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Thursday, 3 September 2015

क्रायोजेनिक तकनीक में आत्मनिर्भरता

शशांक द्विवेदी
डिप्टी डायरेक्टर (रिसर्च), मेवाड़ यूनिवर्सिटी
जीएसएलवी डी- 6 के जरिये अत्याधुनिक संचार उपग्रह जीसैट-6 का सफल प्रक्षेपण
दैनिक जागरण 
लगभग 20 साल की कड़ी मेहनत और कई असफल अभियानों के बाद आखिरकार भारत क्रायोजेनिक तकनीक में आत्मनिर्भर हो गया है । पिछले दिनों इसरो ने देश में निर्मित क्रायोजेनिक इंजन के जरिये रॉकेट जीएसएलवी डी- 6 का सफल प्रक्षेपण कर अंतरिक्ष के क्षेत्र में लंबी छलांग लगाकर नया इतिहास रच दिया। आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से प्रक्षेपित 49.1 मीटर लंबा यह रॉकेट 2117 किलोग्राम वजनी अत्याधुनिक और सबसे बड़े संचार उपग्रह जीसैट-6 को उसकी वांछित कक्षा में स्थापित करने में कामयाब रहा।  जीएसएलवी डी-6 के इस सफल प्रक्षेपण के साथ ही भारत विश्व का ऐसा छठा देश बन गया, जिसके पास अपना देसी क्रायोजेनिक इंजन है। अमेरिका, रूस, जापान, चीन और फ्रांस के पास पहले से ही यह तकनीक है। क्रायोजेनिक इंजन तकनीक से लैस चुनिंदा राष्ट्रों के क्लब में शामिल होने के बाद भारत को अपने भारी उपग्रहों के प्रक्षेपण के लिए किसी अन्य देश पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा। इसरो अब वह दूसरे देशों के भारी उपग्रहों का प्रक्षेपण कर और विदेशी मुद्रा अर्जित कर सकेगा ।
कई नाकामियों के बाद मिली सफलता
इससे पहले स्वदेशी तकनीक से विकसित क्रायोजेनिक इंजन युक्त जीएसएलवी का मात्र एक प्रक्षेपण सफल रहा है। पिछले साल 5 जनवरी 2014 को जीएसएलवी डी-5 ने संचार उपग्रह जीसैट-14 को पृथ्वी की कक्षा में सटीकता के साथ पहुंचाया था। जबकि इसके पहले जीएसएलवी के कुछ अभियान नाकाम रहें थे । इसलिए पिछले कुछ  नाकामियों के बाद देसी क्रायोजेनिक इंजन के साथ जीएसएलवी डी-6  रॉकेट के सफल प्रक्षेपण से भारतीय वैज्ञानिकों में खुशी की लहर दौड़ गयी । प्रक्षेपण में सफलता क्रायोजेनिक तकनीक में महारत हासिल करने की गारंटी भी है । यह जीएसएलवी के वाणिज्यिक उड़ानों के लिए तैयार होने का उद्घोष भी है और भारी संचार उपग्रहों के प्रक्षेपण में देश को आत्मनिर्भर बना देगा।

जीएसएलवी मिशन

मिशन
लॉन्च की तिथि
पेलोड
कक्षा
मिशन स्थिति
जीएसएलवी F06
25-Sep-2010
जीसैट-5P
जीटीओ
विफलता
जीएसएलवी डी 3
15-Nov-2010
जीसैट -4
जीटीओ
विफलता
जीएसएलवी F04
02-Sep-2007
इनसैट -4 सीआर
जीटीओ
आंशिक सफलता
जीएसएलवी F02
10-Sep-2006
इनसेट -4 सी
जीटीओ
विफलता
जीएसएलवी-F01
20-Sep-2004
एडुसैट
जीटीओ
सफलता
जीएसएलवी डी 2
08 मई, 2003
जीसैट-2
जीटीओ
सफलता
जीएसएलवी डी 1
18-Nov-2001
जीसैट-1
जीटीओ
सफलता
जीएस एल वी डी 5
05-JAN-2014
जीसैट-14
जीटीओ
सफलता
प्रभातखबर 


