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Sunday, 2 June 2019

नवें ग्रह की खोज में

नवें ग्रह की खोज में
चंद्रभूषण
परंपरा से नवग्रह पूजन के आदी हम भारतीयों के लिए प्लूटो के ग्रहसूची से बाहर हो जाने के बाद ग्रहों का घट कर आठ ही रह जाना किसी पर्सनल ट्रैजडी से कम नहीं है। लेकिन सौर मंडल के बाहरी हिस्से पर काम कर रहे अंतरिक्ष विज्ञानियों की मानें तो आने वाले समय में ग्रहों की संख्या एक बार फिर आठ से बढ़कर नौ हो सकती है। हवाई के मौना-की पर्वत पर कनाडा और फ्रांस के सहयोग से बने विशाल टेलीस्कोप से 2013 और 2017 के बीच किए गए आउटर सोलर सिस्टम ओरिजिन्स सर्वे (ओसोस) ने बाहरी सौरमंडल में 840 पिंड खोजकर रहस्यों का बहुत बड़ा पिटारा खोल दिया है।

इनमें 2015 बीपी 519 समेत उन नौ पिंडों का आकर्षण सबसे ज्यादा है, जो सूरज की परिक्रमा 20 हजार साल या इससे भी ज्यादा समय में सौरमंडल के ग्रहीय तल से काफी झुकी हुई कक्षाओं में करते हैं। हमारी पृथ्वी के कुछ सहोदर ऐसे भी हैं, जिनका एक साल हमारे 20 हजार वर्षों से भी ज्यादा लंबा होता है, यह बात किसी को भी हैरत में डाल सकती है। लेकिन इनकी शिनाख्त के साथ ही यह सवाल भी उठ खड़ा हुआ है कि सूरज से इतनी दूर इनकी मौजूदगी की वजह क्या हो सकती है।

वैज्ञानिकों का अनुमान है कि ऐसा इस सुदूर इलाके में किसी बड़े ग्रह की उपस्थिति में ही संभव है, जिसका वजन पृथ्वी का दस गुना हो सकता है। सूरज से इतनी दूर, इतने विराट अंधियारे दायरे में सौर परिवार के इस संभावित नवें वरिष्ठ सदस्य की उपस्थिति के संकेत कैसे खोजे जाएं, यह खगोल विज्ञान का अगला सिरदर्द साबित होने जा रहा है।

Wednesday, 11 April 2018

अंतरिक्ष में आलीशान होटल

मुकुल व्यास 
अंतरिक्ष पर्यटन की दिशा में यह पहला कदम तो नहीं है, लेकिन चार करोड़ डॉलर की रूसी पेशकश से काफी किफायती है
चार साल बाद लोग अंतरिक्ष में प्रवास का आनंद उठा सकेंगे। अमेरिका में ओरियन स्पैन नामक कंपनी ने 2021 में एक आलीशान अंतरिक्ष होटल को पृथ्वी की कक्षा में स्थापित करने की योजना बनाई है। पांच साल के भीतर लोग इस होटल में ठहरना शुरू कर देंगे, लेकिन सिर्फ बड़े-बड़े धनकुबेर ही इस होटल में ठहरने के बारे में सोच सकते हैं। कंपनी 12 दिन के प्रवास के लिए सैलानियों से करीब एक करोड़ डॉलर वसूलेगी। इस होटल में ठहरने वाले मेहमान शून्य गुरुत्वाकर्षण का अनुभव कर सकेंगे। होटल की खिड़कियों से पृथ्वी के रोमांचकारी दृश्य कैद कर सकेंगे। इसके अलावा उन्हें दिन में औसतन 16 सूर्योदय और सूर्यास्त देखने का भी का मौका मिलेगा। होटल में ठहरने वाले सैलानी अंतरिक्ष जीवन के हर पहलू का अनुभव कर सकेंगे। अमेरिकी कंपनी ने सेन जोस शहर में स्पेस 2.0 शिखर सम्मेलन में इस प्रोजेक्ट की घोषणा की। 1अरौरा स्टेशन नामक इस अंतरिक्ष होटल में एक बारी में छह लोग ठहर सकेंगे। इनमें चार यात्री और चालक मंडल के दो सदस्य होंगे। कंपनी खुद यह होटल बनाना चाहती है। हालांकि उसने अभी तक इसके प्रक्षेपण का संपूर्ण ब्योरा नहीं दिया है। समझा जाता है कि होटल का डिजाइन मॉडुलर होगा। इससे बाद में इसका विस्तार करने में आसानी होगी। कंपनी के सीईओ फ्रेंक बंगर के अनुसार यह होटल प्रक्षेपण के तुरंत बाद काम करने लगेगा। अरौरा स्टेशन पृथ्वी के सैलानियों की मेजबानी करने के अलावा शून्य गुरुत्वाकर्षण में शोध और अंतरिक्ष में निर्माण की भी सुविधाएं भी देगा। कंपनी दूसरी अंतरिक्ष एजेंसियों को बहुत कम लागत पर अंतरिक्ष में मानव उड़ानें संचालित करने की सुविधाएं देगी। 1आगे चलकर कंपनी होटल की जगह किराये पर भी दे सकती है। बंगर ने बताया कि होटल का वास्तुशिल्प कुछ ऐसा होगा कि आवश्यकता पड़ने पर बाजार की मांग के अनुरूप उसकी क्षमता बढ़ाई जा सकेगी। अरौरा स्टेशन अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन की तुलना में बहुत छोटा होगा। इसका आकार एक बड़े प्राइवेट जेट विमान के केबिन जितना होगा। इस होटल में एक बड़े आलीशान होटल जैसी सारी व सुविधाएं होंगी, लेकिन यात्रियों को प्रवास के दौरान शून्य गुरुत्वाकर्षण में ही रहना पडेगा। होटल में ठहरने वाले लोग हाई स्पीड वायरलैस इंटरनेट के जरिये निरंतर संपर्क में रहेंगे। होटल में ठहरने वाले मेहमानों की सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए कंपनी यात्रियों को तीन महीने का प्रशिक्षण देगी।1अंतरिक्ष भ्रमण को व्यावसायिक बनाने का यह पहला प्रयास नहीं है। पिछले साल रूस ने कहा था कि वह अंतरिक्ष सैलानियों को 2022 तक अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन में रुकने का मौका देना चाहता है, लेकिन रूसी पेशकश अरौरा मिशन द्वारा बताए गए खर्च की तुलना में बहुत महंगी है। रूस ने स्टेशन में एक या दो सप्ताह के प्रवास के लिए प्रति व्यक्ति चार करोड़ डॉलर का खर्च बताया था। दुनिया के अन्य अरबपतियों द्वारा संचालित कंपनियां भी अंतरिक्ष पर्यटन के लिए कुछ लुभावनी परियोजनाएं शुरू कर रही हैं। दुनिया में सबसे अमीर माने जाने वाले एमेजॉन के मुखिया जेफ बेजोस भी इसके लिए ब्लू ओरिजिन प्रोजेक्ट का नेतृत्व कर रहे हैं। 

Saturday, 17 February 2018

अंतरिक्ष में निजी क्षेत्र

अंतरिक्ष उद्योग देश में सेवाओं, निर्माण तथा रोजगार में नए सिरे से दम भरने के लिए अगली क्रांति साबित हो सकता है

