Tuesday, 26 June 2012

पर्यावरण संरक्षण बनाम संतुलित विकास

अमर उजाला कॉम्पैक्ट लेख 
शशांक द्विवेदी
आज से ठीक 20 साल पहले 1992 में पृथ्वी के अस्तित्व पर मंडरा रहे संकट और सतत विकास की चिंताओं से निबटने के लिए साझा रणनीति बनाने के उद्देश्य से दुनिया भर के नेता ब्राजील के रियो डि जेनेरियो में पृथ्वी सम्मेलन में एकत्र हुए थे। इस सम्मलेन पहुंचे नेता जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग जैसी समस्याओं से निपटने के लिए एक महत्वपूर्ण योजना पर सहमत हुए थे। इस सम्मेलन में यूनाइटेड नेशन फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेटिक चेंज पर सहमति बनी थी। पर्यावरण बचाने के लिए क्योटो प्रोटोकॉल भी इसी सम्मेलन का परिणाम था। सभी देश जमीन, हवा और पानी के संरक्षण में संतुलन के लिए नया मॉडल खोजने पर सहमत थे, जिसे उन्होंने टिकाऊ विकास का नाम दिया था। दो दशक बाद आज हम फिर भविष्य के उसी मोड़ पर खड़े हैं। यों कहें कि वे चुनौतियां अब काफी बड़ी हो गई हैं।
वर्तमान आर्थिक नीतियों ने विश्व जनसंख्या के साथ मिलकर पृथ्वी पर अभूतपूर्व दबाव डाला है। अब हमें समझना पड़ेगा कि प्राकृतिक संसाधनों के अंधाधुंध दोहन से हम संपन्नता के रास्ते पर आगे नहीं बढ़ सकते। टिकाऊ विकास का रास्ता आज भी उतना ही जरूरी है, जितना 20 वर्ष पहले था। इस चुनौती से निबटने के लिए साल के शुरू में जीरो ड्राफ्ट की घोषणा की गई।
रियो 20 और यूनाइटेड नेशंस कांफ्रेंस ऑन सस्टेनेबल डेवलपमेंट सम्मेलन का वार्ता मसौदा जीरो ड्राफ्ट, यानी 'भविष्य जो हम चाहते हैं' के नाम से जाना गया। इस मसौदे को पांच वर्गों में बांटा गया है- प्रस्तावनाएं, सतत विकास के संदर्भ में हरित अर्थव्यवस्था और गरीबी उन्मूलन, राजनीतिक प्रतिबद्धता का नवीकरण, सतत विकास के लिए संस्थागत ढांचा और क्रियान्वयन व कार्यवाही की रूपरेखा। इसे रियो प्लस 20 में सर्वसम्मति से अपनाया गया, पर लगता है कि पर्यावरण एवं विकास के बीच सामंजस्य का इसमें ध्यान नहीं रखा गया है। इस मसौदे में कार्बन उत्सर्जन और जंगलों के विनाश पर स्पष्ट तौर पर कुछ नहीं कहा गया है। बेशक सम्मेलन में पर्यावरण को बचाने और चुनौतियों से निबटने के लिए सहमति बनी, पर विकसित देश बराबरी का हक चाहते हैं, जो विकासशील देशों को मंजूर नहीं है। जी-77 समूह देशों का मानना है कि विकसित देशों पर पहले किए गए वायदों को पूरा करने के लिए दबाव डाला जाना चाहिए, जिसके प्रति वे उदासीन नजर आते हैं। हमारे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने साफ कहा कि भारत इस मुद्दे पर विकासशील देशों के समूह जी-77 के साथ है।
दरअसल अमेरिका सहित कई विकसित देश चाहते हैं कि विकासशील देश अपने उद्योग-धंधों की रफ्तार कम करें और कार्बन उत्सर्जन के स्तर को तेजी से नीचे लाएं। लेकिन वे इसके लिए आर्थिक और तकनीकी सहयोग देने के लिए भी तैयार नहीं हैं। कहने का मतलब विकासशील देश एकतरफा सहयोग करें, जबकि यह विश्व समुदाय की जिम्मेदारी है कि वह पर्यावरण संरक्षण की रणनीति को ऐसा व्यावहारिक रूप दे, ताकि सभी राष्ट्र अपनी प्राथमिकताओं और परिस्थितियों के अनुरूप प्रगति कर सके। सम्मेलन के अंतिम मसौदा बयान से स्पष्ट होता है कि विकसित देश गरीब अर्थव्यवस्थाओं के स्थायी विकास की खातिर वित्तपोषण के बारे में कोई आंकड़ा तय करने में नाकाम रहे हैं।
भारत ‘हरित अर्थव्यवस्था’ पर काम करना चाहता है, जो सम्मलेन का मूल उद्देश्य है, पर इसमें विकासशील और विकसित, दोनों देशों की भूमिका अानुपातिक होनी चाहिए। आज पर्यावरण सरंक्षण पर बातें तो हो रही है, पर कोई ठोस समाधान नहीं निकल रहा। इसलिए जरूरी है कि हम भविष्य के लिए ऐसी राह चुनें, जो संपन्नता के आर्थिक, सामाजिक और पर्यावरणीय पहलुओं के बीच संतुलन बना सके।
विकसित देश चाहते हैं कि विकासशील देश अपने उद्योग-धंधों की रफ्तार कम कर दें और कार्बन उत्सर्जन के स्तर को तेजी से कम करें। (Published in Amar Ujala Compact on 26june12)
article link

No comments:

Post a comment