Wednesday, 30 September 2026

एआई बनाम रोजगार की बहस का सच

 

नोमुरा की हालिया रिपोर्ट 

एआई का रोजगार गणित: नौकरियां गईं कम, बनीं ढाई गुना

डॉ. शशांक द्विवेदी

भारत में एआई से 83,100 नई नौकरियां बनीं, 31,921 नौकरियां प्रभावित हुईं; असली चुनौती रोजगार की संख्या नहीं, युवाओं के लिए अवसरों का बदलता स्वरूप है

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई को लेकर पिछले कुछ वर्षों में सबसे बड़ा डर यही रहा है कि मशीनें इंसानों की नौकरियां छीन लेंगी। चैटबॉट से लेकर जनरेटिव एआई तक, तकनीक जिस तेजी से विकसित हुई है, उसने इस आशंका को और गहरा किया है। लेकिन भारत से सामने आए ताजा आंकड़े इस पूरी कहानी को एक नया और कहीं अधिक जटिल आयाम देते हैं।

वैश्विक वित्तीय संस्था नोमुरा की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, 2022 से अगस्त 2026 के बीच भारत में एआई से संबंधित करीब 83,100 नौकरियां पैदा हुईं, जबकि एआई से जुड़ी 31,921 नौकरियां छंटनी या कर्मचारियों के हटने के रूप में प्रभावित हुईं। अर्थात हर एक प्रभावित नौकरी के मुकाबले लगभग 2.6 नई एआई-संबंधित नौकरियां बनीं। भारत में एआई का रोजगार पर शुरुआती प्रभाव इसलिए शुद्ध रूप से सकारात्मक दिखाई देता है।

लेकिन इस आंकड़े को देखकर यह निष्कर्ष निकालना खतरनाक होगा कि एआई रोजगार की समस्या समाप्त कर रहा है। असली कहानी इन आंकड़ों के बीच छिपी हुई है। एआई नई नौकरियां जरूर बना रहा है, लेकिन जरूरी नहीं कि जिन लोगों की पुरानी नौकरियां जा रही हैं, वही लोग नई नौकरियों में प्रवेश कर पा रहे हों। यही भारत के सामने उभरती सबसे बड़ी रोजगार चुनौती है।

रोजगार बढ़ रहा है, लेकिन रोजगार का प्रवेश-द्वार छोटा हो रहा है

नोमुरा के अनुसार, भारत में एआई अपनाने से एक 'दो-स्तरीय रोजगार बाजार' उभर रहा है। एक तरफ अनुभवी कर्मचारियों की मांग बनी हुई है, वहीं दूसरी तरफ शुरुआती स्तर यानी फ्रेशर्स के लिए अवसर अपेक्षाकृत कम हो रहे हैं।भारतीय आईटी क्षेत्र की 651 कंपनियों पर किए गए ICRIER के सर्वेक्षण में 55 प्रतिशत कंपनियों ने बताया कि उनकी एंट्री-लेवल भर्ती में कमी आई है। इसके मुकाबले मिड-लेवल भर्ती में कमी बताने वाली कंपनियों का अनुपात 25 प्रतिशत और वरिष्ठ स्तर पर केवल 14 प्रतिशत था।

यह आंकड़ा बेहद महत्वपूर्ण है। क्योंकि भारत की आर्थिक ताकत का एक बड़ा आधार हर वर्ष कॉलेजों और विश्वविद्यालयों से निकलने वाली विशाल युवा आबादी है। यदि कंपनियां पहले की तरह बड़ी संख्या में फ्रेशर्स को नियुक्त नहीं करतीं तो समस्या केवल बेरोजगारी की नहीं होगी, बल्कि 'करियर की पहली सीढ़ी' के कमजोर पड़ने की होगी।दरअसल, पारंपरिक कॉर्पोरेट व्यवस्था में एक युवा कर्मचारी सामान्य काम से शुरुआत करता था। वह डेटा तैयार करता था, रिपोर्ट बनाता था, बेसिक कोड लिखता था, गुणवत्ता जांच करता था, ग्राहक सेवा संभालता था और धीरे-धीरे अनुभव हासिल करके जिम्मेदार पदों तक पहुंचता था। एआई इन शुरुआती कार्यों का एक बड़ा हिस्सा अब तेजी से करने लगा है।

