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Sunday, 17 November 2013

भारत रत्न वैज्ञानिक सीएनआर राव पर अखबारों में शशांक द्विवेदी के लेख

विज्ञान के क्षेत्र में अभूतपूर्व योगदान
देश के कई प्रमुख अखबारों में शशांक द्विवेदी के लेख 
 दैनिक जागरण ,लोकमत ,हरिभूमि ,दबंग दुनियाँ ,डेली न्यूज ,डीएनए,कल्पतरु एक्सप्रेस ,राज एक्सप्रेस ,मिड डे,आज  में लेख  
दैनिक जागरण 
केंद्र सरकार ने भारत का  सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न सचिन तेंदुलकर और प्रख्यात वैज्ञानिक प्रोफ़ेसर सीएनआर राव को देने का फैसला किया है .अपने अपने क्षेत्र में दोनों की सफलताएं असाधारण है .जहाँ सचिन ने बल्लेबाजी में शतकों का शतक लगाया है वहीं प्रोफ़ेसर राव ने अंतर्राष्ट्रीय शोध पत्रों के प्रकाशन में शतक लगाया है .दोनों की उपलब्धियाँ असाधारण है लेकिन मीडिया खासकर इलेक्ट्रानिक मीडिया सचिन की कवरेज तो बहुत कर रहा है लेकिन प्रोफ़ेसर राव के बारे में या उनके काम के बारे में कोई भी प्रोग्राम नहीं दिखाया जा रहा है . टीवी पर जहाँ सचिन पर घंटो कार्यक्रम दिखाए गये वहीं पर प्रोफ़ेसर राव पर दस मिनट का कार्यक्रम अधिकतर टीवी न्यूज चैनलों में दिखाया तक नहीं गया . विज्ञान जगत के किसी व्यक्ति को भारत के सबसे बड़े सम्मान की खबर पूरी तरह से उपेक्षित नजर आयी जबकि दोनों को ही भारत रत्न मिला है .विज्ञान की खबरों के प्रति टीवी चैनलों का ये दुराग्रह नया नहीं है ,ऐसा पहली बार नहीं हुआ है .याद करिये भारत के सबसे बड़े अंतरिक्ष अभियान मार्स मिशन को भी टीवी वालों ने ज्यादा तवज्जो नहीं दी थी . देश में विज्ञान ,अनुसंधान और शोध  से सम्बंधित खबरे  प्रिंट मीडिया में थोड़ी जगह बना रही है लेकिन इलेक्ट्रानिक मीडिया इससे कोसों दूर है प्रत्यक्ष को प्रमाण की आवश्यकता नहीं है आप खुद देखिये कि इस क्षेत्र में इलेक्ट्रानिक मीडिया कितना संजीदा है सिर्फ विज्ञान और तकनीक से जुड़ी सनसनीखेज खबरें ही खबरिया चैनलों में थोड़ी बहुत जगह बना पाती है ।खैर जो भी हो लेकिन आज वक्त है विलक्षण प्रतिभा के धनी वैज्ञानिक प्रोफ़ेसर सीएनआर राव को याद करने का जिनकी वजह से अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत का मान-सम्मान  बढ़ा है .

वैज्ञानिक शोध में शतक
भारत सरकार ने प्रख्यात वैज्ञानिक और प्रधानमंत्री की वैज्ञानिक सलाहकार परिषद के प्रमुख प्रोफेसर सीएनआर राव को देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न देने की घोषणा की है। सीएनआर राव सोलिड स्टेट और मैटीरियल केमिस्ट्री के क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ख्याति प्राप्त वैज्ञानिक हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उनके  1400 शोध पत्र और 45 किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं। दुनियाभर के तमाम प्रमुख वैज्ञानिक शोध संस्थानों ने राव के योगदानों का महत्वपूर्ण बताते हुए उन्हें अपने संस्थान की सदस्यता के साथ ही फेलोशिप भी दी है। उन्हें कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार भी मिल चुके हैं।
दबंग दुनियाँ 
वास्तव में जो ऊंचाई 40 वर्षीय तेंदुलकर ने क्रिकेट में हासिल किया है वहीं ऊंचाई प्रोफेसर चिंतामणि नागेश रामचंद्र राव (79) यानी सीएनआर राव ने भी शोध क्षेत्र में हासिल किया है । तेंदुलकर ने एक बल्लेबाज के रूप में 100 अंतरराष्ट्रीय शतक जड़े हैं तो राव भी पहले भारतीय हैं जो शोध कार्य के क्षेत्र में सौ के एच-इंडेक्स में पहुंचे हैं। राव ने इस साल अप्रैल में 100 के एच-इंडेक्स (शोधकर्ता की वैज्ञानिक उत्पादकता एवं प्रभाव का वर्णन करने का जरिया) तक पहुंचने वाले पहले भारतीय होने का गौरव हासिल किया। राव की इस उपलब्धि से पता चलता है कि उनके प्रकाशित शोध कार्यों का दायरा कितना व्यापक है। एच-इंडेक्स किसी वैज्ञानिक के प्रकाशित शोध पत्रों की सर्वाधिक संख्या है जिनमें से कम से कम प्रत्येक का कई बार संदर्भ के रूप में उल्लेख किया गया हो। राव की इस उपलब्धि का मतलब समझाते हुए कुछ वैज्ञानिक कहते हैं कि उन्होंने जो मुकाम हासिल किया, दरअसल वह सचिन के 100 शतकों की उपलब्धि से किसी भी मायने में कम नहीं है।
परमाणु शक्ति संपन्न होने और अंतरिक्ष में उपस्थिति दर्ज करा चुकने के बावजूद विज्ञान के क्षेत्र में हम अन्य देशों की तुलना में पीछे हैं। वैज्ञानिकों-इंजीनियरों की संख्या के अनुसार भारत का विश्व में तीसरा स्थान है, लेकिन वैज्ञानिक साहित्य में पश्चिमी वैज्ञानिकों का बोलबाला है ऐसे समय में प्रोफेसर राव ने पश्चिम के एकाधिकार को तोड़ते हुए शोध पत्रों के प्रकाशन के साथ साथ शोध और अनुसंधान के क्षेत्र में भारत का नाम रोशन किया । उनकी सफलता असाधारण है ।

