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Thursday, 13 September 2012

आकाश -कुसुम बना आकाश टैबलेट

आज के अमर उजाला कॉम्पैक्ट में आकाश टैबलेट पर मेरा विशेष लेख ,कहाँ गया आकाश टैबलेट ,कब मिलेगा आकाश टैबलेट .युवाओं से जुड़े सबसे बड़े प्रोजेक्ट का एक साल बाद क्या हुआ ..


अमर उजाला कॉम्पैक्ट
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Tuesday, 24 July 2012

सुरक्षा मोरचे पर नई चुनौतियां


शशांक द्विवेदी
अमर उजाला कॉम्पैक्ट लेख 
आधुनिक युग में सुरक्षा के मोरचे पर उभरी नई किस्म की चुनौतियों के मद्देनजर हमें नए सिरे से रक्षा कार्यक्रमों की समीक्षा की जरूरत है।
हाल ही में ब्रिटेन के पूर्व संचार निदेशक एलिस्टर कैंपबेल ने अपनी डायरी में यह खुलासा किया कि पाकिस्तान के एक सैन्य जनरल ने उनसे कहा था कि इसलामाबाद आठ सेकेंड में भारत पर परमाणु हमला करने में सक्षम है और उसके पास ऐसी तकनीक है कि भारत उसकी किसी भी मिसाइल प्रणाली को नष्ट नहीं कर पाएगा। जाहिर है, आधुनिक युग में ऐसी नई सुरक्षा चुनौतियों पर हमें और भी सचेत रहना होगा और उच्च स्तर की तकनीक भी विकसित करनी होगी ।
भले ही हमारा सुरक्षा कार्यक्रम चीन और पाकिस्तान के हमलों की स्थिति में आत्म-रक्षात्मक कवच को मजबूत करने पर आधारित है, लेकिन उपग्रहों का सैन्य इस्तेमाल किए जाने, हमारे उपग्रहों को मिसाइलों से नष्ट किए जाने, मिसाइलों को उसके मार्ग में ही ध्वस्त किए जाने जैसी आशंकाओं को हम नजरंदाज नहीं कर सकते, क्योंकि पड़ोसी चीन के पास मिसाइल रोधी तकनीक है। परमाणु हथियारों और उन्हें ले जाने वाली भरोसेमंद प्रणाली की मौजूदगी हमें हमलावर को हतोत्साहित करने की क्षमता तो प्रदान करती है, लेकिन दूसरे किस्म के हमलों की आशंका से मुक्त नहीं करती। जैसे, हमारे संचार तंत्र को नष्ट किए जाने की आशंका। ऐसी स्थितियों में अस्थायी उपग्रहों को स्थापित करने की क्षमता बहुमूल्य सिद्ध हो सकती है। थोड़ा फेरबदल करके उसे आक्रामक मिसाइलों को नष्ट करने वाली मिसाइल में भी बदला जा सकता है। इतना ही नहीं, हम हमलावर राष्ट्र के सैन्य उपग्रहों को निशाना बनाने की स्थिति में आ सकते हैं और उपग्रहों पर भी परमाणु संपन्न मिसाइलें तैनात कर सकते हैं। युद्ध में आक्रमण ही बचाव की सर्वश्रेष्ठ रणनीति है। यदि हमें अपनी सुरक्षा तैयारियों को हमलावर राष्ट्र को हतोत्साहित करने तक ही सीमित रखना है, तब भी अंतरिक्षीय चुनौतियों को परास्त करने के लिए एक भरोसेमंद प्रणाली का विकास जरूरी है। इसके लिए हमें अपनी अंतरिक्ष सुरक्षा और सैन्य-अंतरिक्ष नीति को असरदार और व्यापक बनाना होगा।
