Wednesday, 5 September 2012

अनास्था के दौर में शिक्षक का सम्मान


हरिवंश चतुर्वेदी, निदेशक, बिमटेक
पिछले 50 वर्षों से हम पांच सितंबर को शिक्षक दिवस के रूप में मनाते आ रहे हैं। यह सिलसिला साल 1962 में शुरू हुआ था, जब सर्वपल्ली राधाकृष्णन भारतीय गणराज्य के दूसरे राष्ट्रपति बने थे। आज शिक्षक दिवस एक रस्म-अदायगी भर रह गया। इस दिन स्कूलों में गुरु महिमा के गीत गाए जाते हैं और महामहिम राष्ट्रपति के हाथों कुछ शिक्षकों को पुरस्कार दिलाकर भारत सरकार भी अपना फर्ज निभा लेती है।

उत्सवधर्मी देश में शिक्षक दिवस को महज एक औपचारिकता बना  दिया गया है। यह कोई नहीं सोचता कि शिक्षक होने के क्या मायने और सरोकार होते हैं। क्या भारतीय समाज शिक्षकों को अब उतना सम्मान देता है, जितना किसी आईएएस, आईपीएस, इंजीनियर, डॉक्टर, वकील, पत्रकार और बैंक अधिकारी को दिया जाता है? शिक्षकों के वेतन-भत्ते बेहतर होने के बावजूद प्रतिभाशाली विद्यार्थी शिक्षक क्यों नहीं बनना चाहते? शिक्षक के पेशे में आज कोई आकर्षण क्यों नहीं देखा जाता? कभी शिक्षकों की पूजा होती थी, उनसे प्रेरणा ली जाती थी, पर आज हम क्रिकेट और फिल्म जगत के स्टार, धन कुबेरों से ज्यादा प्रभावित होते हैं।

शिक्षकों के बारे में समाज की धारणा पिछले 50 वर्षों में कैसे बदल गई, यह हमारे साहित्य और फिल्मों में शिक्षक पात्रों के चरित्र-चित्रण में देखा जा सकता है। 20वीं सदी के लेखकों यथा प्रेमचंद, शरत चंद्र, बंकिम चंद्र, रवीन्द्रनाथ टैगोर आदि ने अपनी रचनाओं में शिक्षकों को बहुत सकारात्मक रूप में चित्रित किया। भारतीय फिल्में भी आजादी से पहले और बाद में शिक्षकों को राष्ट्र निर्माता और एक आदर्श नायक के रूप में दिखाती रहीं। फिल्म गंगा-जमुना में जब अभिनेता अभि भट्टाचार्य इंसाफ की डगर पे, बच्चों दिखाओ चल के  गाना स्कूली बच्चों के साथ गाते हैं, तो यह संदेश देते हैं कि शिक्षक भारतीय समाज के लिए एक जिम्मेदार भावी पीढ़ी तैयार करते हैं।

हाल की फिल्मों में शिक्षक एक हास्यास्पद चरित्र भर रह गया है। इन फिल्मों के शिक्षक एक सनकी, जिद्दी और तानाशाह के रूप में कहानी में आते हैं और विद्यार्थी वर्ग की मानसिकता से बिल्कुल कटे होते हैं। बॉलीवुड फिल्मों थ्री इडियटस और मुन्नाभाई एमबीबीएस में प्रिंसिपल को जिस रूप में पेश किया गया है, निश्चित रूप में वह एक नकारात्मक चरित्र है।

पिछलें 50 वर्षों में भारतीय समाज ज्ञान, विद्या, समानता, चरित्र निर्माण, भाईचारा, सद्भाव और सामाजिक प्रतिबद्धता जैसे मूल्यों के प्रति अपनी निष्ठा लगातार खोता गया है। इसके विपरीत धनलिप्सा, चालाकी, अवसरवादिता जैसे नकारात्मक मूल्य हमारे समाज पर हावी होते चले गए। इस दौर में शिक्षकों की पेशागत प्रतिबद्धताओं और योग्यताओं में भी लगातार क्षरण होते देखा गया। आजादी के बाद के प्रारंभिक दशकों में शिक्षकों की कार्यदशाएं और वेतन-भत्ते अन्य पेशों की तुलना में कम थे। नतीजतन पूरे देश में प्राथमिक, स्कूली और कॉलेज-यूनिवर्सिटी के शिक्षकों की यूनियनों ने उन्हें लामबंद करके लगातार आंदोलन किए।