धरती के अलावा किसी दूसरे ग्रहों पर इंसानों के बसने की संभावनाओं का पता लगाने के काम में छह फरवरी को उस वक्त एक नया मोड़ आया जब प्राइवेट कंपनी स्पेस एक्स के फाल्कन हैवी राकेट को सफलतापूर्वक अंतरिक्ष में भेज दिया गया। स्पेस एक्स का काम यह पता लगाना है कि अंतरिक्ष के दूसरे ग्रहों पर इंसानों को बसाया जा सकता है या नहीं, खासतौर पर मंगल ग्रह पर। इसके अलावा इसका मकसद अंतरिक्ष की खोज और स्पेस ट्रेवल के कम लागत मगर प्रभावी तौर तरीकों का पता लगाना है। फाल्कन हैवी ने मनुष्यों की इस पुरानी ख्वाहिश को एक कदम और आगे ला दिया है।1जब से अंतरिक्ष के बारे में पता लगाने के काम की शुरुआत हुई है उसके बाद से, केवल संयुक्त राज्य अमेरिका की नेशनल एरोनॉटिक्स एंड स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन (नासा) जैसी सरकारी एजेंसियों का ही इसमें बोलबाला रहा है। फाल्कन हैवी का लांच बहुत ही अहम है, क्योंकि यह अंतरिक्ष में निजी क्षेत्र की अगुआई वाली कोशिशों के लिए भविष्य दिखाने वाले चिराग की तरह है। अंतरिक्ष ही वास्तव में वह जगह रह गई है जहां खोज के काम अभी बाकी है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) नासा के बाद ग्यारह साल बाद बना, लेकिन देश की वित्तीय सीमाओं के चलते हम नासा जैसा प्रदर्शन हासिल नहीं कर सके। फिर भी उन बहुत कम सीमाओं के कारण हम मजबूर हुए कि प्रतिस्पर्धा में बने रहने के लिए हम कम लागत वाले तरीकों को खोजें। मार्स ऑर्बिटर मिशन से इस बात को समझा जा सकता है। तकनीकी कमियों पर काबू पाने और रिकॉर्ड कम बजट पर काम करने के लिए इसरो ने होमैन स्थानांतरण कक्षा के तरीके का इस्तेमाल किया, जिसे स्लिंगशॉट विधि के रूप में जाना जाता है। इसके लिए मंगलयान को मंगल की तरफ भेजने में जरूरी स्पीड हासिल करने के लिए पहले धरती के चारों ओर कक्षा में छह बार चक्कर लगाने पड़े। मुङो इसकी कोई वजह नहीं लगती कि भारत में स्पेस एक्स जैसी कंपनियों को खड़ा नहीं किया जा सकता। इसकी मदद से देश को रिसर्च हब के रूप में ढाला जा सकता है। स्पेस एक्स केवल शुरुआत है। हम अगले कुछ दशकों में अंतरिक्ष में खोज के लिए बड़े पैमाने पर उद्योगों को आगे आता देख सकते हैं। हम देखेंगे कि किस तरह ग्रहों को उपनिवेश बनाने से लेकर क्षुद्रग्रहों पर डिलिंग का काम होने लगा है। अब वक्त आ गया है कि भारत इन कुछ इनोवेंशस की अगुआई करके अंतरिक्ष उद्योग में अहम खिलाड़ी बन कर उभरे। हमारे एयरोनॉटिकल और एयरोस्पेस इंजीनियरों और वैज्ञानिकों की प्रतिभावान टीम में इनोवेंशस को बढ़ावा देने की क्षमता है। 1इस बढ़ते बाजार का लाभ लेने के लिए कुछ पहल भारत में हो चुकी हैं। इसरो एक बेहतरीन अंतरिक्ष कार्यक्रम चला रहा है। कई भारतीय स्टार्ट-अप इस बाजार में प्रवेश करने की कोशिश कर रहे हैं। और पहली बार निजी क्षेत्र स्पेस में खोज और स्पेस ट्रेवल के काम में आगे आने को तैयार हैं। अब कोडर्स और आइटी के लोगों की जगह धीरे-धीरे आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस ले रही है। ऐसे में अंतरिक्ष उद्योग देश में सेवाओं, निर्माण और रोजगार में नए सिरे से दम भरने के लिए अगली क्रांति साबित हो सकता है।

Wednesday, 17 January 2018

साल 2017 में इसरो ,भावी मिशन और इसरो की चुनौतियाँ


साल 2017 इसरो के लिए कैसा रहा और आगे 2018 में उसके क्या भावी मिशन है ,भविष्य में क्या
 चुनौतियाँ है उसके लिए ,इस पर एक खास रिपोर्ट 

