Wednesday, 24 April 2013

गणित को प्रोत्साहन की जरुरत


श्रीनिवास रामानुजन की पुण्यतिथि(26अप्रैल ) पर विशेष 

शशांक द्विवेदी 
देश को रामानुजन जैसे गणितज्ञों की जरूरत 

आज पूरे विश्व में जब भी गणित की या गणित में योगदान की बात की जाती है जो श्रीनिवास रामानुजन का नाम प्रमुखता से लिया जाता है । विश्व स्तर पर गणित के क्षेत्र में उनका योगदान अनुकरणीय है । गरीबी ,सीमित संसाधनों ,और सरकारी लालफीताशाही के बावजूद उन्होंने अपनी विलक्षण प्रतिभा से दुनियाँ को चमत्कृत कर दिया । उन्होंने गणित के क्षेत्र में जो कार्य किये है वह देश के युवाओं के लिए सदा प्रेरणा के रूप में मौजूद रहेगा । प्राचीन समय से भारत गणितज्ञों की सरजमीं रही है। भारत में आर्यभट, भास्कर, भास्कर-द्वितीय और माधव सहित दुनिया के कई मशहूर गणितज्ञ पैदा हुए। उन्नीसवीं शताब्दी और उसके बाद में श्रीनिवास रामानुजन, चंद्रशेखर सुब्रमण्यम और हरीश चंद्र जैसे गणितज्ञ विश्व पटल पर उभरकर सामने आए। 
भारत की धरती पर जन्म लेने वाले आर्यभट्ट ने ही दुनिया को दशमलव का महत्व समझाया लेकिन मौजूदा समय में विश्व में गणित के मामलों में भारत  काफी निचले पायदान पर पहुंच गया है । श्रीनिवास रामानुजन के जीवन चरित्र से हमारी शिक्षा व्यवस्था का खोखलापन भी उजागर होता है। 13 वर्ष की अल्पायु में रामानुजन् ने अपनी गणितीय विश्लेण की असाधारण प्रतिभा से अपने सम्पर्क के लोगों को चमत्कृत कर दिया मगर भारतीय शिक्षा व्यवस्था ने उन्हें असफल घोषित कर बाहर का रास्ता दिखा दिया था। वास्तव में शिक्षा व्यवस्था में विलक्षण बालकों के लिए कोई स्थान नहीं है। रामानुजन् की पारिवारिक पृष्ठभूमि गणित की नहीं थी। परिवार में कोई उनका मददगार भी नहीं था ऐसे में अपनी क्षमता को दुनिया के सामने लाने हेतु रामानुजन् को अत्यधिक परिश्रम करना पड़ा था।
गणित के क्षेत्र में सितारे की तरह चमकने वाले श्रीनिवास रामानुजन का जन्म 22 दिसंबर 1887 को तमिलनाडु के इरोड में हुआ था । वह पारंपरिक ब्राह्मण परिवार में जन्मे थें । उनके परिवार का गणित विषय से दूर-दूर तक का कोई नाता नहीं था । सन 1897 में रामानुजन ने प्राथमिक परीक्षा में जिले में अव्वल स्थान हासिल किया । इसके बाद अपर प्राइमरी की परीक्षा में अंकगणित  में सर्वोच्च अंक प्राप्त कर अपने अध्यापकों को चैंका दिया । सन 1903 में रामानुजन ने दसवीं की परीक्षा पास की. इसी साल उन्होंने घन ( क्यूब ) और चतुर्घात समीकरण ( बायक्वाडरेटिक इक्वेशन ) हल करने का सूत्र खोज निकाला । वह अपना समय का उपयोग गणित के जटिल प्रश्नों को हल करने में व्यतीत करते थे । समय के साथ-साथ रामानुजन का गणित के प्रति रुझान बढ़ता ही गया । फलस्वरूप 12वीं की परीक्षा में गणित को छोड़कर वह अन्य सभी विषयों