Wednesday, 23 May 2012

ऊर्जा सुरक्षा और देश

ऊर्जा सुरक्षा और विश्व का भविष्य
सस्ती व सतत ऊर्जा की आपूर्ति किसी भी देश की तरक्की के लिए सबसे ज्यादा जरूरी है। परंपरागत ऊर्जा के स्रोत सूखते जा रहे हैं। इसलिए जरूरी है कि ऊर्जा के नए स्रोत विकसित किए जाए जो पर्यावरण हितैषी भी हों।
सस्ती और सतत ऊर्जा की उपलब्धता आधुनिक उद्योगों और सभ्यता की मूलभूत आवश्यकता है। ऊर्जा आधुनिक सभ्यता का इंजन है जिसे अधिकांशत: जीवाश्म ईंधनों से प्राप्त किया जाता है। प्रतिदिन पूरे विश्व में भारी मात्रा में ऊर्जा की खपत होती है और मुख्य रूप से यह ऊर्जा हमें कोयला, गैस, पेट्रोलियम और न्यूक्लियर ईंधन से प्राप्त होती है।
पश्चिमी दुनिया में औद्योगिकीकरण की शुरुआत में केवल कोयले का ही प्रयोग किया जाता था। लेकिन 19वीं शताब्दी से मानव सभ्यता की आत्मनिर्भरता कोयले पर से घटी और पेट्रोलियम व गैस का प्रयोग होने लगा। 
तब से लगातार विकास के इंजन को जारी रखने के लिए मानव ने जीवाश्मीय ईंधनों का जमकर दोहन किया है। अब स्थिति ब्रेकिंग प्वाइंट पर पहुँच चुकी है और दुनिया पर ऊर्जा संकट के बादल मंडरा रहे हैं। पेट्रोलियम और गैस का इतना ज्यादा दोहन हुआ है कि उनके भंडार तेजी से कम हो रहे हैं। पेट्रोलियम व गैस के दोहन से ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन होता है जिसकी वजह से हमारी धरती का अस्तित्व ही खतरे में दिखाई पड़ रहा है। एक अनुमान के अनुसार, सन 2030 तक ऊर्जा की वैश्विक मांग वर्तमान की तुलना में 50 से 60 फीसदी तक बढ़ जाएगी। इस समस्या का हल खोजना बेहद जरूरी है। हमें आज ऊर्जा के सतत अक्षय स्रोतों के विकास की जरूरत है जिसमें हाइड्रोजन फ्यूल सेलों से लेकर विंड टार्बाइन तक शामिल हैं जिससे आम जिंदगी का कामकाज सुचारू रूप से चल सके। 

पेट्रोलियम की बढ़ती मांग
भाप शक्ति पर आधारित औद्योगिक क्रांति के पूर्व लकड़ी जलाकर अधिकांश ऊर्जा जरूरतों की पूर्ति कर ली जाती थी। इसके बाद कोयला एक आम ईंधन बन गया। पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस की उपलब्धता के बावजूद दुनिया की एक-चौथाई ऊर्जा आवश्यकताओं की आज भी पूर्ति कोयले के द्वारा ही की जाती है। लेकिन जब से पेट्रोलियम का प्रयोग आरंभ हुआ है तब से कोयले का प्रयोग कम होता जा रहा है। ऊर्जा सामथ्र्य के दृष्टिकोण से कोयले कोई अच्छा विकल्प नहीं है। पर्यावरण व स्वास्थ्य के लिहाज से यह सबसे ज्यादा खतरनाक जीवाश्मीय ईंधन है, लेकिन प्रचुर मात्रा में उपलब्ध होने की वजह से आज भी इसकी मांग है।
आज पेट्रोलियम से दुनिया की 40 फीसदी ऊर्जा आवश्यकताओं की पूर्ति होती है जिसमें से ऑटोमोबाइल प्रमुख है। इसमें से भी एक-चौथाई पेट्रोलियम का उपभोग अकेले संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा किया जाता है।