जीसैट-6
जीसैट-6 भारत का सबसे बड़ा अत्याधुनिक संचार उपग्रह है .जीसैट-6 का वजन 2117 किलोग्राम है जिसमें प्रोपेलेटों का वजन 1132 किलोग्राम और उपग्रह का शुद्ध भार 985 किलोग्राम है और ये सैटेलाइट अपने साथ 6 मीटर चौड़ा एक एंटिना ले जा रहा है, जिसका मकसद छोटे हैंडसेट के जरिये डाटा, वीडियो या आवाज को एक जगह से दूसरी जगह भेजना है। इसका इस्तेमाल डिफेंस यानी सामरिक सेक्टर में होगा ताकि दूर-दराज के इलाके में भी छोटे हैंडसेट के जरिये संपर्क साधा जा सके। जीसैट-6 एस बैंड और सी बैंड के माध्यम से संचार मुहैया कराएगा। इस उपग्रह की जीवन अवधि नौ वर्ष है।


जीसैट-6 इसरो का बनाया 25वां भू-स्थैतिक संचार उपग्रह है जबकि  जीसैट श्रृंखला का यह 12वां उपग्रह है। इसका सामरिक उपयोग करने वाले इसके सी बैंड में राष्ट्रीय बीम और एस बैंड में पांच स्पॉट बीमों जरिए संचार सुविधा ले सकेंगे। इसका एंटिना इसरो द्वारा बनाया गया अब तक का सबसे बड़ा एंटिना है।
वाकई में ये एक बड़ी कामयाबी है क्योंकि  इस मिशन के लिए जैसे मानक तय किए गए थे, उस पर भारतीय क्रायोजेनिक इंजन सौ फीसद खरा उतरते हुए जीसैट-6  को सफलतापूर्वक स्थापित कर दिया । अभी तक भारत दूसरे देशों की मदत से अपने 3.5 टन के संचार उपग्रह के प्रक्षेपण के लिए 500 करोड़ की फीस चुकाया करता था । जबकि जीएसएलवी यह काम लगभग 200 करोड़ में ही कर देगा । क्रायोजेनिक इंजन विकसित करने में बीस वर्षो की मेहनत रंग लाई है । भारत के लिए यह ऐतिहासिक दिन है। 2001 से ही देसी क्रायोजेनिक इंजन के माध्यम से जीएसएलवी का प्रक्षेपण इसरो के लिए एक गंभीर चुनौती बना हुआ था। जीएसएलवी के कई परीक्षणों में हमें असफलता मिल चुकी है इसलिए ये कामयाबी खास है ।
क्रायोजेनिक रॉकेट इंजन
राष्ट्रीय सहारा 
असल में जीएसएलवी में प्रयुक्त होने वाला  द्रव्य ईंधन इंजन में बहुत कम तापमान पर भरा जाता है, इसलिए ऐसे इंजन क्रायोजेनिक रॉकेट इंजन कहलाते हैं। इस तरह के रॉकेट इंजन में अत्यधिक ठंडी और द्रवीकृत गैसों को ईंधन और ऑक्सीकारक के रूप में प्रयोग किया जाता है। इस इंजन में हाइड्रोजन और ईंधन क्रमश ईंधन और ऑक्सीकारक का कार्य करते हैं। ठोस ईंधन की अपेक्षा यह कई गुना शक्तिशाली सिद्ध होते हैं और रॉकेट को बूस्ट देते हैं। विशेषकर लंबी दूरी और भारी रॉकेटों के लिए यह तकनीक आवश्यक होती है।
क्रायोजेनिक इंजन के थ्रस्ट में तापमान बहुत ऊंचा (2000 डिग्री सेल्सियस से अधिक) होता है। अत ऐसे में सर्वाधिक प्राथमिक कार्य अत्यंत विपरीत तापमानों पर इंजन व्यवस्था बनाए रखने की क्षमता अर्जित करना होता है। क्रायोजेनिक इंजनों में -253 डिग्री सेल्सियस से लेकर 2000 डिग्री सेल्सियस तक का उतार-चढ़ाव होता है, इसलिए थ्रस्ट चौंबरों, टर्बाइनों और ईंधन के सिलेंडरों के लिए कुछ विशेष प्रकार की मिश्र-धातु की आवश्यकता होती है।  फिलहाल भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने बहुत कम तापमान को आसानी से झेल सकने वाली मिश्रधातु विकसित कर ली है।
अन्य द्रव्य प्रणोदकों की तुलना में क्रायोजेनिक द्रव्य प्रणोदकों का प्रयोग कठिन होता है। इसकी मुख्य कठिनाई यह है कि ये बहुत जल्दी वाष्प बन जाते हैं। इन्हें अन्य द्रव प्रणोदकों की तरह रॉकेट खंडों में नहीं भरा जा सकता। क्रायोजेनिक इंजन के टरबाइन और पंप जो ईंधन और ऑक्सीकारक दोनों को दहन कक्ष में पहुंचाते हैं, को भी खास किस्म के मिश्रधातु से बनाया जाता है।, द्रव हाइड्रोजन और द्रव ऑक्सीजन को दहन कक्ष तक पहुंचाने में जरा सी भी गलती होने पर कई करोड़ रुपए की लागत से बना जीएसएलवी रॉकेट रास्ते में जल सकता है। इसके अलावा दहन के पूर्व गैसों (हाइड्रोजन और ऑक्सीजन) को सही अनुपात में मिश्रित करना, सही समय पर दहन प्रारंभ करना, उनके दबावों को नियंत्रित करना, पूरे तंत्र को गर्म होने से रोकना जरूरी है ।
जीएसएलवी (जियो सिंक्रोनस लॉन्च वीकल )
जीएसएलवी ऐसा मल्टीस्टेज रॉकेट होता है जो दो टन से अधिक वजनी उपग्रह को पृथ्वी से 36000 किमी. की ऊंचाई पर भू स्थिर कक्षा में स्थापित कर देता है ,जो विषुवत वृत्त या भूमध्य रेखा के ऊपर होता है। ये अपना कार्य तीन चरण में पूरा करते हैं। इनके आखिरी यानी तीसरे चरण में सबसे अधिक बल की जरूरत पड़ती है। रॉकेट की यह जरूरत केवल क्रायोजेनिक इंजन ही पूरा कर सकते हैं। इसलिए बगैर क्रायोजेनिक इंजन के जीएसएलवी रॉकेट बनाया जा सकना मुश्किल होता है।  दो टन से अधिक वजनी उपग्रह ही हमारे लिए ज्यादा काम के होते हैं इसलिए दुनिया भर में छोड़े जाने वाले 50 प्रतिशत उपग्रह इसी वर्ग में आते हैं। जीएसएलवी रॉकेट इस भार वर्ग के दो तीन उपग्रहों को एक साथ अंतरिक्ष में ले जाकर 36000 किमी. की ऊंचाई पर भू-स्थिर कक्षा में स्थापित कर देता है। यही जीएसएलवी रॉकेट की प्रमुख विशेषता है।

