Friday, 17 August 2012

कहां गॉड, कहां गॉड पार्टिकल


सुधांशु त्रिवेदी ।।
पिछला महीना यानी जुलाई 2012 विज्ञान की दृष्टि से एक युगांतकारी घटना का साक्षी है। जेनेवा में विश्व के सैकड़ों वैज्ञानिकों ने मिलकर 'हिग्स बोसॉन' नामक एक ऐसे कण की लगभग खोज कर ली जिसे अखिल ब्रह्माण्ड के सभी पदार्थों का मूल कण कहा जा सकता है। इसे सामान्य भाषा में सृष्टि के सृजन के लिए उत्तरदायी 'ईश्वरीय कण' की संज्ञा दी गई। प्रश्न यह उठता है कि क्या यह हिग्स बोसॉन ही सृष्टि के अंतिम रहस्य को दर्शा रहा है जैसा कि इसके लोकप्रिय नाम 'गॉड पार्टिकल' से आभास होता है। इसका उत्तर वैज्ञानिक खोजों के इतिहास में सहजता से मिल जाएगा। 18वीं शताब्दी में जब न्यूटन ने भौतिक गति और गुरुत्वाकर्षण के नियम खोजे तो माना गया कि प्रकृति का रहस्य लगभग समझ में आ गया। 19वीं शताब्दी में जब वैज्ञानिक डाल्टन ने सृष्टि के अंतिम अविभाज्य कण के रूप में परमाणु की परिकल्पना दी, तब भी लगभग यही माना गया।

1897 में इलेक्ट्रॉन, 1919 में प्रोटॉन और 1931 में न्यूट्रॉन की खोज से एक शताब्दी से मान्य डाल्टन का सिद्धांत ध्वस्त हो गया। इससे उत्साहित वैज्ञानिकों को 1930 और 40 के दशक में भी लगता था कि हम प्रकृति के रहस्य को समझने के बहुत निकट आ गए हैं, परंतु बाद के वषोंर् में परमाणु के अंदर क्वार्क, ग्लुऑन और मेसॉन आदि अनेक सूक्ष्म कण खोज लिए गए। आइंस्टाइन ने कहा था कि हमें लग रहा था कि हम दीवार के छोर तक आ गए हैं परंतु जब खिड़की खुली तो देखा कि मेरे सामने असंख्य संभावनाओं का एक महासागर लहरा रहा है। आइंस्टाइन सही थे। 1945 में परमाणु बम के विस्फोट के साथ डाल्टन का सिद्धांत मूर्खतापूर्ण की श्रेणी में आ गया। कुछ ऐसा ही उत्साह एक बार पुन: अभी 21वीं सदी में दिखने को मिल रहा है। मेरा तात्पर्य गॉड पार्टिकल जैसी वैज्ञानिक उपलब्धि को छोटा सिद्ध करना नहीं, बल्कि अंतिम सत्य की प्राप्ति के दावे के प्रति एक दूसरा दृष्टिकोण देना है। यह खोज युगांतकारी हो सकती है, परंतु अंतिम सत्य से अभी बहुत दूर है।

कुछ लोग यह कहेंगे कि एक सूक्ष्म कण की खोज का हमारे दैनिक जीवन से क्या संबंध हो सकता है। मैं याद दिलाना चाहता हूं कि 1900 में मैक्स प्लैंक ने जो क्वांटम थिअरी दी, उसी के चलते डिजिटल सिग्नल बनाए जा सके और आज सूचना के युग में हम मोबाइल और इंटरनेट का प्रयोग कर पा रहे हैं। इसी प्रकार यह खोज भी आने वाले समय में इतना बड़ा परिवर्तन कर सकती है जिसकी कल्पना अभी संभव नहीं है। जापानी मूल के अमेरिकी वैज्ञानिक मिशियो काकू ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक 'विजन्स' में कहा है कि टेक्नॉलजी की क्षमता के अनुसार सभ्यताओं के तीन स्तर होते हैं।
स्तर 1 - जो सभ्यता अपने ग्रह की सभी ऊर्जाओं के ज्ञान और उपयोग में सक्षम हो।
स्तर 2 - जो अपने सौरमंडल की सभी ऊर्जाओं के ज्ञान और उपयोग में सक्षम हो।
स्तर 3 - जो आकाश गंगाओं और ब्रह्मांड की सभी ऊर्जाओं के ज्ञान और उपयोग में सक्षम हो।

