Friday, 31 August 2012

खुद से खतरा है सोशल मीडिया को

सोशल मीडिया 
गौतम चिकरमने, एग्जीक्यूटिव एडीटर, बिजनेस, हिन्दुस्तान टाइम्स
आपमें से ज्यादातर लोगों की तरह ही, जो आर्थिक या राजनीतिक, घरेलू या अंतरराष्ट्रीय, प्रशासनिक या भ्रष्टाचार या फिर आस्था या तर्क के मुद्दों पर अपनी एक राय रखते हैं, मैं भी उन लोगों का शिकार हूं, जो नफरत फैलाते हैं, लोगों पर ठप्पे लगाते हैं, अश्लीलता परोसते हैं और सबका अपमान करते हैं। ऐसे काम वे इतने जोर-शोर से करते हैं, जैसे उनके पास कोई और काम हो ही नहीं। यह किसी बात को तथ्यों के साथ, आंकड़ों के साथ तर्कपूर्ण ढंग से रखने से अलग है। मुझे इसी तरह का विमर्श अच्छा लगता है और मैं उसी में शामिल होता हूं। लेकिन ये लोग कुछ भी कहते हैं, कुछ भी करते हैं, नफरत, यहां तक कि देशद्रोह जैसी भावनाएं फैलाते हैं और बच निकलते हैं। इसका कारण है उन्हें मिली अनाम रहने की सुविधा। अनाम रहने की इसी सुविधा का लाभ उठाकर इंटरनेट पर और खासतौर पर सोशल मीडिया पर लोग किसी को भी निशाना बनाते हैं, नुकसान पहुंचाते हैं और फिर गायब हो जाते हैं। यह ऐसा काम है, जिसे हकीकत की दुनिया में आप नहीं कर सकते।
वर्चुअल दुनिया में इन्फ्रास्ट्रचर चलाने वाली गूगल, ट्विटर और फेसबुक जैसी कंपनियां ऐसे लोगों के अकाउंट बंद करने में आनाकानी करती हैं। जब वे ऐसे लोगों के अकाउंट बंद करती हैं, तो वे कई तरह के आरोपों में घिर जाती हैं। अगर नहीं करतीं, तो सरकार उन पर शिंकजा कसने लगती है। जैसे कि हाल ही में भारत सरकार ने ट्विटर पर दबाव डालकर ऐसे लोगों के अकाउंट बंद करवाए, जो विभिन्न समुदायों के खिलाफ नफरत फैलाने का काम कर रहे थे। लेकिन इसी प्रक्रिया में कुछ ऐसे नामचीन लोगों के जायज अकाउंट भी बंद हो गए, जो सिर्फ सरकार के आलोचक थे। वैसे जिनसे शिकायत है, उनके खिलाफ सरकार भी कुछ कर पाने की स्थिति में नहीं है। अनाम रहने में तब तक कोई दिक्कत नहीं है, जब तक कि आपका अनाम रहना किसी को आहत न कर रहा हो। मसलन, अगर आप निजी बातचीत में यह कहते हैं कि फलां मंत्री भ्रष्ट है, तो इसमें कोई दिक्कत नहीं है। अगर आप यही बात ट्विटर पर या किसी ब्लॉग में कहते हैं, तो इसका अर्थ है कि यह निजी बातचीत नहीं है और आप इसे सार्वजनिक मंच से कह रहे हैं।
पिछले हफ्ते हुए हिन्दुस्तान टाइम्स के डिजिटल लिटरेसी सम्मेलन में सूचना तकनीकी राज्यमंत्री सचिन पायलट ने कहा था कि सरकार चाहती है कि हर परिवार में कम से कम एक शख्स ऐसा जरूर हो, जो डिजिटल साक्षर हो। विडंबना यह है कि जब हम इस बात को कर रहे थे, तभी ट्विटर पर लगाम कसने की खबर भी आ गई। डिजिटल साक्षरता एक ऐसा औजार हो सकता है, जिससे आर्थिक विकास के मोर्चे पर हम एक या दो पीढ़ी में लंबी छलांग लगा सकते हैं। लेकिन यह सब जो चल रहा है, उससे तो इसमें बाधा ही आएगी। और काफी