Tuesday, 18 August 2026

ई-20 का सच: माइलेज घटा या सिर्फ भ्रम?

 

-20 पेट्रोल: पर्यावरण की जीत या आम उपभोक्ता की नई चुनौती?

डॉ. शशांक द्विवेदी

परियोजना प्रबंधक, टीएसएससी

(कौशल विकास एवं उद्यमिता मंत्रालय,भारत सरकार)

भारत तेजी से ऊर्जा आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ रहा है। इसी दिशा में केंद्र सरकार ने पेट्रोल में 20 प्रतिशत एथनॉल मिलाकर -20 (E20) ईंधन को देशभर में लागू करने का लक्ष्य लगभग हासिल कर लिया है। सरकार का दावा है कि इससे कच्चे तेल के आयात में कमी आएगी, किसानों की आय बढ़ेगी, विदेशी मुद्रा की बचत होगी और कार्बन उत्सर्जन घटेगा। दूसरी ओर, सोशल मीडिया, ऑटोमोबाइल विशेषज्ञों और लाखों वाहन मालिकों का एक वर्ग यह दावा कर रहा है कि -20 पेट्रोल से उनकी कारों का माइलेज कम हो गया है, इंजन की कार्यक्षमता प्रभावित हो रही है और लंबे समय में रखरखाव की लागत बढ़ सकती है।

ऐसे में सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या -20 वास्तव में भारत के लिए सही विकल्प है, या फिर इसके क्रियान्वयन में कुछ ऐसे प्रश्न हैं जिनका समाधान अभी बाकी है?

भारत को -20 की आवश्यकता क्यों पड़ी?

भारत अपनी कुल कच्चे तेल की आवश्यकता का लगभग 85 प्रतिशत आयात करता है। हर वर्ष लाखों करोड़ रुपये विदेशी मुद्रा तेल खरीदने में खर्च होते हैं। यदि पेट्रोल में घरेलू स्तर पर उत्पादित एथनॉल मिलाया जाए तो आयातित पेट्रोलियम पर निर्भरता घटाई जा सकती है।

सरकार के अनुसार, वर्ष 2014 से अब तक एथनॉल मिश्रण कार्यक्रम के कारण देश को लगभग 1.44 लाख करोड़ रुपये के कच्चे तेल आयात की बचत हुई है। वर्ष 2024-25 में भारत में औसत एथनॉल मिश्रण लगभग 19-20 प्रतिशत तक पहुंच चुका है तथा एक हजार करोड़ लीटर से अधिक एथनॉल का उपयोग पेट्रोल में किया जा रहा है।एथनॉल मुख्यतः गन्ने, मक्का तथा अन्य कृषि उत्पादों से बनाया जाता है। इसका सीधा लाभ किसानों और चीनी उद्योग को भी मिलता है। यही कारण है कि सरकार इसे केवल ऊर्जा नीति नहीं बल्कि कृषि और आर्थिक सुधार का भी महत्वपूर्ण हिस्सा मानती है।

विरोध आखिर क्यों हो रहा है?

सरकार के दावों के समानांतर बड़ी संख्या में वाहन मालिक अलग अनुभव साझा कर रहे हैं। उनका कहना है कि -20 पेट्रोल भरवाने के बाद वाहन का माइलेज पहले की तुलना में कम हो गया है।

यह शिकायत पूरी तरह निराधार भी नहीं कही जा सकती। वैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो एथनॉल की ऊर्जा (Energy Density) सामान्य पेट्रोल की तुलना में लगभग 30-35 प्रतिशत कम होती है। अर्थात समान मात्रा में एथनॉल, पेट्रोल की तुलना में कम ऊर्जा उत्पन्न करता है। इसलिए यदि इंजन विशेष रूप से -20 के अनुरूप डिजाइन नहीं किया गया है, तो व्यवहारिक परिस्थितियों में 3 से 8 प्रतिशत तक माइलेज में कमी देखी जा सकती है।हालांकि यह कमी हर वाहन में समान नहीं होती। यह इंजन की तकनीक, ड्राइविंग शैली, सड़क की स्थिति तथा वाहन के रखरखाव पर भी निर्भर करती है।यही कारण है कि कुछ लोग किसी अंतर का अनुभव नहीं करते, जबकि कुछ वाहन मालिक माइलेज में स्पष्ट कमी की शिकायत करते हैं।

क्या -20 सभी कारों के लिए सुरक्षित है?

