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Sunday, 18 March 2018

जीवों के अनोखे गुणों पर गौर


मुकुल व्यास 
पृथ्वी के कुछ जीव-जंतु विषम परिस्थितियों में भी जीने में सक्षम हैं और वैज्ञानिक उनकी इस अनोखी क्षमता का इस्तेमाल करना चाहते हैं। उनकी नजर टार्डीग्रेड नामक एक विचित्र जीव पर पड़ी है जो कठोर से कठोर पर्यावरणीय परिस्थितियों को भी ङोल सकता है। यह जीव बर्फीले माहौल, तीव्र विकिरण या डिहाइड्रेशन का सामना कर सकता है। धरती पर मौजूद कुछ जीव अपनी जैविक क्रियाओं को धीमा करने के लिए कुछ प्रोटीनों के जरिये अपनी कोशिका के कार्यों को नियंत्रित कर सकते हैं। टार्डीग्रेड विषम स्थितियों से निपटने के लिए अपने शरीर की आंतरिक गतिविधियों को धीमा कर सकता है। इस अवस्था को क्रिप्टोबायोसिस कहा जाता है। क्रिप्टोबायोसिस के दौरान टार्डीग्रेड में समस्त जैव-रासायनिक प्रक्रियाएं बंद होती प्रतीत होती हैं, लेकिन जीव फिर भी जीवित रहता है। टार्डीग्रेड की तरह उत्तरी अमेरिका में पाया जाने वाला मेंढक (वुड फ्रॉग) भी विषम परिस्थितियों को ङोल सकता है। यह मेंढक कई दिनों तक सर्दियों में बर्फ की तरह जमे रहने के बाद भी जीवित रहता है। टार्डीग्रेड और वुड फ्रॉग अलग-अलग प्रजातियों के जीव हैं, लेकिन दोनों अपनी कोशिकाओं की मशीनों को चुनिंदा तरीके से स्थिर करने में सक्षम हैं। अमेरिकी रक्षा अनुसंधान एजेंसी यानी डरपा रणभूमि में जख्मी सैनिकों के जैविक समय को धीमा करने के लिए टार्डीग्रेड की तरकीब का इस्तेमाल करना चाहती है। इसके लिए उसने बायोस्टेसिस नामक एक कार्यक्रम शुरू किया है। इस कार्यक्रम का उद्देश्य घायल सैनिकों के लिए चोट लगने के समय से लेकर प्राथमिक डॉक्टरी उपचार के समय को बढ़ाने के तरीके खोजना है। घायल व्यक्ति की जान बचाने के लिए 60 मिनट का समय बहुत बहुमूल्य होता है जिसे हम गोल्डन ऑवरभी कहते हैं, लेकिन हकीकत में जख्मी के इलाज के लिए एक घंटे से भी कम वक्त मिलता है। डरपा को उम्मीद है कि बायोस्टेसिस कार्यक्रम से जीवित कोशिकाओं में जैव-रासायनिक प्रक्रियाओं को धीमा करके घायल व्यक्ति के इलाज के लिए अतिरिक्त समय जुटाया जा सकता है। इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य है जीवन बचाने के लिए जीवन को धीमा करो।’1बायोस्टेसिस कार्यक्रम के प्रबंधक टिस्टन मैक्लर-बेगली का कहना है कि आणविक स्तर पर जीवन वास्तव में जैव-रासायनिक क्रियाओं की एक निरंतर श्रृंखला है। इन रासायनिक क्रियाओं को संपन्न कराने के लिए एक उत्प्रेरक की आवश्यकता होती है। कोशिकाओं के अंदर ये उत्प्रेरक प्रोटीनों और बड़ी आणविक संरचनाओं के रूप में मौजूद होते हैं जो रासायनिक ऊर्जा को जैविक प्रक्रियाओं में बदलते हैं। मैक्लर-बेगली ने कहा कि बायोस्टेसिस कार्यक्रम के जरिये हम इन आणविक मशीनों को नियंत्रित करके समूचे सिस्टम को धीमा करना चाहते हैं। इस कार्यक्रम के तहत जैव-रासायनिक क्रियाओं को धीमा करने के तरीकों के बारे में सुझाव मांगे जाएंगे। इनमे प्रतिरोधी तत्व और समूची कोशिकाओं के समग्र उपचार शामिल हैं। ये विधियां तभी कारगर मानी जाएंगी जब वे सारे जैविक कार्यों को धीमा कर दें और सिस्टम के सामान्य होने पर शरीर को ज्यादा नुकसान न पहुंचाएं।

Thursday, 1 March 2018

रोबोट को होगी स्पर्श की अनुभूति


इलेक्ट्रॉनिक स्किन वाले रोबोट यह भांप सकेंगे कि मनुष्यों के साथ संपर्क में आने के वक्त कितनी ताकत का प्रयोग करना चाहिए
 मुकुल व्यास  
कुछ वर्ष पहले हॉलीवुड की फिल्म टर्मिनेटरमें दिखाया गया धातु का रोबोटिक हाथ शक्तिशाली जरूर था, लेकिन इस तरह के कमाल सिर्फ पर्दे तक ही सीमित हैं। यदि भविष्य के वास्तविक जीवन में ऐसे रोबोट का प्रवेश हो जाए तो क्या होगा? यदि कोई रोबोट आपसे हाथ मिलाता है या आपके बच्चे को गोदी में लेता है तो क्या वह अपनी यांत्रिक ताकत को परिस्थिति के हिसाब से संतुलित कर पाएगा? आपसे हाथ मिलाते हुए उसे यह ध्यान में रखना होगा कि वह बहुत ताकत के साथ आपका हाथ नहीं पकड़े। इसी तरह बच्चे को गोदी लेते वक्त उसे यह देखना होगा कि उसके शक्तिशाली हाथों से बच्चे को कोई नुकसान नहीं हो। इलेक्ट्रॉनिक स्किन इस समस्या का हल हो सकती है। इलेक्ट्रॉनिक स्किन से युक्त रोबोट यह पता लगा सकेंगे कि मनुष्यों के साथ संपर्क करते हुए उनसे हाथ मिलाने या बच्चे को गोदी लेते वक्त कितनी ताकत का प्रयोग करना चाहिए। वैज्ञनिकों ने एक नई किस्म की लचीली इलेक्ट्रॉनिक स्किन का विकास किया है जिसका उपयोग रोबोट विज्ञान से लेकर कई तरह के बायोमेडिकल उपकरणों में किया जा सकता है। यूनिवर्सिटी ऑफ कोलोराडो बोल्डर के शोधार्थियों द्वारा विकसित यह स्किन एल्कोहल-आधारित घोल की मदद से अपने आप अपनी मरम्मत कर सकती है। इस स्किन का पुनरुपयोग भी किया का सकता है। इलेक्टॉनिक स्किन या ई-स्किन एक पतला पारदर्शी पदार्थ है जो मानव त्वचा के कार्य और उसके यांत्रिक गुणों की नकल कर सकता है।1अभी तक विकसित की गई इलेक्ट्रॉनिक त्वचाओं की सबसे बड़ी कमजोरी यह थी कि उनके निर्माण में प्रयुक्त होने वाले रासायनिक जोड़ कमजोर थे। ये त्वचाएं मानव त्वचा जैसी लचीली जरूर थीं, लेकिन सुदृढ़ नहीं थीं। नई स्किन की बेहतर यांत्रिक ताकत, रासायनिक स्थायित्व और विद्युत सुचालकता के लिए इसमें चांदी के अत्यंत सूक्ष्म कण डाले गए हैं। कोलोराडो यूनिवर्सिटी के असिस्टेंट प्रोफेसर चियानलियांग शियाओ के अनुसार नई ई-स्किन में तापमान, दबाव,आर्द्रता और वायु-प्रवाह को नापने के लिए सेंसर लगे हुए हैं। इन सेंसरों की मदद से रोबोट यह तय कर सकता है कि किस जगह कितनी ताकत लगानी है। शोधार्थियों ने पता लगाया है कि यदि ई-स्किन कहीं से कट जाती है या फट जाती है तो वह एल्कोहल में घुले कुछ रसायनों की मदद से खुद अपनी मरम्मत कर सकती है। 1इस प्रक्रिया में टूटी हुई सतह पर नए मॉलिक्यूल जमा हो जाएंगे, इससे बिखरे हुए हिस्से आपस में जुड़ने लगेंगे। यह प्रक्रिया कुदरती त्वचा में हीलिंग प्रक्रिया जैसी ही है। इसका एक और खास गुण यह है कि सामान्य तापमान पर इसकी रिसाइक्लिंग की जा सकती है। एक घोल में घुलने के बाद इस स्किन से और ई-स्किन निर्मित की जा सकती हैं। इस अध्ययन के सह-लेखक वेई चांग ने कहा कि दुनिया में उत्पन्न होने वाले लाखों टन इलेक्ट्रॉनिक कचरे को देखते हुए ई स्किन की रिसाइक्लिंग न सिर्फ पर्यावरण की दृष्टि से उपयोगी है, बल्कि आर्थिक रूप से किफायती भी है।

Monday, 5 February 2018

दूसरी आकाशगंगा में ग्रहों के प्रमाण

साइंस पत्रिका में प्रकाशित इस खोज से ब्रrांड के इतिहास के मूल सिद्धांत की बुनियाद हिल सकती है जिसे अभी तक कोई चुनौती नहीं मिली थी

मुकुल व्यास 
खगोल वैज्ञानिकों ने पहली बार हमारी मिल्कीवे आकाशगंगा के बाहर ग्रहों की आबादी का पता लगाया है। उन्होंने यह खोज माइक्रोलेंसिंगके जरिये की है। माइक्रोलेंसिंग एक खगोलीय प्रक्रिया है जो पृथ्वी से बहुत दूर स्थित ग्रहों को खोजने के लिए एक कुदरती दूरबीन का काम करती है। अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ ओकलहोमा के शोधार्थियों ने माइक्रोलेंसिंग के जरिये दूसरी आकाशगंगाओं में खगोलीय पिंडों की मौजूदगी का पता लगाया है, जिनका द्रव्यमान चंद्रमा और बृहस्पति के द्रव्यमानों के बराबर है। यूनिवर्सिटी के भौतिकी और खगोल विज्ञान विभाग के प्रोफेसर शिन्यु दाई ने नासा की चंद्र एक्स-रे ऑब्जर्वेटरी से प्राप्त आंकड़ों के विश्लेषण के बाद इन ग्रहों की खोज की है। 1चंद्र एक्स-रे ऑब्जर्वेटरी अंतरिक्ष में तैनात दूरबीन है जो स्मिथसोनियन एस्ट्रोफिजिकल ऑब्जर्वेटरी द्वारा नियंत्रित की जाती है। दाई ने कहा, हम इस खोज से बेहद रोमांचित है। यह पहला अवसर है जब किसी ने हमारी आकाशगंगा के बाहर ग्रहों की उपस्थिति का पता लगाया है। इस अध्ययन से पहले दूसरी आकाशगंगाओं में ग्रहों के मौजूद होने का कोई प्रमाण नहीं मिला था। माइक्रोलेंसिंग के जरिये मिल्कीवे आकाशगंगा में अक्सर नए ग्रहों की खोज होती है। छोटे-छोटे खगोलीय पिंडों के गुरुत्वाकर्षण प्रभाव से पृष्ठभूमि की चीजें कई गुणा बड़ी दिखने लगती हैं। इस कुदरती मैग्निफाइंग ग्लास का उपयोग सुदूरवर्ती वस्तुओं के अवलोकन के लिए किया जा सकता है। जिस आकाशगंगा में नए ग्रहों की उपस्थिति का पता चला है वह पृथ्वी से 3.8 अरब वर्ष दूर है और पृथ्वी के सबसे उत्कृष्ट टेलीस्कोप से भी इन ग्रहों का प्रत्यक्ष अवलोकन नहीं किया जा सकता। अत: खगोलीय पर्ववेक्षण के लिए माइक्रोलेंसिंग से बेहतर और कोई तकनीक नहीं है। 1इस बीच, अंतरराष्ट्रीय खगोल वैज्ञानिकों के अन्य दल ने पृथ्वी से करीब 1.3 करोड़ प्रकाश वर्ष दूर सेंटारस ए आकाशगंगा के इर्दगिर्द छोटी आकाशगंगाओं का पता लगाया है जो अपनी मूल आकाशगंगा के चारों तरफ एक डिस्क की भांति व्यवस्थित ढंग से चक्कर काट रही हैं। साइंस पत्रिका में प्रकाशित इस खोज से ब्रrांड के इतिहास के मूल सिद्धांत की बुनियाद हिल सकती है जो पिछले दो दशकों से निर्विवाद था। 1विज्ञान के स्टैंडर्ड मॉडल के मुताबिक ब्रrांड का करीब एक-पांचवां हिस्सा अदृश्य पदार्थ अथवा डार्क मैटर से बना है। इस मॉडल के अनुसार अधिकांश छोटी आकाशगंगाओं को अपनी मेजबान आकाशगंगाओं की अनियमित तरीके से परिक्रमा करनी चाहिए, लेकिन कुछ वर्ष पहले खगोल वैज्ञानिकों ने पता लगाया था कि मिल्कीवे और पड़ोसी एंड्रोमेडा आकाशगंगा के इर्दगिर्द छोटी आकाशगंगाएं भी एक सीध में परिक्रमा कर रही हैं। खगोल वैज्ञानिकों की टीम के सदस्य हेल्मुट जर्जेन ने बताया कि खगोल वैज्ञानिकों ने पहले यह सोचा था कि ये दो बड़ी आकाश गंगाएं अपवाद हो सकती हैं। अब ऐसा लगता है कि हमारी मिल्कीवे आकाशगंगा और एंड्रोमेडा आकाशगंगा सामान्य आकाश गंगाएं हैं। एक बड़ी आकाशगंगा के चारों तरफ चक्कर काटने वाली आकाश गंगाएं सर्वत्र मौजूद हैं।