एक मोटे अनुमान के अनुसार पेट्रोलियम के भंडार अगले 50 वर्र्षों के भीतर ही चुक जाएंगे। इसलिए हम एक बड़े ऊर्जा संकट के मुहाने पर खड़े हैं। पेट्रोलियम के पारंपरिक भंडार तेजी से चुक रहे हैं। जीवाश्मीय ईंधन ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन के सबसे बड़े स्रोत हैं। ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन से ही जलवायु परिवर्तन की समस्या पैदा हो रही है जिससे हमारी धरती का अस्तित्व ही खतरे में पड़ गया है।
प्राकृतिक गैस
प्राकृतिक गैस पेट्रोलियम का एक अच्छा विकल्प साबित हो सकती है लेकिन इनके भंडार भी 21वीं शताब्दी के अंत तक ही समाप्त हो जाएंगे। वर्तमान में पूरी दुनिया की एक-तिहाई बिजली का उत्पादन प्राकृतिक गैस के द्वारा ही किया जाता है।
प्राकृतिक गैस जो कि अधिकांशत: मीथेन है, शायद सबसे ज्यादा साफ-सुथरा जीवाश्मीय ईंधन है। यह कोयले की तुलना में मात्र 40 फीसदी व पेट्रोलियम की तुलना में मात्र 25 फीसदी ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन ही करती है। पेट्रोल की तुलना में अधिक पर्यावरण हितैषी ईंधन होने की वजह से इसका प्रयोग अधिक से अधिक ऑटोमोबाइल में कैम्प्रेस्ड नेचुरल गैस अथवा हाइड्रोजन फ्यूल सेलों को पावर करने के लिए किया जा रहा है।
न्यूक्लियर ऊर्जा
न्यूक्लियर ऊर्जा का प्रयोग लगातार बढ़ रहा है। वर्तमान में दुनिया के 32 देशों के 440 रिएक्टरों के द्वारा दुनिया की 16 फीसदी बिजली का उत्पादन किया जा रहा है।
पर्यावरण संगठनों के लगातार विरोध के बावजूद, कई देश जैसे जापान, अमेरिका और भारत इस तकनीक का अधिक से अधिक प्रयोग कर रहे हैं। हालांकि न्यूक्लियर कचरे का निस्तारण करना अपने आप में एक भारी समस्या है।
अक्षय ऊर्जा विकल्प
चीनियों व रोमनों ने वाटरमिलों का प्रयोग लगभग 2000 वर्ष किया था। लेकिन पहले पनबिजली बांध का निर्माण सर्वप्रथम इंग्लैंड में 1870 में किया गया था। पनबिजली वर्तमान समय में पुनर्नवीकृत ऊर्जा का सबसे प्रचलित प्रकार है जिससे दुनिया की लगभग 20 फीसदी बिजली का उत्पादन किया जाता है।
कम प्रदूषण पैदा करने वाले पुनर्नवीकृत ऊर्जा स्रोतों के द्वारा ही दीर्घावधि में ऊर्जा की समस्या का व्यवहारिक हल खोजा जा सकता है।
सौर ऊर्जा
सूर्य ऊर्जा का अक्षय स्रोत है। यदि ठीक से इसकरी ऊर्जा का उपयोग करने की तकनीक विकसित हो जाए तो हमारी ऊर्जा समस्या का पुख्ता हल निकल सकता है। आज सौर ऊर्जा का प्रयोग कई तरीके से किया जाता है। ऊष्मीय सौर ऊर्जा में सूर्य की रोशनी से छतों पर लगे सौर पैनलों के द्वारा घरेलू प्रयोग के लिए सीधे पानी को गर्म किया जाता है, जबकि सूर्य की रोशनी को फोटोवोल्टेइक सेलों के प्रयोग से बिजली में परिवर्तित किया जा सकता है। इसमें सेमीकंडक्टरों का प्रयोग फोटानों को बिजली में परिवर्तित करने में किया जाता है।