अंतरिक्ष बाजार में भारत की धमक
पिछले दिनों पांच ब्रिटिश उपग्रहों के सफल प्रक्षेपण के साथ ही भारत अब तक 19 देशों के 45 उपग्रहों को अंतरिक्ष भेज चुका है और भविष्य में नासा के कुछ उपग्रह भी प्रक्षेपित करने वाला है भारत इस .यह भारत की अंतरिक्ष बाजार में बढ़ती हुई धमक का स्पष्ट संकेत है क्योकि इतने कम बजट में भी इसरो बेहतरीन प्रदर्शन कर रहा है .भारत इस तरह के व्यावसायिक प्रक्षेपण करने वाला दुनिया का चौथा देश बन गया है । वास्तव में विदेशी उपग्रहों का यह सफल प्रक्षेपण भारत की अंतरिक्ष क्षमता की वैश्विक अभिपुष्टिहै। वास्तव में ये सफलता कई मायनों में बहुत खास है क्योंकि एक समय था जब भारत अपने उपग्रहों के प्रक्षेपण के लिए दूसरे देशों पर निर्भर था और आज भारत विदेशी उपग्रहों के प्रक्षेपण से अरबों डालर की विदेशी मुद्रा अर्जित कर रहा है । जिससे भारत को वाणिज्यिक फायदा हो रहा है । इसरो के कम प्रक्षेपण लगत की वजह से दूसरे देश भारत की तरफ लगातार आकर्षित हो रहें है । इसरो द्वारा 45 विदेशी उपग्रहों के प्रक्षेपण से देश के पास काफी विदेशी मुद्रा आई है।  इसके साथ ही अरबों डॉलर के अंतरिक्ष बाजार में भारत एक महत्वपूर्ण देश बनकर उभरा है ।   फ़िलहाल इसरो के कामर्शियल विंग का टर्नओवर 13 अरब रुपये हो गया है। चाँद और मंगल अभियान सहित इसरो अपने 100 से ज्यादा अंतरिक्ष अभियान पूरे करके पहले ही इतिहास रच चुका है ।
संभावनाओं के नए दरवाजें

जीसैट-6 प्रक्षेपण को लेकर इसरो के अध्यक्ष ए.एस. किरन कुमार ने कहा, ' रॉकेट का प्रदर्शन आशा के अनुरूप रहा और यह पूरी टीम के जबर्दस्त प्रयासों का परिणाम है । अब हमें क्रायोजेनिक इंजन की पेचीदगियां समझ में आ गई हैं।' इसरो प्रमुख के अनुसार भविष्य में हम जीएसएलवी के जरिये कई और संचार उपग्रहों का प्रक्षेपण करेंगे साथ ही इस रॉकेट का इस्तेमाल दूसरे चंद्रयान मिशन और जीआइसेट की लांचिंग में भी किया जाएगा । जीएसएलवी की यह सफलता इसरो के लिए बेहद ख़ास है क्योंकि दूरसंचार उपग्रहों, मानव युक्त अंतरिक्ष अभियानों या दूसरा चंद्र मिशन जीएसएलवी के विकास के बिना संभव नहीं था । इस प्रक्षेपण की सफलता से इसरो के लिए संभावनाओं के नए दरवाजें खुलेगे ।

