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Friday, 6 April 2018

भालू और उसका भोजन


स्कंद शुक्ला  
सबकें देह परम प्रिय स्वामी !
( हे स्वामी ! सबको अपनी देह परम प्रिय है। )
--- तुलसीकृत रामचरितमानस का सुन्दरकाण्ड , जहाँ हनुमान् रावण से कह रहे हैं।
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भारतीय उपमहाद्वीप में मिलने वाली तीन भालू-प्रजातियों में प्रमुख स्लॉथ-भालू है और यह कीड़े चाव से खाता है। दीमक-चींटियाँ , उनके अण्डे व लार्वे इस भालू का प्रिय भोजन हैं। कारण कि कीड़े पृथ्वी पर मौजूद उन कुछ भोज्य-पदार्थों में से हैं , जो प्रोटीन का सबसे समृद्ध स्रोत हैं। मांस-दालों से कहीं अधिक।
सो भालू के लिए आसान है अपने लम्बे नाखूनों से दीमक की बाँबियाँ खोदना , उनमें अपनी नाक के ज़ोर से हवा फूँकना कि वे छिन्न-भिन्न हो जाएँ और फिर किसी वैक्यूम-क्लीनर की तर्ज़ पर अपनी लम्बी जीभ व निचले होठ की सहायता से एक झटके में ही दीमकों को मुँह के भीतर खींच लेना। जो प्रोटीन बड़े श्रम के बाद शिकार से मिलता , वह प्रचुरता के साथ इस रीछ को कीड़े खाने से मिल गया।
अचम्भा मुझे इससे अधिक तब हुआ , जब मैंने जाना कि संसार की सात अरब आबादी में से दो अरब कीटभोजी है। हम मनुष्य हैं और हमारा आहार विज्ञान से अधिक संस्कृति तय करती है। जो जहाँ जिस परिवार-समाज-धर्म-जाति-देश में पैदा हो गया है, उसकी रीतियों-मान्यताओं को सही सिद्ध करने में एड़ी-चोटी का ज़ोर लगा देगा और दूसरे के आहार-व्यवहार में मीनमेख निकालने लगेगा।
बहरहाल। कीड़े संसार-भर के अलग-अलग देशों में शौक़ से खाये जाते हैं। अफ़्रीकी देशों में। सुदूर पूर्व में। दक्षिण-पूर्व एशिया में। और इसके कारण कई हैं , जिनमें स्वाद सबसे महत्त्वपूर्ण नहीं।
पहला और सबसे महत्त्वपूर्ण कारण खाद्यान्न-संकट है। अकाल और गृहयुद्ध से जूझते तमाम देश मनमरज़ी से खेती पर ध्यान नहीं दे सकते। कृषि संरचनात्मक काम है , जो मानवीय शान्ति और प्राकृतिक सहयोग माँगती है। लेकिन जहाँ यह सम्भव नहीं , वहाँ क्या किया जाए !
जानवरों का मांस भी यों ही नहीं मिल जाता। जानवर यानी पालतू पशु। यानी बड़े चारागाह। अगर चरने के स्थान नहीं , तो पशुपालन नहीं। तो फिर ऐसे में मांस का विकल्प भी सीमित होने लगता है।
कीड़ों में तमाम विकल्प हैं। वे प्रोटीन का पृथ्वी पर समृद्धतम स्रोत हैं , बड़ी तादाद में आसानी से जन्म लेते हैं। नतीजन मानव-भोजन में उनका स्थान बन जाना अकारण नहीं सोचा गया। एफडीए-जैसे संस्थान ऐसे ही नहीं कह रहे कि भविष्य में हमें कीट-उत्पादन पर ज़ोर देना होगा और कीड़े हमारे आहार का महत्त्वपूर्ण अवयव होंगे।
लेकिन कीड़ों को भोजन के रूप में अपनाने में समस्याएँ भी कई हैं। कीटनाशकों के प्रयोग के कारण उनके भीतर भी इन रसायनों की मौजूदगी मनुष्य के लिए चिन्ता का विषय है। पर इसका दूसरा पक्ष यह है कि पालतू पशुओं के भोजन-रूप में प्रयोग से यह ख़तरा कहीं न्यून है। मवेशियों और परिन्दों को पालने से न जाने कितने ही मनुष्य हर साल फ़्लू और एनसेफेलाइटिस की भेंट चढ़ जाते हैं। ये बीमारियाँ आदमी को जानवर पालने के एवज़ में उपहार में मिली हैं।
एफडीए यह भी हमें बताता है कि हम अपने भोजन में बहुत कुछ ऐसा खा जाते हैं , जो हम जानते ही नहीं। अनाज में चूहों के ढेरों बाल मिलते हैं , जिन्हें कोई नहीं निकाल पाता। सब्ज़ियों में तमाम कीड़ों में अंग-उपांग हमारे भोजन में अपनी जगह अनजाने बना लेते हैं। अभी यह सब अनायास हो जाता है , आगे भविष्य की भयावहता को देखते हुए यह सब सायास करना पड़ सकता है।
सन् 2050 तक मनुष्य नौ बिलियन के क़रीब होंगे। पर्यावरण दिन-दिन प्रतिकूल हो रहा है। सबके लिए आहार एक चुनौती है , जो आगे और बड़ी होगी। ऐसे में कीड़ों को आहार-शृंखला में शामिल करना मनुष्य की आवश्यकता भी बन सकती है , चाहे आज हम इसपर लाख नाक-भौं सिकोड़ लें।
बुभुक्षितः किम् न करोति पापम् !