Wednesday, 23 September 2015

खुलेंगे ब्रह्मांड के रहस्य

अत्याधुनिक इंफ्रारेड कैमरा एनआइआरकैम 
यह एक विशाल इंफ्रारेड टेलीस्कोप है। आने वाले दशक में अंतरिक्ष के पर्यवेक्षण का मुख्य कार्य इसी दूरबीन द्वारा किया जाएगा
आने वाले दशकों में अंतरिक्ष अनुसंधान के लिए नई टेक्नोलॉजी और शक्तिशाली उपकरणों के उपलब्ध होने के बाद हमें ब्रह्मांड से जुड़े कई सवालों के जवाब मिल जाएंगे। अमेरिका की एरिजोना यूनिवर्सिटी और लॉकहीड मार्टिन कंपनी के वैज्ञानिकों द्वारा विकसित किया जा रहा नियर इंफ्रारेड कैमरा या एनआइआरकैम एक ऐसा महत्वपूर्ण उपकरण है जिसका पूरी दुनिया के खगोल वैज्ञानिक बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं। उन्हें यकीन है इस अति संवेदनशील उपकरण से ब्रह्मांड के अनसुलङो रहस्यों को समझने में मदद मिलेगी। एनआइआरकैम को अक्टूबर, 2018 में जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप के साथ फ्रेंच गुयाना से छोड़ा जाएगा। टेलीस्कोप को अंतरिक्ष में ले जाने का काम यूरोपियन स्पेस एजेंसी का शक्तिशाली एरियन 5 रॉकेट करेगा। इस कैमरे के कोरोनाग्राफ उपकरणों के जरिये खगोल वैज्ञानिक सुदूर अंतरिक्ष में झांक सकेंगे और चमकीली वस्तु या तारे आसपास मौजूद अत्यंत धुंधली वस्तुओं अथवा ग्रहों की तस्वीर खींच सकेंगे। इस कैमरे से प्रारंभिक तारों और निर्माणाधीन आकाशगंगाओं के विस्तृत चित्र तैयार करना संभव हो जाएगा। जिस तरह हम सूरज की रोशनी में किसी वस्तु को देखने के लिए अपनी आंखों के ऊपर अपना हाथ रख लेते हैं, एनआइआरकैम का कोरोनाग्राफ भी उसी तरह से काम करता है। कोरोनाग्राफ चमकीली वस्तु से निकलने वाली तेज रोशनी को अवरुद्ध कर देता है जिसकी वजह से धुंधली वस्तुओं को देखना मुमकिन हो जाता है।
इस कैमरे के विशेष फिल्टरों से हमें तारों के उदय काल में मौजूद रासायनिक संरचनाओं और गैसों के उभरते हुए बादलों को समझने में मदद मिलेगी। इस कैमरे के फिल्टर प्रकाश की अलग अलग वेवलेंथ को पकड़ सकते हैं। चमक में होने वाले परिवर्तनों का पता लगाकर यह कैमरा आकाश गंगाओं के बीच दूरियों का अंदाजा कर सकता है। यह कैमरा दूसरे तारों के इर्दगिर्द घूमने वाले ग्रहों के भौतिक और रासायनिक गुणों का पता लगाने में भी समर्थ होगा। एनआइआरकैम ब्रह्मांड की उत्पत्ति को समझने में सहायक हो सकता है। इस कैमरे के हार्डवेयर में 4 करोड़ पिक्सल हैं और यह 35 केल्विन या माइनस 238 डिग्री सेल्सियस के अत्यंत ठंडे तापमान पर काम करने के उद्देश्य से डिजाइन किया गया है। वैज्ञानिकों का कहना है कि एनआइआरकैम से हम डार्क मैटर और डार्क एनर्जी को बेहतर ढंग से समझ पाएंगे। हम जानते हैं कि इनका अस्तित्व है, लेकिन हमारी दूरबीनें अभी तक इनका पता नहीं लगा पाई हैं। यह कैमरा हमें यह भी समझाएगा कि अंतरिक्ष और समय मूलभूत स्तर पर किस तरह कार्य करते हैं। एनआइआरकैम द्वारा एकत्र डेटा का पूरी दुनिया पर गहरा असर पड़ेगा। ब्रह्मांड की उत्पत्ति से जुड़ी बातों को समझ कर खगोल वैज्ञानिक उन तमाम ब्रह्मांडीय प्रक्रियाओं को ठीक से समझ पाएंगे जो फिलहाल हमारी समझ से बाहर हैं। एनआइआरकैम की खूबियों पर चर्चा करते हुए यहां मुख्य दूरबीन, जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप का उल्लेख करना भी उचित होगा। यह एक विशाल इंफ्रारेड टेलीस्कोप है। आने वाले दशक में अंतरिक्ष के पर्यवेक्षण का मुख्य कार्य इसी दूरबीन द्वारा किया जाएगा।

यह दूरबीन हमारे ब्रह्मांड के इतिहास के प्रत्येक चरण का अध्ययन करेगी जिसमें बिग बैंग या ब्रह्मांडीय महाविस्फोट के बाद निकली पहली चमक, पृथ्वी जैसे ग्रहों पर जीवन में मददगार सौरमंडलों का निर्माण शामिल है। वैज्ञानिकों को इस दूरबीन की तैनाती का इंतजार है। शुरू में इस दूरबीन का नाम नेक्स्ट जनरेशन स्पेस टेलीस्कोप रखा गया था। 2002 में नासा के पूर्व प्रशासक जेम्स वेब पर इसका नया नाम रख दिया गया। नासा का गोडार्ड स्पेस स्पेस सेंटर इसका प्रबंधकीय कार्य देख रहा है। अंतरिक्ष में तैनाती के बाद अमेरिका का स्पेस टेलीस्कोप साइंस इंस्टीट्यूट वेब टेलीस्कोप का संचालन करेगा।

Monday, 10 August 2015

जीन तकनीक के खतरे

जीन ड्राइव तकनीक के दुरुपयोग की आशंका 
वैज्ञानिकों ने कीटों में परिवर्तित जीनों के प्रसार के लिए विकसित की गई नई तकनीक के दुरुपयोग की आशंका जाहिर की है। उनका कहना है कि जीन ड्राइव नामक नई टेक्नोलॉजी गलत हाथों में पड़ सकती है और आतंकवादी इससे बड़ी पर्यावरणीय विपदा उत्पन्न कर सकते हैं। नई टेक्नोलॉजी से परिवर्तित जीन बहुत तेजी से दूसरी पीढ़ी में पहुंचता है। रिसर्चरों ने इस विधि की तुलना अनियंत्रित आणविक चेन रिएक्शन से की है। यदि अच्छे उद्देश्य के लिए इस टेक्नोलॉजी का उपयोग किया जाए तो हम इससे मलेरिया और पीत ज्वर जैसी मलेरिया जनित बीमारियों के विस्तार को रोक सकते हैं। यदि किसी के मन में कुत्सित इरादे पनप रहे हों तो इसका उपयोग घातक बीमारियां फैलाने के लिए भी किया जा सकता है। इजराइल केतेल अवीव विश्वविद्यालय के जीन वैज्ञानिक डेविड गर्विट्ज का कहना है कि यदि जीन ड्राइव टेक्नोलॉजी मच्छरों को मलेरिया के परजीवी की मेजबानी करने और उसे प्रसारित करने से रोकती है तो यही टेक्नोलॉजी मनुष्यों में विषाक्त बैक्टीरिया पहुंचाने के लिए भी प्रयोग में लाई जा सकती है। साइंस पत्रिका में छपे एक लेख में दुनिया के 27 प्रमुख जीन वैज्ञानिकों ने वैज्ञानिक समुदाय से आग्रह किया है वे जनता को जीन ड्राइव टेक्नोलॉजी के फायदों के साथ-साथ उसके भयावह पहलुओं के बारे में भी बताएं।
जीन ड्राइव तकनीक में प्रयुक्त होने वाले जीन सुपरचार्ज कहलाते हैं, क्योंकि उनमें आनुवंशिक सामग्री का कैसेट होता है जो किसी जीव के क्रोमोजोम यानी गुणसूत्र में प्रविष्ट किया जाता है। कैसेट से साथ प्रविष्ट करने वाली आनुवंशिक सामग्री बहुत आसानी से एक क्रोमोजोम से दूसरे क्रोमोजोम में पहुंचने लगती है। इससे जीन संशोधित गुण जंगलों में रहने वाली उन प्रजातियों में तेजी से फैलता है जिनमें प्रजनन तेजी से होता है। इजराइली वैज्ञानिक गर्विट्ज का कहना है कि परमाणु हथियार निर्मित करने की टेक्नोलॉजी की तरह जीन ड्राइव की तकनीक को भी गोपनीय रखा जाना चाहिए, लेकिन हार्वर्ड विश्वविद्यालय के डॉ. केविन एसवेल्ट और 26 अन्य वैज्ञानिकों ने गर्विट्ज के सुझाव से असहमति व्यक्त की है। इन वैज्ञानिकों का कहना है कि जीन ड्राइव को जैविक हथियार बनने से रोकने के लिए संपूर्ण पारदर्शिता और खुलापन जरूरी है। उन्होंने जीन परिवर्तित प्रजातियों के दुर्घटनावश विस्तार को रोकने लिए कड़े सुरक्षा उपाय लागू करने का आग्रह किया है। वैज्ञानिकों का यह भी मानना है कि दुनिया में स्वास्थ्य, कृषि और संरक्षण से संबंधित समस्याओं का हल खोजने में जीन ड्राइव टेक्नोलॉजी तमाम संभावनाओं से भरपूर है, लेकिन प्रयोगशाला से बाहर जंगली आबादियों में फेरबदल करने की उनकी क्षमता पर कड़ी नजर रखना जरूरी है। कुछ समय पहले फ्रूट फ्लाई पर किए गए प्रयोगों में संशोधित जीन सिर्फ कुछ ही पीढ़ियों के बाद लगभग हर फ्रूटफ्लाई को संक्रमित करने में सक्षम हो गए थे। इंपीरियल कॉलेज लंदन के जीन वैज्ञानिक ऑस्टिन बर्ट को 2003 में इस दिशा में पहली सफलता मिली थी। जीन संपादन की क्रिस्पर तकनीक के उपलब्ध होने के बाद प्रयोगशाला में अब इन प्रयोगों को दोहराना आसान हो गया है।

क्रिस्पर तकनीक का फायदा यह है कि इससे दोषपूर्ण जीनों को कोशिकाओं से हटाया जा सकता है या उनके स्थान पर स्वस्थ जीन डाले जा सकते हैं। इस विधि से डीएनए कोड में अक्षरों की अशुद्धि भी दूर की जा सकती है। हार्वर्ड के डॉ. एसवेल्ट का मानना है कि जीन ड्राइव से मनुष्यों में बीमारियां फैलाने वाले कीटों में आनुवंशिक फेरबदल करके मानव स्वास्थ्य को लाभ पहुंचाया जा सकता है। इन कीटों में मच्छरों की वे प्रजातियां शामिल हैं जो मलेरिया, डेंगू और चिकनगुनिया जैसी बीमारियों का प्रसार करती हैं। जीन ड्राइव से ये मच्छर मनुष्यों के लिए खतरा नहीं रहेंगे। फसलों को नुकसान पहुंचाने वाले कीटों में म्यूटेशन की वजह से उन पर कीटनाशक दवाओं का असर नहीं हो रहा है। ऐसे म्यूटेशन जीन ड्राइव विधि से निष्प्रभावी किए जा सकते हैं।