प्रोफेसर सीएनआर राव का जन्म 30 जून 1934 को बेंगलूर में हुआ था। 1951 में मैसूर विश्वविद्यालय से स्नातक करने के बाद बीएचयू से मास्टर डिग्री ली। अमेरिकी पोडरू यूनिवर्सिटी से पीएचडी करने के बाद 1961 में मैसूर विश्वविद्यालय से डीएससी की डिग्री हासिल की। 1963 में आइआइटी कानपुर के रसायन विभाग से फैकल्टी के रूप में जुड़कर करियर की शुरुआत की । 1984-1994 के बीच इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस के निदेशक रहे। ऑक्सफोर्ड, कैंब्रिज समेत अनेक विश्वविद्यालयों में विजिटिंग प्रोफेसर रहे हैं। वो इंटरनेशनल सेंटर ऑफ मैटिरियल साइंस के भी निदेशक रहे। रसायन शास्त्र की गहरी जानकारी रखने वाले राव फिलहाल बंगलौर स्थित जवाहरलाल नेहरू सेंटर फॉर एडवांस्ड साइंटिफिक रिचर्स में कार्यरत हैं। डॉ. राव न सिर्फ न केवल बेहतरीन रसायनशास्त्री हैं बल्कि उन्होंने देश की वैज्ञानिक नीतियों को बनाने में भी अहम भूमिका निभाई है।
विलक्षण प्रतिभा के धनी है प्रोफेसर सीएनआर राव
हरिभूमि 
राव के एक वैज्ञानिक के रूप में पांच दशकों के करियर में 1400 से अधिक शोध पत्र प्रकाशित हो चुके हैं। दुनियाभर की प्रमुख वैज्ञानिक संस्थाएं, रसायन शास्त्र के क्षेत्र में उनकी मेधा का लोहा मानती हैं। वे  उन चुनिंदा वैज्ञानिकों में एक हैं जो दुनिया के सभी प्रमुख वैज्ञानिक अकादमी के सदस्य हैं। सीवी रमन, पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम के बाद राव इस सर्वोच्च सम्मान को पाने वाले तीसरे भारतीय वैज्ञानिक हैं। राव को दुनिया के 60 विश्वविद्यालयों से डाक्टरेट की मानद उपाधि मिल चुकी है और भारतीय वैज्ञानिक समुदाय में वह एक आइकन की तरह देखे जाते हैं। । किसी वैज्ञानिक  के मूल्यांकन के लिए सिर्फ उसका एच-इंडेक्स ही काफी नहीं है बल्कि उसके कितने शोध पत्रों को दृष्टांत के रूप में उल्लेख किया गया है यब भी बहुत मायने रखता है । इस मामले में भी  प्रोफेसर राव दुनिया के कुछेक चुनिंदा वैज्ञानिकों में ऐसे एकमात्र भारतीय हैं जिनके शोध पत्र का दृष्टांत के तौर पर वैज्ञानिकों ने लगभग 50 हजार बार के करीब उल्लेख किया है। 
प्रोफेसर राव ठोस अवस्था, संरचनात्मक और मैटेरियल रसायन के क्षेत्र में दुनिया के जाने-माने रसायन शास्त्री हैं । भारत सरकार ने उन्हें 1974 में पदमश्री और 1985 में पदमविभूषण से सम्मानित किया। वर्ष 2000 में रायल सोसायटी ने उन्हें ह्युजेज पुरस्कार से सम्मानित किया वर्ष 2004 में भारतीय विज्ञान पुरस्कार पाने वाले पहले भारतीय बने । भारत-चीनी विज्ञान सहयोग को बढ़ावा देने में अहम भूमिका निभाने के लिए उन्हें इसी साल जनवरी, 2013 में चीन के सर्वश्रेष्ठ विज्ञान पुरस्कार से सम्मानित किया गया । प्रोफेसर राव ने ट्रांजीशन मेटल ऑक्साइड सिस्टम, (मेटल-इंसुलेटर ट्रांजीशन, सीएमआर मैटेरियल, सुपरकंडक्टिविटी, मल्टीफेरोक्सि), हाइब्रिड मैटेरियल, नैनोट्यूब और ग्राफीन समेत नैनोमैटेरियल और हाइब्रिड मैटेरियल के क्षेत्र में काफी शोध और अनुसंधान कार्य किये । प्रोफेसर राव सॉलिड स्टेट और मैटेरियल केमिस्ट्री में अपनी विशेषज्ञता की वजह से जाने जाते हैं। उन्होंने पदार्थ के गुणों और उनकी आणविक संरचना के बीच बुनियादी समझ विकसित करने में अहम भूमिका निभाई है।
लोकमत समाचर 
भारत को अंतरिक्ष विज्ञान में आकाश की अनंत बुलंदी पर पहुँचाने वाले मंगल अभियान में भी उन्होंने अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया । विज्ञान के क्षेत्र में भारत की नीतियों को गढ़ने में अहम भूमिका निभाने वाले राव, प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की वैज्ञानिक सलाहकार परिषद के भी सदस्य थे। इसके बाद उन्होंने प्रधानमंत्री राजीव गांधी, एचडी दैवेगोड़ा, और आईके गुजराल के कार्यकाल में भी परिषद से जुड़े रहें । राव की मेधा और लगन का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उनके साथ काम करने वाले अधिकतर वैज्ञानिक सेवानिवृत्त हो चुके हैं, लेकिन वे 79 साल की उम्र में भी सक्रिय हैं और प्रधानमंत्री डाक्टर मनमोहन सिंह की वैज्ञानिक सलाहकार परिषद में अध्यक्ष के तौर पर अपनी सेवाएं दे रहे हैं । 
दुनिया में अब वैज्ञानिक और तकनीकी ज्ञान आर्थिक स्त्रोत के उपकरण बन गए हैं। किसी भी देश की वैज्ञानिक और तकनीकी क्षमता उसकी आर्थिक प्रगति का पैमाना बन चुकी है। दुनिया के ज्यादातर विकसित देश वैज्ञानिक शोध को बढ़ावा देने के लिए अपने रिसर्च फंड का 30 प्रतिशत तक यूनिवर्सिटीज को देते हैं, मगर अपने देश में यह प्रतिशत सिर्फ छह है। उस पर ज्यादातर यूनिवर्सिटीज के अंदरूनी हालात ऐसे हो गए हैं कि वहां शोध के लिए स्पेस काफी कम रह गया है। वैज्ञानिक शोध पत्रों के प्रकाशन में भी भारत की स्तिथि बहुत अच्छी नहीं है । इसको सुधारने के लिए सरकार को तुरंत ध्यान देना होगा । देश में प्रोफेसर सीएनआर राव जैसे कई वैज्ञानिक पैदा करने के लिए इस शोध के लिए नया माहौल और समुचित फंड देने की जरुरत है ।
कुलमिलाकर विज्ञान के क्षेत्र में प्रोफेसर सीएनआर राव का योगदान अभूतपूर्व है और उनको देश का सर्वोच्च सम्मान  भारत रत्न देने के फैसले से देश में वैज्ञानिक शोध और अनुसंधान को प्रोत्साहन भी मिलेगा । इससे देश में वैज्ञानिक चेतना का माहौल बनाने में भी मदत मिलेगी ।
article link
http://www.jagran.com/editorial/apnibaat-pioneers-of-research-10872828.html

