Friday, 14 December 2012

भारत शोध और नवोन्मेष में पीछे

राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने कहा है कि शिक्षा के क्षेत्र में उपलब्धियों के बावजूद भी भारत शोध और नवोन्मेष में चीन और अमेरिका जैसे देशों से पीछे है. उन्होंने कहा कि देश में उच्च शिक्षा का स्तर उन्नत किये जाने की आवश्यकता है.राष्ट्रपति ने हरिद्वार में देव संस्कृति विश्वविद्यालय के दीक्षान्त समारोह में संबोधित करते हुए कहा, ‘हमारा देश तेजी से एक महान आर्थिक शक्ति बन रहा है. क्रय मूल्य समानता के नजरिये से हम दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था हैं. वृद्धि दर के मामले में हम सिर्फ चीन से पीछे हैं. पिछले नौ सालों में से छह सालों में हमने आठ प्रतिशत से अधिक वृद्धि दर हासिल की.
उन्होंने कहा, ‘हालांकि वैश्विक मंदी के चलते वर्ष 2010-11 में वद्धि दर कुछ कम हुई पर भारत इस संकट को झेलने में कामयाब रहा और इसने अनूठी वापसी की. यह शिक्षा में भारत की वृद्धि ही है जो भारत की वापसी के लिये जिम्मेदार रही.’ राष्ट्रपति ने कहा कि उपलब्धियों के बावजूद भी देश को उच्च शिक्षा का स्तर उन्नत करने की जरूरत है. अपने संबोधन के दौरान राष्ट्रपति ने बताया, ‘शोध और नवोन्मेष की दृष्टि से देश पिछड़ रहा है. वर्ष 2010 में भारतीयों द्वारा दायर किये गये पेटेंट आवेदनों की संख्या छह हजार के करीब थी. वहीं चीन द्वारा तीन लाख से अधिक, जर्मनी से करीब 1.7 लाख, जापान द्वारा 4.64 लाख और अमेरिका द्वारा 4.2 लाख पेटेंट आवेदन किये गये. भारतीयों द्वारा पेटेंट के लिये किये गये आवदेनों की संख्या विश्व की तुलना में मात्र 0.30 प्रतिशत ही रही. ’
राष्ट्रपति ने कहा कि शोध शिक्षा का उत्तम रूप, तकनीकी आधुनिकीकरण और प्रक्रिया का उत्कृष्ट होना है जो नवोन्मेष को बढ़ावा देता है.
राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने कहा कि मुक्त एवं दूरस्थ शिक्षा जैसे लचीले शिक्षा मॉडलों को अधिक प्रोत्साहन दिया जाना चाहिये जिससे देश में शिक्षा का दायरा बढ़ सके. उन्होंने कहा कि हालांकि नामांकन की संख्या 2006-07 में 27 लाख से बढ़कर 2011-12 में 42 लाख हो गयी पर अभी भी बहुत कुछ किया जाना बाकी है.
प्रणब मुखर्जी ने कहा, ‘सूचना तकनीक और आधुनिक माध्यमों का प्रयोग नये चीजें सामने ला सकता है और ज्यादा अवसर मुहैया करा सकता है.’ उन्होंने कहा कि यह निर्विवाद तथ्य है कि शिक्षा, जिससे हम बौद्धिक संपदा विकसित करते है, हर व्यक्ति, समाज और राष्ट्र के लिये अहम है.
राष्ट्रपति ने कहा कि उच्च शिक्षा के क्षेत्र में भारत में उपाधियां प्रदान करने वाले 659 संस्थान हैं और 33023 महाविद्यालय हैं. 11वीं पंचवर्षीय योजना के अंत तक देश में कुल 152 केंद्रीय संस्थान हैं जो उच्च उपाधियां प्रदान करते हैं. उन्होंने बताया, ‘11वीं पंचवर्षीय योजना के काल 2007 से 2012 तक ऐसे संस्थानों की संख्या में 65 संस्थानों का इजाफा हुआ है. इसने हमारे कार्यबल की उत्पादकता को बढ़ाने में योगदान दिया है.’
राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने कहा कि आईआईटी और आईआईएम जैसे संस्थानों ने प्रोद्यौगिकी और प्रबंधन की शिक्षा में नये मानदंड तय किये हैं और बाहर के देशों में बहुत प्रतिष्ठित हैं, इसलिये यह बेहद खुशी की बात है कि आईआईटी संस्थानों की संख्या 2006-07 में सात से 2011-12 में 15 तक पहुंच गयी और आईआईएम संस्थानों की संख्या छह से 13 हो गयी है. उन्होंने यह भी बताया कि उपाधियां प्रदान करने वाले केंद्रीय, राज्यीय और निजी संस्थानों की संख्या 11वीं पंचवर्षीय योजना के दौरान 272 अधिक हो चुकी है. उच्च शैक्षणिक संस्थानों में नामांकन की संख्या में इजाफा हुआ है, यह 2006-07 में 1.39 करोड़ से 2011-12 में 2.18 करोड़ तक पहुंच गयी है.
अपने संबोधन में राष्ट्रपति ने मूल्यपरक शिक्षा की आवश्यकता पर भी ज़ोर दिया. उन्होंने कहा कि शिक्षा व्यक्ति में मूल्यों को पैदा करती है और मूल्यपरक शिक्षा हमें समाज के योग्य बनाती है.

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