Wednesday, 18 September 2013

अग्नि-5-कामयाबी के साथ चुनौतियाँ भी

शशांक द्विवेदी 
दैनिक जागरण 
एक बड़ी कामयाबी हासिल करते हुए भारत ने स्वदेशी तकनीक से तैयार इंटर कांटीनेंटल बैलास्टिक मिसाइल (आईसीबीएम )अग्नि-5 का सफल परीक्षण कर लिया है । रक्षा अनुसंधान व विकास संगठन के अनुसार यह मिसाइल सभी पैमानों पर खरा उतरी है। इस परीक्षण के दौरान तीन चरणों वाली अग्नि-पांच ने निर्धारित लक्ष्य पर सटीक वार किया। अस्सी फीसद से ज्यादा स्वदेशी उपकरणों से बनी इस मिसाइल ने भारत को नाभिकीय बम के साथ सुदूर लक्ष्य पर सटीक वार करने वाली अतिजटिल तकनीक का रणनीतिक रक्षा कवच दिया है। इसके जरिए भारत अपने किसी भी हमलावर को भरोसेमंद पलटवार क्षमता के साथ मुंहतोड़ जवाब दे सकता है। वास्तव में ये भारत के इतिहास की सबसे बड़ी सामरिक उपलब्धि है क्योंकि इस कामयाबी में स्वदेशी तकनीक  के साथ साथ आत्मनिर्भरता की तरफ बढ़ते कदम की भी पुष्टि होती है । अगर सकारात्मक सोच और ठोस रणनीति के साथ हम लगातार  अपनी रक्षा जरूरतों को पूरा करने की दिशा में हम कदम बढ़ाते  रहें है तो वो दिन दूर नहीँ जब हम खुद अपने नीति नियंता बन जायेगे और हमें किसी तकनीक,हथियार और उपकरण  के लिए दूसरों पर निर्भर  नहीं रहना पड़ेगा ।
भारत के सामरिक कार्यक्रम के लिए काफी महत्वपूर्ण यह मिसाइल 5000 किलोमीटर तक मारक क्षमता के साथ पूरे एशिया, ज्यादातर अफ्रीका व आधे से अधिक यूरोप तथा अंडमान से छोड़ने पर आस्ट्रेलिया तक पहुंच सकती है। यह एक टन तक के परमाणु बम गिरा सकती है। अग्नि-पांच भारत की सबसे तेजी से विकसित मिसाइल है, जिसे महज तीन साल में तैयार किया गया है। 
अत्याधुनिक तकनीक का इस्तेमाल
रक्षा अनुसंधान व विकास संगठन (डीआरडीओ) द्वारा विकसित अग्नि 5 के सफल परीक्षण के  साथ ही भारत  आईसीबीएम क्षमता रखने वाले दुनिया के चुनिन्दा मुल्कों में शामिल हो गया है । दुनिया में अभी तक केवल अमेरिका, ब्रिटेन, रूस, फ्रांस और चीन के पास ही आईसीबीएम को संचालित करने की क्षमता है । अग्नि-5 तीन स्तरीय, पूरी तरह से ठोस ईंधन पर आधारित तथा 17.5 मीटर लंबी मिसाइल है जो विभिन्न तरह के उपकरणों को ले जाने में सक्षम है। इसमें मल्टीपल इंडीपेंडेंटली टागेटेबल रीएंट्री व्हीकल (एमआरटीआरवी) भी विकसित किया जा चुका है। यह दुनिया के कोने-कोने तक मार करने की ताकत रखता है तथा देश का पहला कैनिस्टर्ड मिसाइल है। जिससे इस मिसाइल को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाना सरल होगा ।
कल्पतरु एक्सप्रेस 