यानी एआई केवल नौकरी नहीं बदल रहा; वह नौकरी तक पहुंचने का रास्ता भी बदल रहा है।

आईटी सेक्टर में बदलाव का संकेत पहले ही मिल चुका है

भारतीय आईटी कंपनियों की कुल भर्ती में आई गिरावट इस परिवर्तन को और स्पष्ट करती है। नोमुरा ने स्टाफिंग  फर्म  स्फेनो के आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि भारतीय आईटी कंपनियों की नेट हायरिंग वित्त वर्ष 2021-22 में लगभग छह लाख थी, जो वित्त वर्ष 2025-26 में घटकर करीब 1.40 लाख रह गई। कंपनियां बड़े पैमाने पर कैंपस भर्ती करने के बजाय कम लेकिन अधिक कुशल कर्मचारियों को प्राथमिकता दे रही हैं।

यहां एआई को अकेला दोषी मानना भी उचित नहीं होगा। वैश्विक मांग, आईटी उद्योग का पुनर्गठन, लागत नियंत्रण और ऑटोमेशन जैसे कई कारक इस बदलाव के पीछे हैं। लेकिन एआई ने इस परिवर्तन की गति निश्चित रूप से बढ़ा दी है।

नई नौकरियां किसके लिए बन रही हैं?

यहां सबसे महत्वपूर्ण सवाल है—अगर एआई नई नौकरियां बना रहा है तो वे नौकरियां किसके लिए हैं?

एआई मॉडल विकसित करने वाले इंजीनियर, डेटा विशेषज्ञ, मशीन लर्निंग विशेषज्ञ, एआई ट्रेनर, डेटा एनोटेटर, भाषा विशेषज्ञ, साइबर सुरक्षा विशेषज्ञ और एआई सिस्टम को व्यवसाय से जोड़ने वाले पेशेवरों की मांग बढ़ रही है। नोमुरा के एशियाई अध्ययन में एआई से संबंधित नई नौकरियों का 90 प्रतिशत से अधिक हिस्सा टेक्नोलॉजी क्षेत्र में केंद्रित था।इसका अर्थ यह है कि भारत के सामने अब केवल 'कितनी नौकरियां?' का सवाल नहीं है। उससे अधिक महत्वपूर्ण प्रश्न है—'किस कौशल वाली कितनी नौकरियां?'

यही वह बिंदु है जहां भारत की शिक्षा और कौशल विकास व्यवस्था की परीक्षा शुरू होती है।

डिग्री से ज्यादा जरूरी होगा 'एआई के साथ काम करने' का कौशल

आने वाले वर्षों में एआई का मुकाबला इंसान बनाम मशीन के रूप में करना शायद सबसे बड़ी भूल होगी। असली मुकाबला उन कर्मचारियों के बीच होगा जो एआई का इस्तेमाल करना जानते हैं और उन कर्मचारियों के बीच जो इसे केवल अपने रोजगार के लिए खतरा मानते हैं।एक अकाउंटेंट जो एआई आधारित विश्लेषण, ऑटोमेशन और डेटा टूल का उपयोग कर सकता है, उसकी उपयोगिता उस अकाउंटेंट से अधिक हो सकती है जो केवल पारंपरिक तरीके से काम करता है। इसी तरह एक पत्रकार जो शोध, डेटा विश्लेषण और प्रारंभिक ड्राफ्टिंग के लिए एआई का प्रभावी इस्तेमाल कर सकता है, वह तकनीक से प्रतिस्थापित होने के बजाय तकनीक की उत्पादकता बढ़ाने वाला पेशेवर बन सकता है।

इसलिए भारत को 'एआई बनाम रोजगार' की बहस से आगे बढ़कर 'एआई के साथ रोजगार' की रणनीति बनानी होगी।

एआई के कारण रोजगार का अंत नहीं होने जा रहा। बल्कि रोजगार का स्वरूप बदलने जा रहा है। संभव है कि भविष्य में एक कर्मचारी वही काम करे जो आज तीन लोग करते हैं, लेकिन साथ ही ऐसे नए काम भी पैदा हों जिनकी आज कल्पना तक नहीं की गई है।भारत के लिए अवसर बहुत बड़ा है। देश के पास विशाल युवा आबादी, मजबूत आईटी उद्योग, अंग्रेजी सहित अनेक भाषाओं की क्षमता और दुनिया के लिए डिजिटल सेवाएं देने का अनुभव है। यदि इन ताकतों को एआई कौशल के साथ जोड़ा जाए तो भारत केवल एआई से प्रभावित अर्थव्यवस्था नहीं, बल्कि एआई-आधारित रोजगार का वैश्विक केंद्र बन सकता है।

(लेखक विज्ञानपीडिया के संस्थापक और विज्ञान & तकीनीकी मामलों के जानकार हैं )

