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Sunday, 29 March 2020

लैंग्लैंड्स प्रोग्राम यानी गणित की ग्रैंड यूनिफिकेशन थिअरी

चंद्रभूषण
इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से जुड़े प्रो. हरिश्चंद्र के शिष्य डॉ. रॉबर्ट लैंग्लैंड्स को गणित में पिछले पचास वर्षों से ‘लैंग्लैंड्स प्रोग्राम’ के लिए जाना जाता है, जिसको कुछ लोग भौतिकी की बहुप्रतीक्षित ‘ग्रैंड यूनिफिकेशन थिअरी’ की तर्ज पर गणित की जीयूटी भी कहते हैं। गणित के बारे में ज्यादातर लोगों की राय यही रहती आई है कि दो दूनी चार अब से हजारों साल पहले भी होता रहा होगा और आज भी यह दो दूनी चार ही होता है, फिर इसमें नई खोज की गुंजाइश कहां से बनती होगी?

इससे ऊंचे स्तर वाली समझ के लोग अप्लाइड मैथमेटिक्स यानी भौतिकी के जटिल हिसाब-किताब में काम आने वाली गणित में कुछ खोजबीन की भूमिका देख पाते हैं, बाकी उन्हें सिर्फ बौद्धिक श्रम लगता है। लेकिन मजे की बात यह कि ऐसे दुराग्रह खुद उच्च गणित के दायरे में भी मौजूद हैं, जिसका शिकार प्रो. लैंग्लैंड्स को होना पड़ा। उन्हें गणित के क्षेत्र में अपने दौर का एकमात्र अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार फील्ड्स मेडल सिर्फ इसलिए नहीं मिल सका, क्योंकि संबंधित वर्ष के निर्णायकों की नजर में उनका काम कुछ ज्यादा ही अमूर्त था!

वैसे भी फील्ड्स मेडल हर चार साल बाद 40 साल से कम उम्र वाले किसी गणितज्ञ को ही मिलता है। एक बार आप उससे चूक गए तो फिर जीवन भर के लिए चूक गए। असाधारण प्रतिभा वाले रॉबर्ट लैंग्लैंड्स ने अपना पहला महत्वपूर्ण काम यह साबित करने के रूप में किया कि घनों के योगफल के रूप में लिखी जा सकने वाली अभाज्य संख्याएं (प्राइम नंबर्स) हार्मोनिक एनालिसिस के जरिये भी निकाली जा सकती हैं। इस वक्तव्य के अटपटेपन पर हम बाद में आएंगे, पहले इसके शुरुआती हिस्से पर बात करते हैं।

रोजमर्रे के काम आने वाली गिनतियां अपने पीछे जो शाश्वत रहस्य छिपाए हुए हैं, उनका शुरुआती दरवाजा अभाज्य संख्याओं में दिखता है। यानी ऐसी संख्याएं, जिनमें खुद उनको और 1 को छोड़कर और किसी भी संख्या का भाग नहीं जाता। इनके बारे में कई प्राथमिक सिद्धांत हैं, जैसे यह कि इन्हें किसी भी प्राकृतिक संख्या के छह गुने से एक कम या ज्यादा की शक्ल में लिखा जा सकता है (जाहिर है, यह नियम 2 और 3 पर लागू नहीं होता।) इसी तरह एक तरीका प्राइम्स को दो वर्गों के जोड़ के रूप में लिखने का भी है, जैसे 41=16 (4 का वर्ग) + 25 (5 का वर्ग)।

इसी तरीके से देखें तो प्राइम्स का एक दुर्लभ समूह ऐसा भी है, जिसे तीन घनों के जोड़ के रूप में लिखा जा सकता है। जैसे, 73=1 (1 का घन) + 8 (दो का घन) + 64 (4 का घन)। अंकगणित के लिए घनों के योगफल का आम फॉर्म्युला हमेशा से एक समस्या रहा है और प्राइम नंबर्स के साथ इसका रिश्ता दोहरी मुश्किल वाला माना जाता रहा है। लेकिन रॉबर्ट लैंग्लैंड्स ने जब कहा कि इन्हें हार्मोनिक एनालिसिस के जरिये भी निकाला जा सकता है तो साठ के दशक में कई गणितज्ञों को लगा कि यह नौजवान सटक गया है।