अग्नि-पांच को अचूक बनाने के लिए भारत ने माइक्रो नेवीगेशन सिस्टम, कार्बन कंपोजिट मैटेरियल से लेकर कंप्यूटर व सॉफ्टवेयर तक ज्यादातर चीजें स्वदेशी तकनीक से विकसित कीं। अग्नि-5 का प्रयोग छोटे सेटेलाइट लांच करने और दुश्मनों के सेटेलाइट नष्ट करने में भी किया जा सकता है। एक बार इसे दागने के बाद रोकना मुश्किल है। इसकी रफ्तार गोली से भी ज्यादा तेज है और यह 1.5 टन परमाणु हथियार ले जाने में सक्षम है। तीन चरणों में काम करने वाली इस मिसाइल में ठोस ईधन का इस्तेमाल किया है। पहले चरण में रॉकेट इंजन मिसाइल को 40 किमी ऊपर ले जाता है, दूसरे चरण में यह 150 किमी धकेलता है और तीसरे चरण में यह धरती से 300 किमी जाता है। अंतत यह धरती से 800 किमी की दूरी तक जाता है। इसका प्रक्षेपण प्रणाली इतना सरल है कि इसे सड़क किनारे से भी छोड़ा जा सकता है। कुछ और प्रक्षेपण के बाद इसे 2014-15 तक सेना में शामिल किया जा सकेगा। 
भारत के लिए बहुत महत्वपूर्ण
आज के इस तकनीकी युग  में हजारों किलोमीटर दूर तक मार करने वाली बैलिस्टिक मिसाइलों की बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका होगी। क्योंकि  जिस तरह से चीन एशिया  में लगातार अपनी सैन्य ताकत को बढ़ा रहा है ऐसे में भारत को  भी अपनी सैन्य क्षमता को बढ़ाते हुए उसे अत्याधुनिक तकनीक से लैस करते जाना होगा । तभी देश बदलते समय के साथ विश्व में अपनी मजबूत सैन्य उपस्थिति दर्ज करा सकेगा ।
जमीन और  सीमा विवाद को लेकर जिस तरह चीन भारत को लगातार चुनौती दे रहा है और कट्टरपंथी ताकतों को बढ़ावा देकर पकिस्तान अपने सामरिक हित पूरा  कर रहा ऐसे में देश के पास लंबी दूरी की अग्नि-5 जैसी  बैलेस्टिक मिसाइलों का होना बेहद जरूरी है । देश की रक्षा जरूरतों को देखते  हुए अग्नि -5 का परीक्षण  काफी जरूरी हो गया था क्योंकि पड़ोस में चीन के पास बैलिस्टिक मिसाइलों का अंबार लगा हुआ है जिससे एक सैन्य असंतुलन पैदा हो गया था । चीन ने दो साल पहले ही 12 हजार किलोमीटर दूर तक मार करने वाली तुंगफंग-31 ए बैलिस्टिक मिसाइलों का विकास कर लिया है । लेकिन अब अग्नि 5 के सफल परिक्षण से कोई दुश्मन देश हम पर हावी नहीं हो सकेगा । 
आत्मनिर्भरता ही एक मात्र विकल्प
अग्नि-5  की सफलता ने भारत की सामरिक प्रतिरोधक क्षमता की पुष्टि कर दी है और डीआरडीओ ने अपनी ख्याति और क्षमताओं के अनुरूप ही अग्नि 5  को आधुनिक तकनीक के साथ विकसित किया है । लेकिन देश की रक्षा प्रणाली में आत्मनिर्भरता और रक्षा जरूरतों को समय पर पूरा करने की जिम्मेदारी सिर्फ डीआरडीओ की ही नहीं होनी चाहिए बल्कि ‘आत्म निर्भरता संबंधी जिम्मेदारी’  रक्षा मंत्रालय से जुड़े सभी पक्षों की होनी चाहिए। देश में स्वदेशी रक्षा प्रौद्योगिकी को बड़े पैमाने पर विकसित करने की जरुरत है और इस दिशा में जो भी समस्याएं है उन्हें सरकार द्वारा अबिलम्ब दूर करना होगा तभी सही मायनों में हम विकसित राष्ट्र का अपना सपना पूरा कर पायेगे । सरकार को यह महसूस करना चाहिए कि अत्याधुनिक आयातित प्रणाली भले ही बहुत अच्छी हो लेकिन कोई भी विदेशी प्रणाली लंबे समय तक अपनी रक्षा जरूरतों को पूरा नहीं कर सकती। सैन्य तकनीकों और हथियार उत्पादन में आत्मनिर्भरता देश की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बहुत जरुरी है । इसके साथ ही  भारत को हथियारों के आयात की प्रवृत्ति पर रोक लगानी चाहिए। 
