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Thursday, 14 March 2019

अल्बर्ट आइंस्टाइन के बारें में विशेष ,उनके जन्मदिन पर खास पेशकश

प्रदीप कुमार
आज अल्बर्ट आइंस्टाइन का जन्मदिन है :
उन्नीसवी शताब्दी के अंत में गुरुत्वाकर्षण सिद्धांत, विद्युत्-चुंबकीय सिद्धांत, ऊष्मागतिकी वगैरह क्षेत्रों में इतनी प्रगति हो चुकी थी कि सैद्धांतिक भौतिकी के पंडितों ने यह दावा कर दिया था कि भौतिकी में जो भी नई खोजें हो सकती थीं, वे हो चुकीं हैं और अब नया खोजने के लिए कुछ भी नहीं रह गया है। जैसे सिकंदर ने बचपन में अपने पिता से इस बात की शिकायत की थी कि जिस प्रकार से वे दुनिया को फतह कर रहे हैं उसके चलते उसके पास विजय पाने के लिए कुछ भी नहीं बचेगा, ठीक उसी प्रकार से वैज्ञानिकों को भी विज्ञान (विशेषकर भौतिकी) से शिकायत थी! मगर वास्तव में ऐसा नहीं हुआ क्योंकि वैज्ञानिकों द्वारा स्वीकृत सिद्धांतों पर नए प्रयोगों ने प्रश्नचिन्ह लगा दिए और धीरे-धीरे इन पुराने सिद्धांतों की उपयोगिता कम होने लगी तथा ब्रह्मांड की व्याख्या के लिए नए सिद्धांतों की आवश्यकता महसूस की जाने लगी। और इसके बाद तो भौतिकी में महान आविष्कारों की झड़ी-सी लग गई और एक्स-रे, रेडियोसक्रियता, इलेक्ट्रॉन, रेडियम, प्रकाश-विद्युत प्रभाव, क्वांटम सिद्धांत आदि खोजें भौतिकी के क्षितिज पर प्रकट हुईं। और, 1905 में जैसे चमत्कार ही हो गया। बर्न के पेटेंट ऑफिस में एक क्लर्क की हैसियत से काम कर रहे 26 वर्षीय अल्बर्ट आइंस्टाइन ने भौतिकी की स्थापित मान्यताओं को चुनौती देते हुए दिक्काल (यानी स्पेस-टाइम) और पदार्थ की नई धारणाओं के साथ चार शोध पत्र प्रकाशित किए जिन्होंने सैद्धांतिक भौतिकी को झकझोरकर उसका कायाकल्प ही कर दिया।
पहला शोध पत्र प्रकाश-विद्युत् प्रभाव की व्याख्या प्रस्तुत करता था, जिसने क्वांटम सिद्धांत को आधार प्रदान किया।  दूसरे शोध पत्र ने ब्राउनियन मोशन की व्याख्या की तथा परमाणु और अणु की वास्तविकता को सुनिश्चित किया। तीसरा शोध पत्र विशेष सापेक्षता सिद्धांत से संबंधित था। इसमें आइंस्टाइन ने यह बताया कि समय, स्थान और द्रव्यमान तीनों ही गति के अनुसार निर्धारित होते हैं। चौथे शोध पत्र में उन्होंने द्रव्य और ऊर्जा के बीच के संबंध को स्थापित करते हुए मशहूर E=mc² सूत्र प्रतिपादित किया था। आइंस्टाइन तत्कालीन भौतिकी में शैतानरूपी विपदा के समान आए और तब न्यूटन पर एल्कजेंडर पोप के तुक्तक (‘प्रकृति और प्रकृति के नियम अंधरे में ओझल थे / ईश्वर ने कहा,  न्यूटन को आने दो और सबकुछ पता चल गया।’) की नकल करते हुए सर कोलिंग्स स्क्वायर को कहना पड़ा : ‘यह अंतिम नहीं था और शैतानी हुंकार भरी, छी / यथास्थिति बहाल करने के लिए आइंस्टाइन को आने दो।’
यह सब उल्म शहर (जर्मनी) एक ऐसे लड़के ने आगे चलकर किया था, जिसको परिवार और विद्यालय ने मंदबुद्धि घोषित कर दिया था; जिसने पढ़ाई पूरी होने से पहले ही विद्यालय छोड़ दिया था;  पॉलिटेक्निक प्रवेश  परीक्षा में असफल हो चुका था; जिसे पढ़ाई पूरी करने के बाद विश्वविद्यालय में अध्यापन कार्य प्राप्त करने में भी असफल होने के बाद एक क्लर्क की नौकरी से ही संतोष करना पड़ा था।
