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Saturday, 22 March 2014

जीने के लिए जरूरी है जल संरक्षण

विश्व जल दिवस पर विशेष
शशांक द्विवेदी 

LOKMAT
विश्व जल दिवस यानी पानी के वास्तविक मूल्य को समझने का दिन ,पानी बचाने के संकल्प का दिन। पानी के महत्व को जानने का दिन और जल संरक्षण के विषय में समय रहते सचेत होने का दिन। आँकड़े बताते हैं कि विश्व के 1 .6 अरब लोगों को पीने का शुद्ध पानी नही मिल रहा है। पानी की इसी जंग को खत्म करने और इसके प्रभाव को कम करने के लिए संयुक्त राष्ट्र ने 1992 के अपने अधिवेशन में 22 मार्च को विश्व जल दिवस के रुप में मनाने का निश्चय किया। विश्व जल दिवस की अंतरराष्ट्रीय पहल रियो डि जेनेरियो में 1992 में आयोजित पर्यावरण तथा विकास का संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन में की गई। जिस पर सर्वप्रथम 1993 को पहली बार 22 मार्च के दिन पूरे विश्व में जल दिवस के मौके पर जल के संरक्षण और रखरखाव पर जागरुकता फैलाने का कार्य किया गया। पिछले दिनों संयुक्त राष्ट्र ने चेतावनी दी है कि विश्व के अनेक हिस्सों में पानी की भारी समस्या है और इसकी बर्बादी नहीं रोकी गई तो स्थिति और विकराल हो जाएगी क्योंकि भोजन की मांग और जलवायु परिवर्तन की समस्या दिनोंदिन बढ़ती जा रही है।
प्रकृति जीवनदायी संपदा जल हमें एक चक्र के रूप में प्रदान करती है, हम भी इस चक्र का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। चक्र को गतिमान रखना हमारी जि़म्मेदारी है, चक्र के थमने का अर्थ है, हमारे जीवन का थम जाना। प्रकृति के ख़ज़ाने से हम जितना पानी लेते हैं, उसे वापस भी हमें ही लौटाना है। हम स्वयं पानी का निर्माण नहीं कर सकते अतः प्राकृतिक संसाधनों को दूषित न होने दें और पानी को व्यर्थ न गँवाएँ यह प्रण लेना आज के दिन बहुत आवश्यक है।
धरातल पर तीन चैथाई पानी होने के बाद भी पीने योग्य पानी एक सीमित मात्रा में ही है। उस सीमित मात्रा के पानी का इंसान ने अंधाधुध दोहन किया है। नदी, तालाबों और झरनों को पहले ही हम कैमिकल की भेंट चढ़ा चुके हैं, जो बचा खुचा है उसे अब हम अपनी अमानत समझ कर अंधाधुंध खर्च कर रहे हैं।
संसार इस समय जहां अधिक टिकाऊ भविष्य के निर्माण में व्यस्त हैं वहीं पानी, खाद्य तथा ऊर्जा की पारस्परिक निर्भरता की चुनौतियों का सामना हमें करना पड़ रहा है। जल के बिना न तो हमारी प्रतिष्ठा बनती है और न गरीबी से हम छुटकारा पा सकते हैं। फिर भी शुद्ध पानी तक पहुंच और सैनिटेशन यानी साफ-सफाई, संबंधी सहस्त्राब्दी विकास लक्ष्य तक पहुंचने में बहुतेरे देश अभी पीछे हैं।एक पीढ़ी से कुछ अधिक समय में दुनिया की आबादी के 60 प्रतिशत लोग कस्बों और शहरों में रहने लगेंगे और इसमें सबसे अधिक बढ़ोतरी विकासशील देशों में शहरों के अंदर उभरी मलिन बस्तियों तथा झोपड़-पट्टियों के रूप में होगी।
भारत में शहरीकरण के कारण अधिक सक्षम जल प्रबंधन तथा समुन्नत पेय जल और सैनिटेशन की जरूरत पड़ेगी। क्योंकि शहरों में अक्सर समस्याएं विकराल रूप धारण कर लेती हैं, और इस समय तो समस्याओं का हल निकालने में हमारी क्षमताएं बहुत कमजोर पड़ रही हैं।
जिन लोगों के घरों या नजदीक के किसी स्थान में पानी का नल उपलब्ध नहीं है ऐसे शहरी बाशिंदों की संख्या विश्व परिद्रश्य में पिछले दस वर्षों के दौरान लगभग ग्यारह करोड़ चालीस लाख तक पहुंच गई है, और साफ-सफाई की सुविधाओं से वंचित लोगों की तादाद तेरह करोड़ 40 लाख बतायी जाती है। बीस प्रतिशत की इस बढ़ोतरी का हानिकारक असर लोगों के स्वास्थ्य और आर्थिक उत्पादकता पर पड़ा हैः लोग बीमार होने के कारण काम नहीं कर सकते।