Monday, 9 February 2015

आइवीएफ पर विवाद

ब्रिटेन में विवादास्पद आइवीएफ तकनीक को मंजूरी
इस तकनीक का मकसद बचपन की आनुवंशिक बीमारियों से छुटकारा दिलाना है, लेकिन भविष्य में इसका दुरुपयोग भी हो सकता है .
ब्रिटेन में हाउस ऑफ कॉमंस ने भारी मतों से विवादास्पद आइवीएफ यानी परखनली तकनीक को मंजूरी दे दी है जिससे तीन लोगों के डीएनए से भ्रूण उत्पन्न पैदा किए जा सकेंगे। नई आइवीएफ तकनीक से पहला आइवीएफ शिशु अगले वर्ष जन्म ले सकता है। दुनिया में दूसरे देशों के विशेषज्ञों ने विवादास्पद तकनीक को मंजूरी दिए जाने पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। उनका कहना है कि ब्रिटेन मानव निषेचन और भ्रूण विज्ञान कानून में संशोधन करके बहुत बड़ी गलती करेगा। इस बारे में 44 ब्रिटिश सांसदों का मानना है कि इस तकनीक से यूरोपीय कानूनों का उल्लंघन होता है। कई लोगों ने इस तकनीक की नैतिकता पर सवाल उठाए हैं। इस तकनीक के कुछ अन्य आलोचकों का कहना है कि इससे बच्चों में अज्ञात स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का खतरा बढ़ जाएगा। ब्रिटिश हाउस ऑफ लॉर्डस में अगले महीने इस मुद्दे पर चर्चा होगी और वहां संशोधन के ठुकराए जाने की संभावना बहुत कम है। नया कानून इसी साल अक्टूबर में लागू हो जाएगा। इसके तुरंत बाद मानव परीक्षण शुरू हो जाएंगे। इस तकनीक के पक्षधरों का कहना है कि नए इलाज से ब्रिटेन में 2,500 महिलाओं को लाभ होगा।
इस तकनीक का असली मकसद बचपन की आनुवंशिक बीमारियों से छुटकारा दिलाना है, लेकिन भविष्य में मनचाहे गुणों वाली संतान अथवा डिजाइनर बेबी पैदा करने के लिए इस तकनीक का दुरुपयोग भी हो सकता है। यह तकनीक दरअसल जर्मलाइन जीन थिरैपी का एक रूप है जिसमें एक परिवार में होने वाली संतानों को वंशानुगत बीमारियों से निजात दिलाने के लिए उनके डीएनए को बदल दिया जाता है। हमारी कोशिकाओं में पाए जाने वाले माइटोकांडिया में आनुवंशिक गड़बड़ियों से करीब 6,500 लोगों में से एक व्यक्ति प्रभावित होता है। माइटोकांडिया के विकारों का इस समय कोई इलाज नहीं है। इन्हें मां से शिशुओं में फैलने से रोकने का भी कोई तरीका नहीं है। माइटोकांडिया दरअसल हमारी कोशिका का सूक्ष्म बिजलीघर है। माइटोकांडिया में 37 जीन होते है। ये जीन हमारी कोशिकाओं की ऊर्जा आपूर्ति के लिए जरूरी होते हैं। हमारे डीएनए का एक बहुत बड़ा हिस्सा कोशिका के नाभिक में होता है। हमारे शरीर को रूप और आकार देने वाले जीन इसी डीएनए में होते हैं। ब्रिटेन की न्यूकैसल यूनिवर्सिटी के रिसर्चरों द्वारा विकसित इस तकनीक को माइटोकांडियल ट्रांसफर भी कहा जाता है। इस विधि में एक स्वस्थ महिला डोनर के डीएनए का इस्तेमाल किया जाता है। इसका उद्देश्य माताओं द्वारा बच्चों में आनुवंशिक बीमारियों के प्रसार को रोकना है। इन बीमारियों में मस्कुलर डिस्ट्रोफी यानी मांसपेशियों का क्षय तथा हृदय और लीवर की बीमारियां शामिल हैं। ज्यादातर बच्चों में यह बीमारी हलके रूप में प्रकट होती है लेकिन साल में जन्म लेने वाले पांच से दस बच्चे माइटोकांडिया रोग के उग्र रूप से प्रभावित होते हैं। नई तकनीक से ऐसे बच्चों का जीवन सुधारा जा सकता है। इस विधि में आनुवंशिक विकारों वाली महिला की अंडाणु कोशिका की आनुवंशिक सामग्री को एक स्वस्थ महिला के अंडाणु में हस्तांतरित कर दिया जाता है ताकि उसके माइटोकांडिया का डीएनए आइवीएफ शिशु में पहुंच सके। इसका अर्थ यह हुआ कि शिशु को तीन अभिभावकों यानी माता-पिता और डोनर महिला से से डीएनए मिलेगा, लेकिन वैज्ञानिकों का कहना है कि शिशु को डोनर से सिर्फ 0.1 फीसद डीएनए ही मिलेगा।
कुछ वैज्ञानिकों का कहना है कि अभी माइटोकांडिया को हम ठीक से समझ नहीं पाए हैं। उसके डीएनए से व्यक्ति के गुणों पर असर पड़ सकता है। इसलिए नई तकनीक को मंजूरी देने से पहले माइटोकांडिया को ठीक से समझना जरूरी है। इस तकनीक से जन्म लेने वाली लड़कियों की भावी संतानें आगे की पीढ़ियों में भी माइटोकांडिया के परिवर्तनों को जारी रखेंगी।


Tuesday, 3 February 2015

खेती में नई तकनीक

फलों की जीन संशोधित फसल 
आनुवंशिक परिवर्तनों के जरिये पौधे की कोशिकाओं द्वारा उत्पन्न कुदरती पदार्थो की मात्र को घटाया -बढ़ाया जा सकता है  
जीनों के संपादन की नई तकनीकें उपलब्ध होने के बाद फल-सब्जियों और दूसरे कृषि उत्पादों में आनुवंशिक परिवर्तन करना संभव हो जाएगा। इसके लिए उनमें बाहरी जीन प्रविष्ट करने की जरूरत नहीं पड़ेगी। रिसर्चरों का कहना है कि जीन संपादन जीन संशोधन से एकदम भिन्न जैव तकनीक है। जीन संशोधित फसलों पर पूरी दुनिया में चल रहे विवाद को देखते हुए समाज में जीन संपादित फल-सब्जियों की स्वीकार्यता अधिक हो सकती है। जीन संपादन तकनीक से लाभान्वित होने वाले फलों में विटामिन ए वाले केले और कुछ खास ढंग के सेब शामिल हैं जो काटे जाने पर भूरे नहीं होंगे। आनी वाले दिनों में यूरोपीय बाजारों में इस तरह के फल दिख सकते हैं। इटली में सेन माइकेल कृषि संस्थान के वैज्ञानिक चिदानंद नागमंगला कांचीस्वामी का कहना है कि बाहरी जीनों के प्रविष्ट कराने के बाद उगाई गई फसलों की तुलना में बाहरी जीनों के बिना तैयार की गईं जीन संपादित फसलें ज्यादा कुदरती हैं। सिर्फ कुछ मामूली आनुवंशिक हेरफेर से फलों के गुणों में परिवर्तन किया जा सकता है। इन आनुवंशिक परिवर्तनों के जरिये पौधे की कोशिकाओं द्वारा उत्पन्न कुदरती पदार्थो की मात्र को घटाया -बढ़ाया जा सकता है।
फलों के जीन समूहों के बारे में लगातार नई जानकारियां मिलने के बाद जीन संपादन के लिए क्रिस्पर और टॉलेन जैसी तकनीकें विकसित हो चुकी हैं। इनसे किसी भी फल का जीन संपादन करना आसान हो गया है। अभी तक फलों की जीन संशोधित फसलों पर जीन संपादन की नई तकनीक नहीं आजमाई गई थी। इस समय विकसित की गई फलों की अधिकांश फसलों में बाहरी जीन डालने के लिए वानस्पतिक बैक्टीरिया का प्रयोग किया गया है। यूरोपीय यूनियन के कठोर नियमों के कारण इन फलों में से सिर्फ पपीते का ही आंशिक व्यावसायिक इस्तेमाल हो पाया है। रिसर्चरों का कहना है कि जीनों की काट-छांट वाली फसलों को यूरोपीय यूनियन जीन असंशोधित श्रेणी में रखने पर विचार कर सकती है। कांचीस्वामी और उनके सहयोगियों के मुताबिक जीन संपादन तकनीक से उच्च गुणों वाली बेहतर फसलों के विकास में मदद मिलेगी और ऐसी फसलों का उन देशों में भी व्यवसायीकरण किया जा सकेगा जहां आनुवंशिक रूप से संशोधित फसलों को लेकर तीव्र विवाद है। इस बीच आस्ट्रेलियाई वैज्ञानिकों ने एक ऐसा जीन संशोधित केला तैयार किया है जो बच्चों के कुपोषण की समस्या के हल में मदद कर सकता है। विटामिन ए की कमी से दुनिया में हर साल सात लाख बच्चो की मौत होती है और तीन लाख बच्चे दृष्टिहीनता के शिकार हो जाते हैं। रिसर्चरों का दावा है कि आनुवंशिक सुधारों के फलस्वरूप पूर्वी अफ्रीका में उगने वाली केले की किस्म में विटामिन ए की मात्र बढ़ गई है। ब्रिस्बेन में क्वींसलैंड युनिवर्सिटी में केला परियोजना पर काम कर रहे प्रमुख वैज्ञानिक जेम्स डेल का कहना है कि पूर्वी अफ्रीका में प्रमुख खाद्य वस्तु के रूप में उगाए जाने वाले केले में लौह तत्व और बीटा केरोटीन की मात्र अपेक्षित स्तर पर नहीं होती जिस वजह से बच्चों को भरपूर पोषक तत्व नहीं मिल पाते। केले की नई किस्म में बीटा केरोटीन की मात्र बढ़ाने के लिए कुछ खास जीन शामिल किए गए हैं।

बीटा केरोटीन की उच्च मात्र की वजह से यह केला अंदर से संतरी रंग का है। बीटा केरोटीन शरीर के अंदर जाकर विटामिन ए में परिवर्तित होता है। आस्ट्रेलियाई रिसर्चरों ने बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन से प्राप्त एक करोड़ डॉलर की वित्तीय मदद से युगांडा में परीक्षण के तौर पर जीन संशोधित केले की कुछ किस्में उगाई हैं। युगांडा में करीब 70 प्रतिशत आबादी अपनी अधिकांश पौष्टिक खुराक के लिए केले पर निर्भर है। युगांडा में उगाया गया केला मानव परीक्षणों के लिए अमेरिका भेजा गया है। इसके नतीजे इस वर्ष के अंत तक प्राप्त हो जाएंगे। युगांडा के सांसद इस समय जीन संशोधित केले से संबंधित विधेयक पर विचार कर रहे हैं।