अंतरिक्ष से भारत की नई रणनीतिक “नजर”

 

अंतरिक्ष से बदलेगी धरती की तस्वीर

डॉ. शशांक द्विवेदी

परियोजना प्रबंधक, टीएसएससी

(कौशल विकास एवं उद्यमिता मंत्रालय,भारत सरकार)

आसमान में उठता रॉकेट अक्सर केवल विज्ञान की उड़ान दिखाई देता है, लेकिन उसकी असली मंजिल धरती पर होती है। पिछले दिनों श्रीहरिकोटा से जब जीएसएलवी-एफ17 ने उड़ान भरी तो उसके साथ भारत की उम्मीदों का एक और मिशन अंतरिक्ष की ओर रवाना हुआ। उड़ान के लगभग 18 मिनट बाद EOS-05 उपग्रह को निर्धारित ट्रांसफर ऑर्बिट में स्थापित कर दिया गया। यह क्षण इसलिए महत्वपूर्ण था क्योंकि भारत ने पृथ्वी-अवलोकन की अपनी क्षमता को एक ऐसे स्तर तक पहुंचाने की दिशा में कदम बढ़ाया है, जहां अंतरिक्ष से केवल तस्वीरें लेना ही उद्देश्य नहीं, बल्कि उन तस्वीरों को राष्ट्रीय सुरक्षा, आपदा प्रबंधन, कृषि, पर्यावरण और विकास की रणनीति का आधार बनाना है।

EOS-05 को यदि भारत की ‘आसमान में तैनात रणनीतिक आंख’ कहा जा रहा है तो इसके पीछे ठोस वजह है। पृथ्वी की निचली कक्षा में घूमने वाले अधिकांश इमेजिंग उपग्रह किसी स्थान के ऊपर से गुजरते हुए उसकी तस्वीर लेते हैं। इसके विपरीत जियोसिंक्रोनस क्षेत्र से काम करने वाला उपग्रह किसी बड़े भूभाग पर लंबे समय तक निगरानी बनाए रखने की क्षमता देता है। इसका अर्थ है कि बदलती परिस्थितियों को केवल अलग-अलग समय की तस्वीरों के रूप में देखने के बजाय उनके निरंतर क्रम को समझने की बेहतर संभावना।

यही वह बदलाव है, जो भारत की अंतरिक्ष शक्ति को केवल वैज्ञानिक उपलब्धि से आगे ले जाकर रणनीतिक क्षमता में बदलता है।भारत की भौगोलिक स्थिति ऐसी है जहां अंतरिक्ष आधारित निगरानी का महत्व लगातार बढ़ रहा है। उत्तर में हिमालय, पश्चिम में संवेदनशील सीमाएं, दक्षिण में विशाल समुद्री क्षेत्र और पूर्व में पहाड़ी एवं वर्षा प्रभावित क्षेत्र—इन सभी की निगरानी के लिए जमीन आधारित प्रणालियों की अपनी सीमाएं हैं। अंतरिक्ष से प्राप्त डेटा इन सीमाओं को काफी हद तक दूर कर सकता है। सीमा क्षेत्रों में सड़क, पुल, निर्माण गतिविधियों या भू-भाग में होने वाले बदलावों की निगरानी हो अथवा समुद्री क्षेत्र में गतिविधियों पर नजर, उपग्रह आधारित अवलोकन आधुनिक सुरक्षा व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है।

हालांकि इसे केवल ‘जासूसी उपग्रह’ के नजरिये से देखना उचित नहीं होगा। इसरो प्रमुख वी. नारायणन ने भी EOS-05 को लेकर ऐसी अटकलों को खारिज करते हुए इसे बहु-उपयोगी इमेजिंग मिशन के रूप में रेखांकित किया है। असल बात यह है कि आज के दौर में नागरिक और रणनीतिक अंतरिक्ष तकनीक के बीच स्पष्ट दीवार खींचना कठिन है। जो तकनीक मौसम की जानकारी दे सकती है, वही राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए भी उपयोगी हो सकती है। जो तकनीक फसल की स्थिति बता सकती है, वही आपदा के बाद नुकसान का आकलन भी कर सकती है।