शशांक द्विवेदी
डिप्टी डायरेक्टर, मेवाड़ यूनिवर्सिटी ,राजस्थान 

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के लिए 2017 एक के बाद एक कई उपलब्धियों वाला साल रहा। फरवरी में उसने एक साथ 104 उपग्रहों का प्रक्षेपण कर नया इतिहास रचा तो 24 साल में पहली बार पीएसएलवी का कोई मिशन विफल रहने से कुछ चिंताएं भी उभरीं।  साल की शुरुआत धमाकेदार रही
104 उपग्रह छोड़कर बनाया विश्व कीर्तिमान
इसरो ने 15 फरवरी को एक साथ एक मिशन में और एक ही प्रक्षेपणयान से 104 उपग्रह छोड़कर विश्व कीर्तिमान बना दिया। इससे पहले उसने पिछले साल एक साथ 20 उपग्रहों का प्रक्षेपण किया था। दुनिया के किसी अन्य देश ने अब तक एक साथ 100 उपग्रह अंतरिक्ष में नहीं भेजे हैं। इसमें कार्टोसैट-2 मुख्य उपग्रह था जबकि 101 विदेशी समेत कुल 103 छोटे एवं सूक्ष्म उपग्रह थे। इस मिशन में सबसे चुनौतीपूर्ण काम था सभी उपग्रहों को इस प्रकार उनकी कक्षा में स्थापित करना कि वे एक-दूसरे से न टकराएं। इसरो ने इस काम को बखूबी अंजाम देकर यह साबित कर दिया कि उपग्रह प्रक्षेपण में उसने महारत हासिल कर ली है। इस मिशन से वैश्विक स्तर पर वाणिज्यिक प्रक्षेपण में उसकी साख और मजबूत हुई है तथा भविष्य में इस मद से देश के विदेशी मुद्रा अर्जन में तेजी आयेगी।
जीएसएलवी एमके-3 डी-1 का किया सफल प्रक्षेपण
05 जून, 2017 को इसरो ने जीएसएलवी प्रक्षेपण यान के अगले संस्करण जीएसएलवी एमके-3 डी-1 का सफल प्रक्षेपण किया। इस यान से 3,136 टन वजन वाले जीसैट-19 उपग्रह का प्रक्षेपण किया गया। इसरो द्वारा छोड़ा गया यह अब तक का सबसे भारी उपग्रह है। इस मिशन की सफलता के साथ ही भारत ने चार टन तक के वजन वाले उपग्रह को भूस्थैतिक कक्षा में स्थापित करने की दक्षता प्राप्त कर ली है। इससे पहले दो टन या इससे ज्यादा वजन के उपग्रहों के प्रक्षेपण के लिए हम विदेशों पर निर्भर थे।  इसरो ने 23 जून को एक साथ 31 उपग्रहों का प्रक्षेपण कर एक बार फिर साबित कर दिया कि वह एक साथ कई उपग्रह छोडऩे में अपना कौशल तथा अनुभव बढ़ाता जा रहा है। भारत ने अंतरिक्ष विज्ञान में अपनी सफलता के जश्न में पड़ोसी देशों को भी शामिल करते हुए 05 मई को दक्षेस देशों का साझा उपग्रह साउथ एशिया सैटेलाइट जीसैट-9 लांच किया। यह जीएसएलवी की लगातार चौथी सफल उड़ान रही। इसरो का कहना है कि अब जीएसएलवी भी लगातार सफल प्रक्षेपण करते हुए विश्वसनीय प्रक्षेपण यानों की श्रेणी में शामिल हो चुका है।
पीएसएलवी के 41वें मिशन ने इसरो को दिया झटका
लगातार 24 साल तक बिना किसी विफलता के अचूक प्रक्षेपण यान के रूप में स्वयं को स्थापित कर चुके पीएसएलवी के 41वें मिशन ने इसरो के विश्वास को इस साल बड़ा झटका दिया। पीएसएलवी सी-39 ने 31 अगस्त को आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से उड़ान भरी। इस मिशन के जरिए नेविगेशन उपग्रह आईआरएनएसएस-1एच को उप-भू स्थैतिक कक्षा में स्थापित किया जाना था। यह प्रक्षेपण विफल रहा। इसरो ने बताया कि शाम सात बजे प्रक्षेपण यान ने उड़ान भरी थी। प्रक्षेपण पूरी तरह योजना के अनुसार रही, लेकिन इसका हीट शील्ड प्रक्षेपण यान से अलग नहीं हो सका। इस कारण अंतरिक्ष में पहुंचकर उपग्रह हीट शील्ड के अंदर ही प्रक्षेपण यान से अलग हुआ। इसरो का कहना है कि वह हीट शील्ड के अलग नहीं होने के कारणों का विस्तृत विश्लेषण कर रहा है। इस विफलता के बाद इसरो ने साल के आखिरी चार महीने में किसी भी मिशन को अंजाम नहीं दिया है। पीएसएलवी की 20 सितंबर 1993 के बाद की यह पहली विफलता है
इसरो ने इस साल दिया सात मिशन को अंजाम
इस साल इसरो ने कुल सात मिशन को अंजाम दिया जिनमें से छह सफल रहे। इसके अलावा जीसैट-17 का प्रक्षेपण एरियन-5 वीए-238 से किया गया। साल के दौरान जीसैट-17 समेत इसरो ने उसके अपने आठ और 130 विदेशी उपग्रह छोड़े। इसमें आईआरएनएसएस-1एच का प्रक्षेपण विफल रहा।  आने वाले वर्ष में इसरो ने अपने प्रक्षेपणों की सालाना संख्या बढ़ाने का लक्ष्य रखा है। साथ ही उसने चंद्रयान-2 की भी तैयारी की है जिसका प्रक्षेपण मार्च 2018 तक होने की उम्मीद है।
इसरो के भविष्य के मिशन
मंगल यान और चंद्रयान -1 की सफलता के साथ साथ  अंतरिक्ष में प्रक्षेपण का शतक लगाने के बाद इसरो  कुछ और महत्वपूर्ण मिशनों पर कार्य तेज करने जा रहा है। इनमें पहला कदम है साल 2018 की पहली तिमाही में दुसरे चन्द्र अभियान को कार्यान्वित करते हुए चंद्रमा की सतह पर एक रोवर उतारना ,दूसरा मिशन है मानवयुक्त अंतरिक्ष अभियान यानि अंतरिक्ष में मानव मिशन भेजना । और  तीसरा  मिशन सूर्य के अध्ययन के लिए आदित्य उपग्रह का प्रक्षेपण करना है। मंगल की कक्षा में सफलतापूर्वक मंगलयान के पहुंचने के बाद इसरो के वैज्ञानिक सभी भविष्य के अभियानों की सफलता को लेकर काफी आश्वस्त हैं।
दूसरें चंद्र अभियान की तैयारी में इसरो
अंतरिक्ष तकनीक में कामयाबी की एक नई कहानी लिखने के लिए भारत तेजी से आगे बढ़ रहा है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) साल 2018 की पहली तिमाही में बड़े मानवरहित अभियान के तहत चंद्रमा पर दूसरा मिशन 'चंद्रयान-2' भेजने जा रहा है। इसरो के चेयरमैन एस किरण कुमार के अनुसार चंद्रमा की धरती पर स्पेसक्रॉफ्ट की लैंडिंग को लेकर परीक्षण चल रहा है और अगले साल 2018 तक चंद्रयान-2 अभियान लॉन्च हो जाने की उम्मीद है। इसरो इसके लिए एक विशेष इंजन विकसित करेगा जो लैंडिंग को कंट्रोल कर सके। फिलहाल इसका अभ्यास किया जा रहा है जिसके लिए चंद्रमा की सतह जैसी आकृति और वातावरण बनाकर प्रयोग जारी है। फिलहाल इस अभियान को लेकर कई तरह के परीक्षण इसरो कर रहा है और चंद्रमा के लिए जाने वाला सैटेलाइट भी तैयार है। चंद्रयान-2 नई तकनीकी से तैयार किया गया है जो चंद्रयान-1 से काफी एंडवांस है और इसको जीएसएलवी-एमके-2 के जरिए लॉन्च किया जाएगा।  गौरतलब है कि पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने 2003 में भारत की ओर से चंद्रयान-1 अभियान की घोषणा की थी और इसे 2008 में भेजा गया था ।  भारत की ओर से चंद्रमा के लिए यह पहला सफल अभियान था ।
भारत पिछले कई वर्षो से रूस के सहयोग से इस अभियान को अंजाम तक पहुंचाने में जुटा था, लेकिन रूस से समय सीमा के अंदर तकनीकी सहयोग नहीं मिल पाने के कारण अब इस अभियान में भारत पूरी तरह से अपनी स्वदेशी तकनीक का प्रयोग करेगा। पहले यह अभियान इसरो और रूसी अंतरिक्ष एजेंसी (रोसकोसमोस) द्वारा संयुक्त रूप से किया जाना था जिसमें तय किया गया था कि ऑर्बिटर तथा रोवर की मुख्य जिम्मेदारी इसरो की होगी तथा रोसकोसमोस लैंडर के लिए जिम्मेदार होगा। लेकिन अब यह पूरा अभियान इसरो ही संभालेगा। जिसमें आर्बिटर ,रोवर तथा लैंडर तीनों ही इसरो डिजाइन करेगा ।
इसरो का मानवयुक्त अंतरिक्ष कार्यक्रम
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) इतिहास रचने के लिए एक और कदम बढ़ाने जा रहा है। 05 जून, 2017 को इसरो ने अपने सबसे भारी रॉकेट जीएसएलवी मार्क-3 को सफ़ल प्रक्षेपण कर बड़ी कामयाबी हासिल की थी  । इसरो द्वारा निर्मित यह अब तक का सबसे वजनी सेटेलाईट है, जिसका वजन 3,136 किलो है। इस सेटेलाईट की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसे और रॉकेट के मुख्य और सबसे बड़े क्रायोजेनिक इंजन को इसरो के वैज्ञानिकों ने भारत में ही विकसित किया है। खास बात यह है कि इसके सफल प्रक्षेपण से भारत मानवयुक्त अंतरिक्ष अभियान करनें में सक्षम हो गया है ।
जीएसएलवी मार्क-3 की सफलता के बाद इसरो का इंसान को अंतरिक्ष में भेजने का सपना कर पायेगा । अभी अमेरिका और रूस ही अपने दम पर स्पेस में इंसान को भेज पाए हैं। मार्क-3 के साथ भेजे गए क्रू मॉड्यूल के सफल टेस्ट से भारत को उम्मीदें बंधी हैं। चंद्रयान-1 और मंगल यान की कामयाबी के बाद भारत की निगाहें अब आउटर स्पेस पर हैं। इसरो ग्रहों की तलाश और उनके व्यापक अध्ययन के लिए मानव युक्त अंतरिक्ष मिशन भेजने की योजना बना रहा है। मानव स्पेसफ्लाइट कार्यक्रम का उद्देश्य पृथ्वी की निचली कक्षा के लिए दो में से एक चालक दल को ले जाने और पृथ्वी पर एक पूर्व निर्धारित गंतव्य के लिए सुरक्षित रूप से उन्हें वापस जाने के लिए एक मानव अंतरिक्ष मिशन शुरू करने की है कार्यक्रम इसरो द्वारा तय चरणों में लागू करने का प्रस्ताव है वर्तमान में, पूर्व परियोजना गतिविधियों क्रू मॉड्यूल ,पर्यावरण नियंत्रण और लाइफ सपोर्ट सिस्टम, क्रू एस्केप सिस्टम, आदि महत्वपूर्ण प्रौद्योगिकियों के विकास पर इसरो काम कर रहा हैयोजना के अनुसार अंतरिक्ष में जाने वाली इसरो की पहली मानव फ्लाईट में दो यात्री होंगे। फ़िलहाल यह फ्लाईट अंतरिक्ष में सौ से नौ सौ किलोमीटर ऊपर तक ले जाने की योजना है  ।