वृहद स्तर पर प्रयोग के लिए फोटोवोल्टेइक सेल काफी महंगे होते हैं, फिर भी दूर-दराज के इलाकों में बिजली सप्लाई के लिए इनका प्रयोग काफी ज्यादा किया जाता है। सोलर पैनलों का प्रयोग अब स्पेसक्राफ्ट, सोलर कारों और हवाई जहाजों में भी किया जाने लगा है।यदि इस क्षेत्र में तकनीकी तरक्की हो जाए तो सस्ते फोटोवोल्टेइक सेल का उत्पादन करना संभव हो सकता है, जिससे सन 2020 तक न्यूक्लियर ऊर्जा से ज्यादा सौर ऊर्जा का उत्पादन संभव हो सकेगा।
ऑटोमोबाइल के लिए ईंधन
यहां पर एक सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि जब तेल के कुएं सूख जाएंगे तो हमारी कारें कैसे सड़कों पर दौड़ेंगी? इस समस्या को सुलझाने की जोरदार कोशिशें जारी हैं।
आंतरिक दहन इंजन के आविष्कार के समय से ही जैव ईंधन के बारे में दुनिया को जानकारी है। अमेरिका में पेट्रोल में इथेनॉल मिलाया जाता है और दुनिया भर में करोड़ों कारें इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल से चलती हैं। यूरोप में जैव ईंधन का उत्पादन बेजीटेबुल के प्रयोग से किया जाता है। सोया तेल का प्रयोग हवाई जहाजों को उड़ाने में किया जा सकता है।
हाइड्रोजन फ्यूल सेलों में भविष्य की संभावनाएं निहित हैं यदि इसके प्रयोग में आने वाली तकनीकी परेशानियों को दूर कर लिया जाए। फ्यूल सेल एक प्रकार की बैटरी होते हैं जिन्हें लगातार रिफिल किया जा सकता है। 
इसमें हाइड्रोजन, ऑक्सीजन के साथ प्रतिक्रिया करके बिजली व जल का उत्पादन करते हैं। यह ईंधन जलाने से कहीं ज्यादा पर्यावरण हितैषी तरीका है, क्योंकि इसमें ऊष्मा का क्षरण काफी कम होता है। लेकिन यह केवल कारों के लिए ही उपयोगी नहीं हैं। हाइड्रोजन का प्रयोग पावर स्टेशनों और इलेक्ट्रॉनिक और पोर्टेबुल गजेट्स में भी किया जा सकता है। छोटे फ्यूल सेल एक दिन निश्चित रूप से बैटरियों को बेकार कर देंगे। फ्यूल सेल प्राकृतिक गैस, मिथेनॉल और कोयले का भी प्रयोग कर सकते हैं। लेकिन इनके साथ एक समस्या कार्बन-डाई-ऑक्साइड के उत्पादन की है। हाइड्रोजन भी पूरी तरह से साफ-सुथरा ऊर्जा विकल्प नहीं है क्योंकि इसमें हाइड्रोजन के उत्पादन के लिए जल को अपने अवयवों में तोड़ा जाता है, जिसके लिए बिजली का 
उपयोग किया जाता है। यह बिजली जीवाश्मीय ईंधन से ही पैदा की जाती है। रेक्जाविक, आइसलैंड जैसे शहरों में बसें चलाने के लिए हाइड्रोजन का ही प्रयोग किया जाता है।
ज्वारीय ऊर्जा
2003 में नार्वे में ज्वारीय ऊर्जा को बिजली में बदलने के लिए प्रथम कॉमर्शियल पावर स्टेशन की शुरुआत की गई। इसका डिजाइन विंड मिल की तरह किया गया है जबकि कई स्टेशन ऐसे हैं जिनका निर्माण टार्बाइनों के रूप में किया गया है।
पवन ऊर्जा