नई एंटीबायोटिक की खोज

दवा प्रतिरोध का मुकाबला
जीवाणु विकसित करने की नई विधि से उम्मीद है कि शक्तिशाली एंटीबायोटिक दवाएं विकसित की जा सकेंगी 
वैज्ञानिकों ने लगभग तीस साल बाद एंटीबायोटिक की एक नई किस्म खोजी है जो ऐसी संक्रामक बीमारियों से लड़ने में मदद कर सकती हैं जिनमें मौजूदा दवाएं बेअसर साबित हो रही हैं। टेक्सोबैक्टीन नामक यह एंटीबायोटिक कई तरह के दवा प्रतिरोधी बैक्टीरिया को नष्ट करने में सक्षम है जिनमें टीबी उत्पन्न करने वाले बैक्टीरिया शामिल हैं। इस एंटीबायोटिक के प्रयोग से जीवाणु अपनी कोशिका की दीवार नहीं बना पाते। इससे उनकी दवाओं का प्रतिरोध करने की क्षमता नष्ट हो जाती है। अमेरिका में बोस्टन स्थित नॉर्थ ईस्टर्न यूनिवर्सिटी के एंटीमाइक्रोबियल डिस्कवरी सेंटर के डायरेक्टर किम लुइस का कहना है कि टेक्सोबैक्टीन बहुत तेजी से इंफेक्शन का सफाया का देती है। गौरतलब है कि दुनिया में खतरनाक बीमारियां फैलाने वाले जीवाणुओं में दवा प्रतिरोधी क्षमता लगातार बढ़ रही है और वैज्ञानिकों ने चेताया है कि रोगाणुओं में दवा प्रतिरोध की समस्या जलवायु परिवर्तन जितनी ही गंभीर है। जनस्वास्थ्य विशेषज्ञों ने इस बात पर गहरी चिंता जताई है कि एंटीबायोटिकरोधी रोगाणु लगभग प्रत्येक देश में पहुंच चुके हैं। स्थिति इतनी हताशापूर्ण है कि डॉक्टरों के पास बची हुई सबसे शक्तिशाली एंटीबायोटिक दवाएं भी बेअसर साबित हो रही हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने पिछले साल अपनी एक रिपोर्ट में दवा प्रतिरोध की गंभीरता पर सबका ध्यान खींचा था। एक अन्य रिपोर्ट में चेतावनी दी गई थी कि यदि दवा प्रतिरोध से निपटने के लिए कारगर उपाय नहीं किए गए तो दुनिया की अर्थव्यवस्था पर 2050 तक खरबों डॉलर का बोझ आ जाएगा।
चूहों पर किए गए ताजा अध्ययनों के दौरान अमेरिकी वैज्ञानिकों ने पाया कि नए एंटीबायोटिक से स्टेफाइलोकोकस और स्ट्रेप्टोकोकस नामक जीवाणु बेअसर हो जाते हैं। इन जीवाणुओं से फेफड़ों और रक्त में जानलेवा इन्फेक्शन उत्पन्न हो सकते हैं। यह दवा एंट्रोकोकस के विरुद्ध भी कारगर सिद्ध हुई है जो हृदय पेट और प्रोस्ट्रेट आदि को इंफेक्ट कर सकता है। अधिकांश एंटीबायोटिक दवाएं बैक्टीरिया या फफूंदी से निकाली जाती हैं, लेकिन वैज्ञानिक अभी बहुत कम बैक्टीरिया में एंटीबायोटिक क्षमता की जांच कर पाए हैं। इसकी वजह यह है कि 99 प्रतिशत जीवाणुओं को प्रयोगशाला में विकसित नहीं किया जा सकता। लुइस की टीम ने इस समस्या से निपटने के लिए आइचिप नामक एक उपकरण विकसित किया। यह उपकरण बैक्टीरिया को उनके कुदरती माहौल में विकसित करता है। लुइस की टीम ने मैसाचुसेट्स की एक कंपनी और यूनिवर्सिटी ऑफ बोन के रिसर्चरों के साथ मिलकर मिटटी के नमूनों में करीब 10,000 बैक्टीरिया में एंटीबायोटिक की जांच की। उन्होंने 25 रसायन खोजे जिनमें टैक्सोबैक्टीन को सबसे ज्यादा उपयोगी पाया गया। ज्यादातर एंटीबायोटिक दवाएं बैक्टीरिया के प्रोटीन को निशाना बनाती हैं, लेकिन बैक्टीरिया नए प्रोटीन उत्पन्न करके दवा प्रतिरोधी क्षमता हासिल कर लेते हैं। टैक्सोबैक्टीन सीधे बैक्टीरिया की कोशिका दीवार की निर्माण सामग्री पर प्रहार करती है। लुइस का कहना है कि इस एंटीबायोटिक को दवा के रूप में उपलब्ध कराने से पहले अभी और रिसर्च की जरूरत है। इस दवा के असर को जांचने के लिए मानवीय परीक्षण दो साल में शुरू हो सकते हैं।

इस एंटीबायोटिक के संभावनापूर्ण होने के बावजूद इसमें कुछ कमियां हैं। यह सिर्फ ऐसे बैक्टीरिया के खिलाफ काम करती है जिनमें बाहरी कोशिका दीवार नहीं होती। ऐसे बैक्टीरिया को ग्राम पॉजिटिव बैक्टीरिया कहा जाता है जिनमें टीबी और स्ट्रेप्टोकोकस शामिल है। यह ग्राम नेगिटिव बैक्टीरिया के खिलाफ बेअसर साबित हुई है जिनमें ई-कोलाई जैसे खतरनाक दवा-प्रतिरोधी जीवाणु शामिल हैं। इन सीमाओं के बावजूद नई एंटीबायोटिक की खोज और जीवाणुओं को विकसित करने के लिए खोजी गई नई विधि से उम्मीद है कि आने वाले वषों में शक्तिशाली एंटीबायोटिक दवाएं विकसित की जा सकेंगी।

Monday, 25 August 2014

एमड्राइव इंजन की अवधारणा

ईंधन रहित इंजन
क्या कोई इंजन ईंधन के बगैर चल सकता है? जब ब्रिटिश वैज्ञानिक रॉबर्ट शायर ने 2000 में एमड्राइव इंजन का डिजाइन तैयार किया तो वैज्ञानिक समुदाय ने यह कहकर उनकी अवधारणा को खारिज कर दिया कि इस तरह का इंजन असंभव है, क्योंकि यह भौतिकी के सिद्धांत के विपरीत है। अब नासा ने एक नई किस्म के असंभव इंजन का अनुमोदन कर दिया है जिससे अंतरिक्ष भ्रमण के क्षेत्र में बड़ी क्रांति आ सकती है। नासा की ईगलवर्क्‍स लेबोरेटरीज के इंजीनियरों ने एक इंजन से ईंधन के बगैर ही वेग उत्पन्न करने में सफलता प्राप्त की है। यह एक तरह से भौतिकी के इस नियम का उल्लंघन है कि हर क्रिया पर समान और विपरीत क्रिया उत्पन्न होती है। पारंपरिक अंतरिक्ष यानों को अंतरिक्ष में आगे बढ़ने के लिए बड़ी मात्र में ईंधन ले जाना पड़ता है। इस ईंधन से उत्पन्न थ्रस्ट यान को आगे की ओर धकेलता है। यह तरीका कारगर है, लेकिन इसमें ईंधन और अंतरिक्ष में उसके प्रक्षेपण की लागत बहुत ज्यादा आती है। नासा इंजीनियरों ने केनी ड्राइव नामक इंजन का परीक्षण किया है। इस मशीन में बिजली से माइक्रोवेव तरंगें उत्पन्न की जाती हैं।
इन तरंगों को विशेष रूप से निर्मित एक पात्र के अंदर छोड़ा जाता है। माइक्रोवेव के लिए बिजली सौर ऊर्जा से मिलती है। इसका अर्थ यह हुआ कि इस इंजिन को किसी प्रणोदक की आवश्यकता नहीं है। जब लंदन में कार्यरत वैज्ञानिक रॉबर्ट शायर ने अपने एमड्राइव इंजन की अवधारणा पेश की तो सिर्फ चीनी वैज्ञानिकों ने उनकेविचार को गंभीरता से लिया था। उन्होंने अपने इंजन से 720 मिलीन्यूटन यानी 72 ग्राम थ्रस्ट पैदा करने का दावा किया था। चीनियों द्वारा निर्मित इंजन एक उपग्रह को धकेलने में सक्षम था। पश्चिम में किसी को भी चीनी वैज्ञानिकों के इस दावे पर यकीन नहीं हुआ। ब्रिटिश वैज्ञानिक प्रो. शायर अपनी कंपनी एसपीआर लिमिटेड के जरिये अपने एमड्राइव इंजन में लोगों का ध्यान आकृष्ट करने की कोशिश करते रहे हैं। शायर ने अपने इंजन के कई सिस्टम निर्मित किए हैं, लेकिन उनके आलोचकों का कहना है कि भौतिकी के नियमों के अनुसार इस तरह के सिस्टम काम नहीं कर सकते। अमेरिकी वैज्ञानिक गाइडो फेटा ने अपना एक अलग माइक्रोवेव इंजन निर्मित किया। उन्होंने नासा से इस इंजन के परीक्षण का आग्रह किया। नासा के वैज्ञानिकों द्वारा किए गए परीक्षण के नतीजे गत 30 जुलाई को क्लीवलैंड में एक वैज्ञानिक सम्मेलन में प्रस्तुत किए गए। परीक्षण के नतीजे आश्चर्यजनक रूप से सकारात्मक थे। जॉनसन स्पेस सेंटर के पांच रिसर्चरों ने फेटा के इंजन को स्थापित करने में छह दिन लगाए। इसके बाद वे दो दिन तक इस पर परीक्षण करते रहे। परीक्षण के दौरान यह प्रणोदक रहित इंजन 30 और 50 माइक्रोन्यूटन वेग उत्पन्न करने में सफल रहा। यदि नासा के रिसर्चरों की बात सही साबित होती है तो अंतरिक्ष में इस टेक्नोलॉजी के चमत्कारिक उपयोग हो सकते हैं। सौर पैनलों से इंजन के संचालन के लिए बिजली मिल सकती है। इससे इंजन को लंबे समय तक बिना किसी अतिरिक्त खर्च के चलाना संभव हो सकेगा।
इससे उपग्रहों को कक्षा में लंबे समय तक कार्यरत रखने की लागत कम हो जाएगी और स्पेस स्टेशनों का खर्च घटेगा। साथ ही उनका जीवनकाल भी बढ़ जाएगा। सुदूर अंतरिक्ष में लंबी यात्रएं करना बहुत आसान हो जाएगा। अंतरिक्ष यात्रियों को महीनों के बजाय कुछ ही हफ्तों में मंगल पर पहुंचाया जा सकेगा। एक वैज्ञानिक हेरॉल्ड वाइट का अनुमान है कि इस इंजन के बड़े संस्करण से हम प्रोक्सिमा सेंटारी की यात्र सिर्फ 30 वर्षो में कर सकने में समर्थ हो सकेंगे। प्रोक्सिमा सेंटारी हमारा सबसे करीबी पडोसी तारा है और वर्तमान टेक्नोलॉजी से वहां तक पहुंचने में 76,000 वर्ष लगेंगे। नासा ने अभी इस इंजन की कार्यप्रणाली को ठीक से नहीं समझाया है। जाहिर है वैज्ञानिक समुदाय ईंधन रहित इंजन के दावे की बहुत बारीकी से पड़ताल करेंगे।


Sunday, 20 July 2014

बुढ़ापे का मुकाबला

आहार में कैलोरी की मात्र कम करने से उम्र संबंधी जुड़ी बीमारियों को कम किया जा सकता है। वृद्ध होने की प्रक्रिया पर आहार के प्रभावों को जानने के लिए बंदरों पर 25 वर्ष तक किए गए अध्ययन में यह बात सामने आई है। यह अध्ययन अमेरिका की विस्कोंसिन मेडिसन यूनिवर्सिटी के नेशनल प्राइमेट रिसर्च सेंटर में 1989 में शुरू किया गया था। अध्ययन में 76 बंदरो को सम्मिलित किया गया। अध्ययन शुरू करने के समय इन बंदरों की आयु 7 से 14 वर्ष के बीच थी। इन बंदरों को दिए जाने वाले आहार में कैलोरी की मात्र 30 प्रतिशत कम कर दी गई थी। अध्ययन में शामिल दूसरे ग्रुप के बंदरों के आहार में कैलोरी की मात्र में कोई कटौती नहीं की गई। रिसर्चरों ने पाया कि जिन बंदरों ने भरपेट भोजन लिया उनमें बीमारियां उत्पन्न होने का खतरा कम कैलोरी लेने वाले बंदरों की तुलना में 2.9 गुना ज्यादा था। इसी तरह इन बंदरों में मृत्यु का खतरा तीन गुना अधिक पाया गया। इस अध्ययन से जुड़े प्रमुख रिसर्चर रिचर्ड वाइनड्रच का कहना है कि यह अध्ययन इस नाते महत्वपूर्ण है कि निचले क्रम के जीवों में हमने जो जीवविज्ञान देखा है वह प्राइमेट ग्रुप पर भी लागू होता है जिसमें मनुष्य भी शामिल है।
कैलोरी में कटौती के द्वारा बुढ़ापे का मुकाबला करने के पीछे जो प्रक्रिया है उससे उम्र से जुड़ी बीमारियों को रोकने वाली दवाएं विकसित करने में मदद मिल सकती है। शरीर को पोषक तत्वों की आपूर्ति बनाए रखते हुए कम कैलोरी वाली खुराक से मक्खियों और चूहों के आयुकाल में 40 प्रतिशत की वृद्धि देखी जा चुकी है। वैज्ञानिक काफी समय से कैलोरी कटौती की जीव-वैज्ञानिक प्रक्रिया को समझने की कोशिश कर रहे हैं। इस अध्ययन से जुडी एक अन्य रिसर्चर रोजालिन एंडरसन का कहना है कि बुढ़ापे की प्रक्रिया और उम्र से जुडी बीमारियों पर कैलोरी में कटौती के स्पष्ट प्रभाव दिखने की वजह से ही हम कैलोरी कटौती का विशेष अध्ययन कर रहे हैं। कुछ लोगों ने उन दवाओं का भी अध्ययन शुरू कर दिया है जो कैलोरी कटौती के समय सक्रिय रहने वाली प्रक्रियाओं को प्रभावित करती हैं। इन दवाओं में कुछ कंपनियां काफी दिलचस्पी ले रही हैं। विस्कोंसिन के रिसर्चरों के निष्कर्ष अमेरिका के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ एजिंग यानी एनआइए में किए गए अध्ययन के नतीजों के एकदम विपरीत हैं। एनआइए ने 120 बंदरों पर अध्ययन करने के बाद कहा था कि कैलोरी कटौती वाले बंदरों में दूसरे बंदरों की तुलना में कोई खास अंतर नहीं देखने को मिला है। विस्कोंसिन के रिसर्चरों का कहना है कि एनआइए में किए गए अध्ययन में कटौती से मुक्त बंदरों की खुराक तय करने में जरूर कुछ गड़बड़ियां हुई होंगी। एंडरसन ने स्पष्ट किया है कि हम यह अध्ययन इसलिए नहीं कर रहे हैं कि लोग अपने आप कैलोरी की मात्र घटाने का फैसला करने लगें। यह मात्र एक अनुसंधान है, जीवन शैली बदलने की सिफारिश नहीं। उन्होंने बताया कि कैलोरी कटौती के अधिकांश लाभ ऊर्जा के नियमन से जुड़े हुए हैं। यह ईंधन के इस्तेमाल को प्रभावित करती है। कैलोरी कटौती मुख्य रूप से मेटाबोलिज्म को निर्धारित करती है।
वैज्ञानिकों ने अपना अध्ययन शुरू करने के छह महीने के भीतर ही कैलोरी कटौती से मुक्त बंदरों में डायबिटीज के लक्षण देखे थे। ये बंदर अपनी युवावस्था में ही थे। दूसरी तरफ आहार में कम कैलोरी लेने वाले बंदरों में काफी लंबे समय तक डायबिटीज का कोई लक्षण नहीं मिला। बहुत कम लोग कैलोरी में 30 प्रतिशत कटौती बर्दाश्त कर सकते हैं। फिर भी विस्कोंसिन में किए गए अध्ययन में बहुत सी बातें आशाजनक हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि चूहों, कीड़ों और मक्खियों में कैलोरी कटौती के पीछे जो बुनियादी जीवविज्ञान काम करता है वह वानर प्रजातियों में भी दिखाई देता है।