भारत में विश्व की लगभग 16 प्रतिशत आबादी निवास करती है। लेकिन, उसके लिए मात्र 4 प्रतिशत पानी ही उपलब्य है। विकास के शुरुआती चरण में पानी का अधिकतर इस्तेमाल सिंचाई के लिए होता था। लेकिन, समय के साथ स्थिति बदलती गयी और पानी के नये क्षेत्र-औद्योगिक व घरेलू-महत्वपूर्ण होते गये। भारत में जल संबंधी मौजूदा समस्याओं से निपटने में वर्षाजल को भी एक सशक्त साधन समझा जाए। पानी के गंभीर संकट को देखते हुए पानी की उत्पादकता बढ़ाने की जरूरत है। चूंकि एक टन अनाज उत्पादन में 1000 टन पानी की जरूरत होती है और पानी का 70 फीसदी हिस्सा सिंचाई में खर्च होता है, इसलिए पानी की उत्पादकता बढ़ाने के लिए जरूरी है कि सिंचाई का कौशल बढ़ाया जाए। यानी कम पानी से अधिकाधिक सिंचाई की जाए। अभी होता यह है कि बांधों से नहरों के माध्यम से पानी छोड़ा जाता है, जो किसानों के खेतों तक पहुंचता है। जल परियोजनाओं के आंकड़े बताते हैं कि छोड़ा गया पानी शत-प्रतिशत खेतों तक नहीं पहुंचता। कुछ पानी रास्ते में भाप बनकर उड़ जाता है, कुछ जमीन में रिस जाता है और कुछ बर्बाद हो जाता है।
पानी का महत्व भारत के लिए कितना है यह हम इसी बात से जान सकते हैं कि हमारी भाषा में पानी के कितने अधिक मुहावरे हैं।अगर हम इसी तरह कथित विकास के कारण अपने जल संसाधनों को नष्ट करते रहें तो  वह दिन दूर नहीं, जब सारा पानी हमारी आँखों के सामने से बह जाएगा और हम कुछ नहीं कर पाएँगे।
जल नीति के विश्लेषक सैंड्रा पोस्टल और एमी वाइकर्स ने पाया कि बर्बादी का एक बड़ा कारण यह है कि पानी बहुत सस्ता और आसानी से सुलभ है। कई देशों में सरकारी सब्सिडी के कारण पानी की कीमत बेहद कम है। इससे लोगों को लगता है कि पानी बहुतायत में उपलब्ध है, जबकि हकीकत उलटी है।
इस निराशाजनक परिदृश्य में कुछ उदाहरण उम्मीद जगाने वाले हैं। पहला उदाहरण चेन्नई का है, जहां अनिवार्य जल संचय के लिए एक सुस्थापित प्रणाली काम कर रही है। दूसरा उदाहरण कर्नाटक के हुबली-धारवाड़ में विश्व बैंक द्वारा समर्थित सफल योजना का है। यहां बेहतर ढांचागत संरचना, प्रभावी आपूर्ति तंत्र और वसूली के जरिए वाजिब कीमत पर 24 घंटे पानी की आपूर्ति की जा रही है।
समय आ गया है जब हम वर्षा का पानी अधिक से अधिक बचाने की कोशिश करें। बारिश की एक-एक बूँद कीमती है। इन्हें सहेजना बहुत ही आवश्यक है। यदि अभी पानी नहीं सहेजा गया, तो संभव है पानी केवल हमारी आँखों में ही बच पाएगा। पहले कहा गया था कि हमारा देश वह देश है जिसकी गोदी में हज़ारों नदियाँ खेलती थी, आज वे नदियाँ हज़ारों में से केवल सैकड़ों में ही बची हैं। कहाँ गई वे नदियाँ, कोई नहीं बता सकता। नदियों की बात छोड़ दो, हमारे गाँव-मोहल्लों से तालाब आज गायब हो गए हैं, इनके रख-रखाव और संरक्षण के विषय में बहुत कम कार्य किया गया है।
ऐसा नहीं है कि पानी की समस्या से हम जीत नहीं सकते। अगर सही ढ़ंग से पानी का सरंक्षण किया जाए और जितना हो सके पानी को बर्बाद करने से रोका जाए तो इस समस्या का समाधान बेहद आसान हो जाएगा। लेकिन इसके लिए जरुरत है जागरुकता की। एक ऐसी जागरुकता की जिसमें छोटे से छोटे बच्चे से लेकर बड़े बूढ़े भी पानी को बचाना अपना धर्म समझें।