इंस्टीट्यूट ऑफ डिफेंस रिसर्च ऐंड एनालिसिस की स्पेस सिक्योरिटी रिपोर्टकहती है कि बदलती सामरिक परिस्थितियों और चीन के अंतरिक्ष क्षेत्र में अपने दायरे बढ़ाने के जबरदस्त प्रयास के बावजूद भारत की सैन्य तैयारियां मुख्य रूप से जमीन पर ही केंद्रित हैं। भारत की मौजूदा अंतरिक्ष नीति मुख्य रूप से नागरिक उद्देश्यों के लिए संचालित है और अंतरिक्ष से जुड़ा सैन्य कार्यक्रम काफी छोटा है। जबकि चीन अंतरिक्ष के क्षेत्र में लगातार प्रयोग कर रहा है। इसी के तहत वर्ष 2007 में उसने अपने ही उपग्रह को निशाना बनाते हुए उसे मार गिराया था। चीन के परीक्षण से साबित हो गया कि हमें अंतरिक्ष परिसंपत्तियों की सुरक्षा नीति को व्यापक बनाने की जरूरत है। इसमें सैन्य संकाय को भी शामिल किया जाना चाहिए।
अंतरिक्ष सुरक्षा पर मैक्सवेल एयरफोर्स बेस के स्कूल ऑफ एडवांस एयर ऐंड स्पेस स्टडीज के प्रोफेसर जान बी शेल्डन ने एक लेख में कहा कि वाणिज्य और शासन व्यवस्था से लेकर राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए अधिक से अधिक देशों के उपग्रह पर निर्भर होने के कारण अंतरिक्ष को युद्ध के दायरे से बाहर नहीं रखा जा सकता है। अगर कोई देश उपग्रह के माध्यम से युद्ध का सटीक संचालन करता है, तो यह कैसे संभव है कि अंतरिक्ष युद्ध के दायरे से बाहर रहे। कई विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका का स्टार वारकार्यक्रम इसी सोच का हिस्सा था। चीन आज इसी नीत पर काम कर रहा है।
सुरक्षा विशेषज्ञों के अनुसार जमीन, साइबर दुनिया एवं अंतरिक्ष के क्षेत्र में चीन का बढ़ता दखल चिंता का विषय है। वह आर्थिक, प्रौद्योगिकी एवं सैन्य क्षेत्र में लगातार अपनी क्षमता बढ़ा रहा है और पाकिस्तान को भी सैन्य प्रौद्योगिकी मुहैया करा रहा है। इसलिए हमें नए सिरे से अपने रक्षा कार्यक्रमों की समीक्षा करने की जरूरत है।(अमर उजाला कॉम्पैक्ट में २४/०७/२०१२ को प्रकाशित )
लेख लिंक 