अक्षय ऊर्जा स्रोतों में सबसे ज्यादा बिजली उत्पादन पवन ऊर्जा के द्वारा ही किया जा रहा है। आधुनिक विंड फार्र्मों में बड़े-बड़े टर्बाईन होते हैं जिनसे बिजली उत्पादन किया जाता है। यद्यपि इससे बिजली उत्पादन करना काफी ज्यादा खर्चीला है, लेकिन वायु की सर्वसुलभता को देखते हुए इसका अधिक से अधिक प्रयोग किया जा रहा है।
स्कॉटलैंड में यूरोप के सबसे बड़े विंड फॉर्म का निर्माण किया जा रहा है जिससे लगभग 200,000 घरों को बिजली सप्लाई की जाएगी। भविष्य की इमारतों में टर्बाइनें भी बनाई जाएंगी, जिनसे स्वयं के प्रयोग के लिए 20 फीसदी ऊर्जा का उत्पादन हो सकेगा।


जल ऊर्जा
नदियों का बहता पानी और समुद्र से उत्पन्न ज्वारभाटा व जल तरंगें ऊर्जा का प्रमुख स्रोत बन सकते हैं और इससे बड़ी मात्रा में बिजली उत्पादित की जा सकती है । वर्ष 2005 में देश की विद्युत आपूर्ति में जल ऊर्जा का योगदान 26 प्रतिशत था । देश में इससे 15 हजार मेगावॉट बिजली प्राप्त करने की संभावना है । विदित है कि जल का आवेग वायु के आवेग से भारी होता है, अतः छोटे से झरने से भी काफी बिजली बनाई जा सकती है । जल से बिजली प्राप्त करने का सबसे पुराना तरीका पन बिजली संयंत्र है जो बांध पर निर्भर होते हैं । इसके तहत नदी के पानी को बांध में एकत्रित कर लिया जाता है । इसके बाद बांध का द्वार खोल दिया जाता है और पानी तीव्र गति से पाइप में गिरता है और टरबाइन पर लगते ही टरबाइन चलने लगता है और बिजली का उत्पादन होता है ।  इसके अलावा छोटे-छोटे झरनों पर भी टरबाइन लगाकर बिजली बनाई जा सकती है ।
समुद्र में उत्पन्न होने वाले ज्वार-भाटे व लहरों से भी बिजली प्राप्त की जा सकती है । इससे ऊर्जा प्राप्त करने के लिए समुद्र के कोल पर बैराज बना दिया जाता है और उसके अंदर टरबाइन लगे होते हैं । जब ज्वार तीव्र गति से इसके अंदर प्रवेश करती है तो टरबाइन चलता है और बिजली उत्पन्न होती है । इसी तरह जब पानी वापिस बाहर आता है तब भी बिजली पैदा होती है । इसके अलावा समुद्र तट से परे पानी के भीतर चक्कियां लगाने से भी बिजली प्राप्त की जा सकती है । ये चक्कियां ज्वार-भाटे से चलती है । समुद्र में उत्पन्न होने वाली लहरों से भी बिजली प्राप्त की जा सकती है । भारत की सीमाएं तीन तरफ से समुद्र से घिरी हैं जिसके चलते भारत ऊर्जा उत्पादन में इसका विशेष लाभ उठा सकता है ।
भू-तापीय ऊर्जा
भू-तापीय ऊर्जा पृथ्वी से प्राप्त होने वाली ऊर्जा है । पृथ्वी के भीतर गर्म चट्टानें पानी को गर्म करती है और इससे भाप उत्पन्न होती है । ऊर्जा प्राप्त करने के लिए पृथ्वी के गर्म क्षेत्र तक एक सुरंग खोदी जाती है और इसके जरिए भाप कोऊर्जा संयंत्र तक लाया जाता है जिसके पश्चात टरबाइन घूमने लगते है । एक अनुमान के अनुसार भारत में भू-तापीय ऊर्जा के लिए 113 तंत्रों के संकेत मिले हैं जिससे लगभग 10 हजार मेगावॉट बिजली उत्पादन की संभावना है । भू-तापीय ऊर्जा के लिए लगभग 3 किमी. गहराई तक जमींन के भीतर खुदाई करके जांच करनी होगी लेकिन भारत के पास संसाधनों की कमी के कारण ऐसा नहीं हो पा रहा है । भारत के पास इतनी गहराई तक भेदन क्षमता वाली मशीन नहीं है, अतः ऐसी मशीनों का आयात कर इस स्रोत का लाभ उठाया जा सकता है ।