पीपल का पेड़ और ऑक्सीजन का मिथ


स्कन्द शुक्ला 
"पीपल के पेड़ के विषय में यह भ्रामक बात कैसे फैल गयी कि वह रात में ऑक्सीजन छोड़ता है ?"

"इसका कारण ऑक्सीजन और पीपल , दोनों को ढंग से न समझना है।"
"कैसे समझा जाए ?"
"पेड़-पौधे जानवरों की ही तरह साँस चौबीस घण्टे लेते हैं। इस क्रिया में वे ऑक्सीजन वायुमण्डल से लेते हैं और कार्बनडायऑक्साइड छोड़ते हैं। लेकिन वे सूर्य के प्रकाश में एक और महत्त्वपूर्ण क्रिया करते हैं , जिसे प्रकाश-संश्लेषण कहा जाता है। इस क्रिया में वे अपना ग्लूकोज़ स्वयं बनाते हैं वायुमण्डल की कार्बनडायऑक्साइड और जलवाष्प को लेकर। इस काम में उनका हरा रंजक क्लोरोफ़िल महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है और सूर्य का प्रकाश भी। इसी प्रकाश-संश्लेषण के दौरान ग्लूकोज़ के साथ ऑक्सीजन बनती है , जिसे वायुमण्डल में वापस छोड़ दिया जाता है।"
"यानी अगर पौधा या पेड़ हरा न हो और प्रकाश न हो , तो प्रकाश-संश्लेषण होगा नहीं।"
"बिलकुल नहीं।"
"तो ग्लूकोज़ और ऑक्सीजन बनेंगे नहीं।"
"नहीं। ज़ाहिर है रात में जब प्रकाश न के बराबर रहता है , तो यह काम प्रचुरता से होने से रहा। पीपल और उस जैसे कई अन्य पेड़-पौधे कुछ और काम करते हैं , जिसे लोग ढंग से समझ नहीं पाये।"
"क्या ?"
"पीपल का पेड़ शुष्क वातावरण में पनपता है और इसके लिए उसकी देह में पर्याप्त तैयारियाँ हैं। पेड़-पौधों की सतह पर स्टोमेटा नामक नन्हें छिद्र होते हैं जिनसे गैसों और जलवाष्प का लेन-देन होता है। सूखे गर्म माहौल में पेड़ का पानी न निचुड़ जाए , इसलिए पीपल दिन में अपेक्षाकृत अपने स्टोमेटा बन्द करके रखता है।"
"इससे दिन में पानी की कमी से वह लड़ पाता है।"
"बिलकुल। लेकिन इसका नुकसान यह है कि फिर दिन में प्रकाश-संश्लेषण के लिए कार्बन-डायऑक्साइड उसकी पत्तियों में कैसे प्रवेश करे ? स्टोमेटा तो बन्द हैं। तो फिर प्रकाश-संश्लेषण कैसे हो ? ग्लूकोज़ कैसे बने ?"
"तो ?"
"तो पीपल व उसके जैसे कई पेड़-पौधे रात को अपने स्टोमेटा खोलते हैं और हवा से कार्बन-डायऑक्साइड बटोरते हैं। उससे मैलेट नामक एक रसायन बनाकर रख लेते हैं। ताकि फिर आगे दिन में जब सूरज चमके और प्रकाश मिले , तो प्रकाश-संश्लेषण में सीधे वायुमण्डलीय कार्बन-डायऑक्साइड की जगह इस मैलेट का प्रयोग कर सकें।"
"यानी पीपल का पेड़ रात को भी कार्बन-डायऑक्साइड-शोषक है।"
"बिलकुल है। और वह अकेला नहीं है। कई हैं उस जैसे। ज़्यादातर रेगिस्तानी पौधे यही करते हैं। अरीका पाम , नीम , स्नेक प्लांट , ऑर्किड , तुलसी और कई अन्य। रात को कार्बनडायऑक्साइड लेकर उसे मैलेट बनाकर आगे प्रकाश-संश्लेषण के लिए इस्तेमाल करने की यह प्रक्रिया CAM मार्ग ( क्रासुलेसियन पाथवे ) के नाम से पादप-विज्ञान में जानी जाती है।"
"तो पीपल रात को ऑक्सीजन नहीं छोड़ता , वह वायुमण्डल से कार्बनडायऑक्साइड बटोरता है ताकि दिन में अपनी जल-हानि से बच सके।"
"यही।"