हार्मोनिक एनालिसिस तरंगों के जोड़-घटाव के अध्ययन का गणित है और इसके साथ अंकगणित का तो तब दूर-दूर तक कोई रिश्ता ही नहीं माना जाता था। लैंग्लैंड्स प्रोग्राम दरअसल आपस में कोई रिश्ता न रखने वाली गणित की विभिन्न शाखाओं की तह में मौजूद किसी ज्यादा गहरे गणितीय सिद्धांत की तलाश का ही कार्यक्रम है, जिसके कुछ हिस्से खुद प्रो. लैंग्लैंड्स ने खोजे और बाकियों की खोज में दुनिया भर की गणितीय प्रतिभाएं लगी हुई हैं।

और तो और, उनके इस प्रस्तावित कार्यक्रम के आधार पर डॉ. ऐंड्रयू जे. वाइल्स ने तीन सौ साल से असिद्ध पड़े फर्मा के अंतिम प्रमेय को सिद्ध कर डाला, जिसके लिए उन्हें 2016 में ऐबेल प्राइज का हकदार पाया गया। यह भी दिलचस्प है कि खुद डॉ. लैंग्लैंड्स को गणित का नोबेल कहलाने वाले इस पुरस्कार से दो साल बाद, 2018 में नवाजा गया। काफी पहले से माना जाता रहा है कि लैंग्लैंड्स प्रोग्राम एक ऐसी गणितीय प्रस्थापना है, जो आने वाले दिनों में न सिर्फ गणित बल्कि भौतिकी की फ्रंटलाइन समझ का भी खाका बदल देगी।

Saturday, 13 April 2019

ब्लैक होल की छाया

ब्लैक होल की छाया : एक प्रश्नोत्तरी
चंद्रभूषण
हॉलिवुड की साई-फाई फिल्मों में ब्लैक होल किसी जादुई चीज की तरह आते हैं। ब्रह्मांड में इधर से उधर या समय में आगे-पीछे ले जाने वाली रहस्यमय चीजें। लेकिन अभी दुनिया में भारी उत्सुकता जगाने के बाद एक ब्लैक होल की जो तस्वीर जारी हुई है, उसमें यह खास शक्ल वाले किसी आकाशीय पिंड जैसा ही लग रहा है। क्या इसे ऐंटी-क्लाइमैक्स समझा जाए?

- ब्लैक होल भौतिकी का एक चरम बिंदु है। अभी पचास साल पहले तक शीर्ष वैज्ञानिकों को भी यह सिर्फ एक खयाली चीज लगती थी। खुद आइंस्टाइन को भी इसके होने का भरोसा नहीं था। फिर बहुत सारे प्रेक्षणों से ब्लैक होल जैसी ही चीजों की मौजूदगी का अंदाजा मिलने लगा। यानी तारों से बहुत ज्यादा भारी कोई चीज, जो किसी भी सूरत में, धुंधली से धुंधली शक्ल में भी नजर नहीं आती। अभी जो तस्वीर आप देख रहे हैं, वह ब्लैक होल की नहीं उसकी छाया की तस्वीर है।
   स्थान और समय से जुड़े इसके रहस्य आज भी ज्यों के त्यों हैं और उनकी आजमाइश का कोई जरिया अभी किसी के पास नहीं है। लेकिन इतनी विचित्र चीज का कुछ भी आंखों के सामने मौजूद होना खुद में एक जिंदा चमत्कार है। ऐंटी-क्लाइमैक्स क्यों, एक लंबे क्लाइमैक्स की शुरुआत कहें इसे।

ब्लैक होल की छाया? जिस चीज की कोई शक्ल ही नहीं, उसकी छाया? यह क्या गड़बड़झाला है?

- हां, यह काफी टेढ़ी बात है फिर भी सच के करीब है। अलबत्ता इसे ब्लैक होल की तस्वीर बताना सिरे से झूठी बात होगी। यूं समझिए कि ब्लैक होल बिना लंबाई-चौड़ाई-गहराई वाला एक ऐसा छेद है, जिसमें सारी चीजें, यहां तक कि रोशनी भी गिरती जाती है। फिर भी भरना तो दूर, वजन बढ़ने के साथ इसकी भूख और-और बढ़ती चली जाती है। इतनी खतरनाक चीज के इर्द-गिर्द एक इलाका ऐसा भी होता है, जिसके बाहर कोई चीज सुरक्षित रह सकती है और उसके बारे में हम कुछ जान भी सकते हैं, लेकिन जिसका भीतरी दायरा लांघते ही वह ब्लैक होल में गुम हो जाती है और हम नहीं जान सकते कि इसके बाद उसका क्या हुआ।
   इस दायरे को घटना क्षितिज या इवेंट होराइजन का नाम दिया गया है। तस्वीर में जो मोटा सुनहला कंगन हमें दिखाई पड़ रहा है, उससे ब्लैक होल के घटना क्षितिज के करीबी माहौल का अंदाजा मिल रहा है। खुद यह तस्वीर प्रकाश किरणों के ब्लैक होल के इर्द-गिर्द घूम जाने से बनी है, जो लेंस से किसी चीज की छाया बनने जैसा है।