केंद्र सरकार और अधिकांश वाहन निर्माता कंपनियों का कहना है कि जिन वाहनों को -20 अनुकूल (E20 Compatible) घोषित किया गया है, उनके लिए यह ईंधन पूरी तरह सुरक्षित है।

लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण तथ्य समझना आवश्यक है।

भारत की सड़कों पर करोड़ों ऐसे वाहन भी चल रहे हैं जो कई वर्ष पुराने हैं और जिन्हें मूल रूप से -10 या उससे कम एथनॉल मिश्रण के लिए डिजाइन किया गया था। ऐसे वाहनों में लंबे समय तक अधिक एथनॉल वाले ईंधन के उपयोग से रबर सील, फ्यूल पाइप, प्लास्टिक कंपोनेंट और धातु के कुछ हिस्सों पर अतिरिक्त प्रभाव पड़ सकता है। यही कारण है कि ऑटोमोबाइल विशेषज्ञ पुराने वाहनों के लिए निर्माता कंपनी के दिशा-निर्देशों का पालन करने की सलाह देते हैं।अर्थात समस्या -20 में नहीं, बल्कि वाहन की तकनीकी अनुकूलता में भी हो सकती है।

दुनिया में -20 की स्थिति क्या है?

सरकार का कहना है कि कई देशों में एथनॉल मिश्रित ईंधन का सफल उपयोग हो रहा है। यह तथ्य सही है, लेकिन पूरी तस्वीर थोड़ी अलग है।

ब्राजील विश्व का सबसे पुराना और सबसे सफल एथनॉल उपयोग करने वाला देश है। वहां पिछले कई दशकों से -20 ही नहीं बल्कि -27, -85 और यहां तक कि लगभग शुद्ध एथनॉल (-100) तक का उपयोग होता है। लेकिन ब्राजील के वाहन निर्माता वर्षों से ऐसे इंजन विकसित करते रहे हैं जो उच्च एथनॉल मिश्रण के अनुरूप बनाए गए हैं। वहां फ्लेक्स-फ्यूल वाहन सामान्य हैं।थाईलैंड ने भी वर्ष 2008 से -20 को प्रोत्साहित किया है। वहां -10, -20 और -85 सभी उपलब्ध हैं तथा सरकार उपभोक्ताओं को प्रोत्साहन भी देती है।इसके विपरीत अमेरिका में -10 सबसे सामान्य ईंधन है। -15 कुछ क्षेत्रों तक सीमित है जबकि -20 सामान्य उपभोक्ताओं के लिए व्यापक रूप से उपलब्ध नहीं है।यूरोप के अधिकांश देशोंजैसे जर्मनी और फ्रांसमें लंबे समय तक -5 प्रमुख ईंधन रहा। अब कई देशों में -10 उपलब्ध है, लेकिन -20 अभी भी सामान्य ईंधन नहीं है।

इस तुलना से स्पष्ट होता है कि भारत दुनिया के उन चुनिंदा देशों में शामिल हो गया है जहां बड़े पैमाने पर -20 लागू किया जा रहा है।

सरकार को क्या करना चाहिए?

यदि सरकार चाहती है कि -20 को लेकर जनता में पूर्ण विश्वास बने, तो कुछ कदम अत्यंत आवश्यक हैं।सबसे पहले, विभिन्न श्रेणी के वाहनों पर -20 के प्रभाव का स्वतंत्र और सार्वजनिक वैज्ञानिक अध्ययन जारी किया जाना चाहिए।दूसरे, पुराने वाहनों के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए जाएं कि किन मॉडलों में -20 पूरी तरह सुरक्षित है और किनमें सावधानी आवश्यक है।तीसरे, यदि माइलेज में वास्तविक कमी आती है, तो मूल्य निर्धारण की नीति ऐसी होनी चाहिए कि उपभोक्ता पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़े।चौथे, ऑटोमोबाइल कंपनियों को भी पारदर्शी तरीके से यह बताना चाहिए कि कौन-कौन से मॉडल पूर्णतः -20 अनुकूल हैं।

