Tuesday, 8 May 2012

जल विद्युत् की सार्थकता !!

केंद्र सरकार और लगभग सभी राज्य सरकारें चाहती हैं कि बहती नदियों के पानी को झील अथवा सुरंगों में डालकर जल विद्युत का उत्पादन किया जाये. इससे लोगों का जीवनस्तर सुधरेगा. मैदानी क्षेत्र में कृषि उत्पादन बढ.ाने एवं जनता का पेट भरने के लिए बहती नदी के पानी को नहरों में डालना जरूरी है. इन जनहितकारी कायरें के लिए बांध बनाना उचित लगता है, परंतु नदी का दूसरा पक्ष सांस्कृतिक है.

टिहरी बांध के बनने से जल की गुणवत्ता का ह्रास हुआ है. तीर्थयात्री को वर्तमान में गंगा में डुबकी लगा कर वह सुख हासिल नहीं हो रहा है जो पहले मिलता था. बहते पानी के सांस्कृतिक महत्व को देखते हुए नये बांध बनाना उचित नहीं दिखता है, परंतु लोगों के जीवन स्तर में सुधार करने के लिए इन्हें बनाना उचित दिखता है. केंद्र और राज्य दोनों पक्षों का कहना है कि जनहित के लिए कार्य कर रहे हैं. अतएव दोनों रास्तों से हासिल होने वाले जनहित के अंतर को समझना होगा.

मनोविझान में मनुष्य की चेतना के दो प्रमुख स्तर माने जाते हैं- चेतन एवं अचेतन. सामान्य भाषा में चेतन को बुद्धि तथा अचेतन को मन बताया जाता है. सुखी व्यक्ति की बुद्धि तथा मन में सामंजस्य होता है. जैसे मन कहे कि संगीत सुना जाये और बुद्धि संगीत के कार्यक्रम में ले जाये तो व्यक्ति सुखी हो जाता है. इसके विपरीत मन कहे कि संगीत सुना जाये और व्यक्ति दोस्तों के चकर में सिनेमा देखने चला जाये तो वह दुखी हो जाता है. सुख का सीधा फार्मूला है कि बुद्धि को मन के अनुरूप दिशा दी जाये. बुद्धि और मन का यह विभाजन ही तमाम रोगों और सांसारिक समस्याओं की जड़ है.

मन को जाग्रत करने का दुष्कर कार्य दुनिया की नदियों एवं स्रोतों का पवित्र जल करता है ऐसा समझ में आता है. करोड़ों लोग अपनी मोटी कमाई गंगाजी में एक डुबकी लगाने के लिए खर्च कर देते हैं. देव प्रयाग, ऋषिकेश और हरिद्वार में बहती नदी में स्नान के लिए आये तीर्थ यात्रियों के सर्वेक्षण में 77 प्रतिशत ने बताया कि बहती नदी में स्नान करने से उन्हें मानसिक शांति मिली है. कारण यह कि स्नान से मन जाग्रत हो गया और बुद्धि ने मन के अनुरूप दिशा पकड़ ली. 26 प्रतिशत तीर्थ यात्रियों ने कहा कि उन्हें स्वास्थ लाभ हुआ. कारण यह कि मन की ऊर्जा जागृत होने से फेफ.डे, हृदय आदि अंग सही-सही काम करने लगे. 14 प्रतिशत ने कहा कि उन्हें व्यापार में और 12 प्रतिशत ने कहा कि नौकरी में लाभ हुआ. कारण, मन की ऊर्जा प्रकट होने से उन्होंने सही दिशा पकड़ ली.

जापान के वैज्ञानिक मसारू इमोटो ने पाया है कि बहती नदी में पानी के अणु षट्कोणीय आकर्षक झुंड बना लेते हैं. संभवत: इन्हीं आणविक झुंडों में बहती नदी की शक्ति का संग्रह होता है. इमोटो ने पाया कि पानी को बांध में रोक देने से इन झुंडों का सौंदर्य नष्ट हो जाता है. जलविद्युत टर्बाइन के पंखों से टकराने के बाद जल के षट्कोणीय झुंड बिखर जायेंगे. एक सर्वेक्षण के अनुसार टिहरी के ऊपर षट्कोणीय झुंडों में ऊर्जाके केंद्र दिखते हैं, जो कि टिहरी के नीचे लुप्त हो जाते हैं. इमोटो ने जमजम के पानी का भी अध्ययन किया है. उन्होंने पाया कि इस पानी के षट्कोणीय झुंडों में विशेष सौंदर्य है. 

बहती नदी के पानी में दूसरे गुण भी होते हैं. बहता पानी पत्थरों से रगड़ता है और उसमें तांबा, क्रोमियम जैसे धातु प्रवेश करते हैं. अनेक अध्ययनों में पाया गया है कि संपूर्ण विश्‍व में बांधों के कारण मछलियों की जैविक विविधता का ह्रास हो रहा है. स्पष्ट है कि पानी को रोक कर जल विद्युत बनाने से उसकी गुणवत्ता में अति ह्रास होता है.

मूल प्रश्न है कि नदियों की मनोवैज्ञानिक शक्तियों से अधिक जनहित हासिल होगा या बिजली से? ज्ञात हो कि बिजली के अन्य विकल्प उपलब्ध हैं, जैसे कोयला और सौर ऊर्जा. परंतु बहती नदी की मानसिक शक्ति का कोई विकल्प नहीं है. अत: मेरा मानना है कि नदियों पर बन रहे सभी बांधों को रोकने के साथ-साथ पूर्व में बने टिहरी जैसे बांधों को भी हटाने की पहल करनी चाहिए. इन बातों को न समझने के कारण भारत की जनता बांधों के पीछे भाग रही है. सरकार और जल विद्युत कंपिनयां देशवासियों को भ्रमित करके नदियों को नष्ट करा रही हैं. अत: जनता द्वारा बांधों का सर्मथन किया जाना नासमझी है.

कांग्रेस तथा भाजपा दोनों ही पार्टियां देशवासियों के मन के प्रति उदासीन हैं तथा धन कमाने के लिए प्राकृतिक संसाधनों के दोहन के पक्ष में हैं. श्री अरविंद तथा विवेकानन्द जैसे मनीषियों ने कहा है कि विश्‍व में भारत की भूमिका आध्यात्मिक होगी. इस भूमिका का निर्वाह हम बहती नदी की शक्ति का ह्रास करके नहीं कर सकेंगे. लेखक-डॉ .भरत झुनझुनवाला

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