Wednesday, 4 April 2018

ऑक्सीजन के निर्माण का सच


स्कन्द शुक्ला 
"कई लोग ऐसा क्यों सोच लेते हैं कि पेड़-पौधे रात को ऑक्सीजन छोड़ सकते हैं ?"
"क्योंकि ये लोग यह नहीं जानते कि ऑक्सीजन का निर्माण बिना प्रकाश के करना लगभग किसी जीव के वश का नहीं।"
"आपने 'लगभग' क्यों लगाया ?"
"क्योंकि डच वैज्ञानिकों ने गहरे समुद्र में कुछ ऐसे जीवाणुओं का पता लगाया है , जो अन्धकार में भी ऑक्सीजन बनाते और छोड़ते हैं। ऑक्सीजन-निर्माण में ये जीवाणु नाइट्राइट रसायनों का इस्तेमाल करते हैं।"
"कैसे ?"
"नाइट्राइट की संरचना देखेंगे , तो पाएँगे कि उसमें ऑक्सीजन है। जीवाणु उसे रासायनिक अभिक्रियाओं द्वारा मुक्त कर देते हैं।"
"यह खोज कैसे महत्त्वपूर्ण हुई हमारे लिए ?"
"यह खोज दो जानकारियों के अपवाद प्रस्तुत करती है। पहली जानकारी यह कि बिना प्रकाश के ऑक्सीजन पौधे बना ही नहीं सकते। यह सत्य है कि 'पौधे' नहीं बना सकते , क्योंकि जीवाणु पौधे नहीं हैं। वे प्रोकैर्या कहलाते हैं। लेकिन कोई नहीं बना सकता , यह अतिवाद है। इन जीवाणुओं ने समुद्र के गहरे अँधेरे में ऑक्सीजन को बनाया और छोड़ा है।"
"और दूसरा अपवाद ?"
"दूसरी जानकारी यह है कि ऑक्सीजन प्रकाश में भी पेड़-पौधे तभी बना सकेंगे , जब उनमें पर्णहरित यानी क्लोरोफ़िल होगा। लेकिन इन जीवाणुओं में कोई हरियाली नहीं। फिर भी इन्होंने ऑक्सीजन बना डाली। इसका अर्थ यह कि अँधकार में हुआ यह ऑक्सीजन-निर्माण दोनों महत्त्वपूर्ण घटकों प्रकाश और क्लोरोफ़िल की अनिवार्यता को भंग करता है।"
"इसका सम्पूर्ण आशय हमारे लिए क्या हुआ ?"
"इसका अर्थ यह निकालिए कि जब इस धरती पर कोई जानवर तो जानवर , हरा पेड़-पौधा भी न था , तो ऑक्सीजन कैसे बनी होगी। जानवर-पेड़-पौधे यों ही नहीं पैदा हो गये , उनके होने के लिए हालात पहले बने। हालात किसने बनाये ? पेड़-पौधों ने ऑक्सीजन हमें दी , आज भी दे रहे हैं। लेकिन धरती पर बनी पहली ऑक्सीजन उन्होंने नहीं बनायी। कारण कि वे ऑक्सीजन छोड़ते तो हैं , लेकिन स्वयं प्रयोग में भी लाते हैं। तो वे जीव ऑक्सीजन के पहले निर्माता रहे होंगे , जिन्होंने ऑक्सीजन केवल छोड़ी , किन्तु इस्तेमाल नहीं की।"
"यानी ऑक्सीजन उनके लिए अपशिष्ट थी।"
"यही। उन जीवाणुओं ने हमारी धरती को इस लायक बनाया कि इस पर हरियाली उग सके। फिर उनका ऑक्सीजन-निर्माणक-उत्तरदायित्व हरे पेड़-पौधों ने ले लिया।"
"आज भी उन एककोशिकीय पुरखों के वंशज गहरे समुद्र में मिलते हैं।"
"हाँ। विज्ञान किसी जीव के जन्म से पहले उसके अनुकूल पर्यावरण की बात करता है। वह यह नहीं कहता कि जीव सीधे अचानक उपज गया। जन्म के पहले हवा-पानी-मिट्टी उसके अनुकूल न होते , तो क्या जीव जन्मता ? क्या मनुष्य यों ही पैदा हो गया ? या कोई पौधा ? या कोई भी जानवर या पेड़ ? नहीं। पहले इन सब के लिए माहौल बना।"
"और इन्हीं माहौल बनाने वाले जीवाणुओं के बारे में हम नहीं जानते।"
"क्योंकि हम बहुत स्थूल और आत्मकेन्द्री सोच वाले लोग हैं।"