यदि लाखों वाहन मालिक माइलेज में कमी या अन्य समस्याओं की शिकायत कर रहे हैं, तो उन्हें केवल अफवाह या भ्रम कहकर खारिज कर देना उचित नहीं होगा। दूसरी ओर, बिना वैज्ञानिक प्रमाण के -20 को पूरी तरह असफल बताना भी सही नहीं है।आखिरकार, किसी भी नई तकनीक या नीति की वास्तविक सफलता तभी मानी जाएगी जब देश का हित और नागरिक का विश्वासदोनों साथ-साथ आगे बढ़ें।

 

Wednesday, 1 April 2026

एलपीजी का सशक्त विकल्प है बायोगैस

 डॉ. शशांक द्विवेदी

परियोजना प्रबंधक, टीएसएससी

(कौशल विकास एवं उद्यमिता मंत्रालय,भारत सरकार)

भारत आज ऊर्जा परिवर्तन के एक महत्वपूर्ण दौर से गुजर रहा है। एक ओर प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना जैसी योजनाओं ने करोड़ों घरों तक एलपीजी पहुंचाकर स्वच्छ ईंधन की क्रांति लाई है, वहीं दूसरी ओर बढ़ती आयात निर्भरता, कीमतों में उतार-चढ़ाव और वैश्विक भू-राजनीतिक संकटों ने देश की ऊर्जा सुरक्षा पर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं। हाल के समय में पश्चिम एशिया के तनाव के कारण एलपीजी आपूर्ति प्रभावित होने की घटनाओं ने इस चिंता को और गहरा किया है . अमेरिकाइजरायल और ईरान के बीच बढ़ते तनाव ने वैश्विक ऊर्जा बाजार को अस्थिर कर दिया है। यह स्थिति भारत जैसे ऊर्जा आयात पर निर्भर देश के लिए एक चेतावनी है कि अब ऊर्जा सुरक्षा के प्रश्न को टालना संभव नहीं है।अंतरराष्ट्रीय संकटों का सीधा असर आम नागरिकों पर पड़ता हैपेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ते हैं, महंगाई बढ़ती है और घरेलू रसोई तक प्रभावित होती है। ऐसे में यह जरूरी हो जाता है कि हम पारंपरिक ऊर्जा स्रोतों के विकल्प तलाशें। इसी संदर्भ में बायोगैस एक मजबूत और टिकाऊ समाधान के रूप में उभरती है।

बायोगैस जैविक कचरेजैसे गोबर, कृषि अवशेष, रसोई कचरा आदिसे उत्पन्न गैस है, जिसमें मुख्य रूप से मीथेन होती है। यह गैस खाना पकाने, बिजली उत्पादन और वाहन ईंधन के रूप में भी इस्तेमाल की जा सकती है।भारत जैसे कृषि प्रधान देश में बायोगैस की अपार संभावनाएं हैं। गांवों में पशुधन और जैविक कचरे की उपलब्धता इसे एक व्यवहारिक विकल्प बनाती है।

एलपीजी का विकल्प कैसे बन सकती है बायोगैस?

गांवों में छोटे और मध्यम आकार के बायोगैस प्लांट स्थापित कर स्थानीय स्तर पर गैस का उत्पादन किया जा सकता है। इससे एलपीजी सिलेंडर पर निर्भरता कम होगी। आधुनिक तकनीक के माध्यम से बायोगैस को शुद्ध कर कंप्रेस्ड बायोगैस (CBG) बनाया जा सकता है, जो एलपीजी और सीएनजी का प्रभावी विकल्प है।  गोबर-धन योजनाऔर ‘SATAT’ (Sustainable Alternative Towards Affordable Transportation) जैसी योजनाएं बायोगैस उत्पादन को बढ़ावा दे रही हैं। इनके माध्यम से किसानों और उद्यमियों को आर्थिक सहायता और बाजार उपलब्ध कराया जा रहा है। शहरों में निकलने वाले जैविक कचरे को बायोगैस में बदलकर केवल ऊर्जा पैदा की जा सकती है, बल्कि कचरा प्रबंधन की समस्या का भी समाधान किया जा सकता है।