Thursday, 9 January 2014

मीठे पानी का भंडार

हो सकता है एक दिन हमें मीठे पानी के लिए समुद्र में कुएं खोदने पड़ें। वैज्ञानिकों ने ऑस्ट्रेलिया, चीन, उत्तरी अमेरिका और दक्षिण अफ्रीका के तटों के पास समुद्र के नीचे स्वच्छ जल के भंडारों का पता लगाया है। ये इतने बड़े हैं कि इनसे दुनिया को जल संकट से निजात दिलाने में मदद मिल सकती है। नेचर पत्रिका में प्रकाशित एक अध्ययन रिपोर्ट के मुताबिक पूरी दुनिया में समुद्री तल के नीचे कई किलोमीटर तक फैले क्षेत्र में करीब पांच लाख घन किलोमीटर पानी मौजूद है। वैज्ञानिकों का कहना है कि यह पानी कम लवणता का है और इससे दुनिया के समुद्री तटों पर बसे शहरों को जल आपूर्ति की जा सकती है। ऑस्ट्रेलिया की फलाइंडर्स युनिवर्सिटी के स्कूल ऑफ एनवायरनमेंट के वैज्ञानिक डॉ. विंसेंट पोस्ट का मानना है कि इस पानी की मात्रा पिछली एक सदी के दौरान जमीन से निकाले गए पानी से सौ गुना ज्यादा है।
समुद्र में इस पानी की खोज एक बड़ी खबर है क्योंकि इससे कई दशकों तक दुनिया के कुछ इलाकों में पानी की मांग को पूरा किया जा सकता है। समुद के नीचे स्वच्छ जल की मौजूदगी की बारे में भूजल वैज्ञानिकों को पहले से कुछ जानकारी थी, लेकिन उनका खयाल था कि इस तरह के जलाशय दुर्लभ हैं और कुछ खास स्थितियों में ही पाए जाते हैं। नई रिसर्च से पता चलता है कि समुदी तल के नीचे इस तरह के जलाशय बड़ी मात्रा में मौजूद हैं। समझा जाता है कि इन जलाशयों का निर्माण हजारों वर्षों के दौरान हुआ है। शुरू-शुरू में औसत समुदी स्तर आज की तुलना में बहुत नीचे था और समुदी तट दूर तक फैले हुए थे। बारिश का पानी जमीन में समा जाता था। समुद्री तटों की यह जमीन अब समुद्र के नीचे है। ऐसा पूरी दुनिया में हुआ है। करीब 20,000 वर्ष पहले जब ध्रुवीय टोपियां पिघलनी शुरू हुईं तो समुद्र का जल स्तर भी बढ़ने लगा। तब ये इलाके समुद्र में डूब गए थे। आश्चर्यजनक बात यह है कि समुद्र के खारे पानी का इन जलाशयों पर कोई असर नहीं हुआ है क्योंकि ये जलाशय मिट्टी की कई परतों से ढके हुए हैं।
डॉ.पोस्ट का कहना है कि इन समुद्री जलाशयों का स्वरूप भूजल के सामान्य भंडारों जैसा ही है, जिन पर दुनिया की बहुत कुछ आपूर्ति निर्भर है। समुद्री जलाशयों के पानी की लवणता बहुत कम है और उसे साफ पानी में बदला जा सकता है। लेकिन सवाल यह है कि क्या हम इस पानी का उपयोग कर सकते हैं और क्या यह आर्थिक रूप से किफायती होगा? इस पानी को निकालने के दो तरीके हो सकते हैं। या तो हम समुद्र में खुदाई करें या फिर मुख्य भूमि से खुदाई करें। समुद में खुदाई करना बहुत महंगा पड़ सकता है। इसके लिए पहले जलाशय के स्रोत का आकलन करना पड़ेगा और समुद्र के लवण रहित पानी जैसे दूसरे जल स्रोतों की तुलना में उसकी लागत और पर्यावरण प्रभावों का अध्ययन करना पड़ेगा। डॉ.पोस्ट का मानना है कि समुद्र के खारे पानी को लवण रहित करने की सामान्य प्रक्रिया की तुलना में इस पानी को स्वच्छ जल में बदलने पर कम ऊर्जा खर्च होगी।
दुनिया में स्वच्छ जल की आपूर्ति के लिए बहुत दबाव है। तटों के आसपास नए जल स्रोत मिलने से हमारे सामने जल संकट से निपटने के नए विकल्प मिल सकते हैं लेकिन जिन देशों के पास समुद्र में स्वच्छ जल के भंडार मौजूद हैं उन्हें अपने समुद्री तल का प्रबंध बहुत ही सावधानी से करना पड़ेगा। मसलन जहां कम लवणता वाला पानी मौजूद है वहां हमें यह ध्यान में रखना पड़ेगा कि यह पानी किसी भी तरह से प्रदूषित नहीं हो पाए। वैज्ञानिकों ने चेताया है कि इन जलाशयों का प्राकृतिक नवीकरण संभव नहीं है। एक बार खत्म होने पर इनकी भरपाई नहीं हो पाएगी। समुद्री स्तर में बहुत ज्यादा गिरावट आने के बाद ही इन जलाशयों की भरपाई हो सकती है और बहुत लबे समय तक ऐसा होने वाला नहीं है।