प्रभातखबर 
अगर हम एक विकसित देश बनने की इच्छा रखते हैं तो  आतंरिक और बाहरी चुनौतियों से निपटने के लिए हमें दूरगामी रणनीति बनानी पड़ेगी । क्योंकि भारत  पिछले छह दशक के दौरान अपनी अधिकांश सुरक्षा जरूरतों की पूर्ति दूसरे देशों से हथियारों को खरीदकर कर रहा है । वर्तमान में हम अपनी सैन्य जरूरतों का 70 फीसदी हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर आयात कर रहे हैं।
रक्षा  जरूरतों के लिए भारत का दूसरों पर निर्भर रहना कई मायनों में खराब है एक तो यह कि अधिकतर दूसरे देश भारत को पुरानी रक्षा प्रौद्योगिकी ही देने को राजी है, और वह भी ऐसी शर्ताे पर जिन्हें स्वाभिमानी राष्ट्र कतई स्वीकार नहीं कर सकता। वास्तव में स्वदेशी व आत्मनिर्भरता का कोई विकल्प नहीं है। 
पिछले वर्षों में सैन्य  हथियारों ,उपकरणों की कीमत दोगुनी कर देने, पुराने विमान, हथियार व उपकरणों के उच्चीकरण के लिए मुंहमांगी कीमत वसूलने और सौदे में मूल प्रस्ताव से हट कर और कीमत मांगने के कई केस देश के सामने आ चुके है । वहीं अमेरिका “रणनीतिक रक्षा प्रौद्योगिकी में भारत को भागीदार नहीं बनाना चाहता । अमेरिका भारत को हथियार व उपकरण तो दे रहा है पर उनका हमलावर इस्तेमाल न करने व कभी भी इस्तेमाल की जांच के लिए अपने प्रतिनिधि  भेजने जैसी शर्मनाक शर्ते भी लगा रहा है। आयातित टैक्नोलाजी पर हम  ब्लैकमेल का शिकार भी हो सकते  है। वर्तमान  हालात ऐसे हैं कि हमें बहुत मजबूती के साथ आत्मनिर्भर होने की जरूरत है। वर्तमान समय में भारत दुनिया का सबसे बड़ा हथियार आयातक देश बनता जा रहा है। रक्षा मामले में आत्मनिर्भर बनने की तरफ मजबूती से कदम उठाने के अलावा और कोई विकल्प नहीं है ।
कामयाबी के साथ चुनौतियाँ भी 
अग्नि 5 के सफल परीक्षण के बाद रक्षा वैज्ञानिकों को दुश्मन मिसाइल को मार गिराने वाली इंटरसेप्टर मिसाइल और मिसाइल डिफेंस सिस्टम पर अधिक काम करने की जरुरत है । क्योंकि अमेरिका, रूस, फ्रांस, चीन जैसे देश इस सिस्टम को विकसित कर चुके हैं । मिसाइल डिफेंस सिस्टम के तहत दुश्मन देश के द्वारा दागी गई मिसाइल को हवा में ही नष्ट कर दिया जाता है । इस कामयाबी के साथ ही हमारी चुनातियाँ भी अधिक बढ़ गई है क्योंकि अब चीन और पाकिस्तान इसका जवाब देने के लिए हथियारों और उपकरणों की होड़ में शामिल हो जायेगें इसलिए हमें सतर्क रहते हुए अपने रक्षा कार्यक्रमों को मजबूत करते जाना होगा । इस कामयाबी को आगे बढ़ाते हुए हमें अपनी सैन्य क्षमताओ को स्वदेशी तकनीक से अत्याधुनिक बनाना है जिससे कोई भी दुश्मन देश हमारी तरफ देखने से पहले सौ बार सोचे ।