में फेल हो गये । दिसंबर 1906 में रामानुजन ने स्वतंत्र परीक्षार्थी के रूप में 12वीं की परीक्षा पास करने की कोशिश की, लेकिन वे कामयाब न हो सके । इसके बाद रामानुजन ने पढ़ाई छोड़ दी । बिना डिग्री लिए ही रामानुजन् को औपचारिक अध्ययन छोड़ना पड़ा। अपने अध्ययन के बल पर रामानुजन् कभी भी डिग्री प्राप्त नहीं कर सके। लेकिन उनके कार्यों  और योग्यता को देखते हुए ब्रिटेन ने उन्हें बी ए की मानद उपाधि दी और बाद में उन्हें पी एच डी की भी उपाधि दी । यहाँ पर एक सवाल उठता है कि क्या यह भारत में संभव था या है क्योंकि हमारी शिक्षा व्यवस्था ने तो रामानुजन को हर तरह से नकार ही दिया था । .वो तो सिर्फ अपनी विलक्षण प्रतिभा और प्रो हार्डी जैसे मित्रों की वजह से ही विश्व पटल पर आ पायें ।   
 सन 1911 में रामानुजन का सम प्रोपर्टीज ऑफ बारनालीज नंबर्स शीर्षक से प्रथम शोध पत्र जनरल ऑफ मैथमेटिक्स सोसायटी में प्रकाशित हुआ । मद्रास के इंजीनियरिंग कॉलेज के प्रोफेसर सीएलओ ग्रिफिक्स ने रामानुजन के शोध पत्र गणित विद्वानों को भिजवाये । प्रो.ग्रिफिक्स की सलाह पर रामानुजन ने 1913 में तत्कालीन विख्यात गणितज्ञ एवं ट्रिनिटी कॉलेज के फैलो प्रोफेसर हार्डी को पत्र लिखा, जिसमें 120 प्रमेय और सूत्र शामिल थे ।
प्रोफेसर हार्डी इस पत्र से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने रामानुजन को कैंब्रिज आने का न्योता दे डाला । मार्च 1914 को जब रामानुजन लंदन पहुंचे तो प्रोफेसर नाबिला ने उनका स्वागत किया । जल्द ही उन्हें ट्रिनिटी कॉलेज में प्रवेश मिल गया. यहां वे प्रोफेसर लिटिलवुड के साथ मिलकर शोध कार्य में लग गये । रामानुजन ने इंग्लैण्ड में रहकर बहुत थोड़े ही समय में अपनी धाक जमा दी। उन्होंने प्रो हार्डी के निर्देशन में अध्ययन करते हुए गणित सम्बंधी अनेक स्थापनाएँ दीं, जो 1914 से 1916 के मध्य विभिन्न शोधपत्रों में प्रकाशित हुईं। उनके इन शोधकार्यों से सारे संसार में हलचल मच गयी। उनकी योग्यता को दृष्टिगत रखते हुए 28 फरवरी 1918 को रॉयल सोसायटी ने उन्हें अपना सदस्य बना कर सम्मानित किया। इस घटना के कुछ ही समय बाद ट्रिनिटी कॉलेज ने भी उन्हें अपना फैलो चुनकर सम्मानित किया। हाईली कम्पोजिट नम्बर शीर्षक के अनुसंधान कार्य के आधार पर 1916 में रामानुजन् को बी.ए. की उपाधि प्रदान की गई। प्रोफेसर हार्डी की यह सदाशयता ने रामानुजन् के जीवन की एक बड़ी कमी को दूर कर दिया। यह उपाधि वह चाबी थी जिसने आगे की सफलता के सभी द्वार खोल दिए थे। बाद में उसी उपाधि को पी.एचडी. में बदल दिया गया था। रामानुजन् के शोध प्रबन्ध का सार जनरल ऑफ लन्दन मेथेमेटीकल सोसाइटी में 50 पृष्ठ के विस्तार से छपा था। प्रोफेसर हार्डी के अनुसार तब तक किसी अन्य का ऐसा विद्वतापूर्ण पत्र उस जनरल में नहीं छपा था।