बीते सौ वर्षों में हमने केवल अपने ग्रह की कुछ ऊर्जाओं जैसे कोयला, पेट्रोल और विद्युत को जाना और हमारी दुनिया बदल गई। अभी तो हमने धरती की ही बहुत सी ऊर्जाओं को नहीं जाना है। इस दृष्टि से तो हम लगभग शून्य स्तर की सभ्यता हैं। हिग्स बोसॉन की खोज स्तर 2 और 3 की दिशा में हमारा पहला और नन्हा सा कदम सिद्ध हो सकती है। जैसे परमाणु ऊर्जा ने अंतरिक्ष यात्रा के द्वार खोले, हो सकता है कि यह खोज ब्रह्मांडीय यात्रा के द्वार खोल दे। परंतु रोचक विषय 'गॉड पार्टिकल' या 'ईश्वरीय कण' की संज्ञा है। पूरी विनम्रता के साथ मैं कहना चाहूंगा कि यह पश्चिमी मनोविज्ञान का प्रभाव है। भौतिकवादी पश्चिमी मानसिकता सारा तत्व पदार्थ में ढूंढती है। अत: दुर्भाग्यवश उनकी ईश्वर की खोज भी एक कण में जाकर अटक जाती है। इसके परे नहीं जा पाती। भारतीय धर्मशास्त्रों में स्पष्ट रूप से लिखा है 'यद् पिंडे, तद् ब्रह्मांडे' अर्थात जो एक टुकड़े के अंदर है वही पूरे ब्रह्मांड में है। वैदिक दर्शन में ब्रह्मांड का शाब्दिक अर्थ है- जिसका विस्तार और क्षरण हो रहा हो।

जैन दर्शन में 'पुद्गल' नामक कणों की अवधारणा है जिनसे सारी सृष्टि की रचना मानी गई। महषिर् कणाद द्वारा प्रतिपादित वैशेषिक दर्शन भी कणों पर ही केंद्रित है और यह मानता है कि 'अणु' ही वह सूक्ष्म मूल कण है जिससे सारा ब्रह्मांड बना है। संयोग से कणाद द्वारा प्रतिपादित अणु की प्रकृति और परिमाप, विज्ञान द्वारा प्रतिपादित परमाणु से आश्चर्यजनक रूप से मेल खाती है। मैं पूर्वाग्रह ग्रस्त होकर प्राचीन भारतीय ग्रंथों में विज्ञान को स्थापित करने का प्रयास नहीं कर रहा हूं, बल्कि पाठकों से कुछ समय के लिए पाश्चात्य दर्शन के पूर्वाग्रह से मुक्त होने का अनुरोध कर रहा हूं।

भारतीय और पश्चिमी अवधारणाओं में एक मूल अंतर है। कणाद का अणु अंतिम सत्य नही है बल्कि यह अलौकिक सत्ता की अभिव्यक्ति है। पश्चिम कहता है कण अंतिम है। इसलिए उनके लिए कण ही ईश्वर (गॉड पार्टिकल) है। हमारे अनुसार कण ईश्वर के कारण है। अब इनमें सत्य किसे मानें? एक शताब्दी पूर्व विज्ञान यह मानता था कि पदार्थ और ऊर्जा दो अलग-अलग अवयव हैं, जिनके अलग-अलग नियम हैं। जेनेवा की प्रयोगशाला ने यह लगभग सिद्ध कर दिया कि ब्रह्मांड के सभी पदार्थों का एक मूल कण (हिग्स बोसोन) है, परंतु उसकी उत्पत्ति एक दूसरे अवयव 'ऊर्जा' से है। यदि इस सिद्धांत का विस्तार करें तो मूल कण के समान एक दिन ब्रह्मांड की सभी ऊर्जाओं की एक मूलभूत ऊर्जा भी खोज ली जाएगी। उसकी उत्पत्ति भी किसी दूसरे अवयव से होनी चाहिए जो ऊर्जा से परे हो। वह क्या होगा? विज्ञान के लिए यह यक्ष प्रश्न होगा।

ब्रह्माण्ड में तीन प्रकार के अवयव हैं। पदार्थ, ऊर्जा और प्राण (चेतना)। विज्ञान अपने विकास क्रम में अभी पदार्थ से ऊर्जा के संबंध तक पहुंचा है। परंतु ऊर्जा से प्राण और चेतना तक की यात्रा अभी बहुत दूर है। अंत में महान वैज्ञानिक आइंस्टाइन का एक वाक्य उद्धृत करना चाहूंगा, जिसे उन्होंने 1905 में टाइम को चौथे आयाम के रूप में स्थापित करके ब्रह्मांड की अवधारणा को ही बदल देने वाले अपने शोधपत्र में लिखा था। 'आइंस्टाइन इन हिज ओन वर्ड्स' नामक पुस्तक में यह वाक्य कुछ इस रूप में आता है- 'मानव मस्तिष्क तो अभी चौथे आयाम को भी समझने में सक्षम नहीं है, तो वह ईश्वर को कैसे समझ सकता है, जिसके लिए हजारों वर्ष और हजारों आयाम एक समान है।'
(लेखक फिजिक्स के प्रफेसर हैं)

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