( चित्र में गहरे समुद्र का एक गर्म गीज़र। ऐसे ही गीज़रों में ऑक्सीजन का निर्माण पहले-पहल धरती पर हुआ होगा। ) 



अब समुद्र को गर्म करनें में जुटी दुनियाँ


स्कन्द शुक्ला 
"मान लीजिए कि आप किसी सौ-मंज़िला अट्टालिका की सबसे ऊँची मंज़िल पर रहते हैं। लेकिन आपके राशन का स्टोर-रूम बेसमेंट में है , जबकि रसोईं वहीं आपके पास सौवीं मंज़िल पर। तो ऐसे में क्या होगा आपके साथ ?"
"मुश्किल होगी।"
"कितनी मुश्किल होगी ?"
"बहुत।"
"आप कैसे व्यवस्था करेंगे ?"
"ऊपर-नीचे बहुत दौड़भाग करनी होगी।"
"और दौड़भाग न हो पायी या न कर पाये तो ? याद रखिए कि इस बिल्डिंग में भोजन की कोई और व्यवस्था नहीं।"
मित्र अब चुप हैं और सोच में पड़ गये हैं। 
"मैं बताता हूँ। आप मर भी सकते हैं। भूख से। चोट से।"
"आपने यह उदाहरण क्यों दिया ?"
"क्योंकि पृथ्वी के समुद्रों में यही बुरा खेल चल रहा है। रोज़। और इसके ज़िम्मेदार हम हैं।"
"कौन सा खेल ? कैसी ज़िम्मेदारी ?"
"पृथ्वी पर जानवरों के लिए ऑक्सीजन कौन पैदा करता है ?"
"पेड़-पौधे।"
"कौन से पेड़-पौधे सबसे ज़्यादा ऑक्सीजन पैदा करने में योगदान दे रहे हैं ?"
"यही जो हमारे आसपास हैं।"
"नहीं। न पीपल , न बरगद , न नीम , न आम , न जामुन। वे हैं समुद्री नन्हें एककोशिकीय जीव जिन्हें फ़ाइटोप्लैंक्टन कहा जाता है। उनमें पर्णहरित या क्लोरोफ़िल होता है। और वे समुद्र की सबसे ऊपरी सतहों पर रहते हैं , जहाँ सूरज के प्रकाश को पाकर वे प्रकाश-संश्लेषण करते हैं। पृथ्वी की आधी ऑक्सीजन इन्हीं नन्हें जीवों की पैदावार है।"
"तो फिर इनके लिए समस्या क्या हो रही है ?"
"समस्या यह है कि इन प्लैंक्टनों के पोषक तत्त्व नीचे समुद्री तलहटी पर मिलते हैं। और इनका निवास समुद्री सतह पर है। समुद्र के तल का पानी ठण्डा होता है समुद्र की सतह के पानी से। लेकिन यह अन्तर थोड़ा होता है। इस कारण समुद्री जल ऊपर-नीचे होता रहता है। ताकि इन जीवों को पोषक तत्त्व भी मिलते रहें और इनका प्रकाश-संश्लेषण भी चलता रहे।"
"तो मनुष्य ने क्या बुरा किया इनके साथ ?"
"मनुष्य ने समुद्रों को गर्म करना शुरू कर दिया और अम्लीय भी। उसने फैक्ट्रियाँ चलायीं , डीज़ल-पेट्रोल फूँके। नतीजन वायुमण्डल में गर्माहट बढ़ी , जिसे सागरों-महासागरों से सोख लिया। इस कारण वे गर्म हो उठे और वायुमण्डल की गैसों ने उन्हें अम्लीय कर दिया।"
"तो ?"
"तो यह कि सतह का गर्म पानी इतना अधिक गर्म है कि अब वह नीचे नहीं जाता। और नीचे का ठण्डा पानी ऊपर नहीं उठ पाता। नतीजन प्लैंक्टनों को एक-साथ पोषक तत्त्व पाने और प्रकाश-संश्लेषण करने में समस्या आ रही है। वे ऊपर रहें कि नीचे जाएँ ? कैसे जिएँ ? कैसे ऑक्सीजन बनाएँ ?"
"वे कैसे जी रहे हैं ?"
"वे नीचे जा रहे हैं। नष्ट भी हो रहे हैं बड़ी मात्रा में। लगभग एक-तिहाई से अधिक नष्ट हो चुके हैं। लेकिन फिर वे ऊपर रहकर ऑक्सीजन नहीं बना पा रहे।"
"तो इसमें तो हमारी ही हानि है।"
"हाँ। पर क्या मनुष्य अपनी हानि समझने योग्य प्रजाति है ? आपको लगता है कि लोग सचमुच वयस्क हैं कि वे अपनी वास्तविक हानियों पर बात कर सकें ?"
"अगर हम फ़ैक्ट्रियों के प्रदूषण पर नियन्त्रण कर लें ? डीज़ल-पेट्रोल का प्रयोग सीमित करने की कोशिश करें ? तब तो प्लैंक्टनों की मौत थमेगी न ? समुद्र फिर ठण्डे होंगे पहले जैसे ?"
"समुद्रों को अपने पूर्व के सामान्य ताप पर पहुँचने में हज़ार साल तब भी लग जाएँगे , ऐसा वैज्ञानिक मानते हैं। पापों का प्रायश्चित्त इतनी जल्दी नहीं होता।"