Thursday, 8 May 2014

इलेक्ट्रॉनिक चिप और इंजेस्टिबल सेंसर

आज से पांच-दस साल बाद किसी विकसित देश में जन्म लेने वाले बच्चे को एक अनोखा टैटू मिल सकता है। यह टैटू एक इलेक्ट्रॉनिक चिप के रूप में होगा। डाक टिकट से भी छोटी इस चिप को संभवतः सीने में प्रत्यारोपित किया जाएगा। यह चिप बच्चे के शरीर की हर गतिविधि, उसके सोने की अवधि, उसके सांस लेने की दर, उसके शरीर के तापमान और उसके पोषण की स्थिति पर नजर रखेगी। चिप द्वारा एकत्र किए गए सारे आंकड़े मोबाइल फोनों या टैब्लेटों को भेज दिए जाएंगे जहां ऐप्स के जरिए अभिभावकों और डॉक्टरों को तत्काल बच्चे के स्वास्थ्य के बारे में सभी महत्वपूर्ण जानकारियां मिल जाएंगी। युनिवर्सिटी ऑफ सदर्न कैलिफोर्निया में कार्डियोवैस्कुलर मेडिसिन डिविजन की प्रमुख लेजली सैक्सन का कहना है कि इस तरह की चिपों से सिर्फ बच्चों को ही फायदा नहीं होगा। भविष्य में खिलाड़ियों और सैनिकों सहित हर व्यक्ति को इसका लाभ मिलेगा। मरीज अपने व्यक्तिगत सेंसरों द्वारा एकत्र आंकड़ों की मदद से अपनी बीमारियों से बेहतर ढंग से निपट सकेंगे।
कुछ समय पहले टैक्सस में एक इंटरेक्टिव कॉन्फ्रेंस में सैक्सन ने बताया कि सेंसरों द्वारा एकत्र आंकड़ों का भंडार दवा कंपनियों और दूसरी बायोमेडिकल कंपनियों के लिए बहुमूल्य साबित होगा। हो सकता है भविष्य में ये कंपनियां आपसे आंकड़े प्राप्त करने के लिए आपको अच्छा-खासा भुगतान भी करें। इस तरह के व्यक्तिगत आंकड़ों के दुरुपयोग का खतरा हो सकता है और खुद सैक्सन भी इस बात को मानती हैं। आंकड़ों के दुरुपयोग को रोकने और लोगों की प्राइवेसी के अधिकार को सुरक्षित करने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कोई निगरानी व्यवस्था भी कायम करनी पड़ेगी। लेकिन इस तरह की चीजों से भयभीत होने के बजाय हमें इनका सकारात्मक पक्ष देखना चाहिए। दरअसल इन स्मार्ट मशीनों से हमें अपने शरीर को ज्यादा बेहतर ढंग से समझने में मदद मिलेगी। 
कुछ विकसित देशों में शरीर से बायोमीट्रिक डेटा प्राप्त करने का प्रचलन शुरू भी हो चुका है। सैक्सन के मुताबिक करीब 27 प्रतिशत अमेरिकी बायोमीट्रिक डेटा नापने के लिए किसी न किसी डिवाइस का प्रयोग कर रहे हैं। लोगों द्वारा प्रयुक्त किए जा रहे उपकरणों में एक रिस्टबैंड शामिल है जो शारीरिक गतिविधि और निद्रा के समय को रिकॉर्ड करता है। इस तरह के डिवाइस आगे चल कर ज्यादा उन्नत सेंसरों में तब्दील होंगे। जाहिर है इनसे मनुष्य और मशीन के बीच एक नया रिश्ता बनेगा, उनमें एक नया इंटरफेस बनेगा। इस तरह के सेंसर शरीर के भीतर प्रत्यारोपित किए जा सकेंगे और उनकी नेटवर्किंग की जा सकेगी। भविष्य में आपके शरीर के भीतर के सेंसरों को आपकी स्मार्ट कार के साथ जोड़ा जा सकेगा। इससे ड्राइविंग का मजा बढ़ जाएगा। सैक्सन का कहना है कि इस तरह के सेंसर आपको रोड रेज या पत्नी से झगड़ा करने से भी रोकेंगे।
पश्चिमी बाजारों में शीघ्र ही ऐसे इंजेस्टिबल सेंसर आने वाले हैं, जिन्हें गोली के साथ निगला जा सकेगा। ये सेंसर यह देखेंगे कि मरीज ने अपनी दवा की खुराक निर्धारित मात्रा में ली है या नहीं। वे यह भी देखेंगे कि दवा की खुराक लेने के बाद शरीर के अंदर किस तरह की प्रतिक्रिया होती है। इससे डॉकटरों को दवा की सही मात्रा निर्धारित करने में मदद मिलेगी। सैक्सन का कहना है कि करीब 30 से 50 प्रतिशत मरीज डॉक्टरों द्वारा निर्धरित खुराक समुचित मात्रा में नहीं लेते। एक अमेरिकी दवा कंपनी द्वारा विकसित किए गए इंजेस्टिबल सेंसर को एफडीए की अनुमति मिल गई है। इस सेंसर का इस्तेमाल हृदय रोग से संबंधित एक ड्रग के साथ किया जाएगा। 
सैक्सन का मानना है कि युवाओं, खासकर बच्चों में इस तरह के सेंसरों का प्रयोग विकासशील देशों में काफी उपयोगी साबित हो सकता है, जहां बीमारियां फैलने का खतरा ज्यादा रहता है। इन चिपों से काफी मदद मिल सकती है। इन सेंसरों के जरिए विकासशील देशों में कुपोषण और जन स्वास्थ्य की दूसरी समस्याओं को बेहतर ढंग से समझने और उनका उपाय खोजने में भी मदद मिल सकती है।


चिकित्सा का नया आयाम

डीएनए की खोज का चिकित्सकीय महत्व 
डीएनए हमारे जीवन का कोड है। इसमें हमारी तमाम आनुवंशिक सूचनाएं दर्ज हैं। वैज्ञानिक काफी समय से इस अत्यंत महत्वपूर्ण जैविक मॉलीक्यूल के दूसरे उपयोग भी विकसित करने में जुटे हुए हैं। अमेरिका में हार्वर्ड के वीस इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिकों ने डीएनए की पिंजरानुमा संरचनाएं तैयार की हैं। सिर्फ डीएनए को लेकर पहली बार इतनी बड़ी और जटिल संरचनाएं निर्मित की गई हैं। भविष्य में इस तरह की संरचनाओं का उपयोग शरीर के ऊतकों तक दवाएं पहुंचाने के लिए किया जा सकता है। डीएनए के इन पिंजरों में हुक लगाकर उनके साथ दूसरे रसायन भी जोड़े जा सकते हैं। वीस इंस्टीट्यूट के प्रमुख वैज्ञानिक प्रो. पेंग यिन का कहना है कि डीएनए पर आधारित सूक्ष्म टेक्नोलॉजी अथवा नैनो टेक्नोलॉजी में दिलचस्प और असीमित संभावनाएं हैं। डीएनए के इन पिंजरों की मदद से वैज्ञानिक कई तरह की तकनीकें विकसित कर सकते है। मसलन, इनसे सूक्ष्म विद्युत संयंत्र निर्मित किए जा सकते हैं और खास तरह के रसायनों के उत्पादन के लिए सूक्ष्म फैक्टियां बनाई जा सकती हैं। इनके अलावा डीएनए की संरचनाओं की मदद से अत्यंत संवेदनशील सेंसर बनाए जा सकते हैं। ये सेंसर असामान्य ऊतकों द्वारा छोड़े जाने वाले रसायनों का पता लगाकर रोगों का सही निदान करने में मदद कर सकते हैं।
डीएनए संरचनाओं की खास बात यह है कि इन संरचनाओं की प्रोग्रामिंग की जा सकती है। वैज्ञानिक डीएनए के अक्षरक्रम को निर्धारित कर सकते हैं। कुछ उपयोगों के लिए डीएनए की बड़ी संरचनाएं तैयार करनी पड़ेंगी। इस क्षेत्र में काम करने वाले शोधकर्ता अभी तक डीएनए ओरिगामी नामक विधि का इस्तेमाल कर रहे थे। इस विधि से ज्यादा जटिल संरचनाएं बनाना संभव नहीं था। यिन और उनके सहयोगियों ने इस तकनीक को आगे बढ़ाते हुए प्रिज्म जैसी बड़ी-बड़ी संरचनाएं बनाईं। नैनो टेक्नोलॉजी के अलावा दूसरे क्षेत्रों में भी डीएनए रिसर्च आगे बढ़ रही है। मुख्य शोध चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में हो रही है। डीएनए की मदद से डॉक्टर यह पता लगा सकेंगे कि ट्यूमर हर मरीज को किस तरह से प्रभावित करता है। इस आधार पर वह यह तय कर सकेंगे कि किसी खास किस्म के कैंसर से निपटने के लिए कौन-सी दवा ज्यादा कारगर होगी। इससे मरीज के लिए सही इलाज खोजने का समय भी बहुत कम किया जा सकेगा। मानव जीनों के विश्लेषण में हाल ही में मिली सफलता का लाभ सभी लोगों को मिलेगा। वैज्ञानिकों का कहना है कि लोग भविष्य में कुछ भुगतान करके अपना आनुवंशिक कोड पढ़ सकेंगे। इससे उन्हें यह पता लग जाएगा कि आगे चलकर उन्हें किस तरह की बीमारियां हो सकती हैं। वैज्ञानिक डीएनए के अलावा आरएनए यानी राइबोन्यूक्लिक एसिड के चिकित्सकीय उपयोग पर भी शोध कर रहे हैं। डीएनए की तरह आरएनए प्रोटीन संश्लेषण में प्रमुख भूमिका अदा करता है। आनुवंशिक सूचनाओं के संप्रेषण में भी इसकी कुछ भूमिका होती है। शोधकर्ताओं का मानना है कि आरएनए पर आधारित दवाएं विभिन्न किस्म के कैंसर और एड्स आदि के इलाज में कारगर हो सकती हैं। परीक्षणों के दौरान ये दवाएं असरदार दिखाई दी हैं। आरएनए का स्वरूप अस्थिर होने के कारण इसके प्रयोग में भी कुछ बाधाएं आई हैं। शोधकर्ताओं को आरएनए आधारित दवाओं के कामयाब होने का पूरा भरोसा है।
इसी तरह ूमन माइक्रोबायोम प्रोजेक्ट से हासिल किए गए ज्ञान के आधार पर गंभीर किस्म की बीमारियों के इलाज के लिए माइक्रोबायोम टेक्नोलॉजी की मदद ली जा रही है। माइक्रोबायोम प्रोजेक्ट के तहत मनुष्य को प्रभावित करने वाले जीवाणुओं के जीनों को पढ़ने की कोशिश की गई है। अनगिनत अदृश्य बैक्टीरिया और जीवाणु मनुष्य के स्वास्थ्य में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इनके जीनों को पढ़कर हमें यह पता लग जाएगा कि ये जीवाणु शरीर के लिए प्रोटीन आदि का निर्माण कैसे करते हैं और हमारे शरीर के साथ या दूसरे जीवाणुओं के साथ ये किस तरह का व्यवहार करते हैं।

