Wednesday, 23 May 2012

हरित साझेदारी का समय


अमेरिका, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका, चीन और भारत के प्रयासों से हुई कोपेनहेगन संधि की दुनिया भर में तीखी आलोचना हुई है। भारत में विपक्षी दलों ने इसकी बड़ी हल्के अंदाज में आलोचना की है। बहस के दौरान राज्यसभा में विपक्षी नेता ने कहा कि किसी और को खुश करने के लिए हमारे हितों को बलि चढ़ा दिया गया। इसमें कोई संदेह नहीं है कि अमेरिकी राष्ट्रपति को चार उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं के प्रमुखों के साथ मोलभाव करते हुए देखना एक नया अनुभव है। यह भारत के पर्यावरण मंत्री ने भी स्वीकार किया है कि जिस अंतिम दस्तावेज पर हस्ताक्षर हुए हैं, उसमें उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं द्वारा स्वैच्छिक तरीके से कार्बन उत्सर्जन पर अंकुश लगाने के उपायों के सत्यापन के संदर्भ में भारत के दृष्टिकोण से भटकाव है। उन्होंने अपने बचाव में कहा-''भारत बेसिक देशों के साथ मतैक्य के कारण इस पर सहमत हो गया, किंतु ये देश ओबामा के रुख में नरमी लाने में सफल हुए। ओबामा तो विकल्प, पुनर्विचार, जांच, सत्यापन और आकलन जैसे प्रावधानों के साथ आए थे। बेसिक समूह मुख्य रूप से चीन के आग्रह पर कुछ शर्र्तो के साथ परामर्श और विश्लेषण जैसे शब्दों पर सहमत हुआ, जो देश की संप्रभुता को प्रभावित नहीं करेगा।'' राज्यसभा में बहस में जो तथ्य सामने नहीं आया वह यह था कि मनमोहन सिंह और बराक ओबामा के बीच 24 नवंबर को ही, यानी कोपेनहेगन सम्मेलन से पहले ही समझौता हो चुका था कि कोपेनहेगन के परिणाम में विकसित देशों के उत्सर्जन कटौती के लक्ष्य और विकासशील देशों के लिए उपयुक्त कटौती कार्ययोजना का उल्लेख होना चाहिए। वाशिंगटन वार्ता में ही इस पर भी सहमति बन गई थी कि कटौती की पूरी प्रक्रिया पारदर्शी होनी चाहिए। यही कोपेनहेगन में हुआ भी।
कोपेनहेगन सम्मेलन में सबसे अधिक ध्यान विकसित और विकासशील देशों के बीच विभाजन पर केंद्रित था। विकसित देशों की राय थी कि जलवायु परिवर्तन के संदर्भ में उठाए जाने वाले कदमों का संबंध पर्यावरण से है, जबकि विकासशील देश इसे विकास के मसले से जोड़ रहे थे। विचारों की इस भिन्नता के कारण ही इस मुद्दे को उत्तर-दक्षिण टकराव के रूप में देखा जाने लगा। इसलिए इस बात पर ध्यान नहीं गया कि जलवायु परिवर्तन को एक चुनौती के रूप में देखा जाना चाहिए, जो विकसित और उभरती अर्थव्यवस्थाओं के बीच साझेदारी की मांग करती है। वाशिंगटन वार्ता में ही बराक ओबामा और मनमोहन सिंह के बीच इस विचार पर सहमति बन गई थी। इस अवसर पर भारत-अमेरिका संयुक्त बयान में कहा गया था-''यह स्वीकार करते हुए कि ऊर्जा सुरक्षा, खाद्य सुरक्षा और जलवायु परिवर्तन परस्पर संबद्ध हैं और गरीबी उन्मूलन व स्थिर विकास और स्वच्छ ऊर्जा प्रमुख वैश्विक उद्देश्य हैं, चुनौतियों का सामना करने के लिए दोनों नेता हरित साझेदारी में प्रवेश के लिए सहमत हैं।'' 