- मुकुल व्यास

Monday, 15 April 2013

आम आदमी के हित में हो जल नीति


शशांक द्विवेदी 
भारत जल सप्ताह अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन पर विशेष लेख 
जल संबंधी मुद्दों पर ध्यान केन्द्रित करने के लिए पिछले साल से जल संसाधन मंत्रालय ने भारत जल सप्ताह को वार्षिक अंतरराष्ट्रीय आयोजन के रुप में मनाने की पहल की थी । यह जल संबंधी मुद्दों को वैश्विक मंच प्रदान करेगा जो चुनौतियों, प्रौद्योगिकी प्रदर्शन, अवसरों की खोज, पेशेवरों , संगठनों की उत्कृष्टता की पहचान और उनकी उपलब्धियों को संबोधित करने के लिए नीति निर्धारकों, उद्योग प्रमुखों, विशेषज्ञों, पेशेवरों और व्यवसायिकों को एक साथ लाएगा। भारत जल सप्ताह के दूसरे अंतरराष्ट्रीय आयोजन की श्रृंखला में 8-12 अप्रैल 2013 के दौरान नई दिल्ली में  जल का दक्ष प्रबंधनः चुनौतियां और अवसर थीम पर इसका आयोजन किया जाना एक सकारात्मक संकेत है । यह  कार्यक्रम इसलिए ज्यादा महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें  भारत सहित 64 देशों के 1,758 लोगों ने भाग लिया और सम्मेलन के दौरान 200 शोध पत्र प्रस्तुत किए गये । इस आयोजन में राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने कहा कि वर्तमान परिस्थितियों से तालमेल बनाए रखने के लिए जल संसाधनों की योजना, विकास और प्रबंधन का बहुत महत्व है। देश में इस समय जो संस्थानिक और वैधानिक ढांचा मौजूद है वह पर्याप्त नहीं है तथा तत्काल सुधारों की आवश्यकता है।
अब यहाँ पर सवाल समस्याए बताने से ज्यादा उनके समाधान पर ध्यान केंद्रित करने का है । क्योंकि भारत में आबादी के हिसाब से पहले से ही कम जल की उपलब्धता और कम होती जा रही है जिसे देखते हुए अपने स्वामित्व वाली भूमि से जितना चाहे भू-जल निकालने की छूट को नियंत्रित करने के लिए कानून बनाए जाने की सख्त जरूरत है। पिछले साल भारत जल सप्ताह में प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह और केंद्रीय जल संसाधन मंत्री ने आम आदमी  के हितों के अनुकूल जल नीति बनाने को कहा था लेकिन वह अभी तक नहीं बन पाई । वर्तमान जल नीति का जो मसौदा है उसमे काफी शकाएँ और आशंकाएं है जिसमे जल को एक कमोडिटी के रूप में देखा जा रहा है जो भविष्य में जल के निजीकरण की दिशा में प्रयास है । इस नीति में आम आदमी की व्यवहारिक समस्यायों पर ध्यान केंदित नहीं किया गया है । पानी के बाजारीकरण ,निजीकरण या  कमोडिटी बनने के बाद अमीर और गरीबों के बीच, किसानों और उद्योगों के बीच शुरू होने वाली खींच-तान में सरकार का क्या रुख रहेगा, इसको ले कर इसमें कोई स्पष्टता नहीं है।
