नोमुरा की हालिया रिपोर्ट
एआई का रोजगार
गणित: नौकरियां गईं कम, बनीं ढाई गुना
डॉ. शशांक द्विवेदी
भारत
में एआई से 83,100 नई नौकरियां बनीं, 31,921 नौकरियां प्रभावित हुईं; असली चुनौती रोजगार की संख्या नहीं, युवाओं के लिए अवसरों का बदलता स्वरूप है
आर्टिफिशियल
इंटेलिजेंस यानी एआई को
लेकर पिछले कुछ वर्षों में
सबसे बड़ा डर यही
रहा है कि मशीनें
इंसानों की नौकरियां छीन
लेंगी। चैटबॉट से लेकर जनरेटिव
एआई तक, तकनीक जिस
तेजी से विकसित हुई
है, उसने इस आशंका
को और गहरा किया
है। लेकिन भारत से सामने
आए ताजा आंकड़े इस
पूरी कहानी को एक नया
और कहीं अधिक जटिल
आयाम देते हैं।
वैश्विक
वित्तीय संस्था नोमुरा की हालिया रिपोर्ट
के अनुसार, 2022 से अगस्त 2026 के
बीच भारत में एआई
से संबंधित करीब 83,100 नौकरियां पैदा हुईं, जबकि
एआई से जुड़ी 31,921 नौकरियां
छंटनी या कर्मचारियों के
हटने के रूप में
प्रभावित हुईं। अर्थात हर एक प्रभावित
नौकरी के मुकाबले लगभग
2.6 नई एआई-संबंधित नौकरियां
बनीं। भारत में एआई
का रोजगार पर शुरुआती प्रभाव
इसलिए शुद्ध रूप से सकारात्मक
दिखाई देता है।
लेकिन
इस आंकड़े को देखकर यह
निष्कर्ष निकालना खतरनाक होगा कि एआई
रोजगार की समस्या समाप्त
कर रहा है। असली
कहानी इन आंकड़ों के
बीच छिपी हुई है।
एआई नई नौकरियां जरूर
बना रहा है, लेकिन
जरूरी नहीं कि जिन
लोगों की पुरानी नौकरियां
जा रही हैं, वही
लोग नई नौकरियों में
प्रवेश कर पा रहे
हों। यही भारत के
सामने उभरती सबसे बड़ी रोजगार
चुनौती है।
रोजगार
बढ़ रहा है, लेकिन रोजगार का प्रवेश-द्वार छोटा हो रहा है
नोमुरा
के अनुसार, भारत में एआई
अपनाने से एक 'दो-स्तरीय रोजगार बाजार' उभर रहा है।
एक तरफ अनुभवी कर्मचारियों
की मांग बनी हुई
है, वहीं दूसरी तरफ
शुरुआती स्तर यानी फ्रेशर्स
के लिए अवसर अपेक्षाकृत
कम हो रहे हैं।भारतीय
आईटी क्षेत्र की 651 कंपनियों पर किए गए
ICRIER के सर्वेक्षण में 55 प्रतिशत कंपनियों ने बताया कि
उनकी एंट्री-लेवल भर्ती में
कमी आई है। इसके
मुकाबले मिड-लेवल भर्ती
में कमी बताने वाली
कंपनियों का अनुपात 25 प्रतिशत
और वरिष्ठ स्तर पर केवल
14 प्रतिशत था।
यह
आंकड़ा बेहद महत्वपूर्ण है।
क्योंकि भारत की आर्थिक
ताकत का एक बड़ा
आधार हर वर्ष कॉलेजों
और विश्वविद्यालयों से निकलने वाली
विशाल युवा आबादी है।
यदि कंपनियां पहले की तरह
बड़ी संख्या में फ्रेशर्स को
नियुक्त नहीं करतीं तो
समस्या केवल बेरोजगारी की
नहीं होगी, बल्कि 'करियर की पहली सीढ़ी'
के कमजोर पड़ने की होगी।दरअसल, पारंपरिक
कॉर्पोरेट व्यवस्था में एक युवा
कर्मचारी सामान्य काम से शुरुआत
करता था। वह डेटा
तैयार करता था, रिपोर्ट
बनाता था, बेसिक कोड
लिखता था, गुणवत्ता जांच
करता था, ग्राहक सेवा
संभालता था और धीरे-धीरे अनुभव हासिल
करके जिम्मेदार पदों तक पहुंचता
था। एआई इन शुरुआती
कार्यों का एक बड़ा
हिस्सा अब तेजी से
करने लगा है।
यानी
एआई केवल नौकरी नहीं
बदल रहा; वह नौकरी
तक पहुंचने का रास्ता भी बदल रहा है।
आईटी
सेक्टर में बदलाव का संकेत पहले ही मिल चुका है
भारतीय
आईटी कंपनियों की कुल भर्ती
में आई गिरावट इस
परिवर्तन को और स्पष्ट
करती है। नोमुरा ने
स्टाफिंग फर्म स्फेनो
के आंकड़ों का हवाला देते
हुए बताया कि भारतीय आईटी
कंपनियों की नेट हायरिंग
वित्त वर्ष 2021-22 में लगभग छह
लाख थी, जो वित्त
वर्ष 2025-26 में घटकर करीब
1.40 लाख रह गई। कंपनियां
बड़े पैमाने पर कैंपस भर्ती
करने के बजाय कम
लेकिन अधिक कुशल कर्मचारियों
को प्राथमिकता दे रही हैं।
यहां
एआई को अकेला दोषी
मानना भी उचित नहीं
होगा। वैश्विक मांग, आईटी उद्योग का
पुनर्गठन, लागत नियंत्रण और
ऑटोमेशन जैसे कई कारक
इस बदलाव के पीछे हैं।
लेकिन एआई ने इस
परिवर्तन की गति निश्चित
रूप से बढ़ा दी
है।
नई
नौकरियां किसके लिए बन रही हैं?