आइंस्टाइन का जीवन इस बात का प्रमाण है कि साधारण से भी साधारण व्यक्ति भी परिश्रम, साहस और लगन से सफलता प्राप्त कर सकता है। वैसे 1905 में प्रकाशित आइंस्टाइन के शोध पत्रों से भौतिकी में तत्काल कोई परिवर्तन नहीं हुए। मगर जैसे ही आइंस्टाइन के कार्यों को सही मान्यता मिली उनके सामने पदों को स्वीकार करने के लिए विश्वविद्यालयों और अकादमियों की भीड़ लग गई। इसी बीच आइंस्टाइन ने अपने सापेक्षता सिद्धांत का विकास करते हुए सामान्य सापेक्षता सिद्धांत को प्रतिपादित किया।
सामान्य सापेक्षता सिद्धांत ने एक नए संकल्पना को जन्म दिया, जिसके अनुसार : ‘यदि प्रकाश की एक किरण अत्यंत प्रबल गुरुत्वाकर्षण के क्षेत्र से गुजरेगी, तो वह मुड़ जाएगी।’ 1919 में ब्रिटेन के खगोल वैज्ञानिकों ने पूर्ण सूर्यग्रहण के अवसर पर किये गये अवलोकनों से आइंस्टाइन के इस पूर्वानुमान की सत्यता प्रमाणित की। अगले दिन आइंस्टाइन जब सोकर उठे तो उनकी दुनिया ही बदल गयी थी। उनके इस सिद्धांत को न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण सिद्धांत के बाद दुनिया का सबसे बड़ा आविष्कार माना गया। आम लोगों में यह धारणा बन गयी कि इस सिद्धांत का अन्वेषक अवश्य ही अलौकिक प्रतिभा सम्पन्न व्यक्ति होगा। आइंस्टाइन का नाम प्रतिभा का पर्याय बन गया। आइंस्टाइन के मस्तिष्क को एक चमत्कारी अति-मानवीय मस्तिष्क माना जाने लगा। दुनिया के इन सब मिथकों से दूर आइंस्टाइन सदैव सादगी की मूर्ति बने रहें और व्यक्तिपूजा के खोखलेपन को उजागर करते रहे।
हालाँकि क्वांटम यांत्रिकी का बीज बोने के बावजूद खुद आइंस्टाइन संभाविता आधारित क्वांटम यांत्रिकी को जीवन भर स्वीकार नहीं कर पाए। अलबत्ता, अपने विरोध के बावजूद आइंस्टाइन इसे सबसे सफल व्यवहारिक सिद्धांत मानते थे। इसी प्रकार से आइंस्टाइन ब्रह्मांड को स्थिर मानते रहे, परंतु जब एडविन हबल ने अपने प्रयोगों के आधार पर बताया कि ब्रह्मांड फ़ैल रहा है, तब आइंस्टाइन ने इसे अपने जीवन की सबसे बड़ी भूल माना। ‘मुझसे गलती हो गई’ यह कहना अपने आप में वैज्ञानिक मनोवृत्ति का एक महत्वपूर्ण लक्षण है। आइंस्टाइन ने हमे बता दिया कि विज्ञान में कोई भी सर्वज्ञानी नहीं होता!
आइंस्टाइन ने सिर्फ भौतिकी में ही क्रांति नहीं लायी बल्कि उन्होंने नस्लवाद, जातिवाद और युद्धवाद से भी लोहा लिया। वे जीवनभर शांति, अहिंसा, सामाजिक न्याय, मानवता और समाजवाद के पक्षधर रहे। आइंस्टाइन को जितना मीडिया प्रचार मिला, अब तक उतना प्रचार न्यूटन के अलावा किसी भी वैज्ञानिक को नहीं मिला। 14 मार्च, 1879 को  जन्में शांतिवादी और मानवतावादी वैज्ञानिक आइंस्टाइन की मृत्यु 18 अप्रैल, 1955 को हुई। टाइम पत्रिका ने आइंस्टाइन को बीसवी सदी का सबसे प्रभावशाली मनुष्य माना। दिक्, काल और ब्रह्मांड संबंधी हमारे समझ में विस्तार के साथ भौतिकी की दुनिया में अंतर्ज्ञान विरोधी अवधारणाओं को उखाड़कर प्रकृति को गहराई से समझने के प्रयास में युगांतरकारी आइंस्टाइन को सैदव याद रखा जायेगा।