इस जल नीति के मसौदे के लिए किसानों से वेबसाईट पर अपने सुझाव देने के लिए कहा गया था । अब आप अंदाजा लगाइ कि  किसान तो खेत खलिहान में काम करता है ,गाँव में रहता है और वहाँ पर बिना किसी खास तकनीकी ढांचें के किसान कैसे वेबसाईट पर अपने सुझाव  दे सकेगा, यह एक बड़ा  प्रश्न है जबकि जल नीति से किसान का ही सर्वाधिक मतलब हो सकता है। क्योंकि आज भी करीब  85 प्रतिशत भूजल सिंचाई में इस्तेमाल होता है। इसी प्रकार से समाज के अन्य वर्ग के लोगों तक नीति यह कैसे पहुंचे? इसके बारे में तो सोचा ही नहीं गया ।
वास्तव में इस तरह के वैश्विक आयोजनों की सार्थकता तभी होगी जब समस्याओं के समाधान पर त्वरित क्रियान्यवन होगा । हमारे देश में सार्थक घोषणाएँ भी सरकारी लालफीताशाही का शिकार हो जाती है और उनमे बहुत ज्यादा देर हो जाती है । इसलिए घोषणाओं के क्रियान्यवन की समय सीमा तय होनी चाहिए ,सम्बंधित लोगों की जवाबदेही सुनिश्चित होनी चाहिए तभी इस तरह के आयोजनों की सार्थकता सिद्ध होगी ।
विश्व की 18 प्रतिशत आबादी भारत में है लेकिन उपयोग करने योग्य पेय जल मात्र चार प्रतिशत है। भारत में जल की कमी है। तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था और शहरीकरण ने जल की आपूर्ति और मांग के अंतर को और चैड़ा कर दिया है। जलवायु परिवर्तन से जल की उपलब्धता की कमी और बढ़ सकती है और देश के जल चक्र को खतरा पैदा हो सकता है। धरातल पर तीन चैथाई पानी होने के बाद भी पीने योग्य पानी एक सीमित मात्रा में ही है। उस सीमित मात्रा के पानी का इंसान ने अंधाधुध दोहन किया है। नदी, तालाबों और झरनों को पहले ही हम कैमिकल की भेंट चढ़ा चुके हैं, जो बचा खुचा है उसे अब हम अपनी अमानत समझ कर अंधाधुंध खर्च कर रहे हैं। जल के बिना हमारी क्या स्तिथि होगी इसकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते । वर्तमान में महाराष्ट्र में सूखे की मार से हजारों लोग आत्महत्या करने को मजबूर है ,पीने के पानी की इतनी भारी किल्लत है कि वहाँ के कई क्षेत्रों में इसके लिए संघर्ष भी होते रहते है । राजस्थान के भी हालात पानी के मामले में अच्छे नहीं है । पिछले दिनों संयुक्त राष्ट्र ने चेतावनी दी है कि विश्व के अनेक हिस्सों में पानी की भारी समस्या है और इसकी बर्बादी नहीं रोकी गई तो स्थिति और विकराल हो जाएगी क्योंकि भोजन की मांग और जलवायु परिवर्तन की समस्या दिनोंदिन बढ़ती जा रही है।