Friday, 8 November 2013

विज्ञान पत्रकारिता से गायब है विशेषज्ञ लेखन

मीडिया में मंगल अभियान की स्तरीय कवरेज ना होने पर आशीष कुमार के विचार 

हिंदी पत्रकारिता में विशेषज्ञ लेखन की स्थिति सोचनीय है। हिंदी प्रिंट मीडिया हो या इलेक्ट्रानिक मीडिया दोनों में ही विशेषज्ञ पत्रकारों की संख्या नगण्य है। विज्ञान, रक्षा, पर्यावरण, विदेश नीति, अंतर्राष्ट्रीय घटनाक्रम और आर्थिक मामलों का कवरेज करते समय अक्सर गुणवत्ता में कमी देखने को मिलती है। भारत के मंगल अभियान कवरेज के दौरान भी हिंदी अखबारों और न्यूज चैनलों में विज्ञान पत्रकारिता के संबंध में विशेषज्ञता की कमी दिखाई दी।          अधिकांश हिंदी न्यूज चैनल और अखबारों ने मंगल अभियान को केवल खबरों तक ही सीमित रखा। अखबारों में छपे विशेष लेखनों में भी गुणवत्ता की कमी दिखाई दी। समाचार चैनलों पर इंटरनेट से चुराए गए विदेशी स्पेस एजेंसियों के ग्राफिक्स व एनिमेशन दिखाए जा रहे थे। कुछ पर तो ग्राफिक्स भी घटना का गलत चित्रण कर रहे थे, जिसमें मंगल मिशन सेटेलाइट और उपकरणों को मंगल की सतह पर उतरता हुए दिखाया जा रहा था। जबकि भेजे गए उपकरण केवल मंगल की परिक्रमा करेंगे। किसी ने भी गहराई से तकनीकी पक्षों के बारे में बात नहीं की। कोई भारत को विश्व में तीसरा, कोई चौथा व कोई पांचवा देश बता रहा था, जिसने मंगल ग्रह की ओर अपना मानव रहित अंतरिक्ष यान भेजा है। समाचार चैनलों के तथ्यों में भी भिन्नता देखने को मिल रही थी। मंगल यान की लांचिंग के बाद किसी ने कहा कि भारत को अपना मंगल यान पीएसएलवी से न भेजकर जीएसएलवी के जरिए भेजना चाहिए था, तो किसी भी समाचार चैनल ने पीएसएलवी व जीएसएलवी के तकनीकी पक्षों के अंतर को विशेषज्ञों के जरिए स्पष्ट कराने की कोशिश नहीं की थी। आम हिंदी भाषी दर्शक व पाठक भी देश को गौरवान्वित करने वाले इस घटनाक्रम के संबंध में गहराई से जानना चाहता था, लेकिन सभी को केवल उथली सूचना ही मिलीं। वहीं, एक चैनल पर एनएसी के पूर्व सदस्य हर्ष मंदर कह रहे थे कि भारत ने बेवजह मंगल मिशन पर 480 करोड़ रुपये खर्च किए हैं। देश को मंगल पर जाने की जगह गरीबों पर ध्यान देना चाहिए, उनकी गरीबी दूर करनी चाहिए। उनके समर्थन में एकाध पत्रकार ने भी हामी भरी। हर्ष मंदर व उनको समर्थन करने वाले पत्रकारों को पता होना चाहिए की अंतरिक्ष के क्षेत्र में काम करने वाली इसरो जैसी संस्था कृषि, मौसम, पर्यावरण, संचार आदि के क्षेत्र में भी काम करती है। एक क्षेत्र की सूचनाएं दूसरे क्षेत्र में काम आती हैं। मौसम की पूर्व घोषणा कृषि के पैदावार के लिए सहायक होती है। मौसम की पूर्व घोषणा व संचार तकनीक के सहारे ही उड़ीसा में आए फेलिन से हजारों लोगों के जान माल को बचाया जा सका। हर्ष मंदर के आधारहीन तर्कों का मीडिया में आना और नगण्य ही सही, समर्थन मिलना मेन स्ट्रीम इलेक्ट्रानिक मीडिया में विज्ञान के विशेषज्ञ पत्रकारों की घोर कमी को दर्शाता है।        
विशेषज्ञता की कमी केवल विज्ञान पत्रकारिता के मामले में ही नहीं है बल्कि रक्षा, आर्थिक, पर्यावरण मसले पर भी यह बराबर लागू होती है। पाकिस्तान व चीन के संबंध में युद्ध उन्मादी पत्रकारिता जैसा वातावरण दिखने को मिलता है। वहीं, आर्थिक पत्रकारिता के मसले पर हिंदी समाचार चैनलों व अखबारों का लगभग समान हाल है। विशुध्द आर्थिक पत्रकारिता करने वाले अंग्रेजी के छह समाचार पत्र निकलते हैं वहीं हिंदी का केवल एक। भारत में छह बिजनेस चैनल हैं, जिसमें चार अंग्रेजी के व दो हिंदी के। हिंदी के बिजनेस चैनलों व अखबारों की सामग्री की गुणवत्ता में या तो कमी दिखाई देगी या अंग्रेजी से उधार ली हुई।       ऐसा नहीं है कि विशेषज्ञता से परिपूर्ण सामग्री चाहने वाले पाठकों की कमी है। किसी भी घटना व मुद्दे पर गहराई से जानने की इच्छा रखने वाला एक बड़ा पाठक वर्ग है, लेकिन उसे उस स्तर की सामग्री नहीं मिल पाती है। इस मामले में समाचार पत्र भी गंभीर नहीं दिखाई देते हैं। सबसे बड़ी बात उनके स्टाफ में विशेषज्ञ पत्रकारों का कमी होना है। बड़ी-बड़ी समाचार संस्थाओं में भी भर्ती प्रक्रिया के दौरान इस ओर ध्यान दिया नहीं दिया जाता है। उनकी नजर में journalist  एक generalist होता है। समय-समय बीट के अनुसार संबंधित पत्रकारों को ट्रेनिंग के लिए भी कोई विशेष व्यवस्था नहीं होती है। एक-एक करोड़ का सर्कुलेशन बताने वाले अखबारों का भी विशेषज्ञ लेखन के मामले में कमोबेश यही हाल है। उनके यहां भी विशेषज्ञ पत्रकारों का घोर अभाव है। मैंनेजमेंट भी इस ओर कोई ध्यान नहीं देता है, उनके अनुसार वे पत्रकारिता में नहीं, बल्कि किसी भा तरह मुनाफा देने वाले खबरों के धंधे में हैं। (ref-bhadas.com) 

Saturday, 9 June 2012

विज्ञान पत्रकारिता को व्यवहारिक और रोजगारपरक बनाना होगा

वैज्ञानिक दृष्टिकोण तथा चेतना जगाने में संचार माध्यमों की भूमिका अन्‍तर्राष्‍ट्रीय सम्मेलन  में  दिया गया व्याख्यान और आलेख 