इसरो का 'आदित्य'
मार्स मिशन के बाद सन मिशन
मंगल अभियान और चंद्रयान 1 की सफ़लता के बाद इसरो के वैज्ञानिको अब सन मिशन की तैयारी कर रहें है सूर्य कॅरोना का अध्ययन एवं धरती पर इलेक्ट्रॉनिक संचार में व्यवधान पैदा करने वाली सौर-लपटों की जानकारी हासिल करने के लिए भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) आदित्य-1 उपग्रह छोड़ेगा। इसका प्रक्षेपण वर्ष 2012-13 में होना था मगर अब इसरो ने इसका नया प्रक्षेपण कार्यक्रम तैयार किया है।.
आदित्य-1 उपग्रह  सोलर ' कॅरोनोग्राफ’ यन्त्र की मदद से सूर्य के सबसे भारी भाग का अध्यन करेगा। इससे कॉस्मिक किरणों, सौर आंधी, और विकिरण के अध्यन में मदद मिलेगी। 
 अभी तक वैज्ञानिक सूर्य के
कॅरोना का अध्यन केवल सूर्यग्रहण के समय में ही कर पाते थे। इस मिशन की मदद से सौर वालाओं और सौर हवाओं के अध्ययन में जानकारी मिलेगी कि ये किस तरह से धरती पर इलेक्ट्रिक प्रणालियों और संचार नेटवर्क पर असर डालती है। इससे सूर्य के कॅरोना से धरती के भू चुम्बकीय क्षेत्र में होने वाले बदलावों के बारे में घटनाओं को समझा जा सकेगा। इस सोलर मिशन की मदद से तीव्र और मानव निर्मित उपग्रहों और अन्तरिक्षयानों को बचाने के उपायों के बारे में पता लगाया जा सकेगा। इस उपग्रह का वजन 200  किग्रा होगा । ये उपग्रह सूर्य कॅरोना का अध्ययन कृत्रिम ग्रहण द्वारा करेगा। इसका अध्ययन काल 10 वर्ष रहेगा। ये नासा द्वारा सन 1995 में प्रक्षेपित 'सोहो' के बाद सूर्य के अध्ययन में सबसे उन्नत उपग्रह होगा
शुक्र ग्रह पर भी है नजर 
मंगल के अलावा इसरो के वैज्ञानिकों की नजर शुक्र ग्रह पर भी टिकी है. विशेषज्ञ शुक्र ग्रह पर स्पेस मिशन को खासा अहम मानते हैं क्योंकि धरती के बेहद करीब होने के बावजूद इस ग्रह के बारे में बेहद कम जानकारी उपलब्ध है. हालांकि शुक्र ग्रह का मिशन महज ऑर्बिटर भेजने तक सीमित हो सकता है. अब तक सिर्फ अमेरिका, रूस, यूरोपीय स्पेस एजेंसी और जापान ही शुक्र ग्रह तक कामयाब मिशन लॉन्च कर पाए हैं. 
सैटेलाईट लॉन्च सिस्टम की क्रांति  
फिलहाल इसरो छोटे सैटेलाईट लॉन्च वीइकल को तैयार करने में जुटा है, जिसे सिर्फ तीन दिनों में असेंबल किया गया जा सकेगा। पीएसएलवी जैसे रॉकेट्स को तैयार करने में आमतौर पर 30 से 40 दिन लग जाते हैं, ऐसे में इसरो का यह प्रयास सैटलाइट लॉन्चिंग की दिशा में बड़ी क्रांति जैसा होगा। यही नहीं इस रॉकेट को तैयार करने में पीएसएलवी की तुलना में 10 फीसदी राशि ही खर्च होगी।
दुनिया भर में लॉन्च वीकल की मैन्युफैक्चरिंग कॉस्ट फिलहाल 150 से 500 करोड़ रुपये तक होती है। यह 2018 के अंत या फिर 2019 की शुरुआत तक तैयार हो सकता है। इस वीइकल की कीमत पीएसएलवी के मुकाबले 10 फीसदी ही होगा। हालांकि यह रॉकेट 500 से 700 किलो तक के सैटलाइट्स को ही लॉन्च कर सकेगा।'

ज्यादा उपग्रह प्रक्षेपित करनें का लक्ष्य
अभी भी हमारे पास संचार प्रणाली के मद्देनजर कम सैटेलाइट हैं, इसलिए इसरो सैटेलाइट लॉन्च करने की प्रकिया को दोगुना करने के प्रयास में है। अभी हम एक साल में 8 से 10 सेटेलाइट लॉन्च करते हैं। 2018 तक ये 20 के करीब होगा। हमारा टारगेट अगले 5 साल में 60 सैटेलाइट लॉन्च करने का है।
रेल दुर्घटनाओं से सुरक्षित करेगा इसरो 
मानवरहित रेल फाटकों पर हर साल कई हादसे होते हैं। इन हादसों में कई जानें भी जाती हैं लेकिन अभी तक इसके लिए रेलवे कोई ठोस कदम नहीं उठा पाया है। रेलवे अब इन फाटकों को सुरक्षित करने के लिए भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन यानी इसरो के साथ काम कर रहा है।

इसरो कि चुनौतियाँ 
अब समय आ गया है जब इसरो व्यावसायिक सफ़लता के साथ साथ अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा और चीन की तरह अंतरिक्ष अन्वेषण पर भी ज्यादा ध्यान दे । इसरो को अंतरिक्ष अन्वेषण और शोध के लिए दीर्घकालिक रणनीति बनानी होगी । क्योकि जैसे जैसे अंतरिक्ष के क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा बढेगी अंतरिक्ष अन्वेषण बेहद महत्वपूर्ण होता जाएगा । इस काम इसके लिए सरकार को इसरो का सालाना बजट भी बढ़ाना पड़ेगा जो फिलहाल अमेरिका और चीन के मुकाबले काफ़ी कम है। भारी विदेशी उपग्रहों को अधिक संख्या में प्रक्षेपित करने के लिए अब हमें पीएसएलवी के साथ साथ जीएसएलवी रॉकेट का भी उपयोग करना होगा। पीएसएलवी अपनी सटीकता के लिए दुनियाँ भर में प्रसिद्द है लेकिन ज्यादा भारी उपग्रहों के लिए जीएसएलवी का प्रयोग करना होगा।