यहां
सबसे महत्वपूर्ण सवाल है—अगर
एआई नई नौकरियां बना
रहा है तो वे
नौकरियां किसके लिए हैं?
एआई
मॉडल विकसित करने वाले इंजीनियर,
डेटा विशेषज्ञ, मशीन लर्निंग विशेषज्ञ,
एआई ट्रेनर, डेटा एनोटेटर, भाषा
विशेषज्ञ, साइबर सुरक्षा विशेषज्ञ और एआई सिस्टम
को व्यवसाय से जोड़ने वाले
पेशेवरों की मांग बढ़
रही है। नोमुरा के
एशियाई अध्ययन में एआई से
संबंधित नई नौकरियों का
90 प्रतिशत से अधिक हिस्सा
टेक्नोलॉजी क्षेत्र में केंद्रित था।इसका
अर्थ यह है कि
भारत के सामने अब
केवल 'कितनी नौकरियां?' का सवाल नहीं
है। उससे अधिक महत्वपूर्ण
प्रश्न है—'किस कौशल वाली कितनी नौकरियां?'
यही
वह बिंदु है जहां भारत
की शिक्षा और कौशल विकास
व्यवस्था की परीक्षा शुरू
होती है।
डिग्री
से ज्यादा जरूरी होगा 'एआई के साथ काम करने' का कौशल
आने
वाले वर्षों में एआई का
मुकाबला इंसान बनाम मशीन के
रूप में करना शायद
सबसे बड़ी भूल होगी।
असली मुकाबला उन कर्मचारियों के
बीच होगा जो एआई
का इस्तेमाल करना जानते हैं
और उन कर्मचारियों के
बीच जो इसे केवल
अपने रोजगार के लिए खतरा
मानते हैं।एक अकाउंटेंट जो एआई आधारित
विश्लेषण, ऑटोमेशन और डेटा टूल
का उपयोग कर सकता है,
उसकी उपयोगिता उस अकाउंटेंट से
अधिक हो सकती है
जो केवल पारंपरिक तरीके
से काम करता है।
इसी तरह एक पत्रकार
जो शोध, डेटा विश्लेषण
और प्रारंभिक ड्राफ्टिंग के लिए एआई
का प्रभावी इस्तेमाल कर सकता है,
वह तकनीक से प्रतिस्थापित होने
के बजाय तकनीक की
उत्पादकता बढ़ाने वाला पेशेवर बन
सकता है।
इसलिए
भारत को 'एआई बनाम
रोजगार' की बहस से
आगे बढ़कर 'एआई के साथ
रोजगार' की रणनीति बनानी
होगी।
एआई
के कारण रोजगार का
अंत नहीं होने जा
रहा। बल्कि रोजगार का स्वरूप बदलने
जा रहा है। संभव
है कि भविष्य में
एक कर्मचारी वही काम करे
जो आज तीन लोग
करते हैं, लेकिन साथ
ही ऐसे नए काम
भी पैदा हों जिनकी
आज कल्पना तक नहीं की
गई है।भारत के लिए अवसर
बहुत बड़ा है। देश
के पास विशाल युवा
आबादी, मजबूत आईटी उद्योग, अंग्रेजी
सहित अनेक भाषाओं की
क्षमता और दुनिया के
लिए डिजिटल सेवाएं देने का अनुभव
है। यदि इन ताकतों
को एआई कौशल के
साथ जोड़ा जाए तो भारत
केवल एआई से प्रभावित
अर्थव्यवस्था नहीं, बल्कि एआई-आधारित रोजगार
का वैश्विक केंद्र बन सकता है।
(लेखक
विज्ञानपीडिया के संस्थापक और विज्ञान & तकीनीकी मामलों के जानकार हैं )