---- ये जब्र भी देखा है , तारीख़ की नज़रों ने
लम्हों ने ख़ता की थी , सदियों से सज़ा पायी।

( मुज़फ़्फ़र रज़्मी )


चक्कर आने का क्या मतलब है ?


स्कन्द शुक्ला 
जब आप कहते हैं कि मुझे चक्कर आ रहा है , तो डॉक्टर जानना चाहते हैं कि चक्कर आने से आपका मतलब क्या है।
चक्कर आना , जिसे अँगरेज़ी में वर्टाइगो कहा गया है , कई बार स्पष्ट रूप से रोगी समझकर बता नहीं पाते। ऐसे में रोग को ठीक से पकड़ने में और उसके उपचार में समस्या आती है। कुछ बातों को ध्यान में रखकर वर्टाइगो को बेहतर समझा जा सकता है।
चक्कर आने का अर्थ अगर आँखों के आगे अँधेरा छाना और गिर पड़ने की स्थिति है , तो अमूमन यह हृदय के पम्प-कार्य या ख़ून के संचार से सम्बन्धित मामला है। इसे अँगरेज़ी में सिनकपी या नियर सिनकपी कहा गया है। बहुधा ऐसा खड़े होने पर ही अधिक होता है। ठीक से ख़ून मस्तिष्क में नहीं पहुँच पा रहा। ऐसा कई बीमारियों में हो सकता है , जिन्हें हृदयरोग विशेषज्ञ जाँचों के द्वारा पहचान सकते हैं। 
चक्कर की दूसरी स्थिति रोगी का असन्तुलित होने लगना है। इसे डिसइक्विलिब्रियम कहा गया है। ऐसा होने से उसके गिरने और चोटिल होने की आशंका रहती है। असन्तुलन पैदा करने वाले रोग अमूमन मस्तिष्क के होते हैं और उन्हें न्यूरोलॉजिस्ट देखते हैं।
चक्कर की तीसरी बिरादरी शुद्ध वर्टाइगो है , जिसमें रोगी को लगता है कि उसके आसपास की चीज़ें घूम रही हैं और ऐसा होने से वह गिर पड़ेगा। यह लक्षण जिन रोगों में मिलता है , उन्हें नाक-कान-गला-रोगों के विशेषज्ञ देखते हैं।
चक्कर का चौथा प्रकार जो इन तीनों से अलग है , वह मानसिक है। वह इन सभी से भिन्न है और उसे मनोचिकित्सक द्वारा ठीक किया जाता है।
प्रयास करें कि अपने लक्षणों को और बेहतर समझें और डॉक्टर को उनसे और बेहतर अवगत कराएँ , ताकि आपके रोग की सही पहचान हो सके। लक्षणों की विस्तृत समझ बीमारी को जानने में बड़ी भूमिका निभाती है।
चक्कर आने की स्थिति में डॉक्टर रोगियों से कई बार आहार में कुछ बदलाव करने को कहते हैं। साथ ही उन्हें कुछ व्यायाम भी बताते हैं। नशे व तनाव से मुक्ति और अच्छी नींद की भी इसमें बड़ी भूमिका होती है। चक्कर की स्थिति में रोगियों को यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि उन्हें किसी भी तरह चोट न लगे। वाहन चलाते समय ऐसा कई बार हो जाता है ; ऐसे में बेहतर है कि ड्राविंग से परहेज़ किया जाए।


Sunday, 18 March 2018

ओज़ोन का पराबैंगनी किरणों से सम्बन्ध


स्कन्द शुक्ला 
तीन तिगाड़ा हमेशा काम नहीं बिगाड़ता और न सभी प्रेम-त्रिकोण कष्टकारी होते हैं 

धरती माता ओज़ोन की पोशाक पहनती है और हम इतनी नालायक औलाद हैं कि उसके कपड़ों को तार-तार करने में लगे रहते हैं। ओज़ोन की छतरी में हमारी करतूतें छेद कर देती हैं , जिसका सबसे स्पष्ट प्रमाण अंटार्कटिका के ऊपर वायुमण्डल में देखा जा सकता है। ऐसे में ओज़ोन , उसकी वायुमण्डलीय उपस्थिति , हमारे लिए उसकी उपयोगिता और उसके विनाश पर कई बातें करनी आवश्यक हो जाती हैं। 