Tuesday, 1 April 2014

ब्रह्मांड का विस्तार

बिग बैंग सिद्धांत पर मुकुल व्यास के विचार
 करीब 13.7 अरब वर्ष पहले बिग बैंग अथवा महाविस्फोट के जरिये हमारे ब्रह्मांड की उत्पत्ति हुई थी। ब्रह्मांड के अस्तित्व में आते ही बहुत तेजी से उसका विस्तार हुआ। इस विस्तार से गुरुत्व तरंगें उत्पन्न हुईं जिन्हें ग्रेविटेशनल वेव्स भी कहा जाता है। इन तरंगों को हम बिग बैंग का कंपन भी कह सकते हैं। अब खगोल वैज्ञानिकों ने पहली बार गहन अंतरिक्ष में इन तरंगो की मौजूदगी का पता लगाया है। उन्होंने दक्षिणी ध्रुव में स्थापित बाइसेप-2 दूरबीन से इन तरंगों की परोक्ष तस्वीरें हासिल करने में सफलता हासिल किया है। यह दूरबीन बिग बैंग की वजह से उत्पन्न ब्रह्मांडडीय पाश्र्व विकिरण को नापने के उद्देश्य से बनाई गई हैं। इस खोज से पहली बार उन घटनाओं की पुष्टि हुई है जिनकी शुरुआत ब्रह्मांड की उत्पत्ति से हुई थी। उत्पत्ति के प्रारंभिक पल के दौरान गुरुत्व तरंगें निकली थीं। अल्बर्ट आइंस्टीन ने 1916 में अपने सापेक्षता के सिद्धांत में इन तरंगों के अस्तित्व की भविष्यवाणी की थी, लेकिन अभी तक इनका प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं मिला था। हालांकि, इन्हें नापने के लिए दुनिया में कई प्रयोग किए गए। सत्तर के दशक में खगोल वैज्ञानिकों ने अनुमान लगाया कि गुरुत्व किरणों अवश्य ही बिग बैंग के तुरंत बाद उत्पन्न हुई होंगी। इस अवधि में ब्रव0161ांड का तेजी से विस्तार हुआ। बाद में वह एक मटर के दाने जितने पदार्थ से फैलकर इतना बड़ा हो गया कि हमारी सबसे शक्तिशाली दूरबीनें भी उसकी अनंत गहराइयों का अंदाजा नहीं लगा सकतीं।
ब्रह्मांडडीय विस्तार की इस अवधि को कॉस्मिक इनफ्लेशन भी कहा जाता है। वैज्ञानिकों के सिद्धांत के मुताबिक ब्रह्मांड में सुगम रूप से वितरित पदार्थ से आकाशगंगा, और तारों तथा ग्रहों जैसी बड़ी-बड़ी संरचनाएं बनीं। गुरुत्व किरणों का अस्तित्व इस सिद्धांत के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। मैसाचुसेट्स स्थित हार्वर्ड स्मिथसोनियन सेंटर फॉर एस्ट्रोफिजिक्स के वैज्ञानिक जॉन कोवाक और उनके सहयोगियों ने बिग बैंग की प्रतिध्वनि के रूप में उत्पन्न माइक्रोवेव पाश्र्व विकिरण की धुंधली चमक के अंदर एक अलग किस्म के विकिरण के अनोखे पैटर्न देखे हैं। उनके मुताबिक ये पैटर्न गुरुत्व किरणों की वजह से उत्पन्न हुए हैं। डॉ. कोवाक का कहना है कि इन किरणों के संकेत खोजना ब्रव0161ांड विज्ञान का एक बहुत बड़ा लक्ष्य है। कई लोगों ने इस दिशा में बहुत काम किया है जिस वजह से वैज्ञानिक आज इस बिंदु तक पहुंच पाए हैं। धरती पर रहते हुए अंतरिक्ष में झांकने के लिए दक्षिणी ध्रुव एक आदर्श स्थान है। डॉ. कोवाक के अनुसार बिग बैंग से उत्पन्न धुंधली माइक्रोवेव के पर्यवेक्षण के लिए यह सबसे शुष्क और साफ-सुथरी जगह है। ब्रह्मांडडीय पाश्र्व विकिरण दरअसल प्रकाश का ही एक रूप है। यह प्रकाश के सारे गुणों को प्रदर्शित करता है जिनमें ध्रुवीकरण अथवा पोलराइजेशन शामिल है। पृथ्वी पर वायुमंडल सूरज की रोशनी को बिखेर देता है जिससे वह ध्रुवीकृत हो जाती है। इसी वजह से ध्रुवीकृत चश्मों से चमक या ग्लेयर कम करने में मदद मिलती है। अंतरिक्ष में अणुओं ने ब्रवडीय माइक्रोवेव पृष्ठभूमि को तितर-बितर कर दिया जिससे वह भी ध्रुवीकृत हो गई।
रिसर्च में शामिल एक अन्य वैज्ञानिक जेमी बॉक ने बताया कि उनकी टीम ने विशेष किस्म के ध्रुवीकरण की तलाश की। इस किस्म को बी मोड कहा जाता है। इसमें गुच्छेदार पैटर्न बनते हैं। यही बी मोड पैटर्न गुरुत्व किरणों का संकेत देता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि वे बी मोड विकिरण के इतने शक्तिशाली संकेत मिलने से बहुत चकित हो गए थे, क्योंकि ये संकेत खगोल वैज्ञानिकों द्वारा लगाए गए अनुमानों से कहीं ज्यादा बड़े थे। हार्वर्ड के वैज्ञानिक एवी लोएब ने इस खोज के महत्व पर प्रकाश डालते हुए बताया कि इससे हमें अपने अधिकांश बुनियादी सवालों का उत्तर खोजने में मदद मिल सकती है। नई खोज से हमें पता चलता है कि कब ब्रह्मांड का विस्तार हुआ।

Wednesday, 19 March 2014

पृथ्वी की गहराई में समुद्र

पृथ्वी के गर्भ में पानी के स्रोत की खोज पर विशेष 
 प्रसिद्ध फ्रांसीसी विज्ञान कथाकार जूल्स वर्न ने डेढ़ सौ साल पहले अपने एक उपन्यास में पृथ्वी की सतह के नीचे एक विशाल समुद्र की मौजूदगी की कल्पना की थी। अब वैज्ञानिकों का कहना है कि सतह के नीचे सचमुच पानी बड़ी मात्र में मौजूद है। कनाडा की अल्बर्टा यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर ग्राहम पियरसन के नेतृत्व में वैज्ञानिकों की एक अंतरराष्ट्रीय टीम ने इस बात के प्रमाण भी जुटा लिए हैं। टीम ने पृथ्वी की गहराई से मिले रिंगवुड़ाइट नामक खनिज के नमूने का विश्लेषण करके पता लगाया है कि यह खनिज पानी से भरपूर है। समझा जाता है कि पृथ्वी की सतह से 410 से 660 किलोमीटर नीचे उच्च दबाव की स्थितियों में यह खनिज पाया जाता है। ऑस्ट्रेलिया के भूवैज्ञानिक टेड रिंगवुड ने पृथ्वी के भीतरी भाग में इस खनिज की उपस्थिति की कल्पना की थी। इसी वजह से यह खनिज रिंगवुडाइट के रूप में जाना जाता है। उन्होंने कहा था कि अत्यधिक दबाव और तापमान में एक खास तरह के खनिज का निर्माण तय है। वैज्ञानिकों ने उल्कापिंडों में इस खनिज के नमूने खोजे थे, लेकिन अभी तक पृथ्वी से इसका कोई नमूना नहीं मिला था क्योंकि इतनी गहराई पर जा कर नमूने एकत्र करना मुश्किल है।
रिंगवुड़ाइट की खोज भी महज संयोग से हुई है। दरअसल यह खनिज एक बदसूरत से भूरे हीरे में मौजूद था, जिसे 2008 में कुछ खनिकों ने ब्राजील के माटो ग्रोसो क्षेत्र में एक नदी तेल से खोजा था। यह हीरा ज्वालामुखी की चट्टान के साथ पृथ्वी की सतह के ऊपर आया था। रिसर्चरों ने शोध के लिए यह हीरा खरीद लिया। पियरसन ने बताया कि रिसर्चर तीन मिलीमीटर चौड़े इस हीरे में कोई दूसरा खनिज खोज रहे थे। यह वैज्ञानिकों की खुशकिस्मती थी कि उन्हें अचानक इस नमूने में रिंगवुड़ाइट मिल गया। यह खनिज इतना छोटा होता है कि इसे कोरी आंखों से नहीं देखा जा सकता। हीरे के भीतर रिंगवुड़ाइट को खोजने का श्रेय पियरशन के स्नातक छात्र जॉन मैक्नील को है। उसने 2009 में इस नमूने में रिंगवुड़ाइट की खोज की थी, लेकिन इस खनिज की वैज्ञानिक रूप से पुष्टि करने में कई वर्ष लग गए। इंफ्रारेड स्पेक्ट्रोग्राफी और एक्स रे के जरिए उसका विस्तृत विश्लेषण किया गया। अल्बर्टा यूनिवर्सिटी में पियरसन की भू-रसायन प्रयोगशाला में इस खनिज की पानी की मात्र नापी गई। यह प्रयोगशाला केनेडा के विश्व प्रसिद्ध सेंटर फॉर आइसोटोपिक माइक्रोएनिलिसिस का एक हिस्सा है।
आभूषणों में प्रयुक्त होने वाले ज्यादातर हीरे पृथ्वी की सतह से करीब 150 किलोमीटर की गहराई पर मिलते हैं। करीब 500 किलोमीटर नीचे पृथ्वी की भीतरी परत के आसपास पाए जाने वाले हीरे सुपर डीप डायमंड कहलाते हैं। भीतरी परत को मैंटल भी कहा जाता है। मैंटल के दो हिस्से होते हैं। इन दो हिस्सों के बीच वाली जगह को ट्रांजिशन जोन कहते हैं। इसी जोन में अत्यधिक दबाव की कारण सुपर डीप डायमंड बनते हैं। ये हीरे देखने में बहुत ही बदसूरत होते हैं और इनमें नाइट्रोजन की मात्र बहुत कम होती है। इन हीरों और उनमे मौजूद जलयुक्त खनिजों के अध्ययन के बगैर वैज्ञानिक पृथ्वी के भीतरी हिस्से की वास्तविक संरचना की पुष्टि नहीं कर सकते। वैज्ञानिक समुदाय कई दशकों से यह अटकल लगा रहा था कि पृथ्वी के भीतरी हिस्से में रिंगवुड़ाइट बड़ी मात्र में मौजूद है लेकिन इस बात को निर्विवाद रूप से साबित करने के लिए अभी तक किसी को भी यह खनिज खोजने में सफलता नहीं मिली थी।
खनिज पर किए गए परीक्षणों से पता चलता है कि इसके कुल वजन में करीब 1.5 प्रतिशत पानी है। पियरसन के मुताबिक यह मात्र सुनने में ज्यादा नहीं लगती लेकिन यदि हम पृथ्वी के भीतरी हिस्से में मौजूद रिंगवुड़ाइट की विशाल मात्र की गणना करें तो उनमें पानी की मात्र पृथ्वी के सारे समुद्रों में मौजूद पानी से ज्यादा बैठेगी। अभी यह कहना मुश्किल है कि यह पानी किस रूप में मौजूद है। यह पानी खनिजों में कैद हो सकता है। यह भी मुमकिन है कि भीतरी हिस्से में स्थानीय जलाशयों के रूप में यह पानी मौजूद हो।(मुकुल व्यास )