बायोमास एवं जैव ईंधन
भारत में जैव ईंधन की वर्तमान उपलब्धता सालाना 120-150 मिलियन मीट्रिक टन है । कृषि और वानिकी अवशेषों का प्रयोग ऊर्जा प्राप्त करने के लिए किया जाता है । जैविक पदार्थों से लगभग 16 हजार मेगावॉट बिजली उत्पादित की जा सकती है । भारत की लगभग 90 प्रतिशत ग्रामीण जनसंख्या जैव पदार्थों का प्रयोग खाना बनाने, ऊष्णता प्राप्त करने में करती हैं । इसके अलावा कृषि से निकलने वाले व्यर्थ पदार्थ जैसे खाली भुट्टे, फसलों के डंठल, भूसी आदि और शहरों व उद्योगों के ठोस कचरे से भी बिजली बनाई जा सकती है । भारत में इससे लगभग प्रतिवर्ष 23,700 मेगावॉट बिजली प्राप्त की जा सकती है लेकिन अभी केवल 2,500 मेगावॉट का ही उत्पादन हो रहा है ।
गैर पारंपरिक स्रोतों से प्राप्त होने वाली ऊर्जा में लचीलापन होता है अर्थात कोयले से ऊर्जा प्राप्त करने के लिए 2 हजार मेगावॉट या इससे ज्यादा का प्लांट लगाना पड़ता है जबकि गैर परंपरागत स्रोतों से ऊर्जा प्राप्त करने के लिए एक छोटी सी इमारत में भी 15-20 मेगावॉट का प्लांट लगाया जा सकता है । इन स्रोतों को चलाने के लिए ज्यादा प्रशिक्षण की भी आवश्यकता नहीं है । कोई भी व्यक्ति इसे आसानी से चला सकता है ।
किसी भी देश की अर्थव्यवस्था उसकी ऊर्जा आवश्यकता और पूर्ति पर निर्भर है और हमारा देश ऊर्जा आवश्यकताओं के लिए आयात पर निर्भर है । इस समय तो परमाणु ऊर्जा के लिए विदेशों के साथ हाथ मिलाया जा रहा है । जापान की त्रासदी देखने के बाद भी सरकार को यह समझ नहीं आ रहा है कि परमाणु ऊर्जा देश के लिए कितनी खतरनांक है । परमाणु ऊर्जा के लिए सरकार विदेशों के साथ समझौते कर रही हैं जिसकी एवज में भारतीय मुद्रा विदेशी हाथों में पहुंच रही है जबकि अपने पास अक्षय ऊर्जा के इतने सारे संसाधन मौजूद होने के बावजूद सरकार इसके प्रति ढुलमुल रवैया अपना रही है । भविष्य में जब गैर नवीकरणीय स्रोत खत्म होने की कगार पर होंगे तो नवीकरणीय ऊर्जा का वर्चस्व बढ़ेगा । आज भारत सॉफ्टवेयर के क्षेत्र में आगे बढ़ रहा है जिसके पीछे कई वर्षों की मेहनत है । 90 के दशक में एनआईआईटी जैसे प्रशिक्षण केन्द्रों ने सॉफ्टवेयर इंजीनियरिंग का प्रशिक्षण देना शुरू किया जिसमें युवाओं ने बढ़-चढ़ कर भाग लिया और अब भी ले रहे हैं । इसी तरह अक्षय ऊर्जा के क्षेत्र में भी प्रशिक्षण देकर कुछ लोगों का दल बनाना होगा जो इस दिशा में कार्य करें । आज भारत अपनी अक्षय ऊर्जा की क्षमताओं को पहचान लेगा तो कल पूरे विश्व के लिए आदर्श बनेगा ।


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