भू-जल के भारी दुरूपयोग की वजह हमारा मौजूदा कानून है जिसमे लोग जिनता चाहे उतना जल निकाल रहें है .भू-जल संसाधन के इस्तेमाल को लेकर अभी तक कोई स्पष्ट कानूनी ढाँचा नहीं बना है .हमारे देश में पानी का महत्व कितना है इसको बताने के लिए कई स्थानीय भाषाओँ में सैकड़ों मुहावरे है ।  अगर हम इसी तरह कथित विकास के कारण अपने जल संसाधनों को नष्ट करते रहें तो  वह दिन दूर नहीं, जब सारा पानी हमारी आँखों के सामने से बह जाएगा और हम कुछ नहीं कर पाएँगे। उद्योगों के अपशिष्ट और नालों में  बहने वाले मल से हमारे जल संसाधनों का प्रदूषण बढ़ता जा रहा है। भू-जल का स्तर घटने के साथ ही उसमें फ्लोराइड, आर्सेनिक और अन्य रासायनों की मात्रा बढ़ रही है।
पिछले दशकों में औद्योगिकरण, शहरीकरण और तीव्र जनसांख्यिकी बदलावों के मद्देनजर प्रति व्यक्ति जल उपलब्धता पर काफी दबाव पडा है। दक्षिण एशिया के प्राकृतिक संसाधनों और पारिस्थिक तंत्र पर भी प्रतिकूल प्रभाव पडा है। जलवायु परिवर्तन के कारण समस्या ने और अधिक गंभीर रूप लिया है जिस वजह से क्षेत्र के कुछ हिस्सों में अनपेक्षित बाढ़ और सूखे के प्रभाव की आशंका गहरा गई है। जल संकट के कारण परिवारों और समुदायों को काफी परेशानी सहनी पड़ती है । इसी वजह से कई बार वर्ग संघर्ष भी होता है । बेहतर जल प्रबंधन व्यवस्था करने के लिए देश में इसके लिए बुनियादी और कानूनी ढांचे का अभाव है  जिसमे तत्काल सुधार की जरुरत है । देश के कई हिस्सों में  पानी की विकराल समस्या के लिए बेहतर योजना, विकास और प्रबंधन की दिशा में जल्दी ही कुछ सार्थक करने की जरुरत है । देश में बाढ़ और सूखे की आवृत्तियों से निपटने के लिए जल संसाधनों के प्रबंधन में सुधार के तरीके खोजने होंगे।
जल सप्ताह सम्मेलन के एक प्रस्ताव के अनुसार जल संरक्षण और उपयोग के सामान्य सिद्धांतों को लेकर एक ऐसा व्यापक पंहुच वाला राष्ट्रीय कानूनी ढांचा बनाया जाए जो हर राज्य को जल संचालन का आवश्यक विधायी आधार उपलब्ध कराए। इससे देश के पैमाने पर एकीकृत और सुसंगत संस्थागत जल नीति को लागू करने में मदद मिलेगी। जल दुरुपयोग नियंत्रित करने के सिलसिले में राष्ट्रीय जल मिशन ने जल उपयोग दक्षता में 20 प्रतिशत सुधार का लक्ष्य रखा जाना चाहिए । जल आपूर्ति बढ़ाने की सीमाओं को देखते हुए ऐसा किया जाना आवश्यक है। इस सबसे बढ़ कर भू-जल को वर्तमान में व्यक्तिगत मिलकियत समझे जाने की स्थिति से निकाल कर उसे साझा संपत्ति संसाधनके रूप में बनाया जाना चाहिए। इस तरह के आयोजनों का होना सकारात्मक है लेकिन वास्तविक सफलता तभी है जब घोषणाओं और नीतियों का सफल क्रियान्वयन हो