शशांक द्विवेदी

अन्‍तर्राष्‍ट्रीय सम्मेलन में व्याख्यान देते हुए श्री शशांक द्विवेदी 
भारत में हिंदी में विज्ञान पत्रकारिता का जिक्र होता है तो ऐसा लगता है कि अभी भी वह शैशव अवस्था में है ,हम अभी भी इसे आम आदमी से ठीक तरह से नहीं जोड़ पाये हैं । पिछले कुछ समय से  देश में हिंदी में विज्ञान संचार के लिए  कई सरकारी और गैर सरकारी संस्थाओ द्वारा अथक प्रयास किया जा रहा है ,ये प्रयास सकारात्मक दिशा में है लेकिन ऐसा लगता है कि हम अभी तक विज्ञान को आम आदमी की मातृभाषा से नहीं जोड़ पाए है । इसकी सबसे बड़ी वजह शायद हिंदी में विज्ञान पत्रकारिता रोजी और रोटी से नहीं जुड़ पाया है । इसमें कैरियर की दृष्टि से भी पूर्णकालिक रूप में बहुत ज्यादा अवसर नहीं है । देश के अधिकांश हिंदी अखबारों और इलेक्ट्रानिक चौनलों में विज्ञान पत्रकार नहीं है । न ही इन माध्यमों में निकट भविष्य में विज्ञान पत्रकारों के लिए कोई संभावनाएं दिखती है । देश में इस समय जितना भी हिंदी में विज्ञान लेखन और पत्रकारिता हो रही है अधिकांशतया पार्ट टाइम हो रही है । वही लोग ज्यादातर विज्ञान लेखन कर रहें है हिंदी के उत्थान के लिए सरकारी विभागों से जुड़े है या वो लोग जो पद और पैसे से सम्रद्धिशाली है । कहने का मतलब आर्थिक रूप से संपन्न व्यक्ति ही हिंदी में विज्ञान लेखन कर रहें है । स्वतंत्र और पूर्णकालिक रूप से हिंदी में विज्ञान लेखन के लिए बहुत कम अवसर है । इसलिए हिंदी में विज्ञान संचार या पत्रकारिता को सबसे पहले  आकर्षक रोजगार से जोड़ना पड़ेगा तभी यह उन्नत दिशा में पहुचेगा ।
देश में विज्ञान ,अनुसंधान और शोध  से सम्बंधित खबरे  प्रिंट मीडिया में थोड़ी जगह बना रही है लेकिन इलेक्ट्रानिक मीडिया इससे कोसों दूर है । प्रत्यक्ष को प्रमाण की आवश्यकता नहीं है आप खुद देखिये कि इस क्षेत्र में इलेक्ट्रानिक मीडिया कितना संजीदा है । सिर्फ विज्ञान और तकनीक से जुड़ी सनसनीखेज खबरें ही खबरिया चैनलों में जगह बना पाती है । जबकि देश की प्रगति और आर्थिक सुरक्षा से जुड़ा यह क्षेत्र देश में पूरी तरह से उपेक्षित है । मै पिछले कई सालों से देश के प्रमुख अखबारों के लिए विज्ञान और तकनीकी विषयों पर स्तंभ लिख रहा हूँ लेकिन इस दौरान मैंने यह महसूस किया कि मीडिया में अधिकतर विज्ञान ,शोध और अनुसंधान से जुड़ी सनसनीखेज खबरें ही दिखाई जाती है  
वैज्ञानिक जागरूकता और जन सशक्तीकरण के परिप्रेक्ष्य में हिंदी में विज्ञान पत्रकारिता की महत्वरपूर्ण भूमिका हो सकती है। लेकिन हम विज्ञान से जुड़े व्यक्तित और वैज्ञानिकों को ही विज्ञान के क्षेत्र में कुशल मानते हैं। इसलिए जो पत्रकार विज्ञान पत्रकारिता के क्षेत्र में उल्लेखनीय काम कर भी रहे है तो भी उनकी पत्रकारिता को कमोबेश कम विश्वसनीय ही माना जाता है।कई ऐसे विषय हैं जिन्हें  खोजी विज्ञान पत्रकारिता का हिस्सा बनाना चाहिए। लेकिन ज्याहदातर विज्ञान पत्रकार इन मुद्दों पर इसलिए कलम नहीं चलाते क्योंकि इन्हें  जब तक वैज्ञानिक संस्थाओं से जुड़े वैज्ञानिक मान्यता नहीं देते तब तक इन्हें  प्रमाणिक नहीं माना जाता। जबकि हिंदी में विज्ञान संचार और स्थानीय स्तर पर देशी वैज्ञानिकों की जानकारी देने वाले लेखन का सामने आना जरूरी है। अमेरिका में दस परिवारों में से एक परिवार जरूर अपनी भाषा में वैज्ञानिक पत्रिका पढ़ता है। अमेरिका में वैज्ञानिक लेख नहीं लिखते। विज्ञान पत्रकार ही लेख लिखते हैं। हमारे देश में  वैज्ञानिक पत्रकारिकता अभी भी शैशव अवस्था में है ,इसे ज्यादा प्रोत्साहन की जरुरत है तभी स्वस्थ व जनहितकारी विज्ञान पत्रकारिता हर माध्यम से आम लोगों के सामने आएगी।
विज्ञान पत्रकारिता का उद्देश्य लोगों को विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में होने वाली गतिविधियों और खोजों की समग्र जानकारी प्रदान करना है। अनेक ऐसे वैज्ञानिक और वैज्ञानिक खोजें, पद्धतियां, पारंपरिक ज्ञान और नवाचार के प्रयोग तब अज्ञात रह जाते हैं, जब उन्हेंन अखबारों में जगह अथवा कोई मंच नहीं मिलता। ऐसे लोगों में ग्रामीण क्षेत्रों में स्थाानीय संसाधनों से आविष्काारों में लगे लोगों को लिया जा सकता है। जैसा कि हाल ही में अमेरिकी फोर्ब्सं पत्रिका ने सात ग्रामीण भारतीय वैज्ञानिकों की जानकारी दी है। इन अविष्कारकों ने ग्रामीण पृष्ठभूमि से होने के बावजूद ऐसी तकनीकें ईजाद की हैं जिससे देश भर में लोगों को जीवन में बदलाव के अवसर मिले हैं। जबकि इनमें से ज्यांदातर लोग ने प्राथमिक शिक्षा प्राप्त  भी नहीं हैं। इनके नामों का चयन आईआईएम अहमदाबाद के प्राध्यामपक और भारत में हनीबी नेटवर्क के संचालक अनिल गुप्ता ने फोर्ब्स पत्रिका के लिए किया था। वाकई खोज परख कर विज्ञान पत्रकारिता के माध्युम से सामने लाई गई ये जानकारियां बेहद महत्वपूर्ण हैं। रोजमर्रा की जिंदगी में विज्ञान और तकनीकी विषयों से संबंधित जानकारी निर्णय लेने की क्षमता के विकास में भी जिज्ञासु आविष्कारकों के लिए मददगार साबित हो सकती है।
व्याख्यान की मुद्रा में शशांक द्विवेदी
विज्ञान के क्षेत्र में जो भी भला या बुरा, उचित या अनुचित हो रहा है, वह सामने आना चाहिए। तभी विज्ञान पत्रकारिता का सर्वांगीण रूप स्पष्ट होगा। वह केवल विज्ञान और वैज्ञानिकों की स्तुति भर नहीं रह जाएगी। बल्कि यह सजग प्रहरी और जागरूक सलाहकार के रूप में विकसित हो सकेगी। ऐसा तब हो सकता है जब देश के वैज्ञानिक अपने कार्यकलापों को निष्पक्षता से जांचें, परखें तथा अपनी आलोचना व विश्लेषण स्वयं करें। इसके साथ ही देश में विज्ञान संचारकों का ऐसा वर्ग विकसित हो, जो विज्ञान पत्रकारिता को व्यवसाय के रूप में अपनाए। यह विज्ञान पत्रकार वर्ग ही प्रयोगशाला में घुसकर वैज्ञानिक अनुसंधान कार्य की खोज कर सकता है और उसे संचार माध्यमों के द्वारा आम आदमियों तक पहुंचा सकता है। विज्ञान पत्रकारिता सुदृढ़ हो, इसके लिए जरूरी है कि समाचार पत्र और समाचार चैनल विज्ञान की खोजी पत्रकारिता के लिए अलग से संवाददाताओं की तैनाती करें और विज्ञान खबरों के लिए जगह दें। यहां यह भी जरूरी हो जाता है कि खोजी पत्रकारिता का मतलब सिर्फ गड़बड़ियों की खोज खबर करके उसे प्रकाशित करना ही नहीं है बल्कि  विज्ञान ने जो नए अनुसंधान किए हैं और जो अज्ञात हैं, उन्हें भी सामने लाना है। दूसरी ओर विज्ञान के क्षेत्र में भी पारदर्शिता, विज्ञान पत्रकारिता द्वारा लाई जा सकती है। इसकी खोज करने पर ही इनके कारणों का पता चल सकता है और उनके समाधान के उपाय ढूंढे़ जा सकते हैं। हमारे देश में अनेक प्रकार का पारंपरिक ज्ञान-विज्ञान और प्रौद्योगिकी का विशाल भंडार है। अनेक ऐसी जानकारियां हैं जो स्थाानीय स्तार पर तो प्रचलित हैं, लेकिन इन जानकारियों को भी लोगों के सामने लाया जा सकता है। यह ध्ये्य विज्ञान पत्रकार का होना चाहिए।
विज्ञान के क्षेत्र में खोजी पत्रकारिता लगभग नगण्य है, परंतु स्वस्थ  विज्ञान पत्रकारिता के लिए आज इसकी जरूरत है। आमतौर पर विज्ञान पत्रिकाओं के अधिकांश लेखक वैज्ञानिक होते हैं और वे विज्ञान से रोजगार के रूप में जुडे़ हुए हैं। जाहिर है कि इन वैज्ञानिकों द्वारा लिखे गए लेखों से यह बात तो उभर कर आती है कि अमुक विषय क्या  है ? इसकी उपलब्धियां क्या हैं या हमारे देश में इस विषय पर क्या हो रहा है ? परंतु जब उस विषय पर हो रही खोज या खोज करने वालों के तौर तरीकों का प्रश्न आता है, तो वैज्ञानिक लेखक मौन रह जाता है और आलोचना से बचता है। अलबत्ता लेख केवल विषयनिष्ठक रह जाता है। निष्पक्षता का उसमें प्रायः अभाव रहता है। ऐसे लेख केवल विषय की प्रशंसा भर करते हैं। पाठक इस एकपक्षीय प्रस्तुतिकरण से संतुष्ट नहीं हो पाता। वह सिक्के का दूसरा पहलू भी जानना चाहता है। पाठक आविष्कार की मनुष्य के लिए उपयोगिता क्या है, यह भी परखने की ललक रखता है। इसलिए वैज्ञानिकों द्वारा लिखे गए एक पक्षीय लेख उसकी जिज्ञासा का शमण नहीं करते।
