Monday, 11 June 2012

तकनीकी शिक्षा की दशा और दिशा

शशांक द्विवेदी


तकनीकी शिक्षा के इतिहास में यह पहला मौका है जब देश के 14 राज्यों से 143 तकनीकी शिक्षण संस्थानों ने अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (एआइसीटीई) से अपने पाठ्यक्रम बंद करने की इजाजत मांगी है। वजह साफ है इस बार तकनीकी शिक्षा के मौजूदा सत्र में निजी कालेजों में बड़े पैमानें पर सीटें खाली रह गई थीं। जहां कुछ साल पहले तक निजी तकनीकी शिक्षण संस्थान खोलने की होड़ लगी थी, वहीं अब इन्हें बंद करने की इजाजत मांगने वालों की लाइन लगी हुई है। देश के शिक्षा व्यवस्था से जुड़ा यह गंभीर मामला संसद में भी गूंज चुका है। शिक्षा की गुणवत्ता का ध्यान रखे बगैर जिस तरह से पूरे देश में इस तरह के कॉलेजों की बाढ़ सी आ गई थी, ऐसे में एक दिन यह तो होना ही था। उदाहरण के लिए एआइसीटीई से अकेले आंध्र प्रदेश से ही 56 संस्थानों ने अपने पाठ्यक्रम बंद करने की इजाजत मांगी है। ऐसी ही मांगें देश के अन्य राज्यों से भी आ रही हैं। भारत में तकनीकी शिक्षा के वर्तमान स्वरूप को देखकर यह प्रतीत होता है कि हम अभी तक उसे व्यावहारिक और रोजगारपरक नहीं बना पाए हैं। पिछले 25 साल में उच्च और तकनीकी शिक्षा के क्षेत्र में काफी विस्तार हुआ है। आंकड़ों के अनुसार इस समय देश में पैंतीस सौ से अधिक प्रबंधन संस्थान और चार हजार से अधिक इंजीनियरिंग कॉलेज हैं। पर क्या इन संस्थानों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की गारंटी दी जा सकती है। यही वजह है कि पूरे देश में प्राइवेट कॉलेजों में बड़े पैमाने पर सीटे खाली रह गईं। वास्तव में इस स्थिति के जिम्मेदार भी कॉलेज संचालक हैं जिन्होंने गुणवत्ता की ओर जरा भी ध्यान नहीं दिया और इंजीनियरिंग कॉलेज खोलने को एक कमाऊ उपक्रम मान लिया। देश में यह पहली बार हो रहा है कि एक तरफ तो सरकार उच्च शिक्षा के व्यावसायिकरण पर जुटी है, वही दूसरी तरफ लोगों का तकनीकी शिक्षा की गुणवत्ता न रखने वाले निजी कॉलेजों से रुझान इस तरफ कम हो रहा है। पिछले दिनों इस पर योजना आयोग ने अपना दृष्टिकोण-पत्र जारी किया था उसके मुताबिक आयोग चाहता है ऐसे उच्च शिक्षा संस्थानों की स्थापना के लिए अनुमति दे दी जानी चाहिए जिनका उद्देश्य मुनाफा कमाना हो। दृष्टिकोण-पत्र के मुताबिक 12वीं पंचवर्षीय योजना में उच्च शिक्षा, खासकर तकनीकी शिक्षा के क्षेत्र में निजी क्षेत्र को बड़ी भूमिका देने के लिए अनुकूल स्थितियां बनाने की जरूरत है। अभी इस दृष्टिकोण-पत्र पर सरकार की मुहर नहीं लगी है, इसके बावजूद यह सुझाव पिछले वर्षो के दौरान उच्च शिक्षा क्षेत्र के बारे में चली चर्चा के अनुरूप ही है। देश के अधिकांश निजी तकनीकी शिक्षा संस्थान बड़े व्यापारिक घरानों, नेताओं और ठेकेदारों के व्यापार का एक हिस्सा हैं। निजी क्षेत्र की संस्थाएं सस्ते वेतनमान पर किसी को भी शिक्षक बनाकर विद्यार्थियों को धोखा देने का काम कर रही हैं। इनका नतीजा शिक्षा की गुणवत्ता में गिरावट के रूप में सामने आ रहा है। पाठयक्रमों में सालोंसाल कोई बदलाव न होना, उच्च शिक्षा की एक बड़ी कमी है। खासतौर पर इंजीनियरिंग और मेडिकल में, क्योंकि इन क्षेत्रों में नई-नई तकनीकें विकसित होती हैं, नए विभाग, नए पाठयक्रम शुरू होते हैं। भारत में शिक्षा संस्थान धड़ाधड़ खोले जा रहे हैं। भवन तो आलीशान बना दिए जाते हैं, मगर एक अच्छे शिक्षण संस्थान के लिए पुस्तकालय, वर्कशॉप, कंप्यूटर सेंटर और प्रयोगशालाएं भी स्तरीय होनी चाहिए। दुर्भाग्य से हमारे देश में इन्हें छोड़कर ही बाकी सब दिखावटी चीजों के बलबूते शिक्षण संस्थान खड़े किए जाते रहे हैं। यह सिलसिला चलता रहा, तो आने वाले समय में हमारे समाज में घटिया दर्जे के स्नातकों की बड़ी फौज खड़ी हो जाएगी। ये सभी युवा रोजगार के लिए इधर-उधर ठोकरें खाते फिरेंगे और उनकी ऊर्जा को समाज ने सही दिशा नहीं दी, तो उनका क्रोध किसी बड़े आंदोलन की शक्ल ले लेगा। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं) तकनीकी शिक्षा में गिरती गुणवत्ता पर शशांक द्विवेदी की टिप्पणी बदहाल तकनीकी शिक्षा 

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