पृथ्वी का वायुमण्डल कई परतों में बँटा है। इसी क्रम में ज्यों ही हम मिट्टी छोड़कर ऊपर उठते हैं , तो पहली परत ट्रोपोस्फ़ीयर कहलाती है और दूसरी स्ट्रेटोस्फ़ीयर। इसी स्ट्रेटोस्फ़ीयर में ओज़ोन की मौजूदगी होती है। 
ओज़ोन के निर्माण में एक पदार्थ और एक प्रकाश की भूमिका बड़े महत्त्व की है। पदार्थ ऑक्सीजन है और प्रकाश पराबैंगनी किरणें। ऑक्सीजन का एक अणु दो ऑक्सीजन-परमाणुओं से बना है। सूर्य से चली पराबैंगनी किरणें वायुमण्डलीय ऑक्सीजन-अणुओं से टकरा कर उन्हें परमाणुओं में तोड़ देती हैं। फिर एक टूटा परमाणु आसपास के ऑक्सीजन-अणु से मिलकर एक तिकड़ी बना लेता है। यही परमाणु-तिकड़ी ओज़ोन है। 
ओज़ोन का पराबैंगनी किरणों से सम्बन्ध दिलचस्प है। यह गैस पराबैंगनी किरणों द्वारा अस्तित्व में आती है और फिर उसी को पृथ्वी पर पहुँचने से रोकती है। और उसका यह काम हम जीव-जन्तुओं के लिए बेहद आवश्यक हो जाता है। 
पराबैंगनी किरणें जीवन की नाशिका हैं। उन्हें हमारे डीएनए में तोड़फोड़ करनी है। वह डीएनए जो हमारी कोशिकाओं में है और जिसके होने से हमारा अस्तित्व है। नतीजन यह विकृत-विखण्डित डीएनए तमाम कैंसर-जैसे रोगों को जन्म देने का काम करता है। 
ओज़ोन की पोशाक पृथ्वी पहनती है , तो हम बचते हैं। लेकिन हम उसकी पोशाक में छेद करके अपनी ही मृत्यु को आमन्त्रण देते हैं। हम पराबैंगनी किरणों को धरती पर बुलाते हैं और अपने ही लिये बीमारियाँ पैदा करते हैं। 
पृथ्वी के केवल 20-30 ऊपर किलोमीटर है ओज़ोन की यह पोशाक। और लगभग दस किलोमीटर मोटी , बस। इस गैस का निर्माण विषुवत्-वृत्त के वायुमण्डल में होता है और फिर यह चलती हुई ध्रुवों के ऊपर जमा हो जाती है। स्थान , मौसम और तापमान के कारण यह गैस वायुमण्डल में अलग-अलग मात्रा में मिला करती है। 
सुख्यात विज्ञान-जर्नल नेचर में 1985 में पहली बार वैज्ञानिकों ने ओज़ोन-परत के नष्ट होने की बात उठायी ; तब से अलग-अलग गोष्ठियों में और शोधपत्रों में इस बारे में तमाम बातें प्रकाश में आती रही हैं। यह बात ग़ौर करने योग्य है कि ओज़ोन का सर्वाधिक विनष्टीकरण अंटार्कटिका के ऊपर ही देखने को मिलता रहा है। ऐसा कई ख़ास पर्यावरणीय स्थितियों के कारण है और इसलिए अंटार्कटिका पर ओज़ोन के सन्दर्भ में चर्चा ज़रूरी हो जाती है। 

