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सोमवार, 11 जून 2012

ऊर्जा जरूरतों की पूर्ति


प्लास्टिक से पेट्रोल बनाने की प्रौद्योगिकी पर 
शशांक द्विवेदी
दैनिक जागरण में 10/6/12 को प्रकाशित
किसी आधारभूत उत्पाद या तकनीक के संदर्भ में दूसरों पर आश्रित रहना देश के अर्थतंत्र के लिए कितना भारी पड़ता है इसका ज्वलंत प्रमाण है भारत में कच्चे तेल की कमी। पेट्रोल और डीजल की कीमतों में लगातार हो रही मूल्य वृद्धि ने आम आदमी की कमर तोड़ दी है। कच्चे तेल की कीमतों में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर निरंतर उतार-चढ़ाव से पेट्रोलियम उत्पादों की कमी वाले देशों के अर्थतंत्र को जड़ से हिला दिया है। देश की ऊर्जा आवश्यकताओं की पूर्ति और अन्य कार्योँ के लिए कच्चे तेल और पेट्रोलियम उत्पादों का आयात किया जाता है जिस कारण भारत की मुद्रा विदेशी हाथों में जाती है। अर्थशास्ति्रयों के अनुसार यदि एक बैरल कच्चे तेल की कीमत में एक डॉलर की वृद्धि होती है तो भारत के तेल आयात बिल में लगभग 425 मिलियन डॉलर का अतिरिक्त व्यय जुड़ जाता है। तेल की कीमतों में वृद्धि का सीधा असर हमारे मुद्रा भंडार पर पड़ता है। इन दिनों कच्चे तेल की कीमतों में उतार चढ़ाव जारी है। तेल की ये कीमतें हमारे घरेलू और बाहरी दोनों मोर्चो को बुरी तरह से प्रभावित करेंगी। कीमतों का ये असर अर्थव्यवस्था को कमजोर करने वाला है जिसे कम किए जाने की जरूरत है। ऐसी विषम परिस्थितियों में हमें इसका स्थायी समाधान खोजना होगा। इसलिए अब हमें इस दिशा में आत्मनिर्भरता प्राप्त करने के ठोस तथा सकारात्मक उपायों पर विचार करना पड़ेगा। इसके लिए हमें देश में दूसरे तरीकों से पेट्रोल और डीजल को बनाना होगा या इसका विकल्प खोजना होगा। पिछले दिनों भारतीय पेट्रोलियम संस्थान (आइआइपी) में वैज्ञानिकों की टीम ने पर्यावरण के लिए खतरनाक माने जाने वाले प्लास्टिक से पेट्रोलियम बनाने की नई प्रौद्योगिकी विकसित की है। करीब एक दशक के लंबे प्रयोग के बाद आइआइपी के छह वैज्ञानिकों की टीम ने यह कामयाबी हासिल की है। इसमें उत्पे्ररकों का एक संयोजन विकसित किया गया है जो प्लास्टिक को गैसोलीन या डीजल या एरोमेटिक के साथ-साथ एलपीजी के रूप में तब्दील कर सकता है। वास्तव में बेकार हो चुके प्लास्टिक से पेट्रोलियम उत्पाद तैयार करना हमारे वैज्ञानिकों की बड़ी उपलब्धि है। इस परियोजना का प्रायोजक गेल भी बड़े पैमाने पर पेट्रोलियम उत्पाद तैयार करने के लिए काम कर रही है। इस प्रौद्योगिकी की खास विशेषता यह है कि तरल ईधन गैसोलीन और डीजल यूरो 3 मानकों को पूरा करता है और मापदंड में बदलाव के जरिए इसी कच्चे पदार्थ से विभिन्न उत्पाद हासिल किए जा सकते हैं। इसके अलावा यह प्रक्रिया पूरी तरह पर्यावरण के अनुकूल भी है, क्योंकि इससे कोई जहरीला पदार्थ उत्सर्जित नहीं होता है। वेस्ट प्लास्टिक्स टू फ्यूल एंड पेट्रोकेमिकल्स नाम से इस परियोजना की व्यवहार्यता पर 2002 में कार्य शुरू किया गया था और इस परिणाम तक पहुंचने में चार साल का वक्त लगा कि बेकार हो चुके प्लास्टिक को ईधन में तब्दील करना संभव है। एक अनुमान के मुताबिक दुनिया भर में तीन सौ टन से अधिक प्लास्टिक का इस्तेमाल किया जाता है और इसमें सालाना 10 से 12 फीसद बढ़ोतरी हो रही है। पेट्रोल तैयार करने के लिए पॉलीथीलीन एवं पॉलीप्रोपोलीन जैसे प्लास्टिक मुख्य कच्चा माल हैं। एक किलोग्राम पॉलीओलेफीनीक प्लास्टिक से 650 मिली लीटर पेट्रोल या 850 मिलीलीटर डीजल या 450-500 मिलीलीटर एरोमेटिक तैयार किया जा सकता है। देश में एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल एवं बायोडीजल के प्रयोग पर भी बल दिया जाए। विश्व के कई देशों जैसे संयुक्त राज्य अमेरिका, ब्राजील आदि में एथेनॉल मिश्रित पेट्रोलियम का सफल प्रयोग हो रहा है। ब्राजील में बीस प्रतिशत मोटरगाडियों में इसका प्रयोग होता है। अगर भारत में ऐसा किया जाए तो पेट्रोल के साथ विदेशी मुद्रा की बचत होगी। अगर एथेनॉल बनाने वाली चीजों की खेती की जाए तो भी देश तेल के मामले में काफी आत्मनिर्भर हो जाएगा। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं) प्लास्टिक से पेट्रोल बनाने की प्रौद्योगिकी पर शशांक द्विवेदी के विचार दैनिक जागरण में 10/6/12 को प्रकाशित


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