Friday, 18 May 2012

पृथ्वी दिवस पर प्रभातखबर में

पिछले कुछ महीनों में दुनिया के विभित्र हिस्सों में प्राकृतिक आपदाओं का आना हमें बार बार चेतावनी दे रहा है कि हमारी धरती हमारे ही क्रियाकलापों से विनाश की तरफ बढ. रही है. विकास की अंधी दौर के दुष्परिणामों से धरती को बचाने के लिए 22 अप्रैल 1970 से धरती को बचाने की मुहिम अमेरिकी सीनेटर जेराल्ड नेल्सन द्वारा पृथ्वी दिवस के रूप में शुरू की गयी थी, लेकिन वर्तमान में धरती बचाने की हो रही कोशिशों को देखें, तो लगता है कि यह दिवस सिर्फ आयोजनों तक ही सीमित रह गया है.

पर्यावरण असंतुलन दशकों से मानवजाति के लिए चिंता का सबब है. वास्तव में पर्यावरण संरक्षण हमारे राजनीतिक एजेंडे में शामिल ही नहीं है. पिछले कई वर्षों से दुनियाभर के ताकतवर देशों के कद्दावर नेता हर साल पर्यावरण संबंधित सम्मेलनों में भाग लेते रहे हैं, लेकिन आज तक कोई ठोस लक्ष्य हासिल नहीं हुआ है. इस कथित विकास की बेहोशी से जगने का बस एक ही मूल मंत्र है कि विश्‍व में सह-अस्तित्व की संस्कृति का निर्वहन हो. सह-अस्तित्व का मतलब प्रकृति के अस्तित्व को सुरक्षित रखते हुए मानव विकास करे. इस सिद्धांत को पूरे विश्‍व ने खासतौर पर विकसित देशों ने विकासवाद की अंधी दौड़ में भुला रखा है. वास्तविकता तो यह है कि पिछले 18 वर्ष में जैविक ईंधन के जलने की वजह से कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन 40 प्रतिशत तक बढ. चुका है. पृथ्वी का तापमान 0.7 डिग्री सेल्सियस तक बढ.ा है. अगर यही स्थिति रही तो वर्ष 2030 तक पृथ्वी के वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा 90 प्रतिशत तक बढ. जायेगी. हिमालय और दूसरे ग्लेशियरों के पिघलने की चिंता जताई जा रही है. वर्ष 1870 के बाद से समुद्री जल स्तर 1.7 मिमी की दर से बढ. रहा है. समुद्री जल स्तर अब तक 20 सेमी के लगभग बढ. चुका है. यदि ऐसा ही होता रहा तो एक दिन मॉरीशस जैसे कुछ देश और कई तटीय शहर डूब जाएंगे.

जलवायु परिवर्तन दुनिया में भोजन पैदावार और आर्थिक समृद्धि को प्रभावित कर रहा है. चेतावनी दी जा रही है कि आने वाले समय में जीवन के लिए आवश्यक चीजें इतनी महंगी हो जायेंगी कि उससे देशों के बीच युद्ध जैसे हालात पैदा हो जाएंगे. यह खतरा उन देशों में ज्यादा होगा जहां कृषि आधारित अर्थव्यवस्था है. विकासशील देशों में जलवायु चक्र में हो रहे बदलावों का खतरा खाद्यात्र उत्पादन पर पड़ रहा है, किसान यह तय नहीं कर पा रहे हैं कब बुआई करें और कब फसल काटें. आशंका जताई जा रही है कि तापमान में बढ.ोतरी जारी रही तो खाद्यात्र उत्पादन 40 प्रतिशत तक घट जायेगा. एक नये अमेरिकी अध्ययन में दावा किया गया है कि तापमान में एक डिग्री तक का इजाफा साल 2030 तक अफ्रीका में गृह युद्ध होने का खतरा 55 प्रतिशत तक बढ.ा सकता है और अफ्रीका के उप सहारा इलाके में युद्ध भड़कने से 3 लाख 90 हजार मौतें हो सकती है.

भारतीय पंरपरा में प्रकृति के सह-अस्तित्व पर जोर था, लेकिन, हर कीमत पर विकास की पश्‍चिमी प्रवृत्ति ने हमारे यहां भी ब.डे पैमाने पर पर्यावरण असंतुलन को जन्म दिया है. हमें अपने मॉडल को पुराने सह-अस्तित्व वाले मॉडल की ओर ले जाना होगा. भारत सरकार पहले ही कह चुकी है कि वह आगामी वर्षों में कार्बन उत्सर्जन में 25 प्रतिशत तक की कमी लाने का प्रयास करेगी. हालांकि यह बेहद मुश्किल लक्ष्य है, लेकिन सामूहिक जिम्मेदारी से इसे जरूर हासिल किया जा सकता है. दरअसल हमें अपनी दिनचर्या में पर्यावरण संरक्षण को शामिल करना होगा. हमें यह संकल्प लेना होगा कि पृथ्वी के संरक्षण के लिए हम जो कर सकतेह हैं, वह करेंगे.

बेमौसम बरसात, गहराता पेयजल संकट, बढ.ती प्राकृतिक आपदाएं, विलुप्त होती प्रजातियां एक बेहद खतरनाक भविष्य की ओर इशारा कर रही हैं. इन दिनों न तो हमें चिड़ियों की चहचहाट सुनाई देती है और न ही हमारे घर के आसपास आसमान में धवल पक्षियों की पंक्तियां ही नजर आती हैं. क्या आपको नहीं लगता कि पिछले दो दशक में हमने अपने पर्यावरण को नाश की ओर धकेला है. तो क्यों न कुछ ऐसा किया जाये कि स्थानीय पक्षियों की आबादी को प्रोत्साहित करने के लिए अपनी छत पर उनके लिए घोंसला बनाये या उनके दाने चुगने और पानी पीने का इंतजाम किया जाये.

प्रकृति पर जितना अधिकार हमारा है उतना ही हमारी भावी पीढयों का भी, जब हम अपने पूर्वजों के लगाये वृक्षों के फल खाते हैं, उनकी संजोई धरोहर का उपभोग करते हैं, तो हमारा नैतिक दायित्व है कि हम भविष्य के लिए भी नैसर्गिक संसाधनों को सुरक्षित छोड़ जायें, कम-से-कम अपने निहित स्वाथरें के लिए उनका दुरुपयोग तो न करें. अन्यथा भावी पीढ.ी और प्रकृति हमें कभी माफ नहीं करेगी. इसलिए आज ही और इसी वक्त संकल्प लें कि पृथ्वी को संरक्षण देने के लिए जो हम कर सकेंगे करेंगे और जो नहीं जानते उन्हें इससे अवगत कराएंगे या फिर अपने परिवेश में इसके विषय में जागरूकता फैलाने के लिए प्रयास करेंगे.
प्रभातखबर में 22/04/12 को प्रकाशित 


Prabhatkhabar(leading newspaper in jharkhand,bihar,west bengal) article link

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