भारत में एलपीजी (रसोई गैस) की स्थिति

भारत में एलपीजी की सालाना खपत लगभग 28–31 मिलियन टन (MMT) के आसपास है  भारत में एलपीजी का घरेलू उत्पादन लगभग 10–12 MMT प्रति वर्ष है। यानी कुल मांग का केवल 35–40% ही देश में बनता है .भारत को हर साल लगभग 18–22 MMT LPG आयात करनी पड़ती है . यानी 60–65% LPG आयात पर निर्भरता .भारत आधा से ज्यादा एलपीजी बाहर से खरीदता है ।आयात का बड़ा हिस्सा मिडिल ईस्ट (खाड़ी देशों) से आता है।इसलिए हॉर्मुज स्ट्रेट जैसे संकट भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए सीधा खतरा हैं

भारत में अभी लगभग 132 CBG (Compressed Biogas) प्लांट चल रहे हैं . इनकी कुल उत्पादन क्षमता लगभग 920 टन प्रति दिन है . 920 टन/दिन ≈ 3.3 लाख टन/वर्ष (0.33 MMT) .  अभी बायोगैस का योगदान 1% से भी कम है भारत 20 MMT CBG बना सकता है . कुल संभावित क्षमता (कचरा + गोबर + कृषि). कुल क्षमता लगभग 60 MMT तक मानी जाती है  इसका मतलब भारत अपनी पूरी LPG जरूरत (30 MMT) बायोगैस से पूरा कर सकता है फिलहाल अभी लगभग 300+ नए प्लांट निर्माणाधीन हैं। इंटरनेशनल  एनर्जी  एजेंसी  के अनुसार भारत 2030 तक बायोगैस उत्पादन 7 गुना तक बढ़ सकता है।

बायोगैस केवल सस्ती है बल्कि पर्यावरण के अनुकूल भी है। इससे कार्बन उत्सर्जन कम होता है, जैविक खाद (स्लरी) मिलती है और किसानों की आय बढ़ती है। साथ ही, यह स्थानीय रोजगार के अवसर भी पैदा करती है। हालांकि बायोगैस के क्षेत्र में कुछ चुनौतियां भी हैंजैसे शुरुआती निवेश, तकनीकी जानकारी की कमी और जागरूकता का अभाव। भारत में बायोगैस को लेकर अभी भी कई भ्रांतियाँ हैं। कई लोग इसेगांव की तकनीकमानते हैं या इसके उपयोग में असुविधा महसूस करते हैं।दूसरी ओर, एलपीजी को आधुनिक, सुरक्षित और सुविधाजनक ईंधन के रूप में देखा जाता है। यही कारण है कि शहरी और यहां तक कि ग्रामीण क्षेत्रों में भी लोग एलपीजी को प्राथमिकता देते हैं।इसके लिए जरूरी है कि सरकार और निजी क्षेत्र मिलकर प्रशिक्षण, वित्तीय सहायता और तकनीकी समर्थन उपलब्ध कराएं।

वर्तमान वैश्विक संकट ने यह स्पष्ट कर दिया है कि ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता अब विकल्प नहीं, बल्कि आवश्यकता है। बायोगैस जैसे स्वदेशी और टिकाऊ विकल्पों को अपनाकर भारत केवल अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा कर सकता है, बल्कि पर्यावरण संरक्षण और ग्रामीण विकास की दिशा में भी महत्वपूर्ण कदम बढ़ा सकता है।

आज जरूरत है एक समन्वित प्रयास कीनीतियों, तकनीक और जनभागीदारी के जरिएताकि बायोगैस को एलपीजी का वास्तविक विकल्प बनाया जा सके और भारत ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बन सके।