Tuesday, 11 March 2014

पर्यावरण -जीडीपी के साथ जीईपी भी नापा जाए

अनिल पी. जोशी
दुनिया में विकास का सबसे बड़ा मापदंड सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की दर को माना गया है। देशों की प्रगति का आकलन उनकी जीडीपी के आधार पर ही किया जाता है। लेकिन भारत जैसे देश में इस तथाकथित विकास सूचकांक का आम आदमी से ज्यादा लेना-देना नहीं है। यहां 85 प्रतिशत लोगों के लिए जीडीपी की घटती-बढ़ती दर सीधे कोई मायने नहीं रखती। सच तो यह है कि वर्तमान जीडीपी देश के ज्यादातर लोगों का सीधा नुकसान कर रहा है। इसको ही संपूर्ण विकास का पैमाना समझे जाने के कारण जीवन से जुड़ी मूलभूत चीजें जैसे हवा, पानी, मिट्टी के लेखे-जोखों को लगातार नकारा जा रहा है। परिणाम सामने है। आज सारी बड़ी सुविधाओं के बीच दुनिया में हवा, पानी का बहुत बड़ा संकट खड़ा हो गया है।

हवा को बनाया धंधा
विगत दो दशकों में दुनिया की बढ़ती जीडीपी की सबसे बड़ी मार पर्यावरणीय उत्पादों पर पड़ी है। इसी के परिणाम आज मौसम बदलाव, ग्लोबल वार्मिंग, सूखती नदियों, उजड़ती उपजाऊ मिट्टी के रूप में सामने आ रहे हैं। दूसरी तरफ बाजारी सभ्यता ने इस अवसर को भी नहीं छोड़ा। हममें से किसी ने कभी सोचा भी नहीं था कि बंद बोतलों में पानी बिकेगा। आज यह हजारों करोड़ का व्यापार बन गया है। और तो और आज हवा भी बिकनी शुरू हो गई है। चीन के शंघाई शहर में व्यापारियों ने शुद्ध हवा का ही कारोबार शुरू कर दिया है। जल्दी ही यह भी एक बड़े व्यापार का रूप ले लेगा क्योंकि विश्व भर में प्राणवायु के हालात ठीक नहीं हैं। इसी तरह खेतों में मिट्टी की जगह रासायनिक खादों ने ले ली और यह आज दुनिया में रसूखी धंधा है। रासायनिक खादों के उपयोग से चमत्कारिक उत्पादन अवश्य हुआ होगा, मगर इनके और साथ में रासायनिक कीटनाशकों के अत्यधिक प्रयोग ने हमारी थालियों में जहर भर दिया है।


हालात की गंभीरता को देखते हुए सभी देशों ने क्योटो, कोपेनहेगन व कैनकुन में हुई अंतरराष्ट्रीय चर्चाओं में इस स्थिति पर चिंता जताई और इसकी कुछ जिम्मेदार बढ़ते जीडीपी पर भी डाली। विकसित देश विकासशील देशों के बढ़ते जीडीपी को लेकर चिंतित हैं क्योंकि इसका सीधा नाता उद्योगों से जुड़े कार्बन उर्त्सजन से है। दूसरी तरफ विकासशील देश विकसित देशों के खिलाफ लामबंदी कर अपने हिस्से का विकास तय करना चाहते हैं। पर्यावरण की आड़ में आर्थिक समृद्धि की लड़ाई लड़ी जा रही है। इस खींचतान में जीवन की अहम आवश्यकताएं जैसे हवा, पानी, मिट्टी इन अंतरराष्ट्रीय गोष्ठियों में कभी भी चर्चा का विषय नहीं बन पाई हैं। अगर जीडीपी के सापेक्ष प्राकृतिक संसाधनों को भी शुरुआती दौर में ही महत्व दे दिया जाता तो संसाधनों के संकट का प्रश्न इस रूप में खड़ा नहीं होता।

मौजूदा पर्यावरण संकट प्राकृतिक संसाधनों के प्रति हमारे गैर जिम्मेदाराना व्यवहार का परिणाम है। एक नजर अपने ही देश की नदियों पर डालें तो इन्होंने पिछले 50 वर्षों में अपना पानी लगातार खोया है। इसका सबसे बड़ा कारण नदियों के जलागम क्षेत्रों का वन-विहीन होना रहा है। दूसरी तरफ देश में पानी की बढ़ती खपत चिंता का विषय बनती जा रही है। वन जो पानी, हवा, मिट्टी के दाता हैं, अच्छी हालत में नहीं हैं। वन क्षेत्र तो घटे ही हैं, इनकी गुणवत्ता और प्रजातियों के स्वरूप में भी बदलाव आया है। ऐसे में नीतिकारों का जीडीपी को ही विकास का मापदंड मानना देश को बड़े संकट में डालना है। हमें नहीं भूलना चाहिए कि पानी व मिट्टी हमारे गांवों का धन है जिससे किसान और किसानी बची है। वन की कमी से मात्र गांव की व्यवस्था ही नहीं चरमराई है, इसके घातक प्रभाव विश्व की समूची पारिस्थितिकी पर पड़े हैं।

आज हर तरह से विकास की कीमत प्रकृति को ही चुकानी पड़ रही है। संसाधनों की भरपाई के सवाल पर उतनी गंभीरता से नहीं सोचा जाता, जितना कि इसके दोहन आधारित विकास पर। ऐसे में एकमात्र विकल्प यह है कि विकास के पैमाने को संतुलित किया जाए। दूसरे शब्दों में, विकास का मापदंड सिर्फ जीडीपी न हो, इसके साथ-साथ जीईपी (सकल पर्यावरण उत्पाद) को भी विकास का एक पैमाना बनाया जाए। अगर आर्थिक विकास हुआ तो साथ में यह भी बताया जाना चाहिए कि पारिस्थितिकी को सुधारने के लिए कौन से काम किए गए। साथ ही, कथित विकास की गुणवत्ता का ब्यौरा भी सार्वजनिक किया जाना चाहिए।

बना रहे संतुलन
बढ़ते जीडीपी के साथ बढ़ता जीईपी हमें संतुलित विकास की राह पर मजबूती प्रदान करेगा। अब इस तरह की चर्चा राष्ट्रीय और संयुक्त राष्ट्र के सम्मेलनों में होनी निहायत जरूरी है। सामूहिक विकास के सूचकांक किसी भी देश के वन एवं जल संरक्षण के कार्य और मिट्टी, हवा की बेहतरी की योजनाओं से तैयार होने चाहिए, क्योंकि ऐसा करके ही जीवन की आवश्यकता और विलासिता में सामंजस्य रखा जा सकता है। आर्थिकी के अलावा पारिस्थितिकी संतुलन को बनाए रखने के मापदंड तय किए जाने जरूरी हैं। सकल घरेलू उत्पाद के साथ-साथ सकल पर्यावरण उत्पाद का भी देश के विकास में समानांतर उल्लेख होना आज हम सब की आवश्यकता है।

(लेखक प्रसिद्ध पर्यावरण कार्यकर्ता हैं)

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