प्रकाश क्या है पहले इसे समझिए

आइंस्टाइन नामक व्यक्ति का जहाँ-तहाँ नाम लेने से पहले प्रकाश को समझिए
 स्कन्द शुक्ला 
प्रकाश जो फ़ोटॉन नामक कणों से बना है और तरंग भी है। यानी प्रकाश द्विस्वभावी है और कण-तंरग , दोनों के गुण प्रदर्शित करता है। बहुत दिनों तक वैज्ञानिक इस विषय पर जूझते रहे हैं। न्यूटन से लेकर यंग तक , मैक्सवेल से लेकर आइंस्टाइन तक सबने प्रकाश के कई भौतिक प्रयोग किये और अपने-अपने मत दिये हैं। यहाँ सबकी चर्चा करना सही नहीं होगा लेकिन कुछ मोटी बातें जन-जन को पता होनी चाहिए। न्यूटन कणवाद के पक्ष में थे और मानते थे कि प्रकाश कणों के रूप होता है। 
अब न्यूटन को कौन चुनौती देता ! बड़े दिनों तक आम-ओ-ख़ास में यह बात पैठी रही कि न्यूटन बाबा कह गये हैं, तो सही ही कह गये हैं। लेकिन फिर 1801 में एक दूसरे वैज्ञानिक थॉमस यंग ने अपने एक प्रयोग से सिद्ध करने की कोशिश की कि प्रकाश तरंग के रूप में है। नतीजन संसार अब न्यूटन के मत से हटने लगा और पूरी उन्नीसवीं सदी में प्रकाश को तरंग-रूप में जान-समझ कर तरह-तरह के प्रयोग होने लगे। 
मैक्सवेल ने हमें बताया कि प्रकाश दरअसल विद्युत्-चुम्बकीय तरंग है। यानी तरंगों का वह प्रकार , जो जब चलता है तो उसके साथ विद्युत् और चुम्बकीय क्षेत्र दोनों साथ-साथ निर्मित होते चलते हैं। फिर आइंस्टाइन हमें वापस प्रकाश के कणरूप पर ले गये। बिना प्रकाश को कण रूप में ग्रहण किये , हम प्रकाश-विद्युत्-प्रभाव यानी फ़ोटोएलेक्ट्रिक प्रभाव समझ नहीं सकते। यह वही प्रभाव है , जिसपर आइंस्टाइन को नोबल पुरस्कार मिला था। लेकिन आइंस्टाइन ने प्रकाश की कण-प्रवृत्ति और तरंग-प्रवृत्ति को जोड़ दिया। कहा कि फ़ोटॉनों की तरंग है प्रकाश। इसके कुछ गुण आप कण मानकर बूझ सकते हैं , तो कुछ तरंग मानकर। 
फिर जानिए कि प्रकाश की गति संसार में सर्वाधिक है। जानिए कि निर्वात यानी वैक्यूम में प्रकाश की गति निश्चित है। यह निश्चित है , इसलिए हम दूरी-मापक मानक 'मीटर' की परिभाषा-तक प्रकाश की गति से तय करते हैं। यह तीन लाख किलोमीटर प्रति सेकेण्ड के लगभग है। जानिए कि जिन फ़ोटॉनों से प्रकाश बना है , उनका कोई द्रव्यमान् नहीं है। 
प्रकाश की गति प्रकाश-स्रोत के चलते रहने या रुके होने पर नहीं बदलती , न यह प्रकाश को देखने वाले के चलने-रुके रहने पर बदलती है। इस बात को तनिक सोच कर देखिएगा। कार चल रही हो तो भी प्रकाश की गति उतनी ही , रुकी हो तो भी उतनी ही। दूर खड़े आदमी तक चलती गाड़ी का प्रकाश भी उतनी ही तेज़ आता है , जितना वहाँ रुकी हुई गाड़ी का आता है। 

अभी एकदम सरल भाषा में इतना पकड़िए। आइंस्टाइन को मुहावरा न बनाइए। कविता-कहानी में आइंस्टाइन को बिना समझे मत लगाइए। अन्यथा वह महज़ नेम-ड्रॉपिंग लगेगा ! वैज्ञानिक अपने कृतित्व से जाना जाता है और आइंस्टाइन को बिना प्रकाश को समझे समझा नहीं जा सकता। 

और यह कोई मुहावरे वाला प्रकाश नहीं। यह वही प्रकाश है जो सूर्य-चन्द्रमा-तारों से आ रहा है। कोई आन्तरिक प्रकाश , ज्ञान का प्रकाश , चिन्तन का प्रकाश जैसी झिलमिल भाषा नहीं। सीधा-सादा प्रकाश जो आँखों से आप देखते हैं। ऊर्जा-द्रव्य-प्रकाश को लेकर लोगों में इतनी भ्रान्तियाँ जबरन भरी जाती हैं , कि क्या कहा जाए। ऊर्जा कोई आत्मा-वात्मा की ऊर्जा नहीं। ऊर्जा यानी एनर्जी। जिससे आप चलते हैं। कूदते हैं। बोलते हैं। लिखते हैं। यहाँ तक कि सोते भी हैं। 
द्रव्य को लेकर कलाकारी कम हुई , लोगों ने लच्छेदार बातें कम बनायीं। द्रव्य सामने स्पष्ट दिखता है। आदमी , कुत्ता , सिक्का , टायर , पानी , दूध। हवा महसूस हो जाती है। लेकिन ऊर्जा को लेकर , जिसे देखिए अपनी फ़िलॉस्फ़ी बाँच रहा है। ऊर्जा यह वह , ऊर्जा वह है। और सब सिर्फ़ इसलिए कि ऊर्जा को द्रव्य की तरह समझना सरल नहीं है। 

कुछ बातें ऊर्जा , द्रव्य और प्रकाश पर। एकदम नन्हीं-मुन्नी टाइप। कोई जटिल भौतिकी का जाल नहीं , जो भयभीत करे। पहले भौतिकी को समझिए , पराभौतिकी बाद में कर लीजिएगा। और फिर कविता में आइंस्टाइन का प्रयोग खिलकर-खुलकर कीजिए। 

