Friday, 3 August 2012

डीएनए फिंगर प्रिंटिंग

शुकदेव प्रसाद 
साक्ष्य के रूप में डीएनए अपराध अन्वेषण के क्षेत्र में डीएनए फिंगर प्रिंटिंग की अप्रतिम भूमिका सिद्ध हो चुकी है। इस तकनीक के विकास का श्रेय लेस्टर विश्वविद्यालय, इंग्लैंड के आनुवंशिकीविद प्रो. अलेक जेफरीज को जाता है, जिन्होंने 1985 में इस तकनीक का विकास किया था। भारत में इस विधि के आविष्कार का श्रेय डॉ. लालजी सिंह को है, जो तब हैदराबाद स्थित कोशिकीय एवं आणविक जीन विज्ञान केंद्र (सीसीएमबी) के निदेशक थे। उन्होंने 1988 में इस प्रविधि का विकास किया था। अब वह काशी हिंदू विश्वविद्यालय के कुलपति हैं। 1988 में डॉ. वीके कश्यप ने भारत में इसकी कानूनी स्वीकृति के लिए प्रयास आरंभ किया। 1988 में बहुचर्चित बीना जैन हत्याकांड को बेंगलूर पुलिस ने इसी आधार पर निपटाया था। इस प्रकरण में अपराधियों तक पहुंच पाना अत्यंत दुरूह था, क्योंकि साक्ष्य के तौर पर मात्र मृत महिला की अस्थियां ही उपलब्ध थीं, लेकिन डीएनए फिंगर प्रिंटिंग के आधार पर पुलिस ने हत्या की गुत्थी सुलझा दी। पितृत्व सिद्ध करने के लिए 1989 में तलशेरी (केरल) में एक प्रसिद्ध मुकदमे में यह रीति सफल सिद्ध हुई। फिर मद्रास उच्च न्यायालय में भी एक मुकदमे में इस रीति को अपनाया गया। राजीव गांधी हत्याकांड संबंधी मुकदमे में तनु नामक मानव बम की ठीक से पहचान करने में डीएनए फिंगर प्रिटिंग प्रविधि सफल रही। बिल क्लिंटन और उनकी सचिव मोनिका लेवेंस्की प्रकरण में भी यह सफल रही है। इस संदर्भ में ताजातरीन मामला वयोवृद्ध राजनीतिज्ञ एनडी तिवारी का है। पांच वषरें की अदालती कवायद के बाद अंततोगत्वा सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर एनडी तिवारी को अपना ब्लड सैंपल देना ही पड़ा और जब हैदराबाद की सीडीएफसी लैब ने परीक्षण किया तो उनका डीएनए छाप आरोप लगाने वाले और उसकी मां के रक्त नमूनों से हूबहू मैच कर गया। अब यहां यह जानना लाजिमी है कि डीएनए छाप का आधार क्या है और वह कैसे इस तरह के मामलों का निर्धारण करता है अथवा अपराधियों की जड़ तक पहुंचता है? जगनियंता ने धरती के सभी जीवधारियों को अलग-अलग सांचों से ढालकर निकाला है। जिस प्रकार दो व्यक्तियों के हाथों और पैरों की अंगुलियों के निशान या उभार समान नहीं होते उसी प्रकार दो व्यक्तियों के डीएनए प्रिंट भी समान नहीं होते हैं। माता-पिता के डीएनए का कुछ अंश बच्चों से साम्य रखता है और यही है डीएनए फिंगर पिं्रट का आधार। प्रत्येक जीवधारी की समस्त जैविक गतिविधियां कोशिकीय स्तर पर संपन्न होती हैं। मानव शरीर की प्रत्येक कोशिका में पाए जाने वाले डीएनए का तीन प्रतिशत भाग ही जैविकी का नियंत्रक है और यह प्राय: सभी मनुष्यों में समान पाया जाता है। मानव कोशिकाओं के 97 प्रतिशत डीएनए क्या कार्य करते हैं, इसका ज्ञान हमें नहीं है। अत: उन्हें रद्दी जीन (जंक जीन) की