Wednesday, 13 March 2019

न्यूटन के तीसरे नियम के संशोधन पर इंटरव्यू

*न्यूटन के तीसरे नियम के संशोधन पर अजय शर्मा जी का  इंटरव्यू*

*प्र.1*: न्यूटन की गति का तीसरा नियम क्या है? इसे कैसे समझा जा सकता है?
*अजय शर्माः* न्यूटन ने तीसरा नियम अपनी पुस्तक प्रिसीपिया मे 1686 में दिया था इसके अनुसार क्रिया (Action ) प्रतिक्रिया (Reaction)  हमेशा बराबर और विपरीत होते हैं। जो नियम मैंने सुझाया हे उसके अनुसार क्रिया प्रतिक्रिया के बराबर, कम या ज्यादा भी हो सकती है।

*प्र.2:* इस संबंध में आपने कौन से नये प्रयोग सुझाये है
*अजय शर्माः* मान लो एक 100 ग्राम भार की विशेष रबड़ की गेंद 1 मीटर ऊंचाई से फर्श पर गिरती है यह फर्श से टकराकर 1 मीटर ऊंचाई तक ऊपर उछलती है मान लो हम इस गेंद के आकार को बदल देते है और यह गोल से अर्धगोलाकार, त्रिभुज या शंकु के आकार की बना देते है है। वास्तव में आकार के बदलाव की वजह से अब 100 ग्राम की वस्तु 1 मीटर तक नही उछलती है। न्यूटन के नियम के अनुसार हर वस्तु को 1 मीटर की ऊंचाई तक उछलना चाहिए। अलग अलग संरचना ( लकड़ी, रबड़ ) और आकार के वस्तुएं भी ली जा सकती हैं।

*प्र.3:* क्या न्यूटन ने वस्तु के आकार के बारे में कुछ नही कहा?
*अजय शर्माः* बिल्कुल नहीं। न्यूटन का नियम सिर्फ भार (क्रिया) के बारे में ही कहता हैं आकार के बारे में कुछ नहीं। इस तरह न्यूटन के अनुसार आकार और कम्पोजिशन  पूरी तरह बेमानी है। संवेदनशील प्रयोगों से नियम की खामी जग जाहिर हो जाएगी।
*प्र.4:* आपने इसकी व्याख्या कैसे की है?
*अजय शर्माः* मैंने न्यूटन के नियम को बदला है। संशोधित नियम में एक नया घटक या फैटर आ जाता हे जो वस्तु आकार और सरंचना की व्याख्या करता है।

*प्र०5:* क्या वैज्ञानिक जगत आपसे सहमत
*अजय शर्माः* हां अमेरिकन एसोसिएशन आफ फिजिक्स टीचर्ज के प्रेजीडैंट प्रोफेसर गारडन रामसे ने 22 अगस्त, 2018 को लिखित रिपोर्ट में कहा है कि अजय शर्मा के प्रयोगों से न्यूटन का तीसरा नियम गलत सिद्ध हो सकता है। 105वीं वी इंडियन सांइस कांग्रेस ने भी अपनी प्रोसीडिग्ज (फिजिकल साइसिज) में मेरा शोध पत्र प्रकाशित किया  है।
(i) अमेरिकन एसोसियेसन आफ फिजिक्स टीचरज के प्रैजीटैड प्रोफैसर गौरडन रामसे ने अपनी 22 अगस्त 2018 की रिपोर्ट में लिखा है कि अजय के सुझाये प्रयोगों से न्यूटन की गति का तीसरा नियम गलत साबित हो सकता है।