आज हमारे देश में जो विज्ञान लेखन हो रहा है वह अधिकतर विभिन्न् विषयों के विवरणात्मक पहलुओं और उनकी प्रशंसा तक ही सीमित है। हमारे देश में अधिकतर विज्ञान लेखन और विज्ञान पत्रिकाएं राज्य पोषित अनुदान से प्रकाशित हो रहीं हैं, जिनसे यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि विज्ञान का आलोचनात्मक पहलू प्रस्तुत करें। अधिकतर शोध कार्य भी सरकारी प्रयोगशालाओं में किया जा रहा है। वैज्ञानिक इन प्रयोगशालाओं में क्या कुछ कर रहे हैं, यह जानकारी भी इन पत्रिकाओं में नहीं होती है। बल्क् इन पत्रिकाओं में मंत्रियों, संपादकों और क्षेत्रीय सांसदों व विधायकों के ऐसे प्रशंसा पत्र बेवजह पृष्ठ  घेरे होते हैं, जिन्हें  विज्ञान की जानकारी देकर उपयोगी बनाया जा सकता है। इसलिए इन विज्ञान पत्रिकाओं में विज्ञान के उन तीन सोपान परिलक्षित नहीं होते है जो खोज, शोध और बोध से जुड़े होने चाहिए।
आधुनिक परिदृश्य में  विज्ञान और प्रौद्योगिकी के विकास के अनुरूप हिन्दी भाषा के विकास में नए आयाम जोड़ने की आवश्यकता है । जिससे सुगम एवं बोधगम्य तकनीकी लेखन की शैली का तीव्र गति से अधिकाधिक विकास हो सके, जन-सामान्य के लिए विज्ञान और प्रौद्योगिकी को सुबोध और सम्प्रेषणीय बनाया जा सके, उसमें जिज्ञासा की प्रवृत्ति स्वाभाविक रूप से उत्प्रेरित की जा सके। विश्लेषणात्मक चिंतन शक्ति का विकास किया जा सके और प्रकृति की प्रक्रियाओं के बीच समन्वय स्थापित करने की दृष्टि पैदा की जा सके। साथ ही, बच्चों और किशोरों की कल्पनाशीलता को आकर्षित किया जा सके तथा वयस्कों को रोचक ढंग से समुचित ज्ञान उपलब्ध हो सके।
कुछ लोग खोजी पत्रकारिता को भ्रमवश सनसनीखेज पत्रकारिता से जोड़ते हैं। जबकि दोनों परस्पोर भिन्न है। संतुलित विज्ञान पत्रकारिता के लिए खोजी विज्ञान पत्रकारिता का भरपूर विकास किया जाना जरूरी है। यदि हम अपने चारों ओर नजर दौड़ाकर देखें तो हमारे आसपास ऐसे बहुत से विज्ञान विषयक सूत्र बिखरे मिलेंगे, जिन्हें यदि हम पकड़ने की दृष्टि हासिल कर लें तो एक सफल विज्ञान पत्रकार बन सकते हैं। दरअसल, वैज्ञानिक दृष्टिकोण का महत्वपूर्ण पहलू है खोज करना, जांच करना और उपलब्ध् जानकारियों के माध्यट से अज्ञात जानकारियों की तह में जाकर विज्ञान सम्मत तथ्यों  को ढूंढ़ निकालना। फिर यदि हम इन्हें कल्पनाशील शैली में प्रस्तुत करने में दक्षता प्राप्त कर लेते हैं तो विज्ञान पत्रकारिता के लिए यह एक उपलब्धि होगी।
हालांकि हमारे देश में केवल स्वास्थ्य संबंधी पत्रिकाएं एवं स्तंभ पढ़ने की जिज्ञासा पाठक में सबसे ज्यादा है। क्योंाकि स्वास्थ्य जीवन की लंबी उम्र से जुड़ा है। यदि आज चिकित्सा विज्ञान इतनी उपचार विधियों व दवाओं के आविष्कार में सक्षम नहीं हुआ होता तो मनुष्य का औसत जीवन 40 की उम्र पार नहीं कर पाता। 1900 में एक अमेरिकन व्यक्ति की औसत आयु 30 वर्ष थी जो आज बढ़कर 80 साल हो गई है।
आम तौर पर विज्ञान लेखन मूलतः ऐसे विषयों के इर्द-गिर्द ही घूमता रहता है, जो आम जनता को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित नहीं करते। विज्ञान को आम जनता के सरोकारों से जोड़ने की जरुरत है, और विज्ञान लेखक इस दायित्व को ज्यादा बेहतर ढंग से निभा सकते हैं। नई पीढी और बच्चों में विज्ञान के प्रति जागरूकता पैदा करने के लिए इसे जटिल व्याख्याओं के बंधन से मुक्त करना होगा। इसी पीढी के हाथों में ही न सिर्फ विज्ञान लेखन बल्कि विज्ञान जगत का भी भविष्य है। इसलिए इन्हें स्वयं से जोड़ने के लिए इसमें लचीलापन लाना होगा।
हिंदी में विज्ञान पत्रकारिता में भाषागत समस्या बहुत आती है । सामान्यतया विषय विशेषज्ञों की हिन्दी अथवा अन्य भारतीय भाषाओं में लेखन के प्रति रुचि नहीं है। इसके प्रमुख चार कारण हैं। भाषागत कठिनाई , वैज्ञानिक जगत की घोर उपेक्षा ,हिन्दी में लिखे आलेखों शोधपत्रों को प्रस्तुत करने के लिए मंचों का अभाव प्रकाशन की असुविधा।  इन चारो समस्यायों के समाधान पर हमें अधिक ध्यान देने की जरुरत है । हिन्दी में विज्ञान विषयक शोधपत्रों आलेखों को प्रस्तुत करने के लिए अंग्रेजी के समकक्ष विज्ञान मंचों की स्थापना की आवश्यकता है क्योंकि ज्यादातर ऐसे राष्ट्रीय मंचों का अभाव है जो राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय सेमीनार सम्मेलन आयोजित कर सकें और विज्ञान के बहुपृष्ठी चित्रात्मक शोधपत्रों का संकलन प्रकाशित कर सकें।
अकादमिक संस्थाओं के माध्यम से भी विज्ञान लेखन को दृढ़ता देने के प्रयास सुनिश्चित करने होंगे। किसी शोधार्थी का मूल्यांकन सिर्फ उसके शोध प्रबंध से प्रकाशित शोधपत्रों से ही नहीं, बल्कि विज्ञान को आम जनता के बीच पंहुचाने में सफलता के पैमाने पर रखकर भी होना चाहिए । इस दिशा में शोध निर्देशकों को भी सकारात्मक भूमिका निभाने को प्रेरित किया जाना चाहिए । अकादमिक जगत की सक्रियता विज्ञान लेखन की स्थिरता सुनिश्चित करने में अत्यंत ही महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। निष्कर्षतःविज्ञान लेखन की दिशा विज्ञान को प्रयोगशालाओं तथा अकादमिक जकड़न से मुक्ति दिलाने और आम जन तक सुलभ बनाने की ओर ही होनी चाहिए ।
अर्थव्यवस्था के भूमंडलीकरण और उदारीकरण के दबाव के कारण आज प्रौद्योगिकी की आवश्यकता बढ़ गई है। वास्तव में प्रौद्योगिकीय गतिविधियों को बनाए रखने के लिए तथा सामाजिक-आर्थिक चुनौतियों का सामना करने के लिए भारतीय जन मानस में वैज्ञानिक चेतना का विकास करना अनिवार्य है। देश की सम्पर्क भाषा हिन्दी में वैज्ञानिक तथा प्रौद्योगिकीय ज्ञान के सतत विकास और प्रसार के लिए हम सब को आगे आना होगा । एक व्यक्ति और एक संस्था से ही यह काम सफल नहीं हो सकता है इसमें हम सब की सामूहिक और सार्थक  भागीदारी की जरुरत है ।
अक्सर यह देखने में आता है कि हमारे समाचार पत्र-पत्रिकाओं में ज्यातदातर रचनाएं, विदेशों से आने वाली फीचर प्रचार सामग्री पर आधारित होती हैं। एक तरह से इनके प्रकाशन में कोई बुराई नहीं है। लेकिन यदि इसके साथ ही हम देश में विकसित वैज्ञानिक जानकारियों, तकनीकों और वैज्ञानिक गतिविधियों को प्राथमिकता दें तो यह ज्यादा अच्छा  होगा। इसके लिए आवश्यरक है कि विज्ञान लेखक और पत्रकार स्वयं इस प्रकार की जानकारियां एकत्र करें। इस प्रकार जब वे प्रयोगशालाओं, विज्ञानकर्मियों, विज्ञान नीति-निर्माताओं के संपर्क में आएंगे तो उन्हें  कुछ ऐसे सूत्र हाथ लगेंगे जिनको लेकर विज्ञान पत्रकारिता की राह पर वे आगे बढ़ सकते है। लेख की निष्परक्षता के लिए पत्रकार को जरूरी है कि वह दो वैज्ञानिकों से संबंधित विषय की जानकारी हासिल करे और किसी भी प्रकार के पूर्वग्रह से मुक्त रहे। तभी स्वस्थ व जनहितकारी विज्ञान पत्रकारिता सामनें आयेगी । कुल मिलकर देश में हिंदी विज्ञान पत्रकारिता के उन्नयन के लिये उसे व्यवहारिक और रोजगार परक बनाना होगा । इसके लिये हमें हर स्तर पर सकारात्मक और सार्थक कदम उठाने होंगे ।
(लेखक सेंट मार्गरेट इंजिनियरिंग कॉलेज , नीमराना ,राजस्थान में असिसटेंट प्रोफेसर और शिक्षा ,विज्ञान तथा तकनीकी विषयों पर लिखने वाले वरिष्ठ स्तंभकार है )