महत्वपूर्ण तथ्य 
इसरो का कामयाबी भरा सफ़र
Ø  आज से लगभग 42 साल पहले उपग्रहों का साइकिल और बैलगाड़ी से शुरू हुआ इसरो का सफर आज उस मक़ाम पर पहुँच गया है जहाँ भारत अंतरिक्ष के क्षेत्र में दुनियाँ के सबसे शक्तिशाली पांच देशों में से एक है .
Ø  वर्ष 1969 में प्रसिद्ध वैज्ञानिक विक्रम साराभाई के निर्देशन में राष्ट्रीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन का गठन हुआ था. 
Ø  19 अप्रैल, 1975 को इसरो द्वारा  स्वदेश निर्मित उपग्रह आर्यभट्ट का सफल प्रक्षेपण 
Ø  15 फरवरी, 2017 को इसरो ने एक साथ 104 सैटेलाईट लाँच करके अंतरिक्ष की दुनियाँ में इतिहास रच दिया था . पीएसएलवी की 39वीं उड़ान में इसरो ने एक मिशन में सबसे ज़्यादा 104 सैटेलाइट भेजने का विश्व रिकॉर्ड बनाया  .
Ø  व्यावसायिक उपग्रह प्रक्षेपण का सारा काम इसरो की  कममर्शियल विंग ' एंट्रिक्स कॉरपोरेशन' संचालित करती है . इस सफ़लता से उसे और प्रोजेक्ट  मिलने की उम्मी‍द है.
Ø  भारत में सैटेलाइट्स की कमर्शियल लॉन्चिंग दुनियाँ में सबसे सस्ती पड़ती है। भारत के जरिए सैटेलाइट लॉन्च करना अमेरिका, चीन, जापान और यूरोप से कई गुना तक सस्ता पड़ता है।
Ø  विशेषज्ञों के अनुसार इस सफलता के बाद दुनियाँ भर में छोटी सैटेलाइट लॉन्च  कराने के मामले में इसरो पहली पसंद बन जाएगा, जिससे देश को आर्थिक तौर पर फायदा होगा. विदेशी सैटेलाइट इतनी कम कीमत में लॉन्च करने के कारण अमेरिकी प्राइवेट लॉन्च इंडस्ट्री के लिए इसरो सीधा प्रतिद्वंदी बन गया है.
Ø  लगभग 200 अरब ड़ालर का है ग्लोबल सैटेलाइट मार्केट  फ़िलहाल  इसमें अमेरिका की हिस्सेदारी 41% की है। जबकि भारत की हिस्सेदारी 4% से भी कम है। जो अब लगातार साल दर साल बढ़ रही है ।
Ø  भारत जल्द ही शुक्र और मंगल ग्रहों पर उतरने की तैयारी कर रहा है। इस मिशन को बजट-2017 में जगह दी गई है। इसरो का फंड भी 23% बढ़ाया है।
Ø  इसरो अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा की जेट प्रोपल्सन लेबोरेटरी के साथ संयुक्त रूप से दोहरी फ्रिक्वेंसी (एल एंड एस बैंड) वाली सिंथेटिक एपर्चर रडार (एसएआर) इमेजिंग सैटेलाइट 'नासा-इसरो सिंथेटिक एपर्चर सैटेलाइट' (निसार) के निर्माण पर काम कर रही है, जिसके 2021 तक पूरा होने की उम्मीद है.
Ø  इसरो ने स्वदेश निर्मित जीएसएलवी सीरीज के 2 से 2.5 टन वहन कैपेसिटी वाले एक और रॉकेट 'जीएसएलवी मार्क 2' को ग्लोबल मार्केट में बिक्री के लिए पेश किया. इसके अलावा स्वनिर्मित पीएसएलवी में खुद डेवलप किए गए मल्टीपल बर्न तकनीक का कमर्शियल इस्तेमाल किया.
Ø  इसरो ने दो नेविगेशन सैटेलाइटों की डिजाइन तैयार करने के लिए अल्फा डिजायन टेक्नोलॉजी लिमिटेड के साथ एक अनुबंध करने के साथ सेटेलाइट उत्पादन के नए फेज की शुरुआत की.


(लेखक शशांक द्विवेदी राजस्थान के मेवाड़ विश्वविद्यालय में उपनिदेशक हैं और  टेक्निकल टूडे पत्रिका के संपादक हैं)

Thursday, 7 April 2016

ब्रहमांड को समझने के खुले नए रास्ते

गुरूत्वाकर्षण तरंगों की खोज बड़ी उपलब्धि 
शशांक द्विवेदी

डिप्टी डायरेक्टर (रिसर्च), मेवाड़ यूनिवर्सिटी  
इस सदी की सबसे बड़ी खोज करते हुए अन्तराष्ट्रीय वैज्ञानिकों ने पहली बार गुरूत्वाकर्षण तरंगों की झलक पाने का दावा किया है। आइंस्टीन के सापेक्षता के सिद्धांत की खोज के ठीक 100 साल बाद वैज्ञानिकों ने बेहद अहम खोज किया है. ऐसा अनुमान है कि इस खोज के बाद  इंसान को ब्रहांड के चकित कर देने वाले रहस्यों के बारे में पता चल पायेगा । वैज्ञानिकों ने गुरुत्वाकर्षण तरंगों की खोज कर लिया है।  यह तरंगे प्रकाशीय तरंगों से पूरी तरह भिन्न है।  वैज्ञानिक इन तरंगों को ग्रेविटेशनल वेव्स भी कहते हैं।
 इन तरंगों के अस्तित्व के बारे में पिछली एक सदी से अटकलें लगाई जा रही थीं। इनके अस्तित्व के बारे में सर्वप्रथम सैद्धांतिक परिकल्पना प्रख्यात वैज्ञानि‍क अल्बर्ट आइंस्टीन ने की थी। आइंस्टीन ने 1916 में अपने  सामान्य सापेक्षता सिद्धांत का प्रतिपादन करते हुए इन तरंगों के होने की बात कही थी। वैज्ञानिकों के अनुसार लगभग एक अरब 30 करोड़ साल पहले अंतरिक्ष में दो ब्लैक होल टकराए थे। इन दो ब्लैक होल के मिलन से उठी विशाल तरंग अंतरिक्ष में फैलती हुई 14 सितम्बर 2015 को पृथ्वी तक आ पहुंची । अमरीका में दो भूमिगत अति संवेदी उपकरणों ने इस तरंग को महसूस किया।  इन तरंगों के अस्तित्व की निर्णायक रूप से पुष्टि करना सहज नहीं था। वैज्ञानिक पिछले पचास वर्षो से इन्हें खोजने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन इसके लिए उनके पास सटीक उपकरण नहीं थे। अत्यंत संवेदी उपकरण तैयार करने में उन्हें करीब 25 वर्ष लगे। इन्हीं उपकरणों की मदद से अंतरिक्ष में होने वाली असंगतियों को सूक्ष्मतम पैमाने को ढूंढ पाना संभव हो सका है।
 
