Saturday, 1 September 2012

मंगल की अनोखी दुनिया


मंगल ग्रह की खोज-बीन के लिए अब तक की सबसे महंगी योजना के तहत नासा का यान क्यूरियॉसिटी पूरे ढाई अरब डॉलर खर्च करके इस ग्रह पर अपना डेरा जमा चुका है। दुनिया भर के अंतरिक्ष वैज्ञानिक अगले दो साल इसकी भेजी सूचनाओं के मायने खोजने में जुटे रहेंगे। क्यूरियॉसिटी को गेल क्रेटर नाम के इलाके में उतारा गया है, जो मंगल पर अरबों साल पहले हुए किसी उल्कापात से बना है और जिसमें सदूर अतीत में कोई झील होने के लक्षण मौजूद हैं। इस क्रेटर के बीचो-बीच करीब साढ़े पांच मीटर ऊंचा पहाड़ माउंट शार्प है, जिसकी तहों में मंगल का दो अरब साल पुराना इतिहास देखा जा सकता है। वैसे मंगल ग्रह पर हमारे सौरमंडल की कुछ सबसे अद्भुत भौगोलिक संरचनाएं मौजूद हैं, जिनमें तीन का जिक्र यहां किया जा रहा है-

ओलिंपस पर्वत - ऐवरेस्ट का लगभग तीन गुना (22 किलोमीटर) ऊंचा यह पहाड़ असल में एक खास किस्म का ज्वालामुखी पर्वत (शील्ड वॉल्केनो) है। पृथ्वी पर इस तरह के पहाड़ प्रशांत महासागर में स्थित हवाई द्वीपों में पाए जाते हैं। ओलिंपस की चोटी पर छह विशाल गड्ढे मौजूद हैं। इस पहाड़ की सबसे बड़ी खासियत यह है कि अगर आप नीचे जमीन से इसे देखें तो जान नहीं पाएंगे कि आप इतने ऊंचे पहाड़ के करीब हैं। यही नहीं, अगर आप इसकी चोटी पर खड़े हों तो भी आपको इसका कोई अंदाजा नहीं होगा कि आप इतनी ऊंचाई पर हैं। इसकी वजय यह है कि मंगल पर क्षितिज का दायरा तीन किलोमीटर का ही होता है और ओलिंपस की ढलान इतनी कम है कि तीन किलोमीटर में चढ़ाई का पता ही नहीं चलता।

मैरिनर घाटी - चार हजार किलोमीटर लंबी और दो सौ किलोमीटर चौड़ी घाटियों की यह श्रृंखला अमेरिका की ग्रैंड कैन्यन की याद दिलाती है, लेकिन ग्रैंड कैन्यन इनकी तुलना में कुछ भी नहीं है। ये घाटियां मंगल की भूमध्य रेखा के साथ-साथ ही चलती हैं और इसकी एक चौथाई परिधि तक जाती हैं। ये कैसे बनीं, इस बारे में अनुमान ही लगाए जाते रहे हैं, लेकिन वैज्ञानिकों का बहुमत इन्हें विशाल टेक्टोनिक दरारें मानता है। धरती पर इतनी बड़ी टेक्टोनिक दरारों की कल्पना भी नहीं की जा सकती, लिहाजा यहां इनकी कोई उपमा नहीं खोजी जा सकती। मैरिनर घाटी के दोनों छोरों पर बहते या ऊपर से गिरते पानी से बनी नालियों जैसी संरचनाएं मौजूद हैं, जो अरबों साल पहले दव कार्बन डाई ऑक्साइड के बहने से भी बनी हो सकती हैं।
हेलास इंपैक्ट बेसिन - यह किसी विशाल उल्का पिंड के मंगल से टकराने से टकराने से बना क्रेटर है, वह भी कोई ऐसा-वैसा नहीं। असल में यह हमारे सौर मंडल का सबसे बड़ा क्रेटर है। इसकी गहराई इतनी है कि पूरा ऐवरेस्ट इसमें समा जाए और उसकी चोटी तक दिखाई न पड़े। परिधि से इसकी गहराई पूरे नौ किलोमीटर और भूतल से 7,152 मीटर है। इस क्रेटर की चौड़ाई 2,300 किलोमीटर यानी चंडीगढ़ से चेन्नै तक की दूरी के आसपास है। इस क्रेटर की गहराइयों में पानी खासकर गर्मियों की दोपहर में अपने द्रव रूप में भी मौजूद हो सकता है, हालांकि इसे अब तक जांचा नहीं गया है। अलबत्ता ग्लेशियर जैसी कुछ संरचनाएं इसके किनारों पर जरूर नजर आती हैं।(ref-nbt.in)

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