 एक तो रामानुजन का दुबला-पतला शरीर, दूसरे लंदन का बेहद ठण्डा मौसम, उस पर खानपान की उचित व्यवस्था का अभाव। ऐसे में रामानुजन को क्षय रोग ने घेर लिया। उस समय तक क्षय रोग का कारगर इलाज उपलब्ध नहीं था। सिर्फ आराम और समुचित डॉक्टरी देखरेख ही उन्हें बचा सकती थी। लेकिन रामानुजन की गणित की दीवानगी ने उन्हें चैन से नहीं बैठने दिया। इससे उनकी तबियत बिगड़ती गयी और अतः 27 फरवरी 1919 को उन्हें भारत लौटना पड़ा।  तब तक रामानुजन का स्वास्थ्य बहुत बिगड़ चुका था। डॉक्टरों ने उन्हें पूर्ण आराम की सलाह दी। लेकिन रामानुजन भला गणित को छोड़ कर कैसे रह पाते? नतीजतन उनकी बीमारी बढ़ती चली गयी और 26 अप्रैल 1920 को कावेरी नदी के तट पर स्थित कोडुमंडी गाँव में 33 वर्ष की अल्पायु में उनका निधन हो गया। 
रामानुजन सन 1903 से 1914 के बीच, कैम्ब्रिज जाने से पहले, गणित की 3542 प्रमेय लिख चुके थे। उनकी इन तमाम नोटबुकों को बाद में ‘टाटा इंस्टीट्यूट आफ फंडामेंटल रिसर्च बाम्बे’ (मुम्बई) ने प्रकाशित किया। इन नोट्स पर इलिनॉय विश्वविद्यालय के गणितज्ञ प्रो ब्रूस सी. बर्नाड्ट ने 20 वर्षों तक शोध किया और अपने शोध पत्र को पाँच खण्डों में प्रकाशित कराया। 
रामानुजन की गणितीय प्रतिभा का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उनके निधन के लगभग 93 वर्ष व्यतीत होने जाने के बाद भी उनकी बहुत सी प्रमेय अनसुलझी बनी हुई हैं। उनकी इस विलक्षण प्रतिभा के प्रति सम्मान प्रकट करते हुए भारत सरकार ने उनकी 125वीं जयंती के उपलक्ष्य में पिछले साल को ‘राष्ट्रीय गणित वर्ष’ के रूप में मनाने का निश्चय किया और प्रत्येक वर्ष उनका जन्म दिवस 22 दिसम्बर को  ‘राष्ट्रीय गणित दिवस’ के रूप में मनाने का फैसला किया । इसका उद्देश्य गणित के विकास को प्रोत्साहित करने हेतु हर संभव प्रयास करना है ।
हमारा देश बहुत बड़ा है और इसकी तुलना में यहाँ विश्वस्तरीय गणितज्ञों की काफी कमी है । देश में छात्र उच्चस्तरीय गणित के अध्ययन में बहुत कम ही रूचि दिखाते हैं , फलस्वरूप यहाँ गणित का गुणवत्तापूर्ण और समुचित विकास नहीं हो पा रहा है जबकि आज देश को बड़ी संख्या में गणितज्ञों की जरूरत है । इसके लिए हमें  विश्वविद्यालयों में शैक्षणिक और मूल्यांकन पद्धति में सुधार लाना होगा  , प्रतिभाशाली छात्रों को प्रोत्साहित करना होगा ,उन्हें संसाधन उपलब्ध कराने होंगे  ताकि उन्हें रामानुजन कि तरह कठिनाइयों का सामना न करना पड़े और वे शोध में अपना महत्वपूर्ण योगदान दे सके । देश एक बार फिर से गणित के क्षेत्र में दुनियाँ का सिरमौर बने इसके लिए युवा अथक प्रयास करें सिर्फ यही रामानुजन को सच्ची श्रद्धांजलि होगी ।

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