संज्ञा दी गई है। जीन वस्तुत: डीएनए के छोटे-छोटे हिस्से हैं। रद्दी जीनों का मात्र दशमलव एक प्रतिशत भाग ही व्यक्तिगत विविधता के लिए जिम्मेदार है। इसी भिन्नता से दो व्यक्तियों के बीच डीएनए प्रिंट पैतृकता का निर्धारण करता है, छाप समान पाए जाने पर अपराधियों तक जा पहुंचता है। जंक जीनों में बहुत सी टेंडम रिपीट (अनुबद्ध श्रृंखला) पाई जाती हैं, जो डीएनए फिंगर प्रिंटिंग का आधार है। डीएनए की संरचना दोहरी कुंडली (डबल हेलिक्स) जैसी होती है। हर कुंडली (फीते) की संरचना शर्करा-फास्फोरस-शर्करा-फास्फोरस से होती है। हर फीते को पाली न्यूक्लिओटाइड कहते हैं। इन फीतों को जोड़ने का काम चार नाइट्रोजन क्षार-एडीनीन (ए), गुआनीन (गु), थायमीन (टी) और साइटोसीन (सी) करते हैं। ए हमेशा टी से और गु हमेशा सी से क्रमश: हाइड्रोजन के दो और तीन कमजोर बंधों से बंधे रहते हैं। न्यूक्लिओटाइडों की बार-बार दोहराई जाने वाली एक ही श्रृंखला को टेंडम कहते हैं। टेंडम रिपीट्स की संख्या परिवर्तनशील होती है। कभी-कभी दो या तीन इकाइयों का समूह अथवा ऐसे सैकड़ों समूह दोहराए जाते हैं। जैसे एक फीते में दो दोहराव-जीएटीए/जीएटीए-अथवा तीन दोहराव जीएटीए/जीएटीए/जीएटीए। तो इसके पलट दूसरे फीते में क्रम इसका ठीक उल्टा होगा, जैसे सीटीएटी/सीटीएटी और इसी प्रकार तीन दोहराव इस प्रकार होगा-सीटीएटी/सीटीएटी/सीटीएटीआदि। उल्लेखनीय है कि प्रत्येक व्यक्ति में पाया जाने वाला डीएनए पुनरावृत्त अनुक्रम (टेंडम रिपीट) समान नहीं होता है। टेंडम रिपीटों की भिन्नता ही व्यक्ति की विशिष्टता है और यह हम विरासत में अपने जनकों से प्राप्त करते हैं। टेंडम रिपीटों की संख्या में भिन्नता के कारण इस क्षेत्र को चर संख्या टेंडम पुनरावृत्त कहते हैं। यदि दो डीएनए प्रतिचित्रों में वीएनटीआर की लंबाई समान है तो इसका अर्थ यह है कि वे एक ही व्यक्ति से प्राप्त किए गए हैं और यदि वीएनटीआर की लंबाइयों में भिन्नता है तो समझना चाहिए कि दोनों डीएनए नमूने भिन्न-भिन्न व्यक्तियों से लिए गए हैं। इसी आधार पर डीएनए प्रतिचित्र एक ऐसा साक्ष्य बन जाता है जो पितृत्व सिद्ध करने अथवा अपराधियों की पहचान करने में विश्वसनीय प्रमाण सिद्ध होता है। डीएनए फिंगर प्रिंटिंग से प्राप्त बैंड नमूने हर व्यक्ति के भिन्न होते हैं। उंगलियों से प्राप्त चिह्नों में जिस प्रकार एक विशिष्टता होती है उसी प्रकार हर डीएनए फिंगर प्रिंटिंग में विशिष्टता होती है, जो एक व्यक्ति की दूसरे से अलग पहचान बनाती है। इस प्रविधि में रक्त, वीर्य, बालों के टुकड़े या फिर मृतक के नाखूनों से चिपकी हुई अपराधी की चमड़ी का अल्पांश भी मिल जाए तो अपराधी तक पहुंचा जा सकता है। डीएनए का स्वरूप कभी भी नहीं परिवर्तित होता है, यहां तक कि मृत्यु के बाद भी और इसीलिए इसकी मैचिंग अकाट्य साक्ष्य है।

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