वैज्ञानिकों को उमीद है कि इस खोज से दूर के सितारों, आकाश गंगाओं और ब्लैक होल सहित ब्रह्मांड के रहस्यों  के बारे में अहम जानकारी जुटाने में मदद मिल सकती है। आइंस्टीन ने कहा था कि अंतरिक्ष समय एक जाल की तरह है, जो किसी पिंड के भार से झुकता है, जबकि गुरूत्वाकर्षण तरंगें किसी तालाब में कंकड़ फेंकने से उठी लहरों की तरह है। गुरूत्वाकर्षण तरंगों का पता दो भूमिगत डिटेक्टरों की मदद से लगाया गया जो बेहद सूक्ष्म तरंगों को भी भांप लेने में सक्षम हैं। इस योजना को लेजर इंटरफेरोमीटर ग्रैवीटेशनल वेव ऑब्जर्वेटरी यानी LIGO नाम दिया गया है। वैज्ञानिकों को इन तरंगों से संबंधित आंकड़ों की पुष्टि में कई महीने लग गये। गुरूत्वाकर्षण तरंगें अंतरिक्ष के फैलाव का एक मापक हैं। ये विशाल पिंडों की गति के कारण होती हैं और प्रकाश की गति से चलती हैं, इन्हें कोई चीज रोक नहीं सकती। गुरुत्व तरंगों की तलाश के लिए चलाए जा रहे प्रोजेक्ट की लागत करीब एक अरब डॉलर है। यह सफल खोज दुनिया भर के वैज्ञानिकों की कड़ी मेहनत का नतीजा है।
ब्लैक होल क्या होतें है ?
अल्बर्ट आइंस्टीन ने भविष्यवाणी की थी कि दो ब्लैक होल के टकराने पर गुरुत्व तरंगें उत्पन्न होंगी, लेकिन अभी तक किसी ने भी इनका प्रायोगिक परीक्षण नहीं किया था।  अभी तक किसी को भी दो ब्लैक होल के बारे में प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं मिला था। एक बड़ा प्रश्न है कि ब्लैक होल क्या होते हैं ? ब्लैक होल अंतरिक्ष का वह क्षेत्र है जहां शक्तिशाली गुरुत्वाकर्षण के कारण वहां से प्रकाश बाहर नहीं निकल सकता। इसमें गुरुत्वाकर्षण बहुत ज्यादा इसलिए होता है, क्योंकि पदार्थ को बहुत छोटी जगह में समाहित होना पड़ता है। ऐसा तारे के नष्ट होने की स्थिति में होता है । चूंकि यहां से प्रकाश बाहर नहीं आ सकता, इसलिए लोग इन्हें नहीं देख सकते। ये अदृश्य होते हैं। किसी तारे के नष्ट होने पर ब्लैक होल बनता है। छोटे और बड़े दो तरह के ब्लैक होल हो सकते हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार सबसे छोटे ब्लैक होल एक अणु के बराबर छोटे होते हैं। ये ब्लैक होल छोटे जरुर होतें है लेकिन उनका द्रव्यमान एक पहाड़ के बराबर होता है। बड़े ब्लैक होल यानी स्टेलर का द्रव्यमान सूर्य के द्रव्यमान से 20 गुना तक ज्यादा होता है। सबसे बड़े ब्लैकहोल को सुपरमैसिव कहा जाता हैं, क्योंकि उनका द्रव्यमान 10 लाख सूर्यो से भी ज्यादा होता है। हमारी मिल्कीवे आकाशगंगा में सुपरमैसिव ब्लैक होल का नाम सैगिटेरियस है। इसका द्रव्यमान 40 लाख सूर्यो के बराबर है। बहुत बड़े यानी अत्यंत विशाल ब्लैक होल सभी आकाशगंगाओं के केंद्र में पाए जाते हैं। गुरुत्व तरंगों की खोज से पहले ब्लैक होल का पता लगाना मुश्किल था, क्योंकि ये प्रकाश उत्पन्न नहीं करते थे जबकि सभी खगोलीय भौतिकी उपकरण प्रकाश का इस्तेमाल करते हैं।  

दो ब्लैक होल की टक्कर
दो ब्लैक होल में से प्रत्येक ब्लैक होल का द्रव्यमान करीब 30 सूर्यो के बराबर था।  जैसे ही गुरुत्वाकर्षण की वजह से दोनों ब्लैक होल एक दूसरे के करीब आए, उन्होंने तेजी से एक दूसरे की परिक्रमा आरंभ कर दी। आपस में टकराने से पहले उन्होंने प्रकाश की गति हासिल कर ली थी। उनके उग्र विलय से गुरुत्व तरंगों के रूप में प्रचंड ऊर्जा निकली जो सितंबर में पृथ्वी पर पहुंची। एक अरब साल पहले निकली ऊर्जा पिछले साल सितंबर में पृथ्वी पर पहुंची है। इसी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि  अंतरिक्ष में यह टक्कर कितनी दूर हुई होगी . वैज्ञानिकों के अनुसार सितंबर में पृथ्वी पर पहुंचने वाली तरंग दो ब्लैक होल के विलय से पूर्व अंतिम क्षण में उत्पन्न हुई थी।  
भारतीय वैज्ञानिक भी इस अनुसंधान में शामिल रहें
भारतीय वैज्ञानिकों ने गुरूत्वाकर्षी तरंगों की खोज के लिए महत्वपूर्ण परियोजना में डाटा विश्लेषण सहित अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है । इंस्टिटयूट ऑफ प्लाजमा रिसर्च गांधीनगर, इंटर यूनिवर्सिटी सेंटर फॉर एस्ट्रोनामी एंड एस्ट्रोफिजिक्स पुणे और राजारमन सेंटर फॉर एडवांस्ड टेक्नोलाजी इंदौर सहित कई संस्थान इस परियोजना से जुड़े थे। गुरूत्वाकर्षी तरंगों की खोज की घोषणा आईयूसीएए पुणे और वाशिंगटन डीसी, अमेरिका में वैज्ञानिकों ने समानांतर रूप से की। भारत उन देशों में से भी एक है जहां गुरूत्वाकर्षण प्रयोगशाला स्थापित की जा रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और परमाणु उर्जा आयोग के अध्यक्ष अनिल काकोदकर ने गुरूत्वाकर्षी तरंगों की खोज में महत्वपूर्ण योगदान के लिए आज भारतीय वैज्ञानिकों की टीम को बधाई दी है।
खगोल विज्ञान के लिए बहुत बड़ी उपलब्धि  
यह सफल खोज दुनिया भर के वैज्ञानिकों की कड़ी मेहनत का नतीजा है जिनमें भारतीय वैज्ञानिक भी शामिल हैं। ब्रह्मांड को अभी तक हमने सिर्फ प्रकाश में देखा है, लेकिन वहां जो घटित हो रहा है उसका हम सिर्फ एक हिस्सा ही देख पा रहे हैं। यह खोज ब्रह्मांडीय  भौतिकी और खगोल विज्ञान के लिए एक बहुत बड़ी उपलब्धि है। और इससे ब्रहमांड को समझने के खुले नए रास्ते खुलेंगे ।

(लेखक शशांक द्विवेदी चितौड़गढ, राजस्थाइन में मेवाड़ यूनिवर्सिटी में डिप्टी डायरेक्टर (रिसर्च) हैं और  टेक्निकल टूडे पत्रिका के संपादक हैं। 12 सालों से विज्ञान विषय पर लिखते हुए विज्ञान और तकनीक पर केन्द्रित विज्ञानपीडिया डॉट कॉम के संचालक है  । एबीपी न्यूज द्वारा विज्ञान लेखन के लिए सर्वश्रेष्ठ ब्लॉगर का सम्मान हासिल कर चुके शशांक को विज्ञान संचार से जुड़ी देश की कई संस्थाओं ने भी राष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित किया है। वे देश के प्रतिष्िंचात समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में लगातार लिख रहे हैं।)


Wednesday, 21 October 2015

मंगल पर पानी होने के मायनें

नासा की बड़ी कामयाबी
मंगल ग्रह पर खारे पानी की ख़ोज
शशांक द्विवेदी
डिप्टी डायरेक्टर (रिसर्च), मेवाड़ यूनिवर्सिटी
अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में एक बड़ी कामयाबी हासिल करते हुए अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने मंगल ग्रह पर खारे पानी के मौसमी प्रवाह के पुख्ता सबूत इकट्ठा किए हैं नासा के वैज्ञानिकों ने बकायदा प्रेस कांफ्रेंस करके यह जानकारी दी पत्रिका 'नेचर जियोसाइंस' में प्रकाशित एक अध्ययन में वैज्ञानिकों ने कुछ ढलानों पर गर्मी के मौसम में बनी धारियों का अध्ययन किया, जिसके बारे में पहले माना जाता था कि वे खारे पानी के बहने से बनी होंगी नासा ने दावा किया है कि मंगल ग्रह पर नमकीन पानी के तरल रूप में होने की पुष्टि की है, पहले पानी के जमे हुए रूप में होने का अनुमान था नासा के मुताबिक काली धारी की शक्ल में पानी के होने का पता चला धारियां अप्रैल-मई में बनीं, गर्मी में ये धारियां अच्छे से दिखने लगीं और अगस्त के अंत तक गायब हो गईं  अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में मंगल ग्रह पर पानी होने की ख़ोज कई मायनों में बहुत महत्वपूर्ण है इससे मंगल पर जीवन होने की संभावनाओं के बारें में वैज्ञानिक ठीक से पता लगा सकेंगें एरिजोना यूनिवर्सिटी में पढ़ाई के दौरान स्कॉलर लुजेंद्र ओझा को पहली बार इस बात के सबूत मिले थे कि मंगल पर लिक्विड फॉर्म में पानी मौजूद है