Thursday, 7 June 2012

विज्ञान संचार पर अन्तरराष्ट्रीय सम्मेलन




उद्घाटन समारोह



वैज्ञानिक दृष्टिकोण तथा चेतना जगाने में संचार माध्यमों की भूमिका पर अन्तरराष्ट्रीय सम्मेलन
  विज्ञान पत्रकारिता सत्र में श्री सुभाष लखेड़ा ,श्री शशांक द्विवेदी ,श्रीमती प्रियंका शर्मा द्विवेदी 
आम आदमी तक वैज्ञानिक उपलब्धियों का लाभ पहुंचाने में संचार माध्यमों की अहम् भूमिका रही है। परन्तु संचार माध्यमों की भूमिका भारत जैसे विविध संस्कृति वाले देश में और भी जटिल हो जाती है, जहां इन माध्यमों की सुलभता के लिए ग्रामीण तथा शहरी क्षेत्रों में बहुत अन्तराल व्याप्त है। इसी विषय को लेकर दिनांक 29 मई 2012 को ‘‘वैज्ञानिक दृष्टिकोण तथा चेतना जगाने में संचार माध्यमों की भूमिका पर दो दिवसीय अन्तरराष्ट्रीय सम्मेलन’’ आयोजित किया गया। इस अन्तरराष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन विज्ञान संचार के लिए कार्यरत देश की चार अग्रणी संस्थाओं सीएसआईआर-निस्केयर, विज्ञान प्रसार, राष्ट्रीय विज्ञान प्रौद्योगिकी एवं संचार परिषद् एवं राष्ट्रीय विज्ञान संग्रहालय परिषद् द्वारा किया गया। अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर हिन्दी भाषा में विज्ञान संचार का यह पहला सम्मेलन था। इस आयोजन में विदेश एवं देश के विभिन्न राज्यों से आये वक्ताओं ने अपने विचार प्रकट किए। सम्मेलन में लगभग 150 वक्ताओं एवं प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया। फ्रांस, रूस और जापान से आये वक्ताओं ने सम्मेलन को सफल बनाने में अपना सहयोग दिया।
उद्घाटन समारोह के मुख्य अतिथि डा. लालजी सिहं, कुलपति, बनारस हिन्दु विश्वविद्यालय ने विज्ञान को ग्रामीण क्षेत्रों तक पहुँचाने पर ज़ोर दिया। उनके अनुसार वैज्ञानिक विकास गांव तक नहीं पहुँचा है, जहां देश की कुल आबादी का 60-70 फीसदी हिस्सा रहता है। इसके लिए जरूरत है कि प्रयास निम्न स्तर से किये जाएं। साथ ही गांव के लिए स्थाई व्यवस्था की जानी चाहिए। वैज्ञानिक दृष्टिकोण को बढ़ावा देने के लिए मौखिक शिक्षा की बजाए प्रयोगात्मक ज्ञान दिया जाए। उन्होंने कहा इंटरनेट के साथ-साथ और आधुनिक तकनीकों को गांव तक पहुंचाया जाना चाहिए। डा. सिहं ने इस बात को माना कि लोगों में उत्सुकता है लेकिन साथ ही इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता की ग्रामीण इलाकों में साधनों की कमी है। यहां पर उन्होंने मीडिया की भूमिका को अहम बताया।
श्री शशांक द्विवेदी व्याख्यान देते हुए 