शिक्षकों को राजनीतिक दलों ने विधानमंडलों और संसद के लिए भी नामित किए। इस राजनीतिकरण ने जहां उन्हें आर्थिक लाभ पहुंचाए, वहीं उन्हें शिक्षा के उन्नयन से लगातार विमुख किया। क्या हमारे राष्ट्रीय व प्रादेशिक शिक्षक संघ शिक्षकों की उदासीनता के लिए उत्तरदायी नहीं हैं? पिछले तीन दशक में चौथे वेतन आयोग से लेकर छठे वेतन आयोग की सिफारिशों के लागू होने से सरकारी कर्मचारियों की तरह शिक्षकों के वेतनमानों में भी लगातार वृद्धि हुई। 1977 में डिग्री कॉलेज के एक लेक्चरर को करीब एक हजार रुपये मासिक वेतन मिलता था, जो छठे वेतन आयोग की सिफारिशें लागू होने के बाद लगभग 35,000 रुपये तक पहुंच गया है, यानी कि 35 वर्षों में 35 गुना। भारतीय समाज में शिक्षकों की प्रतिष्ठा लगातार कम होने का कारण शिक्षकों का आर्थिक स्तर बढ़ने के साथ-साथ हिसाबदेयता और पेशागत प्रतिबद्घता में कमी होना भी है।

प्राथमिक शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा तक, सभी जगह शिक्षकों का विद्यार्थियों से अलगाव बढ़ता जा रहा है। सरकारी स्कूलों, राज्य विश्वविद्यालयों व अनुदानित डिग्री कॉलेजों में शिक्षकों के कार्य दिवस कम होते जा रहे हैं। उत्तर भारत के कई राज्यों में डिग्री कॉलेजों और विश्वविद्यालय परिसरों में 100 दिन भी पढ़ाई नहीं होती। इसके लिए शिक्षकों से ज्यादा जिम्मेदारी कुलपतियों, प्राचार्यों और विभागाध्यक्षों की है, जो सख्ती बरतने का खतरा नहीं उठाते और दोषी शिक्षकों व विद्यार्थियों से जवाब-तलब नहीं करते। ग्रामीण भारत के  प्राइमरी स्कूलों व माध्यमिक विद्यालयों में हालत गंभीर है, क्योंकि अधिकांश शिक्षक शहरों व कस्बों में रहते हैं तथा पढ़ाई-लिखाई से उदासीन हैं।

यह सच है कि सभी शिक्षक अपनी जिम्मेदारी से नहीं भागते। शिक्षकों के एक बड़े वर्ग की दिलचस्पी सचमुच पढ़ाने-लिखाने में रहती है। हमारे देश में उच्च शिक्षा प्राप्त करने वाले विद्यार्थियों की तादाद अभी हाल में 1.4 करोड़ बताई गई है। इन विद्यार्थियों को पढ़ाने के लिए जरूरी समुचित संसाधनों की कमी है। कक्षाएं, प्रयोगशालाएं, लाइब्रेरी, हॉस्टल, खेल आदि की सुविधाएं पर्याप्त और अच्छी क्वालिटी की नहीं हैं। देश के किसी भी कालेज या यूनिवर्सिटी कैम्पस में अगर आप जाएं, तो युवा विद्यार्थियों का अक्सर हुजूम दिखाई देगा। आम तौर पर इसका कारण कक्षाएं न लगना होता है। लेकिन इस भीड़भाड़ का एक मुख्य कारण युवा आबादी में हो रही बेतहाशा वृद्धि के साथ-साथ उच्च शिक्षा का समुचित विस्तार न होना भी है।

कल्पना करें कि 2025 तक उच्च शिक्षा में विद्यार्थियों की संख्या जब मौजूदा 1.4 करोड़ से बढ़कर 5.5 करोड़ हो जाएगी, तो क्या हाल होगा? विश्व के अन्य विकसित व विकासशील देशों की तुलना में हमारे पास कम शिक्षक उपलब्ध हैं। यूनेस्को के अनुसार, प्रति दस लाख आबादी पर भारत में 578 डिग्री शिक्षक हैं, जबकि उत्तरी अमेरिका में 3612, पूर्वी एशिया में 3205, चीन में 1199, लैटिन अमेरिका में 1608 और अरब देशों में 730 शिक्षक हैं।

दरअसल, हमारी शिक्षा से जुड़ी समस्याएं जितनी विराट हैं, उनका पुख्ता समाधान सरकार, शिक्षक और समाज के संयुक्त और दीर्घकालीन प्रयासों से ही संभव है। समाज और सरकार के अलावा शिक्षकों में भी आत्मालोचना की बड़ी जरूरत है। उन्हें नई शिक्षण पद्धतियों, सूचना प्रौद्योगिकी एवं 21वीं सदी के शिक्षाशास्त्र से प्रशिक्षित और सुसज्जित करने की जरूरत है। 1949 में जब सर्वपल्ली राधाकृष्णन भारत के राजदूत के रूप में सोवियत रूस के राष्ट्राध्यक्ष जोसेफ स्टालिन से मिलने पहुंचे, तो स्टालिन खड़े हो गए और उन्हें कुरसी पर बैठाया। स्टालिन ने कहा कि मेरे लिए आप एक शिक्षक हैं, जो राजदूत से बड़ा होता है। क्या हमारे शिक्षकों को आने वाले दशकों में इतना मान-सम्मान मिल पाएगा?

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