पानी के पुख्ता सबूत –जीवन की संभावना !!
नासा ने अपने मुख्यालय में जेम्स वेब ऑडिटोरियम में एक प्रेस कांफ्रेस के दौरान इस खोज का पूरा विवरण भी दिया इस प्रेस कांफ्रेंस में अटलांटा के जॉर्जिया इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी से जुड़े लुजेंद्र ओझा भी मौजूद थे  युनिवर्सिटी ऑफ एरिजोना में प्लैनेटरी जियोलॉजी के प्रोफेसर अल्फ्रेड एस.मैकएवेन के मुताबिक, अध्ययन दल ने मंगल ग्रह पर पानीयुक्त अणुओं (परक्लोरेट) की पहचान की है मैकएवेन  के अनुसार "मंगल ग्रह पर खारे पानी का स्पष्ट तौर पर पता चला है."
लगभग 4.5 अरब साल पहले मंगल ग्रह पर अभी की तुलना में साढ़े छह गुना अधिक पानी और एक स्थूल वायुमंडल था अधिकांश पानी अंतरिक्ष में गायब हो गया और इसका कारण मंगल ग्रह पर पृथ्वी की तरह लंबे समय तक चुंबकीय क्षेत्र नहीं होना रहा नासा को प्राप्त मंगल की ताज़ा तस्वीरों में लाल ग्रह पर पानी के सबूत मिले हैं। ये तस्वीरें नासा ने अपने वेबसाइट पर सबके देखने के लिए जारी करीं। तस्वीर के विश्लेषण में सामने आया कि मंगल ग्रह की सतह पर पानी के बहने के निशान हैं और यह पानी अत्यंत खारा है। तरल पानी की मौजूदगी बताती है कि मंगल ग्रह पर जीवन खोजने की संभावना को और पुख़्ता करती हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि तस्वीरों के ज़रिए मंगल ग्रह पर देखी गई गहरी लकीरों को अब तरल पानी के सामयिक बहाव से जोड़कर देखा जा सकता है। उपग्रहों से मिला डाटा दर्शाता है कि चोटियों पर दिखने वाले ये लक्षण नमक की मौजूदगी से जुड़े हैं। मंगल ग्रह पर ऐसा नमक, पानी के जमने और वाष्प बनने के तापमान को भी बदल सकते हैं जिससे पानी ज़्यादा समय तक बह सकता है। मंगल पर पानी जमता तो पृथ्वी के समान ज़ीरो डिग्री सेल्सियस पर ही है, लेकिन कम दबाव के चलते 10 डिग्री सेल्सियस पर ही वाष्पित हो जाता है। पृथ्वी पर पानी 100 डिग्री सेल्सियस पर भाप बनता है। अमेरिकी स्पेस एजेंसी नासा को सैटेलाइट से मिले डाटा से पता चलता है कि चोटियों पर दिखने वाली ये डार्क लाइन्स पानी और नमक के कारण बने हैं। नासा के इस खुलासे से मंगल ग्रह पर जीवन होने की नई उम्मीद जगी है।
सॉल्ट पेरोक्लोरेट की वजह
मार्स रिकानाससेंस ऑर्बिटर स्पेसक्राफ्ट को मंगल पर लिक्विड फॉर्म में सॉल्ट पेरोक्लोट होने के सबूत मिले हैं। इनकी वजह से मंगल ग्रह की सतह और ढलानों पर लकीरें बनी हुई हैं। सॉल्ट पेरोक्लोरेट मंगल पर लिक्विड फॉर्म में मौजूद है। इसकी वजह से मंगल ग्रह की सतह और ढलानों पर लकीरें बनी हुई हैं। पेरोक्लोरेट नाम का यह नमक -70 डिग्री सेल्सियस तापमान में भी पानी को जमने से बचाता है।
लुजेंद्र की बात पर लगी मुहर
मंगल पर पानी मिलने की संभावना इसलिए जोर पकड़ी थी, क्योंकि नासा ने इस अनाउंसमेंट में लुजेंद्र ओझा नाम के पीएचडी स्टूडेंट के शामिल होने की बात कही थी। 2011 में ग्रैजुएट कर चुके 21 वर्षीय लुजेंद्र ने मंगल पर पानी के संभावित लक्षण खोजे हैं। बता दें कि वैज्ञानिकों को मंगल के ध्रुवों पर जमे हुए पानी की जानकारी पहले से है।
ओझा ने बताया था, भाग्यशाली दुर्घटना
एरिजोना यूनिवर्सिटी में पढ़ाई के दौरान ओझा को 'संयोगवश' पहली बार इस बात के सबूत मिले थे कि मंगल पर लिक्विड फॉर्म में पानी मौजूद है। प्लैनेट की सतह की तस्वीरों की स्टडी के बाद उन्हें इस बात के सबूत मिले थे। ओझा ने इस खोज को 'भाग्यशाली संयोग' बताते हुए कहा कि शुरुआत में उन्हें इसके बारे में समझ में नहीं आया। मंगल की सतह पर बने गड्ढों की कई साल तक स्टडी के बाद पता चला कि ये बहते पानी के कारण बने हैं।

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साल पहले मिले थे पोल पर बर्फ के सबूत
मंगल पर पानी के सबूत मिलना कोई नई बात नहीं है। करीब चार दशक पहले इस प्लैनेट के पोल पर बर्फ की खोज की गई थी। इसके अलावा, ग्रह की सतह पर रगड़ के निशान इस ओर इशारा करते हैं कि लाखों साल पहले यहां समुद्र और नदियां रही होंगी। हालांकि, इस ग्रह पर कम ग्रैविटी और वहां के वायुमंडल के आधार पर माना जाता है कि ग्रह पर मौजूद पानी स्पेस में इवैपेरेट (वाष्पित) हो गया होगा। प्लैनेट पर लिक्विड पानी की यह पहली खोज है।

भौगोलिक रूप से सक्रिय है मंगल ग्रह
नासा का नया डाटा दर्शाता है कि मंगल ग्रह अभी भी भौगोलिक रूप से सक्रिय है वैज्ञानिकों का मानना है कि मंगल ग्रह पर देखी गई ग़हरी लकीरों को अब तरल पानी के सामयिक बहाव से जोड़कर देखा जा सकता हैअब मंगल ग्रह पर भविष्य में बस्तियां बसाने की कल्पना अब केवल कथा कहानियों तक सिमट कर नहीं रहेगी क्योंकि मंगल ग्रह की सतह पर पानी तरल अवस्था में देखा गया है जो जीवन के लिए सबसे अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है। इसके साथ ही ऐसी संभावनाएं बढ़ गयी हैं कि मंगल पर जीवन मिल सकता है।