EOS-05 की खासियत इसकी इमेजिंग क्षमता में है। यह दृश्य, इन्फ्रारेड, मल्टीस्पेक्ट्रल और हाइपरस्पेक्ट्रल तकनीकों के उपयोग से पृथ्वी की सतह के बारे में अधिक विस्तृत जानकारी जुटाने में सक्षम है। खासकर हाइपरस्पेक्ट्रल इमेजिंग अंतरिक्ष आधारित पृथ्वी-अवलोकन में एक अत्याधुनिक तकनीक है। सामान्य कैमरा किसी वस्तु को कुछ सीमित रंगों या बैंड में देखता है, जबकि हाइपरस्पेक्ट्रल सेंसर प्रकाश को सैकड़ों संकीर्ण तरंगदैर्ध्य बैंड में विभाजित कर सकता है। इससे अलग-अलग पदार्थों और सतहों के बीच सूक्ष्म अंतर पहचानने की क्षमता बढ़ जाती है।

भारत के लिए यह बदलाव इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि अंतरिक्ष क्षेत्र तेजी से बदल रहा है। अब अंतरिक्ष केवल सरकार और वैज्ञानिक संस्थानों का क्षेत्र नहीं रह गया है। निजी कंपनियां उपग्रह निर्माण, प्रक्षेपण, सेंसर, डेटा विश्लेषण और अंतरिक्ष आधारित सेवाओं में प्रवेश कर रही हैं। इसरो की तकनीकी विशेषज्ञता और निजी उद्योग की व्यावसायिक क्षमता का मेल भारत को वैश्विक अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था में अधिक मजबूत स्थान दिला सकता है।प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा भी इस मिशन की सफलता को इसरो और भारतीय उद्योग के बीच बढ़ती साझेदारी से जोड़ना इसी बदलते परिदृश्य की ओर संकेत करता है। भारत को इस साझेदारी को केवल रॉकेट निर्माण तक सीमित नहीं रखना चाहिए। अगला बड़ा बाजार अंतरिक्ष से मिलने वाले डेटा और उसके अनुप्रयोगों का होगा।

इसरो की यात्रा भी इस परिवर्तन की कहानी कहती है। कभी भारत के पास उपग्रह प्रक्षेपण की सीमित क्षमता थी। आज भारत भारी उपग्रहों को जियोसिंक्रोनस क्षेत्र तक पहुंचाने वाले GSLV जैसे प्रक्षेपण यान संचालित कर रहा है। चंद्रयान-3 की सफलता ने चंद्रमा पर सॉफ्ट लैंडिंग की क्षमता दिखाई, स्पेडेक्स मिशन ने अंतरिक्ष डॉकिंग जैसी जटिल तकनीक का प्रदर्शन किया और NISAR जैसे मिशनों ने पृथ्वी-अवलोकन की नई संभावनाएं खोलीं। EOS-05 इसी लंबी यात्रा की अगली कड़ी है।

यह यात्रा हमेशा सीधी नहीं रही। अंतरिक्ष विज्ञान में असफलताएं भी आती हैं। कुछ प्रक्षेपण अपेक्षित परिणाम नहीं दे पाते, कुछ मिशनों में तकनीकी समस्याएं आती हैं। लेकिन वैज्ञानिक संस्थान की वास्तविक ताकत इस बात में होती है कि वह असफलता से सीखकर अगली सफलता की संभावना बढ़ाए। इस दृष्टि से EOS-05 की सफलता भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम की तकनीकी परिपक्वता का भी प्रमाण है।

भारत की अंतरिक्ष शक्ति का अगला चरण इसलिए रॉकेटों की संख्या से नहीं, बल्कि डेटा की उपयोगिता से मापा जाएगा।EOS-05 हमें यही संदेश देता है कि भविष्य का भारत केवल अंतरिक्ष में पहुंचने वाला भारत नहीं होगा, बल्कि अंतरिक्ष से अपनी धरती को समझने वाला भारत होगा। वह यह देख सकेगा कि सीमा पर क्या बदल रहा है, समुद्र में क्या हो रहा है, खेतों में फसल कैसी है, जंगल कहां सिमट रहे हैं और बाढ़ किस दिशा में फैल रही है।

श्रीहरिकोटा से उठी रॉकेट की लौ कुछ मिनटों में आसमान में विलीन हो जाती है, लेकिन उसके साथ भेजी गई तकनीक वर्षों तक भारत की सुरक्षा और विकास को दिशा दे सकती है। यही इस मिशन की सबसे बड़ी उपलब्धि है।

अंतरिक्ष में भारत की आंख अब और दूर तक देख रही है। जरूरत इस बात की है कि धरती पर भारत उस आंख से मिली जानकारी को उतनी ही तेजी और बुद्धिमत्ता से पढ़ना भी सीखे। यही आने वाले दशक की वास्तविक अंतरिक्ष शक्ति होगी।