Thursday, 13 March 2014

तीस हजार साल पुराने वायरस की खोज पर विशेष

 एक प्राचीन वायरस 
रूस और फ्रांस के वैज्ञानिकों ने साइबेरिया की बर्फीली जमीन से एक विशाल वायरस खोजा है। यह वायरस संक्रामक है और करीब 30,000 वर्ष पुराना है। इतना पुराना वायरस मिलना एक असामान्य सी बात है। वैज्ञानिकों ने चेताया है कि ग्लोबल वार्मिग के प्रभावों से बर्फीली जमीन से दूसरे वायरस और जीवाणु भी बाहर आ सकते हैं जो बीमारियां फैला सकते हैं। प्रयोगशाला में किए गए परीक्षणों से पता चलता है कि साइबेरिया से मिला वायरस एक कोशिका वाले जीव, अमीबा को संक्रमित कर सकता है, लेकिन यह बहुकोशिका जीवों और मनुष्यों को संक्रमित नहीं कर सकता। पिथोवायरस नामक यह जीवाणु वायरस की अब तक ज्ञात किस्मों से एकदम भिन्न है। यह इतना बड़ा है कि इसे ऑप्टिकल माइक्रोस्कोप से भी देखा जा सकता है। रूसी विज्ञान अकादमी और फ्रांसीसी वैज्ञानिक अनुसंधान केंद्र के शोधकर्ताओं ने बताया कि यह वायरस सतह से 30 मीटर नीचे दबा हुआ था। उनका अनुमान है कि यह वायरस कम से कम 30,000 वर्षो से बर्फ में कैद था, लेकिन प्रयोगशाला में जीवित अमीबा के संपर्क में आने के बाद यह वायरस पुनर्जीवित हो गया।
फ्रांसीसी वैज्ञानिकों के मुताबिक इस अध्ययन से यह सिद्ध होता है कि वायरस बर्फीली जमीन के नीचे हजारों वर्ष तक सही सलामत रह सकते हैं। यह खोज सार्वजनिक स्वास्थ्य की दृष्टि से भी बहुत महत्वपूर्ण है। जलवायु परिवर्तनों के बाद विश्व में तापमान वृद्धि निश्चित है। तापमान वृद्धि से ध्रुवीय क्षेत्रों में बर्फ के पिघलने से इन क्षेत्रों में खनिजों और तेल-गैस के दोहन के नए अवसर भी उत्पन्न होंगे, लेकिन बर्फ पिघलने या डिलिंग की वजह से सुप्त जीवाणु फिर से प्रकट हो कर जनता के स्वास्थ्य के लिए खतरा बन सकते हैं। इनमें चेचक जैसे वायरस भी हो सकते हैं जिनका दुनिया से उन्मूलन हो चुका है। चेचक वायरस के विस्तार की प्रक्रिया पिथोवायरस जैसी है। फ्रांसीसी वैज्ञानिक डॉ. शंटल एबरगेल का कहना है कि आर्कटिक की बर्फीली सतहों के नीचे कई तरह के वायरस हो सकते है जो खनन कार्यो या जलवायु परिवर्तनों से फिर सक्रिय हो सकते हैं। यह संभव है कि ये वायरस अमीबा के अलावा दूसरे जीवों को संक्रमित करने में सक्षम हों। यहां दबे हुए जीवाणुओं का पता लगाने के लिए वैज्ञानिकों को बर्फीली सतहों के नमूनों में मौजूद डीएनए का विस्तृत अध्ययन करना चाहिए। अभी कोई नही जानता कि बर्फीली जमीन के नीचे क्या छुपा हुआ है? अत: ध्रुवीय क्षेत्रों में प्राकृतिक संसाधनों का दोहन बहुत ही सावधानी के साथ करना पड़ेगा। इस बीच, एक अन्य अध्ययन में वैज्ञानिकों ने ग्लोबल वार्मिग के प्रभावों से उष्ण प्रदेशों के पहाड़ी क्षेत्रों में मलेरिया के मामलों में बढ़ोतरी की चेतावनी दी है। उन्होंने दक्षिण अमेरिका और अफ्रीका के पहाड़ी क्षेत्रों में पिछले दो दशकों के दौरान हुए मलेरिया के मामलों का विस्तृत विश्लेषण किया है। उनका निष्कर्ष है कि जब-जब तापमान बढ़ता है, पहाड़ी इलाकों में मलेरिया के मामले भी बढ़ते हैं। वैज्ञानिकों के बीच कई वर्षो से यह बहस चल रही थी कि क्या तापमान वृद्धि से उन ऊंचे इलाकों में भी मलेरिया पहुंच सकता है जो अभी तक इस बीमारी से बचे हुए थे। लंदन स्कूल ऑफ हाइजिन एंड ट्रॉपिकल मेडिसिन के रिसर्चर मेनो बूमा का कहना है कि हमने अपनी शोध से यह सिद्ध किया है कि मलेरिया का ऊपरी इलाकों में जाना सचमुच तापमान पर निर्भर है। इस बात को साबित करना बहुत मुश्किल था।
हर साल करीब 30 करोड़ लोग मलेरिया की चपेट में आते है। यह बीमारी एक कोशिका वाले जीवाणु प्लास्मोडियम की वजह से उत्पन्न होती है। मच्छर के काटने से प्लास्मोडियम मनुष्य के शरीर में पहुंचता है। तापमान वृद्धि से ये जीव उन क्षेत्रों में भी पनप सकते है जो पारंपरिक रूप से अभी तक मलेरिया से मुक्त रहे हैं। डॉ. बूमा के अनुसार उष्ण प्रदेशों में लाखों लोग ऊंचे स्थलों पर रहते है। ऐतिहासिक तौर पर ये इलाके बीमारियों से दूर रहे हैं।मुकुल व्यास


Wednesday, 18 September 2013

मंगल ग्रह की यात्रा के लिए कतार

मंगल अतीत में भले ही हरा-भरा रहा हो, लेकिन आज वह एक बंजर स्थान है और वहां की परिस्थितियां जीवन के अनुकूल नहीं हैं। घूमने-फिरने के लिहाज से उसे ऐसा आदर्श पर्यटन स्थल नहीं कहा जा सकता जहां लोग जाने को बेताब हो जाएं, लेकिन यकीन मानिए दुनिया में करीब दो लाख लोग लाल ग्रह की एकतरफा यात्र के लिए तैयार हैं जिनमे करीब 20747 लोग भारतीय हैं। मंगल पर बसने वाले पृथ्वीवासियों के पहले जत्थे में शामिल होने के लिए 140 देशों से दो लाख से अधिक लोगों ने आवेदन किया है। सबसे दिलचस्प बात यह है कि आवेदकों की सूची में भारतियों का स्थान दूसरे नंबर पर है। सबसे ज्यादा आवेदन अमेरिका से आए हैं जहां 47,000 से अधिक लोगों ने मंगल पर जाने की इच्छा व्यक्त की है। चीन से 13000 लोगों ने आवेदन भेजे हैं। मंगल मिशन का संचालन करने वाली हालैंड की कंपनी, मार्स वन का कहना है कि मंगल यात्र पर जाने के इच्छुक लोगों ने अपना शेष जीवन मंगल पर ही बिताने पर सहमति जाहिर की है। डच कंपनी अक्टूबर 2016 में मंगल पर एक सप्लाई मिशन उतारना चाहती है। इसके बाद 2018 में वहां एक सेटलमेंट रोवर उतारा जाएगा। मंगल यात्र के दो लाख आवेदकों में से 24 से लेकर 40 उम्मीदवारों का चयन किया जाएगा। इन्हें 2015 में शुरू होने वाले सात-वर्षीय प्रशिक्षण कार्यक्रम में शामिल किया जाएगा। अंतिम चयन से पहले मौजूदा आवेदकों को चयन के तीन और दौरों से गुजरना पड़ेगा। मार्स वन का कहना है कि मंगल यात्रियों के लिए सैनिक प्रशिक्षण, विमान उड़ाने के अनुभव या विज्ञान की डिग्री की जरूरत नहीं है, लेकिन प्रत्याशी की आयु कम से कम 18 वर्ष होनी होनी चाहिए।
अंतरिक्षयात्री चुनने के लिए दूसरे दौर में मार्स वन की कमेटी के सदस्यों के साथ उम्मीदवारों का साक्षात्कार होगा। तीसरे दौर में पहुंचने वाले उम्मीदवार एक-दूसरे के साथ प्रतिस्पर्धा करेंगे। तीसरे दौर में मिशन की चुनौतियों का सामना करने के लिए उम्मीदवारों को तैयार किया जाएगा और इसका टीवी तथा ऑनलाइन प्रसारण किया जाएगा। मार्स वन का मकसद मंगल पर एक दशक के अंदर मानव बस्ती बसाना है। मंगल पर बस्ती बसाने के लिए कंपनी ने 6.31 अरब डॉलर का बजट बनाया है जबकि नासा ने मंगल पर भेजे गए क्यूरिऑसिटी रोवर पर 2,84 अरब डॉलर खर्च किए थे। मार्स वन विश्वव्यापी रिएल्टी टीवी शो के जरिए मंगल मिशन के लिए धन जुटाएगी। यह शो लंबा चलेगा और दर्शक वोट देकर यह तय करेंगे कि अगले दस वर्षो में मंगल यात्र पर जाने वाले चार अंतरिक्ष यात्रियों के पहले जत्थे में कौन-कौन शामिल होगा। इन चार अंतरिक्षयात्रियों को 2023 तक लाल ग्रह पर उतारने की योजना है।इसके बाद 2033 तक मंगल की मानव बस्ती में 20 लोगों को शामिल करने का लक्ष्य है। पृथ्वी से मंगल की यात्र में करीब 200 दिन लगेंगे। आयोजकों का कहना है कि मंगल पर मानव बस्ती बसाने से हमें सौर मंडल की उत्पत्ति, जीवन की उत्पत्ति और ब्रव0161ांड में पृथ्वी की स्थिति के बारे में बेहतर जानकारी मिल सकेगी। मार्स वन की वेबसाइट के अनुसार मंगल का मिशन फिलहाल एकतरफा ही हो सकता है क्योंकि ग्रह से वापसी के लिए अभी यान उपलब्ध नहीं हैं। ऐसे यानों से मिशन की लागत काफी बढ़ जाएगी। मार्स वन का मानना है कि लाल ग्रह पर मौजूदा टेक्नोलॉजी की मदद से मानव बस्तियों का निर्माण करना संभव है। कंपनी अपने मिशन के लिए अच्छी तरह से परखे गए कलपुर्जे और सिस्टम जुटाएगी।
अनेक विशेषज्ञों ने इस प्रोजेक्ट पर आशंकाएं जाहिर की हैं। यूनिवर्सिटी ऑफ एराइजोना की प्रोफेसर डॉ. वेरोनिका ब्रे का कहना है कि यात्र के दौरान सबसे बड़ा जोखिम रेडिएशन का है। रेडिएशन के संपर्क में आने पर कैंसर का खतरा बढ़ सकता है। ऑक्सफर्ड यूनिवर्सिटी के डॉ. Rिस लिंटूट का कहना है कि मंगल की यात्र व्यवहारिक रूप से संभव है लेकिन असली समस्या धन की है। दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति और वित्तीय ताकत से ही इसे संभव बनाया जा सकता है।

Thursday, 31 January 2013

डीएनए में सूचना संकलन

सूचना संग्रहण की नई तकनीक
डीएनए अथवा डिआक्सीराइबोन्यूक्लिक एसिड में हमारे जीवन का ब्लूप्रिंट होता है। पृथ्वी पर ज्ञात समस्त जीव-जंतुओं और पेड़-पौधों के लिए आनुवंशिक निर्देश इसी रसायन में दर्ज होते हैं। इस रसायन में सूचनाओं को संभाल कर रखने की अनोखी क्षमता है और वैज्ञानिक पिछले काफी समय से यह पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं कि क्या हम डेटा संकलन के लिए इस क्षमता का उपयोग कर सकते हैं। अब ब्रिटिश वैज्ञानिकों ने यह सिद्ध कर दिया है कि डिजिटल डेटा को डीएनए में संभाल कर रखा जा सकता है। कैम्बि्रज के निकट यूरोपियन बायो इंफोर्मेटिक्स इंस्टीटयूट के वैज्ञानिकों ने कृत्रिम रूप से तैयार किए गए जीवन के मॉलिक्यूल के हिस्सों में शेक्सपीयर की कविताएं, मार्टिन लूथर के मशहूर भाषण के अंश, एक वैज्ञानिक पेपर और एक फोटो को संग्रहीत किया। उन्होंने संकलित सूचना को 100 प्रतिशत की शुद्धता के साथ सफलतापूर्वक पढ़ कर भी दिखा दिया। वैज्ञानिकों का दावा है कि डीएनए में बड़ी मात्रा में संकलित जानकारी को हजारों वर्ष तक सुरक्षित रखा जा सकता है। फिलहाल सूचना भंडारण के लिए कृत्रिम रूप से डीएनए का मॉलिक्यूल तैयार करना बहुत महंगा है। मसलन एक मेगाबाइट सूचना के भंडारण का खर्च अभी 12,400 डॉलर है और इस सूचना को दोबारा पढ़ने पर 220 डॉलर और खर्च करने पड़ेंगे। लेकिन वैज्ञानिकों का यह भी मानना है कि आने वाले दशकों में कृत्रिम डीएनए की लागत कम हो जाएगी और चुंबकीय टेपों की तुलना में डेटा संकेतबद्ध करना ज्यादा किफायती होगा। सरकारी और ऐतिहासिक रिकॉर्ड लंबे समय तक डीएनए के गुच्छे में संग्रहीत किए जा सकते हैं। ब्रिटिश टीम के प्रोजेक्ट लीडर निक गोल्डमैन का कहना है कि डीएनए लंबे समय तक स्थिर रहता है। हजारों वर्ष पुराने नमूनों में डीएनए ठीकठाक हालत में पाया गया है। यदि ये नमूने बर्फ में जमे हुए हैं तो वे और ज्यादा समय तक सही सलामत रहेंगे। मसलन मैमथ (लुप्त ऊनी हाथी) के नमूने हजारों वर्ष बीत जाने के बावजूद सुरक्षित हैं। डीएनए का सबसे बड़ा गुण यह है कि इसमें बहुत बड़े पैमाने पर डेटा का संकलन किया जा सकता है और भंडारण के लिए बिजली की जरूरत भी नहीं पड़ती। डीएनए का भंडारण घनत्व करीब 2.2 प्रतिशत पेटाबाइट्स प्रति ग्राम है। एक पेटाबाइट में 1048576 गीगाबाइट्स होते हैं। डीएनए की भंडारण क्षमता इस वक्त इस्तेमाल में आ रहे समस्त भंडारण माध्यमों से कई हजार गुना अधिक है। सैद्धांतिक तौर पर हाई डेफिनेशन वीडियो के 10 करोड़ घंटों को डीएनए से भरे एक कप में स्टोर किया जा सकता है। बहुत सी जानकारियां ऐसी होती हैं, जिनकी हर रोज जरूरत नहीं पड़ती, लेकिन फिर भी उन्हें संभाल कर रखना पड़ता है। ऐसे काम के लिए डीएनए भंडारण एक आदर्श विकल्प हो सकता है। हार्ड डिस्क-ड्राइव और चुंबकीय टैप जैसे मौजूदा भंडारण डिवाइसों की लगातार रखरखाव की जरूरत पड़ती है लेकिन डीएनए लाइब्रेरी के लिए ऐसी कोई कसरत नहीं करनी पड़ेगी। रिसर्चरों ने डेटा को डीएनए में संकेतबद्ध करने के लिए आनुवंश्हिक कोड के पांच अक्षरों ए, सी, जी और टी का इस्तेमाल शून्य और एक के रूप में किया है, जो डिजिटल सूचना के बाइट्स होते हैं। रिसर्चरों की इस तकनीक का ब्यौरा नेचर पत्रिका में प्रकाशित हुआ है। हार्वर्ड मेडिकल स्कूल के आनुवांशिक वैज्ञानिक, प्रोफेसर जार्ज चर्च के नेतृत्व में वैज्ञानिकों की टीम ने पिछले साल डीएनए की अद्भुत भंडारण क्षमता को प्रदर्शित करने के लिए एक पूरी पुस्तक ही डीएनए में संग्रहीत कर दी थी। इस पुस्तक में 11 तस्वीरों और एक कंप्यूटर प्रोग्राम सहित 53,000 शब्द हैं।मुकुल व्यास 