नासा के खगोलीय विज्ञान विभाग के निदेशक जिम ग्रीन के अनुसार मंगल एक सूखा और बंजर ग्रह नहीं है जैसा कि पहले सोचा जाता था।उन्होंने कहा, ‘कुछ निश्चित परिस्थितियों में पानी तरल अवस्था में मंगल पर पाया गया है।वैज्ञानिक लंबे समय से यह अनुमान लगाते आ रहे थे कि कभी लाल ग्रह पर जीवन था। नासा ने कहा है कि तरल अवस्था में जल मिलने से यह संभव है कि वहां इस समय जीवन हो.   इसके बारे में सर्वाधिक रोमांचित करने वाली बात यह है कि मंगल के बारे में हमारा प्राचीन नजरिया और मंगल पर जीवन की संभावना, मंगल पर पूर्व में जीवन के बारे में रसायनिक जीवाश्म की खोज के बारे में रही है। सच्चाई यह भी है कि मंगल पर तरल अवस्था में जल की मौजूदगी, भले ही यह बेहद खारा पानी हो,यह इस बात की संभावना पैदा करता है कि , यदि मंगल पर जीवन है तो हमें यह बताने के लिए एक रास्ता मिला है कि यह जीवन वहां कैसे बना रहा। अब इस नयी खोज ने इस सवाल को ठोस आकार दे दिया है कि क्या इस ग्रह पर जीवन है और अब हम इस सवाल का जवाब दे सकते हैं।  नासा के विज्ञान अभियान निदेशालय के सहायक प्रशासक और अंतरिक्ष वैज्ञानिक जॉन ग्रुंसफेल्ड के अनुसार मंगल पर जल की मौजूदगी से मंगल पर मानव अभियान भेजना आसान हो जाएगा जिसे वर्ष 2030 तक भेजने की नासा की योजना है। ग्रुंसफेल्ड ने कहा, ‘सतह पर जिंदा रहने के लिए वहां संसाधन हैं।उन्होंने कहा कि पानी महत्वपूर्ण है लेकिन ग्रह पर अन्य महत्वपूर्ण तत्व भी हैं जैसे कि नाइट्रोजन जिसका इस्तेमाल ग्रीनहाउस में पौधो को उगाने के लिए किया जा सकता है।
मंगल पर पानी की मौजूदगी की यह घोषणा ब्लॉकबस्टर फिल्म द मार्सियनके रिलीज होने से पूर्व हुई है। इस फिल्म में मैट डेमोन मंगल ग्रह पर करीब एक महीने बिना भोजन के मरने के लिए छोड़ दिए जाने के बाद खुद को जिंदा रखते हैं। वैज्ञानिकों का लंबे समय से मानना रहा है कि कभी लाल ग्रह पर पानी बहता था और इसी से वहां घाटियां और गहरे दर्रे बने लेकिन तीन अरब साल पहले जलवायु में आए बड़े बदलावों के चलते मंगल का सारा रूप बदल गया।
फिलहाल वैज्ञानिक समूह मंगल के बारे में अपनी समझ को क्रांतिकारी आकार दे रहे हैं। इस ग्रह की सतह की खोज में जुटे रोवर्स ने यह भी पाया है कि इसकी मिट्टी पहले लगाए गए अनुमानों से कहीं अधिक नम है। मंगल की सतह पर चार साल पहले ढलानों पर गहरे रंग की रेखाएं देखी गयी थीं। वैज्ञानिकों के पास इसके सबूत नहीं थे लेकिन बाद में पाया गया कि ये रेखाएं गर्मियों में बढ़ जाती थीं और उसके बाद सर्दियां आते आते गायब हो जाती थीं। अब पता चला है कि ये असल में पानी की धाराएं हैं। लेकिन अब इसके सावधानीपूर्वक अध्ययन और विश्लेषण के बाद वैज्ञानिक यह कहने को तैयार हैं कि ये रेखाएं वास्तव में जल धाराएं हैं।कुलमिलाकर नासा द्वारा मंगल पर खारे पानी का पता लगाने की घोषणा कई मायनों में बहुत महत्वपूर्ण है और इससे मंगल ग्रह के विषय में कई तरह की जानकारी इकट्टा करने में मदत मिलेगी
मंगल पर मानव युक्त अंतरिक्ष अभियान की संभावना बढ़ी
मंगल पर पानी की मौजूदगी की पुष्टि होने के बाद अब वहां मानव अभियान भेजने की संभावना बढ़ गई है और अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने इस पर तेजी से काम शुरू कर दिया है। मंगल पर मानव मिशन भेजने के लिए नासा ओरियनअंतरिक्ष यान बना रहा है जिसका पिछले साल परीक्षण किया गया था। यह यान अंतरिक्षयात्रियों को मंगल पर ले जाएगा और फिर सुरक्षित पृथ्वी पर लाएगा। ओरियन को दुनिया के सबसे शक्तिशाली रॉकेट स्पेस लांच सिस्टम के जरिये प्रक्षेपित किया जाएगा। पृथ्वी से मंगल तक की बेहद लंबी यात्रा के दौरान अंतरिक्ष यात्रियों को भजदा रहने के लिए पानी, हवा और अनुकूल तापमान की जरूरत होगी।
नासा के इंजीनियर इसके लिए विश्वसनीय तकनीक विकसित कर रहे हैं जो अंतरिक्ष यात्रियों को अंतरिक्ष में स्वस्थ रख सके। इसके लिए अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (आईएसएस) पर एनवायरमेंट कंट्रोल एंड लाइफ सपोर्ट सिस्टम विकसित किया गया है और ओरियन के लिए भी ऐसी ही प्रणाली बनायी जा रही है। यह प्रणाली कार्बन डाई ऑक्साइड को रिसाइकिल करके ऑक्सीजन में और मूत्र को पेयजल में बदल सकती है। आईएसएस में इंजीनियर और अंतरिक्ष यात्री लंबे अंतरिक्ष मिशनों के लिए एक फिल्टर प्रणाली का परीक्षण कर रहे हैं। इसमें अमीन आधारित एक रासायनिक यौगिक अंतरिक्ष के निर्वात के साथ मिलकर केबिन की हवा को सांस लेने लायक बनाने का प्रयोग चल रहा है।
मंगल की तरफ बढ़ रहे अंतरिक्ष यात्री और उनका यान पृथ्वी के वातावरण और चुम्बकीय क्षेत्र से बाहर होगा। ऐसे में उन्हें अंतरिक्ष में होने वाले विकिरण से बचाना भी एक बड़ी चुनौती होगी। नासा इस दिशा में काम कर रहा है। विकिरण से चालक दल की रक्षा के लिए हीट शील्ड यानी ऊष्मारोधी कवच के करीब एक अस्थायी शेल्टर होगा। पृथ्वी पर वापस लौटने के लिए ओरियन को ऊर्जा और प्रणोदक की जरूरत पड़ेगी। इस यान पर एक सर्विस मोड्यूल भी होगा ताकि जरूरत पडऩे पर इसकी दिशा ठीक की जा सके। यह मोड्यूल चालक दल को जरूरी ऊर्जा, ऊष्मा, पानी और हवा मुहैया कराएगा। नासा इसके लिए यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी ईएसए के साथ मिलकर काम कर रहा है।
पिछले साल जब मानवरहित ओरियनका परीक्षण किया गया था तो इसकी हीट शील्ड करीब 4000 डिग्री फारेनहाइट के तापमान पर बेअसर रही थी। यह ऊष्मा उस समय पैदा हुई थी जब यान 20 हजार मील प्रति घंटे की रफ्तार से पृथ्वी की तरफ बढ़ा था। ओरियन का ऊष्मारोधी कवच टाइटेनियम से बना है जिस पर कार्बन फाइबर की परत चढ़ी है।

इसकी मोटाई 1.6 इंच है जो ओरियन के पृथ्वी के वातावरण में प्रवेश करने के समय इसे जलने से बचाने का काम करेगी। ओरियन के पृथ्वी के वातावरण में प्रवेश करने के बाद इसकी रफ्तार को कम करना बहुत बड़ी चुनौती है। पृथ्वी के वातावरण में प्रवेश करने के बाद इसकी रफ्तार घटकर 325 मील प्रति घंटे रह जाएगी। इसे और कम करने के लिए 11 पैराशूटों का इस्तेमाल किया जाएगा। इनमें से तीन मुख्य पैराशूट तो इतने बड़े हैं कि इनसे फुटबाल का एक पूरा मैदान ढक जाएगा।