Monday, 21 May 2012

उड़न राख : समस्या या संसाधन

राष्ट्रीय सहारा ,राद्वीर तेज
विशाखापत्तनम में सुपर थर्मल पावर प्रोजेक्ट से निकलने वाली फ्लाई एश (उड़न राख) को लेकर पर्यावरण और स्वास्थ्य संबंधी आशंकाएं जताई जा रही हैं। हालांकि प्रोजेक्ट अधिकारियों ने इन्हें निराधार बताया है। उनका कहना है कि नवीनतम तकनीक का इस्तेमाल करके फ्लाई एश को वातावरण में नहीं फैलने दिया जाएगा। सिम्हाद्रि क्षेत्र में फ्लाई एश की बाबत फैलीं भ्रांतियां दूर करने के लिए अधिकारियों ने नागपुर स्थित नेशनल एनवायरमेंटल इंजीनियरिंग रिसर्च इंस्टीट्यूट और सूरत के एक निजी संस्थान से सव्रेक्षण भी कराया है। सव्रेक्षण का निष्कर्ष है-फ्लाई एश से स्वास्थ्य को कोई खतरा नहीं है। दरअसल, यह कोई पहली घटना नहीं है जब फ्लाई एश को लेकर इस प्रकार की आशंकाएं जताई गई हैं। अरसे से इस बाबत विवाद रहा है। भारतीय कोयले में एक अच्छा गुण है कि यह सल्फर रहित होता है। इसी के चलते भारत में अम्लीय वष्रा नहीं होती। लेकिन इसका एक अवगुण भी है कि इसमें 40 से 45 प्रतिशत हिस्सा राख का होता है। एक अनुमान के मुताबिक देश के 82 से ज्यादा थर्मल पावर स्टेशनों और स्टील फैक्टरियों से सालाना दस करोड़ टन से ज्यादा फ्लाई एश निकलती है। इसे जमा करने में ही दो करोड़ हेक्टेयर जमीन पट जाती है। अभी देश में उड़न राख का 15 प्रतिशत से कुछ ज्यादा ही इस्तेमाल हो पाता है। उधर, जर्मनी और फ्रांस जैसे देश अपने यहां 65 प्रतिशत से ज्यादा फ्लाई एश का उपयोग करते हैं। इसलिए आवश्यक है कि फ्लाई एश को राष्ट्रीय संसाधन में तब्दील किया जाए। अमेरिका के बर्कले स्थित कैलिफोर्निया विविद्यालय में सिविल एवं पर्यावरणीय आभियांत्रिकी विभाग में भारतीय मूल के प्रो. अमरीश कुमार मेहता के अनुसार फ्लाई एश ढांचागत निर्माण में सीमेंट के करीबन आधे हिस्से का विकल्प हो सकती है। इसके इस्तेमाल से निर्माण कार्य में पानी का उपयोग कम होता है। निर्माण का टिकाऊपन भी पांच से दस गुना बढ़ जाता है। प्रो. मेहता के अनुसार अभी इस्तेमाल किए जा रहे सीमेंट में ऊष्मा ज्यादा होती है। इसे लगाने के बाद ऊष्मा का स्तर निर्माण के बाहरी स्तर पर 30 डिग्री और भीतरी में 50 डिग्री सेंटीग्रेड तक होता है। ऐसे में जब बाहरी सतह पर्यावरण के प्रभावों के कारण अंदर के तापमान की तुलना में जल्दी ठंडी होने लगती है तो इसमें संकुचन होता है। नतीजतन निर्मित ढांचे में दरारें आ जाती हैं। इन दरारों के जरिए पर्यावरण और पानी निर्माण के भीतरी हिस्से पर रासायनिक दबाव डालते हैं। इससे ढांचे में क्षरण होने लगता है। प्रयुक्त लोहे में जंग लग जाता है। वह अपनी पकड़ छोड़ देता है। भूकंप, चक्रवात जैसी प्राकृतिक आपदाएं झेलने में निर्मित ढांचा नाकाम रहता है। कमजोर ढांचों को मजबूत करने और उनमें दरारों को रोकने के लिए अनेक देशों में सीमेंट के साथ फ्लाई एश का इस्तेमाल बढ़ा है। अमेरिका, कनाडा, इंग्लैंड आदि देशों में पुलों, इमारतों, सड़कों, राजमागरे आदि के निर्माण में ज्यादा से ज्यादा फ्लाई एश का इस्तेमाल किया जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि इसमें ऐसे कई रासायनिक तत्त्व मौजूद होते हैं जो पानी के संपर्क में आते ही सीमेंट से कहीं अधिक मजबूती पकड़ लेते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि फ्लाई एश और सीमेंट के बराबर इस्तेमाल से निर्माण मिशण्रमें पैदा होने वाली ऊष्मता को परंपरागत निर्माण की तुलना में काफी नीचे यानी 12 डिग्री सेंटीग्रेड तक लाया जा सकता है। ऐसे में इसके ठंडा होने पर निर्मित ढांचे में संकुचन नहीं हो पाता। काफी समय उपरांत भी निर्मित ढांचे में पर्यावरणीय प्रभाव व पानी जैसे कारणों से क्षरण व भंगुरता जैसी समस्याएं पैदा नहीं होने पातीं। फ्लाई एश की इन्हीं खूबियों के चलते इससे ईट निर्माण, सीमेंट, सीमेंट क्रंकीट, भवन निर्माण जैसे कार्य किए जा रहे हैं। कुछ थर्मल पावर स्टेशनों पर तो उद्यमियों को फ्लाई एश से ईटें, ब्लॉक, टाइलें, इंटरलॉकिंग, ब्लॉक स्लैब, डिजाइनों वाली खपरैलें, फ्लोर टाइल्स, पौधे लगाने के गमले, बर्तन साफ करने का पाउडर बनाने आदि के प्रशिक्षण दिए गए हैं। कुछेक थर्मल बिजली घरों ने शहरी विकास मंत्रालय के सहयोग से संयुक्त निर्माण उत्पाद केंद्र स्थापित किए हैं। धनबाद स्थित सेंट्रल फ्यूल रिसर्च इंस्टीट्यूट का कहना है कि उड़न राख के उपयोग से कृषि उत्पादन बढ़ाने में भी मदद मिल सकती है। इंस्टीट्यूट का दावा है कि इससे परती भूमि को उपजाऊ बनाकर किसानों को लाभ पहुंचाया जा सकता है। बहरहाल, ऐसे प्रयोगों के बाद यह आशंका निराधार है कि फ्लाई एश केवल नुकसानदायक ही होती है बल्कि यह एक लाभकारी राष्ट्रीय संसाधन बन सकती है। गौरतलब है कि मध्य-पूर्व के देशों को अभी 400 रुपये प्रति टन के हिसाब से इसका निर्यात भी किया जा रहा है।

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