Wednesday, 29 May 2013

गर्मी /तापमान में वृद्धि पर अखबारों में मेरे विशेष लेख

प्रभातखबर 

देश भर में गर्मी का कहर
राजधानी दिल्ली सहित उत्तर भारत के कई प्रमुख शहरों में लोग भीषण गर्मी व लू से परेशान हैं। दिन में झुलसा देने वाली धूप हो रही है, जिससे लोगों का घर से बाहर निकलना दूभर हो गया है। जगह-जगह गर्म हवाएं भी चल रही हैं।  भीषण गर्मी और बढ़ते तापमान  से जनजीवन अस्त व्यस्त हो गया है । आने वाले दिनों में पारा 47 डिग्री के पार जाने की संभावनाएं जताई जा रही है।  19 मई रविवार को नागपुर देश का सबसे गर्म शहर बन गया।यहाँ 19 मई का दिन 19 सालों में सबसे अधिक गर्म दिन रहा। इस दिन यहां पारा 48 के पार चला गया।
इतनी भीषण गर्मी पड़ने की वजह क्या है, इसकी पड़ताल करते अखबारों में(प्रभातखबर ,डेली न्यूज ,जनसंदेश टाइम्स,ट्रिब्यून,सी एक्सप्रेस ) शशांक द्विवेदी के लेख 
Daily news

The Seaexpress

Jansandeshtimes

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