(ii) स्प्रिंगर के जनरल ‘फाउडेशन आॅफ फिजिक्स’ के जनरल के फ्रांसीसी एडिटर-इन-चीफ प्रौफैसर कारलो रोबैली ने 10 जून 2018 की रिपोर्ट में लिखा है। कि अजय के प्रयोगों से न्यूटन के नियम की सम्भावित खामी दर्शायी जा सकती है।

(iii) 105वी इंडियन सांइस कांग्रेस 2018 के फिजिक्स सांइसिस के एडिटर ने भी अजय की शोध को प्रोसीडिग्ज में प्रकाषित किया है।
(vi) 4 दिसम्बर 2018 को इंडियन अकादमी आफ सांइसिज के जरनल ‘रेजोनेंस’ के एडिटर ने लिखा है कि अजय का कथन सही है कि न्यूटन के नियम को प्रयोग द्वारा परिमाणात्मक तौर सिद्ध करना आवष्यक हैं।
इस तरह विज्ञान जगत अजय के प्रयोगों की पुष्टि कर चुका है।

*प्र॰ 6:* तो इतने महत्वपूर्ण प्रयोग अब तक रूके क्यों है ?
*अजय शर्माः* इन प्रयोगों पर लगभग 8-10 लाख रुपये खर्च होगें ये प्रयोग इजनीयरिग रिसर्च की प्रयोगशाला में ही हो सकते हैं। मैं माननीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, साइस एंड टैक्नोलोजी मंत्री डाॅ हर्ष वर्धन, मुख्यमंत्री जय राम ठाकुर और शिक्षा मंत्री सुरेश भारद्धाज से प्रयोगों की सुविधाओं की मांग कर रहा हूँ।

*प्र॰7:*- लेकिन अन्तरिक्ष में जाने वाले राकेट भी न्यूटन के तीसरे नियम पर आधारित हैं।
*अजय शर्माः* रॉकेटों की खेज न्यूटन से लगभग 400 वर्ष पहले चीन में हो चुकी थी। अब वैज्ञानिक कहते है कि जो धुंआ, चिंगारिया, गैस आदि पीछे निकलती है, उसी से राकेट को आगे जाने के लिए धक्का लगता है। पर इस बात की परिमाणात्मक पुष्टि अभी तक इसरो, नासा ने नहीं की है। इस तरह न्यूटन का नियम यहां मोटे तौर पर ही सही है
दूसरी तरफ जब जहाज, हैलीकौप्टर उड़ते है तो उन्हें राकेट की तरह धुंआ, चिंगारिया, गैस आदि से कोई भी धक्का नहीं लगता है। तो खुद वैज्ञानिक न्यूटन के नियम को गलत साबित कर रहे हैं।

प्र॰8  इससे तो विज्ञान का आधारभूत ढांचा  ही बदल जाएगा ।
अजय शर्माः  अगस्त 2018 में एक अमरीकी वैज्ञानिक ने वाशिगटन कान्फरैस में कहा कि इन प्रयोगों की सफलता से भारत को नोबेल प्राइज मिल सकता है। इससे भारत का नाम दुनिया के हर स्कूल में जाएगा।
*Ajay Sharma*   Email   ajoy.plus@gmail.com, Mobile: *94184-50899*