21वीं सदी में स्वच्छ ऊर्जा आधारित अर्थव्यस्था की जरूरत को स्वीकार करते हुए मनमोहन सिंह और बराक ओबामा स्वच्छ ऊर्जा और जलवायु परिवर्तन पहल पर सहमत हो गए। इस पहल का उद्देश्य ऊर्जा को अधिक स्वच्छ, सस्ती और प्रभावी बनाने के लिए नई प्रौद्योगिकी का विकास है, ताकि दोनों देशों की जनता के जीवनस्तर में सुधार आए। इस पहल में पवन ऊर्जा, सौर ऊर्जा, दूसरी पीढ़ी के जैव ईंधन, गैर-परंपरागत गैस, ऊर्जा बचत और स्वच्छ कोयला आधारित प्रौद्योगिकी शामिल है। इस पहल की सफलता भारत और अमेरिका की अपने लोगों के लिए नए आर्थिक अवसरों की क्षमता विकसित करने और स्वच्छ ऊर्जा आधारित रोजगारों पर निर्भर है।
कोपेनहेगन में ओबामा ने कहा कि कार्बन कटौती के कार्य महत्वाकांक्षी हैं, हम इन्हें महज वैश्विक जिम्मेदारियों की पूर्ति के रूप में ही स्वीकार नहीं कर रहे हैं। हम आश्वस्त हैं, जैसे कि आपमें से कुछ आश्वस्त होंगे कि ऊर्जा उत्पादन और उपयोग के तौर-तरीकों में अंतर लाना अमेरिका के आर्थिक भविष्य के लिए जरूरी है। इसी से लाखों नए रोजगारों का सृजन होगा, नए उद्योगों को बिजली मिलेगी, हम प्रतिस्पर्धा कर सकेंगे और एक नए युग का सूत्रपात होगा। हम यह भी समझ रहे हैं कि ऐसा करना हमारी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से भी आवश्यक है, क्योंकि इसी से विदेशी तेल पर हमारी निर्भरता कम होगी। दूसरे शब्दों में दुनिया एक नई औद्योगिक क्रांति के शुरुआती दौर में है। अगले कुछ दशकों में ऊर्जा का उत्पादन, इस्तेमाल तथा ऊर्जा क्षमता हमारी जीवनशैली में बुनियादी बदलाव उत्पन्न करेगी। अमेरिका ने जानबूझकर सस्ती और अस्वच्छ ऊर्जा के युग में चीन को वैश्विक फैक्ट्री बनाया। इसका एक गंभीर दुष्परिणाम यह हुआ कि अमेरिका चीन का बहुत बड़ा ऋणी बन गया। इस मसले पर ओबामा का नजरिया सख्त है। उन्होंने प्रचार के दौरान कहा कि चीन का हमारा बैंकर बन जाना हमारी अर्थव्यवस्था और हमारे वैश्विक नेतृत्व के लिए अच्छा नहींहै। यह हमारी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से भी अच्छा नहींहै। इतिहास हमें बताता है कि कोई देश तभी एक बड़ी सैन्य शक्ति बना रह सकता है जब वह बड़ी आर्थिक शक्ति भी बना रहे।
अब नई ग्रीन औद्योगिक क्रांति के समय अमेरिका को भारत को विश्व की फैक्ट्री बनाने का मौका मिला है और वह पर्यावरण अनुकूल शोध एवं विकास कार्यक्रमों के लिए भारत के साथ साझेदारी करने के लिए तैयार है। भारत को अपनी तरफ से इस अवसर का इस्तेमाल करना चाहिए और सुधारों की गाड़ी आगे बढ़ाकर खुद को निवेशकों के और अधिक अनुकूल बनाना चाहिए। इसके लिए हमें अपनी मनोदशा में भारी बदलाव करने होंगे। सबसे पहले यह समझने की जरूरत है कि ग्रीन हाउस गैसों का सबसे बड़ा उत्सर्जक अमेरिका नहीं, बल्कि भारत है। पर्यावरण परिवर्तन के मुद्दे को अमेरिका से उलझने के लिए एक और विषय बनाने के बजाय हमें इसे दोनों देशों के लिए साझा हित वाले मसले के रूप में देखना चाहिए।
[के. सुब्रह्माण्यम: लेखक रक्षा एवं विदेश मामलों के विशेषज्ञ हैं]

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