Friday, 11 May 2012

कब जागेंगे हम ?


यूनाइटेड स्टेट्स फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज की ताजा  रिपोर्ट

हर व्यक्ति के लिए पानी की उपलब्धता १६५४ क्यूबिक मीटर है। २०५० तक ११४० क्यूबिक मीटर रह जाएगी। १९५१ में भारतीयों के पास प्रति व्यक्ति ५१७७ क्यूबिक मीटर पानी की उपलब्धता थी। यहाँ पानी की कमी महज ६५ साल में करीब एक तिहाई हो गई है।एक शोध की रिपोर्ट ने करवट लेते मौसम और उससे उपजी चिंताओं की तरफ दुनिया का ध्यान दिलाने की कोशिश की है। यूनाइटेड स्टेट्स फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज की रिपोर्ट में कहा गया है कि अगर कार्बन उत्सर्जन मौजूदा दर से ही जारी रहा तो २०३० तक भारत के तापमान में १.५ डिग्री सेल्सियस से लेकर २.० डिग्री सेल्सियस तक की बढ़ोतरी हो सकती है। इससे मिट्टी की नमी में कमी तो आएगी ही, धरती पर मौजूदा जल की उपलब्धता में भी कमी आएगी। इस शोध में शामिल सार्वजनिक क्षेत्र के १७ संस्थानों के २०० वैज्ञानिकों की राय है कि इससे खेती की पैदावार में कमी आएगी और इसका सबसे ज्यादा असर मौसमी सब्जियों और फलों पर पड़ेगा। हमारे देश में पानी की उपलब्धता के चलते ही आलू, प्याज के साथ ही मौसमी सब्जियों का खासा उत्पादन होता है। सूखे की स्थिति में इनके उत्पादन में भारी कमी आती रही है। इस साल भी कर्नाटक और महाराष्ट्र जैसे राज्यों के कुछ हिस्सों में सूखे की वजह से प्याज की पैदावार में गिरावट आई है। अगर रिपोर्ट के आकलन के मुताबिक ही मौसम में बदलाव आता है तो आशंका ये है कि आलू, प्याज और टमाटर के उत्पादन में सबसे ज्यादा गिरावट आएगी। 

इस रिपोर्ट का मानना है कि अगर हालात ऐसे ही बिगड़ते रहे और मौसम में बदलाव आता रहा तो भारत की पहचान रहे आम जैसे फल के उत्पादन में भी कमी आ सकती है। अंगूर और सेब का उत्पादन भी कम हो सकता है। इस रिपोर्ट के मुताबिक जहाँ आज देश में हर व्यक्ति के लिए पानी की उपलब्धता १६५४ क्यूबिक मीटर है। वह २०५० तक ११४० क्यूबिक मीटर ही रह जाएगी। १९५१ में भारतीयों के पास प्रति व्यक्ति ५१७७ क्यूबिक मीटर पानी की उपलब्धता थी। जाहिर है कि हमारे यहाँ पानी की कमी महज पैंसठ साल में करीब एक तिहाई हो गई है।

देश के एक ५९ फीसद जिले कम बारिश की समस्या से जूझ रहे हैं। ऐसे में गौर करने की बात यह है कि भविष्य में आज के मुकाबले ना सिर्फ अनाज बल्कि फल और सब्जियों की ज्यादा जरूरत पड़ेगी। लिहाजा तब उत्पादन बढ़ाना होगा लेकिन मौसम की मार की वजह से ये घटता ही नजर आ रहा है। हम वक्त रहते ही चेत जाएँं तो अच्छा। देश की जनसंख्या का बड़ा हिस्सा अब भी सब्जियों और फलों की कमी से जूझ रहा है। २०३० में जब जनसंख्या में आज की तुलना में बीस से तीस करोड़ का इजाफा होगा और पानी की उपलब्धता कम होगी तो निश्चित है कि संकट बड़े होंगे। प्राचीन भारतीय मनीषा की अगर दुनिया में आज साख है तो उसकी वजह यही है कि उसे अपनी भावी पीढ़ियों और समाज की चिंता थी और उसे बचाने के लिए उसने पहले ही उपाय कर रखे थे। बेहतर होगा कि हम आज ही कड़े कदम उठाएँ, नहीं तो हमारी भावी पीढ़ियों के साथ जो गुजरेगा, उसके लिए वे हमें कभी माफ नहीं कर पाएँगी।