अजीब तरीके से आएगी। नतीजा यह हुआ है कि दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र दुनिया के सबसे बड़े एकदलीय व्यवस्था वाले देश चीन के साथ खड़े होकर संयुक्त राष्ट्र से फेसबुक और ट्विटर पर लगाम लगाने की मांग कर रहा था। अभी साल-दो साल पहले तक टय़ूनीशिया, मिस्र और लीबिया जैसे देशों के तानाशाहों का तख्ता पलट हुआ, सोशल नेटवर्किग पर इस तरह की पाबंदियां लगाने से वहां की सरकारों को कई तरह के दमनकारी अधिकार मिल सकते थे। अगर भारत सरकार की यह योजना आगे बढ़ती है, तो सरकार को पूरी सावधानी से साथ अपने घरेलू दिशा-निर्देश बनाने पड़ेंगे। बहुत सारा काम तो हो भी चुका है। अब जो स्थिति है, उसमें आपको तथा आपकी बातों को आपके आईपी एड्रेस, फोन व सिग्नल के जरिये ट्रैक किया जा सकता है।
अनाम बने रहने के अपने फायदे हैं। इसमें उन लोगों को अवाज मिल जाती है, जो सामने आने से घबराते हैं या मनोवैज्ञानिक रूप से अपने भीतर ही सिमटे रहते हैं। ऐसे लोगों को दूसरों तक अपनी आवाज पहुंचाने का जरिया मिल जाता है। लेकिन जब अनाम रहने की सुविधा को लोगों को नुकसान पहुंचाने के औजार में बदल देते हैं, तो यह तय है कि समाज यह सुविधा आपके पास ज्यादा समय तक नहीं रहने देगा। कुछ सिरफिरे आतंकवादियों ने विमान को अमेरिका के ट्विन टॉवर से टकरा दिया था और उसके बाद हवाई अड्डों में सुरक्षा जांच के ढेर सारे चरण बना दिए गए, इसका नतीजा यही हुआ कि लागत बढ़ी और विमान यात्रा बहुत महंगी हो गई। यही इंटरनेट के मामले में भी होगा। अनाम रहने की सुविधा का गलत फायदा अगर एक हद से ज्यादा उठाया गया, तो नतीजा यहां भी लागत का बढ़ जाना ही होगा।
आइए, अब हकीकत की दुनिया में अपना अक्स देखते हैं। हम प्रशासन के मामले में सरकार से पारदर्शिता की उम्मीद करते हैं। जब चुनाव होते हैं, तो हम चाहते हैं कि हमें राजनेताओं की संपत्ति की पूरी जानकारी मिले। जनता से पैसे इकट्ठा करने के लिए जब कोई कंपनी पूंजी बाजार में आती है, तो हम उससे हर चीज के खुलासे की उम्मीद रखते हैं। सूचना के अधिकार से आप अधिकारियों और नौकरशाहों के बारे में बहुत छोटी से छोटी चीज भी जान सकते हैं। तो क्यों नहीं वचरुअल दुनिया में हमारा व्यवहार भी पारदर्शी हो?
वैसे पिछले कुछ दिनों से मैं सोशल मीडिया और अभिव्यक्ति की आजादी पर पाबंदी के आर्थिक विकास से रिश्ते को पता लगाने की कोशिश कर रहा हूं। लेकिन लगता है कि इनके बीच में कोई रिश्ता है ही नहीं। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बिना पिछले तीन दशक से आर्थिक कामयाबी के झंडे गाड़ने वाला चीन अगर एक तरफ है, तो दूसरी तरफ उत्तर कोरिया है। इसी तरह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता वाले देशों में अगर एक तरफ अमेरिका है, तो दूसरी तरफ पाकिस्तान भी है। 

No comments:

Post a comment