सम्मेलन में की-नोट वक्तव्य देते हुए डा. जी. एस. रौतेला, महानिदेशक, राष्ट्रीय विज्ञान संग्रहालय परिषद् (एनसीएसएम) ने इस बात पर ज़ोर दिया कि आज प्रभावी विज्ञान संचार के लिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण को नापने का मापदण्ड और विज्ञान संचार के सूचकांकों को चिन्हित कर सूचकांकों को स्थापित करने की आवश्यकता है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण को नापने के लिए कोई ऐसा यंत्र बनाया जाए जिसमें सभी की भागदारी होनी चाहिए। साथ ही उन्होंने एनसीएसएम द्वारा विज्ञान को आम आदमी तक पहुंचाने के लिए किये जा रहे प्रयासों की व्याख्या की।
प्रोफेसर एस. के. जोशी, पूर्व महानिदेशक, सीएसआईआर ने अध्यक्षीय संबोधन में कहा की वैज्ञानिक दृष्टिकोण को जन जन तक पहुंचाने की आवश्यकता है। प्रोफेसर जोशी ने भी ग्रामीण क्षेत्रों कि तरफ ध्यान देने की ज़रूरत ज़ाहिर की। उन्होंने कहा की वैज्ञानिक दृष्टिकोण यह बताता है कि किसी भी बात को विवेचना के साथ ही अपनाना चाहिए। उन्होंने कहा कि संचार माध्यम समाज में वैज्ञानिक दृष्टिकोण जगाने में अहम भूमिका निभा सकते हंै। उन्होंने अखबारों में विज्ञान काॅलम में और टी. वी. में विज्ञान स्लाॅट की कमी पर निराशा जताई। उन्होंने कहा की संचार माध्यमों के साथ-साथ वैज्ञानिकों की भी जिम्मेदारी है कि वो विज्ञान को लोगों तक पहुंचाने में सहयोग करें। उनके अनुसार इंटरनेट क्रांति के ज़रिए क्षेत्रीय भाषाओं में विज्ञान को और प्रभावी बनाया जा सकता है।
श्री शशांक द्विवेदी

कार्यक्रम में सेंट मार्ग्रेट इंजिनियरिंग कालेज में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर और देश के प्रमुख हिन्दी अखबारों में विज्ञानं और तकनीकी विषयों पर स्तंभ लिखने वाले स्तंभकार शशांक द्विवेदी ने हिंदी में विज्ञानं संचार और पत्रकारिता पर बोलते हुए कहा कि हिन्दी में विज्ञान संचार को रोजगारपरक और व्यावहारिक बनाना होगा तभी नौजवानों का इस क्षेत्र में आकर्षण बढेगा .जब तक विज्ञान संचार रोजी और रोटी से नहीं जुडेगा  तब तक यह आम आदमी से नहीं जुड पायेगा .इस अवसर पर प्रमुख स्तंभकार और अमर उजाला ,आगरा की पत्रकार  प्रियंका शर्मा ने विज्ञान पत्रकारिता से जुड़े अपने अनुभव  शेयर किये .उन्होंने कहा की अभी भी अखबारों में विज्ञान,शोध और अनुसन्धान से जुडी खबरों को बहुत महत्त्व नहीं दिया जाता .अधिकतर पत्रकारों और संपादको में विज्ञानं की ठीक समझ का अभाव है .इसी वजह से विज्ञान की खबरों को कम महत्त्व दिया जाता है .इसे बड़े पैमाने पर सुधारने की जरुरत है .  
      इससे पूर्व सम्मेलन का शुभारंभ डा. सुबोध महंती, निदेशक, विज्ञान प्रसार ने अपने स्वागत अभिभाषण से किया। इसमें उन्होंने वैज्ञानिक दृष्टिकोण को बढ़ावा दिये जाने पर ज़ोर दिया। इसके लिए डा. महंती ने कहा कि समाज के सभी वर्गों के व्यक्तियों एवं संस्थाओं को जोड़ना चाहिए। साथ ही उन्होंने भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू कि दूरगामी दृष्टि की सरहाना की। उन्होंने कहा कि पंडित नेहरू ने विज्ञान एवं तकनीकी क्षेत्र में आम आदमी कि भूमिका को अहम समझा और उसकी भागीदारी को बढ़ाने के लिए प्रयास भी किए। डा. महंती के अनुसार सभी भारतीय भाषाओं में विज्ञान का प्रचार ज़रूरी है।
श्रीमती प्रियंका शर्मा द्विवेदी व्याख्यान देते हुए

      डा. गंगन प्रताप, निदेशक, निस्केयर ने सम्मेलन को सम्बोधित करते हुए कहा कि विज्ञान के अधिकतर प्रयास एक ही भाषा तक सीमित हैं। वैज्ञानिक दृष्टिकोण बनाने के लिए ज़रूरी है कि विज्ञान का प्रचार सभी क्षेत्रीय भाषाओं में हो। डा. प्रताप ने भी पंडित जवाहरलाल नेहरू द्वारा वैज्ञानिक दृष्टिकोण की भूमिका को स्पष्ट किया। उन्होंने विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी को लोगों तक पहुंचाने के लिए संचार माध्यमों कि भूमिका पर भी चर्चा की। इसमें उन्होंने इलेक्ट्रॅानिक मीडिया को खास तौर पर ज़रूरी बाताया क्योंकि ग्रामीण क्षेत्रों में इलेक्ट्राॅनिक मीडिया कि पहुंच ज़्यादा है।
      मुख्य रूप से सम्मेलन को बारह सत्रों में विभाजित किया गया जिसमें प्रमुख हैं. शिक्षण संस्थाओं का विज्ञान संचार में योगदान, भारतीय भाषाओं में विज्ञान संचार, सम्पादन और प्रकाशन की चुनौतियां, विज्ञान पत्रकारिता एवं विज्ञान संचार, विज्ञान संचार के नये साधन, विज्ञान संचार में नीतिगत मुद्दे आदि। इस अंतर्राष्ट्रीय सम्मलेन में देश –विदेश के कई विद्वानों ने भाग लिया और अपने विचार रखे .
दो दिवसीय विज्ञान संचार सम्मेलन के समापन समारोह में दिनांक 30 मई 2012 को प्रो. यशपाल, श्री फारूक़ शेख एवं सुश्री मल्लिका साराभाई ने  मुख्य वक्ता के रूप में अपने विचार रखे .
समारोह के अंत में धन्यवाद ज्ञापन के दौरान श्रीमती दीक्षा बिष्ट, प्रमुख वैज्ञानिक, निस्केयर  ने सभी का आभार व्यक्त करते हुए यह उम्मीद ज़ाहिर की कि इस अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन से विज्ञान संचार के नए मानक स्थापित होंगे और स्थायी दिशा में आगे बढ़ा जा सकेगा।
प्रो .यशपाल से प्रमाण पत्र लेते हुए शशांक द्विवेदी 

देश में वैज्ञानिक दृष्टिकोण तथा चेतना जगाने के उद्देश्‍य से आयोजित इस सम्‍मेलन में जिन प्रमुख वक्‍ताओं ने भाग लिया, उनमें प्रो .यशपाल ,मल्लिका साराभाई , डॉ0 ओम विकास, सुभाष लखेड़ा, पंकज बिष्‍ट, रमेश उपाध्‍याय, देवेन्‍द्र मेवाड़ीचक्रेश जैन, सुरजीत सिंह, हरिकृष्‍ण आर्य, लक्ष्‍मण सिंह बटरोही, विनीता सिंघल, जाकिर अली रजनीश, शशांक द्विवेदी ,प्रियंका शर्मा द्विवेदी ,जीशान हैदर जैदी, विष्‍णु प्रसाद चतुर्वेदी, निमिष कपूर, एम0एम0 गोरे, के0के0 मिश्रा, किंकिणी दास गुप्‍ता, इरफान ह्यूमन आदि के नाम प्रमुख हैं। सम्‍मेलन में सर्वसम्‍मति से निम्‍न प्रस्‍ताव भी पारित किये गये:

1. विज्ञान संचार, विज्ञान जनचेतना, वैज्ञानिक समझ और विज्ञान नीतियों पर काम करने वाले विशेषज्ञों को अवधारणात्‍मक मॉडल तैयार करना चाहिए, जो एक ओर तो संस्‍कृति आधारित मॉडल विकसित करेगा, ताकि वह संस्‍कृति विशेष के अनुरूप वैज्ञानिक दृष्टिकोण की धारणा को समझने में मदद करे और दूसरी ओर विज्ञान संचारकों को इस धारणा को समाज के सभी वर्गों तक पहुंचाने में मदद करे।

2. समाज में वैज्ञानिक दृष्टिकोण के विकास को परखने के लिए उपयुक्‍त मापन सूचक (इंडिकेटर) तैयार कने पडेंगे। यह काम आसान नहीं है, इसलिए इस कार्य में रूचि रखने वाली सभी संस्‍थाओं को एकजुट होकर प्रयास करना होगा।

3. वर्तमान में भारतीय भाषाओं में प्रशिक्षित विज्ञान संचारकों का काफी अभाव है। इसलिए समाज की आवश्‍यकताओं को ध्‍यान में रखते हुए नये तथा अधिक कारगर प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू करने की आवश्‍यकता है।

4. स्‍कूली विज्ञान शिक्षा पर अधिक ध्‍यान देना होगा। साथ ही प्रोयोगिक शिक्षा पर अधिक जोर दिया जाए, ताकि बचपन में ही वैज्ञानिक दृष्टिकोण का बीजारोपण किया जा सके। साथ ही साथ कॉलेज, विश्‍वविद्यालयों की शिक्षा, पाठ्यक्रम में ऐसी सामग्री विषय शामिल किये जाएं, जिससे वैज्ञानिक समझ और चेतना का विकास हो।

समापन समारोह 

5. आज सबसे बड़ी जरूरत इस बात की है कि वैज्ञानिक सोच के अनुरूप शिक्षा को गाँव-गाँव तक पहुँचाया जाए। इसलिए संचार के मौजूदा ढ़ाँचे के बेहतर उपयोग के साथ ही संचार के नए ढ़ाँचे तैयार करने होंगे।

6. विज्ञान संचार की नई प्रौद्योगिकियों पर आधारित माध्‍यमों को पूरी ताकत से अपनाना पड़ेगा।

7. वैज्ञानिक दृष्टिकोण के राष्‍ट्रीय स्‍तर पर व्‍यापक प्रचार-प्रसार के लिए सम्‍बंधित क्षेत्रीय व राष्‍ट्रीय संस्‍थाओं को मिल जुल कर काम करना पड़ेगा, ताकि इस दिशा में वैज्ञानिक चेतना जगाने के लिए समय-समय पर राष्‍ट्रीय व क्षेत्रीय अभियान चलाए जा सकें।

8. भारत के प्रत्‍येक नागरिक का संवैधानिक कर्तव्‍य है कि वह वैज्ञानिक मानसिकता अपनाए और इसके समुचित विकास में अपना हर संभव योगदान दे। इस बात को जन-जन तक पहुँचाने की आवश्‍यकता है।
9. वैज्ञानिकों और सभी बुद्धिजीवियों को कर्तव्‍य मानकर वैज्ञानिक दृष्टिकोण का प्रसार करने में अपना महत्‍वपूर्ण योगदान देना होगा।

10. आज मीडिया जिस प्रकार अंधविश्‍वासों और पुरानी रूढि़यों का प्रचार-प्रसार कर रहा है, उस पर सदन ने चिन्‍ता व्‍यक्‍त करते हुए प्रस्‍ताव पारित किया कि न्‍यूज ब्रॉडकास्टिंग एसोसिएशन प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया और प्रशासन की ओर से इस पर अंकुश लगाने के लिए अविलम्‍ब कारगर कदम उठाए जाएं।

11. इस बात पर भी चिन्‍ता जताई गयी कि देश का मीडिया जहाँ अति आधुनिक प्रौद्योगिकी का इस्‍तेमाल अपने हित साधन के लिए करता है, वह अंधविश्‍वासों को बढ़ावा देकर आमजन को दिगभ्रमित कर रहा है।

12. भारतीय विज्ञान की उपलब्धियों और वैज्ञानिकों के वर्तमान कार्य को आमजन तक पहुँचाने की पुरजोर कोशिश की जानी चाहिए।

13. देश में विज्ञान विरोधी बातें जनता में एक अज्ञात भय फैला रही हैं। विज्ञान संचारकों और अन्‍य लोगों को एकजुट होकर ऐसे प्रचार के खिलाफ कड़े कानून बनाने के लिए भरपूर दबाव बनाना चाहिए।

14. सदन ने इस बात पर भारी चिन्‍ता व्‍यक्‍त की गयी कि देश के कई टीवी चैनल दकियानूसी और विज्ञान विरोधी हैं। ऐसे चैनल पाखंड को प्रोत्‍साहित कर रहे हैं, जबकि विज्ञान को समर्पित कोई भी चैनल नहीं है। आमजन में वैज्ञानिक दृष्टिकोण के विकास के लिए देश में पूरी तरह विज्ञान को समर्पित टीवी चैनल होना चाहिए, जो केवल विज्ञान का संचार करे और जिसमें आईपीआर नियंत्रणों के बिना संसाधनों को साझा किया जा सके।

15. विज्ञान संचार गतिविधियों के दस्‍तावेजीकरण के लिए वेब आधरित डेटाबेस बनाया जाए, जिसमें सफल और असफल दोनों प्रकार के अनुभव एवं गतिविधियाँ दर्ज हों। सफल विज्ञान संचारकों को प्रोत्‍साहित और सम्‍मानित करने के लिए समुचित संस्‍थागत व्‍यवस्‍था की जाए।

16. वैज्ञानिक दृष्टिकोण की आवधारण का सम्‍बंध केवल प्राकृतिक विज्ञान की विधाओं से नहीं अपितु कला, दर्शन और साहित्‍य से भी है। वैज्ञज्ञनिक दृष्टिकोण्‍ के व्‍यापक विकास के लिए सभी विषयों की परस्‍पर सहभागिता की जरूरत है।

17. देशभर में वैज्ञानिक चेतना के प्रचार-प्रसार को अंजाम देने के लिए विज्ञान संचारकों के लिए रोजगार के अवसर बढ़ाए जाएँ। साथ ही इस काम में संलग्‍न संस्‍थाओं के प्रोत्‍साहन के लिए अनुदान की शुरूआत की जाए।



दैनिक भास्कर लेख (13/06/12)

दैनिक भास्कर में विज्ञान लेखन पर मेरा विशेष लेख .इसमें हाल में ही दिल्ली में हुए अंतर्राष्ट्रीय सम्मलेन का विशेष जिक्र है जिसमे मै शामिल हुआ था .एकदम लाइव रिपोर्ट (जरुर पढ़े )
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