Wednesday, 16 January 2013

लद्दाख में सौर दूरबीन

दुनिया की सबसे बड़ी सौर दूरबीन परियोजना पर
भारत जम्मू-कश्मीर के लद्दाख क्षेत्र में दुनिया की सबसे बड़ी सौर दूरबीन स्थापित करेगा। नेशनल लार्ज सोलर टेलिस्कोप (एनएलएसटी) नामक इस दूरबीन का निर्माण कार्य इस साल के अंत में शुरू होने की उम्मीद है। दो मीटर के छिद्र (एपरचर) वाली इस दूरबीन की मदद से भारतीय खगोल-वैज्ञानिकों को सौर धब्बों की उत्पत्ति और उनके क्षय से जुड़ी प्रक्रिया को समझने में मदद मिलेगी। सौर दूरबीन से सूरज के अंदर चल रही मूलभूत प्रक्रियाओं पर भी गहन अनुसंधान किया जा सकेगा। इस प्रोजेक्ट पर करीब 300 करोड़ रुपये खर्च किए जाएंगे। इस समय अमेरिका में एराइजोना स्थित किट पीक नेशनल आब्जर्वेटरी में स्थापित मेक्मैथ-पियर्स दूरबीन दुनिया की सबसे बड़ी सौर दूरबीन है। इसका एपरचर 1.6 मीटर है। भारतीय सौर दूरबीन 2017 तक बन कर तैयार हो जाएगी। अमेरिका हवाई में चार मीटर एपरचर की दूरबीन का निर्माण कर रहा है, जिसका संचालन 2020 में शुरू होगा। तब तक लद्दाख की दूरबीन दुनिया की सबसे बड़ी दूरबीन बनी रहेगी। बेंगलूर स्थित इंडियन इंस्टीटयूट ऑफ एस्ट्रोफिजिक्स के पूर्व निदेशक एसएस हसन इस प्रोजेक्ट के चीफ इनवेस्टीगेटर हैं। कोलकाता में भारतीय विज्ञान कांग्रेस के शताब्दी अधिवेशन के दौरान डॉ. हसन ने इस प्रोजेक्ट के विभिन्न पहलुओं की विस्तार से जानकारी दी। डॉ. हसन के मुताबिक यह दूरबीन लद्दाख की पंगोंग झील के निकट हानले या मेराक गांव में स्थापित की जाएगी। पूरी तरह से तैयार होने के बाद इस दूरबीन की गिनती दुनिया की उन गिनी-चुनी सौर दूरबीनों में होने लगेगी, जहां रात-दिन खगोल-वैज्ञानिक अनुसंधान किया जाता है। इससे यूरोप और जापान के बीच देशांतर के अंतर को पाटने में भी मदद मिलेगी। डॉ. हसन का यह भी कहना है कि दूरबीन के बेहतर स्वदेशी डिजाइन और उन्नत उपकरणों की मदद से सौर गतिविधियों का ज्यादा सटीक पर्यवेक्षण संभव होगा। इससे सूरज के वायुमंडल में चुंबकीय क्षेत्रों के स्वरूप के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी मिल सकती है। बढ़ी हुई सौर गतिविधि पृथ्वी की संचार प्रणाली और बाहरी हरी अंतरिक्ष में परिक्रमा करने वाले उपग्रहों को प्रभावित कर सकती है। अत: हमारे लिए यह जानना जरूरी है कि सूरज के धब्बे किस तरह बनते हैं और किस तरह से उनका क्षय होता है। सौर धब्बों की गतिविधि बढ़ने से सूरज से सौर पवन यानी सोलर विंड के रूप में पदार्थ बाहर निकलता है। इस सौर पवन में मौजूद विद्युत आवेशित कण उपग्रहों के संचालन में विघ्न उत्पन्न कर सकते हैं और पृथ्वी के ऊपरी वायुमंडल में अणुओं के साथ क्रिया कर सकते हैं। इससे जमीनी संचार प्रणालियां छिन्न-भिन्न हो सकती हैं। पृथ्वी की निम्न कक्षा में मौजूद उपग्रहों को ज्यादा खतरा है क्योंकि बढ़ी हुई सौर गतिविधि के दौरान अतिरिक्त गर्मी के कारण पृथ्वी का ऊपरी वायुमंडल फूल जाता है। इससे उपग्रहों के क्षय की रफ्तार बढ़ जाती है। सौर गतिविधियों के अध्ययन के अलावा खगोल-वैज्ञानिक रात में इस सुविधा का इस्तेमाल सौरमंडल से बाहर दूसरे ग्रह अथवा महा-पृथ्वियां खोजने के लिए भी कर सकते हैं। सौर मंडल से बाहर पहला ग्रह 1995 में खोजा गया था। तब से अब तक 800 से अधिक ग्रह खोजे जा चुके हैं। नासा की केप्लर दूरबीन ने 2400 से अधिक संभावित बाहरी ग्रहों की पहचान की हैं, जिनमें कुछ ग्रह पृथ्वी जैसे भी हैं। इन संभावित ग्रहों की पुष्टि के लिए दूसरी वेधशालाओं द्वारा अध्ययन करना पड़ेगा। इस दिशा में लद्दाख की प्रस्तावित दूरबीन एक बड़ी भूमिका अदा कर सकती है। सौर दूरबीन का निर्माण बेंगलूर स्थित इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ एस्ट्रोफिजिक्स द्वारा किया जाएगा। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन, आर्यभट रिसर्च इंस्टीटयूट ऑफ आब्जर्वेशनल साइंसेज, टाटा इंस्टीटयूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च सहित कई संस्थान दूरबीन के निर्माण में सहयोग करेंगे। यह दूरबीन उच्चस्तरीय सौर अनुसंधान के लिए एक उपयोगी मंच साबित होगी। इस सुविधा का लाभ उठाने के लिए दुनिया के कई सौर खगोल-वैज्ञानिक भारत आ सकते हैं।

Tuesday, 4 December 2012

आंखों में छिपा पासवर्ड


कोई भी दो व्यक्ति दुनिया को एक ही नजर से नहीं देखते। एक तस्वीर को देखते हुए लोग अलग-अलग ढंग से अपनी आंखें घुमाते हैं। यदि वे एक ही तरीके से तस्वीर को देखते हैं तो भी उनका आंखों को घुमाने का तरीका अलग होता है। अमेरिका में सेन मार्कोस स्थित टेक्सस स्टेट यूनिवर्सिटी के कंप्यूटर वैज्ञानिक ओलेग कोमोगो‌र्त्सेव एक ऐसा सिस्टम विकसित कर रहे हैं, जो लोगों द्वारा कंप्यूटर स्क्रीन पर देखने के ढंग के आधार पर उनकी पहचान करेगा। कोमोगो‌र्त्सेव के अनुसार लोगों के नजरें घुमाने के तरीके में दिखने वाला फर्क बायोमीट्रिक के लिए पर्याप्त है। बायोमीट्रिक शरीर के किसी हिस्से के आधार पर पहचान का एक पैमाना है। मिसाल के तौर पर फिंगरप्रिंट का उल्लेख किया जा सकता है। दुनिया भर के कंप्यूटर वैज्ञानिक अपराध सुलझाने और सीमा सुरक्षा के लिए बायोमीट्रिक्स पर रिसर्च कर रहे हैं। स्मार्टफोन, टैबलेट और अन्य उपकरणों के पासवर्ड के लिए भी बायोमीट्रिक विधियों के इस्तेमाल पर विचार किया जा रहा है। आंखों की हलचल का इस्तेमाल आंखों की पुतलियों के स्कैन जैसी प्रचलित बायोमीट्रिक विधियों में सुधार के लिए किया जा सकता है। हवाई अड्डों में और कुछ कंपनियों में इस तकनीक का इस्तेमाल हो रहा है। भारत में आधार कार्ड बनाने के लिए भी इस तकनीक का इस्तेमाल किया गया है। कुछ रिसर्चर प्रयोगों के जरिये यह दिखा चुके हैं कि प्रिंटेड कांटेक्ट लैंस से पुतलियों के स्कैनर को धोखा दिया जा सकता है। कोमोगो‌र्त्सेव का ख्याल है कि आंखों की हलचल रिकॉर्ड करने वाले स्कैनर से इस तरह की धोखाधड़ी को रोका जा सकता है। भविष्य में आंखों की हलचल के स्कैन से सुरक्षाकर्मी यह पता लगा सकेंगे कि व्यक्ति मानसिक तौर पर परेशान या बीमार तो नहीं है। सुरक्षा अधिकारी अत्यंत सुरक्षा वाले संवेदनशील स्थानों में ऐसे व्यक्तियों का प्रवेश वर्जित कर सकते हैं। भविष्य में आंखों की पुतलियों के स्कैनरों के साथ आंखों की हलचल के स्कैनर लगाने पर न सिर्फ व्यक्ति की पहचान की जा सकेगी, बल्कि उसकी मानसिक स्थिति का भी अंदाजा किया जा सकेगा। कोमोगो‌र्त्सेव का कहना है कि हवाई अड्डों पर लोगों की पहचान के लिए आंखों की हलचल के स्कैनर लगाने से पहले कुछ बुनियादी सवालों का जवाब खोजना पड़ेगा। जैसे, यह पता लगाना जरूरी है कि किसी व्यक्ति की आंखों में हलचल हमेशा एक जैसी रहती है या समय के साथ उसमे समय के साथ परिवर्तन होता रहता है। कोमोगो‌र्त्सेव की टीम अगले दो-तीन वर्षो के अंदर आंखों की हलचल को स्कैन करने वाली मशीन परीक्षण के लिए उपलब्ध करा सकती है। कोमोगो‌र्त्सेव का सिस्टम आंखों की हलचल को रिकॉर्ड करते हुए इस बात पर ध्यान देता है कि स्क्रीन के बिंदु पर किसी व्यक्ति की नजर कितनी देर तक स्थिर रहती है और विभिन्न बिंदुओं के बीच उसकी नजरें कितनी तेजी से दौड़ती हैं। इसके आधार पर यह सिस्टम लोगों की आंखों की मसल्स द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली ताकत और आंखों की दूसरी खूबियों का भी अंदाजा कर सकता है। आदमी की पहचान करने के अलावा आंखों की हलचल के कुछ दूसरे उपयोग भी हैं। वैज्ञानिकों ने ऐसे उपकरण बना लिए हैं, जिनकी मदद से व्यक्ति सिर्फ अपनी आंखों की हलचल से कंप्यूटर और लैपटॉप का संचालन कर सकता है या आसपास किसी चीज को नियंत्रित कर सकता है। यह उपकरण उन लोगों के लिए बहुत उपयोगी है, जो शरीर को पंगु करने वाली बीमारियों से पीडि़त हैं। यह उपकरण आंखों की हलचल को पढ़ कर यह हिसाब लगा लेता है कि व्यक्ति किसे देख रहा है। इस तरह सिर्फ आंखें घुमा कर कंप्यूटर स्क्रीन पर कर्सर को नियंत्रित किया जा सकता है और इसके लिए माउस की जरूरत नहीं पड़ती।