आइंस्टाइन की महज़ नेम-ड्रॉपिंग नहीं। 

फ़िज़िक्स के साथ अतीन्द्रियता की समस्या है , जिसे न कवि बूझ पा रहे हैं और न श्रोता-पाठक।
आदमी सदियों से इन्द्रियों के साथ जिया। देखा-छुआ-सूँघा-सुना और जाना। जितना इनसे समझा , वही भौतिक सत्य माना। अन्य बातों को उसने कमरे में या जंगल में चटाई बिछाकर मन में कल्पित किया। तरह-तरह के लोग , तरह-तरह की कल्पनाएँ। अच्छे-घने-गम्भीर लोगों की अच्छी-घनी-गम्भीर कल्पनाएँ। लेकिन फिर भी कल्पनाएँ ही। कल्पना का अपना महत्त्व है , लेकिन सत्य का महत्त्व पहले और अधिक है।
फिर फ़िज़िक्स वाले आ गये। पहले वे सफ़ेद विग वाले सनकी और अब ये बड़े-बड़े जटाजूट वाले। लगे ज्ञान बाँचने। पदार्थ को हमें प्रयोग से बेहतर समझाया। खाली कहा नहीं। कहा कि हवा-पानी-पत्थर को ही तुम ढंग से नहीं जानते , आत्मा-परमात्मा-सात आसमान-जिन्न-फ़रिश्ते बाद में जानना। तो पहले जो दिख रहा है , उसे ढंग से समझो। प्लेट में जो है ख़त्म नहीं कर पा रहे हो और दूसरे डोंगे ढूँढ़ रहे हो।
फिर वे पगले वैज्ञानिक लोग और आगे बढ़े। इन्होंने मशीनों के माध्यम से पदार्थ को जानने का दायरा ही बढ़ा दिया। फिर पदार्थ और प्रकाश के रिश्ते समझाने लगे। प्रकाश को कहा कि यह तरंग है और कण भी। आम आदमी चकराने लगा और उसका कवि भी। तरंग का अर्थ जिसने समुद्र की तरंग तक समझा हो और कणों को रेत का कण , वह बेचारे एलेक्ट्रॉनों को कैसे समझे और कैसे उन पर कविता बनाए !
लेकिन एलेक्ट्रॉनों पर पुष्ट-प्रमन कविता बनेगी और पढ़ने वाले भी सामने आएँगे। उसके लिए पहले एलेक्ट्रॉन की साधारण अभिधात्मक समझ पैदा करनी होगी। फिर उसकी अनुभूतियाँ जिनमें जन्मनी होंगी , जन्मेंगी। पहले अभिधा , फिर व्यंजना-लक्षणा की झिलमिल। पहले मौलिक सत्य , फिर धुँधला छलावा। अन्यथा कवि लोगों को और भरमा देगा। वे विज्ञान नहीं समझेंगे , उसकी कविता पहले पढ़कर भटकने लगेंगे।
पदार्थ को समझने के लिए सनक चाहिए। ( सनक तो पदार्थ से कविता पैदा करने के लिए भी चाहिए ! ) लेकिन ढेरों लोग सोचते हैं कि पदार्थ को क्या समझना , यह समझा-समझाया है। वे फ़िज़िक्स नहीं पढ़ते , सीधे मेटाफ़िज़िक्स की गोलमोल बातें करने लगते हैं। सुनने में बहुत अच्छी लगती हैं। लेकिन पहले सच्ची बातें सुनायी जाएँ , अच्छी बातें फिर बाद में।
कमरे में संगीत बज रहा है। झूमना चाहिए। संगीत बहुत श्रव्य है। लेकिन उसके पहले कमरा समझना है। अन्यथा वह गिर गया , तो बाजे-समेत सुनने वाले नष्ट हो जाएँगे। न भी गिरे तो वह संगीत के बाजे के साथ तालमेल करके ध्वनि आपके कानों तक पहुँचा रहा है। लेकिन आप अज्ञानी हैं , इसलिए कृतघ्न हैं। आपको लगता है कि स्वर केवल बाजे से पैदा हो रहे हैं और आप तक पहुँच रहे हैं।
वैसे संगीत भी हवा के अणुओं का ऊर्जात्मक लहराव है। लेकिन पहले कमरे को समझिए , हवा को समझिए , ऊर्जा को समझिए , अणुओं को समझिए , लहराव को समझिए। उसके बाद लिया गया संगीतानन्द घटता नहीं , बढ़ जाता है।
रस लेना है , पहले स्वयं को दायरे समझने के लिए कस लेना है। फिर ढीला छोड़ना है और रस आने लगेगा।
जाने गये में नया जोड़ने के लिए जाना गया ढंग से जानना ज़रूरी है। पहले मंजन , फिर रंजन , फिर ज़रूरत पड़ी तो भंजन। फिर मंजन चालू। यही क्रम अनवरत।