Monday, 23 April 2012

स्टीफन हॉकिंग


प्रख्यात वैज्ञानिक स्टीफन हॉकिंग सत्तर वर्ष के हो गए। आठ जनवरी 1942 को इंग्लैंड में जन्मे हॉकिंग निस्संदेह हमारे वक्त के सबसे चर्चित और लोकप्रिय वैज्ञानिक हैं। हॉकिंग का 70 वर्ष का होना इस मायने में महत्वपूर्ण है कि 21 वर्ष की उम्र में उन्हें एमायोट्रॉफिक लेटरल स्क्लेरॉसिस नाम के कठिन रोग ने घेर लिया था। इस रोग में शरीर की मांसपेशियों को क्रमश: लकवा मार जाता है। इसके निदान के बाद मरीज की उम्र गिने-चुने वर्ष ही रह जाती है।
हॉकिंग को डॉक्टरों ने कहा था कि वह सिर्फ दो-तीन वर्ष जिएंगे। हॉकिंग उसके बाद लगभग पचास वर्ष निकाल चुके हैं। चिकित्साशास्त्र के इतिहास में इस रोग का कोई मरीज इतनी लंबी उम्र नहीं जिया, हालांकि यह रोग लगातार उन्हें ग्रसता गया। कुछ वर्ष पहले हॉकिंग भारत आए थे, तब तक उनके एक हाथ की एक छोटी उंगली गतिशील थी, जिसके जरिये वह कंप्यूटर की सहायता से काम करते थे।
अब उनके गाल की कुछ मांसपेशियां ही सक्रिय हैं, उनके चश्मे में एक संवेदनशील इंफ्रा रेड सेंसर लगा है, जो उन मांसपेशियों की हरकत को एक कंप्यूटर तक पहुंचाता है। यह कंप्यूटर इस तरह व्यक्त किए गए शब्दों को आवाज में ढालकर रिकॉर्ड करता है। इस प्रक्रिया से अपना एक भाषण तैयार करने लिए उन्हें कई दिनों तक मेहनत करनी पड़ती है।
1985 में उन्हें न्यूमोनिया हो गया था और उसके इलाज के दौरान उनकी आवाज चली गई थी। इतनी कठिन बीमारी से जूझते हुए वह शोधकार्य करते रहे, किताबें लिखते रहे, जबकि एक-एक शब्द लिखना उनके लिए कठिन कार्य था, दुनिया भर में भाषण देते रहे। वह पिछले दिनों कैंब्रिज यूनिवर्सिटी में गणित विषय के उसी पद से रिटायर हुए हैं, जिस पद पर कभी सर आइजैक न्यूटन हुआ करते थे। आज के कई नामी वैज्ञानिक उनके शोध छात्र रहे हैं।
स्टीफन हॉकिंग की महानता यह है कि उन्होंने अपने काम पर अपने रोग की छाया नहीं पड़ने दी, बल्कि वह कहते हैं कि बीमार होने और पहिएदार कुरसी पर जकड़े रहने की वजह से वह इधर-उधर के व्यवधानों से बचे रहे और अपना दिमाग विज्ञान की समस्याओं में लगाए रहे।
हॉकिंग को विज्ञान के क्षेत्र में तो मान्यता काफी पहले मिल गई थी, लेकिन उन्हें व्यापक लोकप्रियता 1988 में प्रकाशित उनकी किताब ए ब्रीफ हिस्ट्री ऑफ टाइमसे मिली, जिसकी आज तक एक करोड़ से ज्यादा प्रतियां बिक चुकी हैं। हॉकिंग सिर्फ जाने-माने वैज्ञानिक नहीं हैं, बल्कि वह उन लोगों में से हैं, जो विज्ञान को आम लोगों तक पहुंचाने का काम भी करते हैं।
वह कई टीवी कार्यक्रमों में भी दिखाई दिए या उससे जुड़े रहे। उनकी लोकप्रियता का राज उनकी दिलचस्प शैली और विज्ञान को व्यापक दार्शनिक सवालों से जोड़ना है। उनका बुनियादी काम अंतरिक्ष विज्ञान, ब्लैक होल्स, क्वांटम गुरुत्वाकर्षण वगैरा से जुड़ा है, लेकिन वह उसे ज्यादा बड़े सवालों से जोड़ते हैं। इस काम में उनके सहयोगी रोजर पेनरॉज भी काफी मदद करते हैं।
हॉकिंग को नोबेल पुरस्कार के अलावा संभवत: वे सभी पुरस्कार मिल चुके हैं, जो किसी वैज्ञानिक को मिल सकते हैं। लेकिन हॉकिंग का रोग भी बढ़ता जा रहा है। कई वर्षो से जो उनकी कंप्यूटरीकृत आवाज है, वह बदलना जरूरी हो गया है, क्योंकि उनके गालों की मांसपेशियां भी कमजोर होती जा रही हैं।
अक्सर यह होता है कि एक शब्द कहने में उन्हें पूरा एक मिनट लग जाता है। उनके हितचिंतक उनके लिए बेहतर से बेहतर कंप्यूटर प्रोग्राम बनाने में लगे रहते हैं और हमें कामना करनी चाहिए कि इस महान वैज्ञानिक और इंसान की आवाज हम लंबे वक्त तक सुन सकें।