Tuesday, 26 June 2012

पर्यावरण संरक्षण बनाम संतुलित विकास

अमर उजाला कॉम्पैक्ट लेख 
शशांक द्विवेदी
आज से ठीक 20 साल पहले 1992 में पृथ्वी के अस्तित्व पर मंडरा रहे संकट और सतत विकास की चिंताओं से निबटने के लिए साझा रणनीति बनाने के उद्देश्य से दुनिया भर के नेता ब्राजील के रियो डि जेनेरियो में पृथ्वी सम्मेलन में एकत्र हुए थे। इस सम्मलेन पहुंचे नेता जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग जैसी समस्याओं से निपटने के लिए एक महत्वपूर्ण योजना पर सहमत हुए थे। इस सम्मेलन में यूनाइटेड नेशन फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेटिक चेंज पर सहमति बनी थी। पर्यावरण बचाने के लिए क्योटो प्रोटोकॉल भी इसी सम्मेलन का परिणाम था। सभी देश जमीन, हवा और पानी के संरक्षण में संतुलन के लिए नया मॉडल खोजने पर सहमत थे, जिसे उन्होंने टिकाऊ विकास का नाम दिया था। दो दशक बाद आज हम फिर भविष्य के उसी मोड़ पर खड़े हैं। यों कहें कि वे चुनौतियां अब काफी बड़ी हो गई हैं।
वर्तमान आर्थिक नीतियों ने विश्व जनसंख्या के साथ मिलकर पृथ्वी पर अभूतपूर्व दबाव डाला है। अब हमें समझना पड़ेगा कि प्राकृतिक संसाधनों के अंधाधुंध दोहन से हम संपन्नता के रास्ते पर आगे नहीं बढ़ सकते। टिकाऊ विकास का रास्ता आज भी उतना ही जरूरी है, जितना 20 वर्ष पहले था। इस चुनौती से निबटने के लिए साल के शुरू में जीरो ड्राफ्ट की घोषणा की गई।
रियो 20 और यूनाइटेड नेशंस कांफ्रेंस ऑन सस्टेनेबल डेवलपमेंट सम्मेलन का वार्ता मसौदा जीरो ड्राफ्ट, यानी 'भविष्य जो हम चाहते हैं' के नाम से जाना गया। इस मसौदे को पांच वर्गों में बांटा गया है- प्रस्तावनाएं, सतत विकास के संदर्भ में हरित अर्थव्यवस्था और गरीबी उन्मूलन, राजनीतिक प्रतिबद्धता का नवीकरण, सतत विकास के लिए संस्थागत ढांचा और क्रियान्वयन व कार्यवाही की रूपरेखा। इसे रियो प्लस 20 में सर्वसम्मति से अपनाया गया, पर लगता है कि पर्यावरण एवं विकास के बीच सामंजस्य का इसमें ध्यान नहीं रखा गया है। इस मसौदे में कार्बन उत्सर्जन और जंगलों के विनाश पर स्पष्ट तौर पर कुछ नहीं कहा गया है। बेशक सम्मेलन में पर्यावरण को बचाने और चुनौतियों से निबटने के लिए सहमति बनी, पर विकसित देश बराबरी का हक चाहते हैं, जो विकासशील देशों को मंजूर नहीं है। जी-77 समूह देशों का मानना है कि विकसित देशों पर पहले किए गए वायदों को पूरा करने के लिए दबाव डाला जाना चाहिए, जिसके प्रति वे उदासीन नजर आते हैं। हमारे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने साफ कहा कि भारत इस मुद्दे पर विकासशील देशों के समूह जी-77 के साथ है।
दरअसल अमेरिका सहित कई विकसित देश चाहते हैं कि विकासशील देश अपने उद्योग-धंधों की रफ्तार कम करें और कार्बन उत्सर्जन के स्तर को तेजी से नीचे लाएं। लेकिन वे इसके लिए आर्थिक और तकनीकी सहयोग देने के लिए भी तैयार नहीं हैं। कहने का मतलब विकासशील देश एकतरफा सहयोग करें, जबकि यह विश्व समुदाय की जिम्मेदारी है कि वह पर्यावरण संरक्षण की रणनीति को ऐसा व्यावहारिक रूप दे, ताकि सभी राष्ट्र अपनी प्राथमिकताओं और परिस्थितियों के अनुरूप प्रगति कर सके। सम्मेलन के अंतिम मसौदा बयान से स्पष्ट होता है कि विकसित देश गरीब अर्थव्यवस्थाओं के स्थायी विकास की खातिर वित्तपोषण के बारे में कोई आंकड़ा तय करने में नाकाम रहे हैं।
भारत ‘हरित अर्थव्यवस्था’ पर काम करना चाहता है, जो सम्मलेन का मूल उद्देश्य है, पर इसमें विकासशील और विकसित, दोनों देशों की भूमिका अानुपातिक होनी चाहिए। आज पर्यावरण सरंक्षण पर बातें तो हो रही है, पर कोई ठोस समाधान नहीं निकल रहा। इसलिए जरूरी है कि हम भविष्य के लिए ऐसी राह चुनें, जो संपन्नता के आर्थिक, सामाजिक और पर्यावरणीय पहलुओं के बीच संतुलन बना सके।
विकसित देश चाहते हैं कि विकासशील देश अपने उद्योग-धंधों की रफ्तार कम कर दें और कार्बन उत्सर्जन के स्तर को तेजी से कम करें। (Published in Amar Ujala Compact on 26june12)
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