इस तस्वीर और इसके ऑब्जेक्ट के बारे में कुछ और बताइए। क्या इसने ब्लैक होलों के बारे में हमारी कोई राय अंतिम तौर पर बदली है?

- हमारी आकाशगंगा के पड़ोस में इससे कई गुना ज्यादा बड़ी एक और आकाशगंगा है, जिसका नाम वर्गो-ए या मेसियर-87 है। इसके बीचोबीच, धरती से साढ़े पांच करोड़ प्रकाशवर्ष की दूरी पर हमारे सूरज का साढ़े छह अरब गुना वजनी एक ब्लैक होल मौजूद है। इसके दम का अंदाजा आप इस बात से लगा सकते हैं कि तस्वीर के कंगन में जो कलाई वाली खाली जगह है, उसकी चौड़ाई सूरज से धरती की दूरी की चालीस गुनी, लगभग दस अरब किलोमीटर है।
   और बाहर जो कंगन वाला सोना दमक रहा है, उसका तापमान चार से छह अरब डिग्री के बीच है। इसे समझने के लिए सूरज भी नाकाफी है क्योंकि उसके सबसे गरम हिस्से कोरोना का तापमान भी 10 लाख डिग्री से ऊपर नहीं जाता। इतने प्रचंड आकार और दमक वाला कंगन सिर्फ दूरी और बीच की धुंध के चलते अबतक हमारी नजरों से ओझल था।
   आकाश की सबसे धुंधली चीजों के प्रेक्षण का शास्त्र रेडियो एस्ट्रॉनमी लंबे समय से इसे देखने-परखने की कोशिश में जुटा था। इवेंट होराइजन टेलीस्कोप परियोजना में उसने कई ताकतवर रेडियो टेलीस्कोपों को इस तरह एक साथ आजमाया है कि पूरी धरती ही एक विराट टेलीस्कोप बन गई है! रही बात राय बदलने की तो ब्लैक होल में स्पेसशिप घुसा देना आगे अब आपको शायद ही किसी फिल्म में दिखे।

Saturday, 6 April 2019

कैसे बचें समुद्री जीव

चंद्रभूषण
अगर आप अपने इर्द-गिर्द के पर्यावरण ध्वंस से परेशान हैं तो जरा समुद्री जीवों पर आई विपत्ति के बारे में सोचकर देखें। टेक्नॉलजी ने जलजीवों के शिकार की क्षमता बहुत बढ़ा दी है और गहरे समुद्रों में जैविक सर्वनाश पर नजर रखने के लिए कोई सरकारी या गैर-सरकारी अथॉरिटी भी नहीं है। ऊपर से ग्लोबल वार्मिंग ने विशाल समुद्री इलाकों की ऑक्सीजन चूसकर उन्हें बंजर बना दिया है। समुद्री जीव वहां रहना तो दूर उधर से गुजरने में भी डरते हैं।

इन बुरी खबरों के बीच अकेली अच्छी खबर यह है कि लगातार घटती समुद्री पकड़ ने सरकारों को जता दिया है कि यह किस्सा यूं ही चलता रहा तो अगले दस-बीस वर्षों में ह्वेलिंग के अलावा समुद्रों से मछली, केकड़ा, झींगा पकड़ने के कारोबारों पर भी ताला पड़ जाएगा। इससे कई छोटी अर्थव्यवस्थाएं तबाह होंगी और मानवजाति प्रोटीन के सबसे बड़े स्रोत से वंचित हो जाएगी। पर्यावरण पर इसका क्या असर पड़ेगा, कोई नहीं जानता।

इन आशंकाओं के मद्देनजर तीन वैज्ञानिक समूहों ने ग्रीनपीस, प्यू ट्रस्ट और नेशनल ज्योग्राफिक की परियोजनाओं के तहत सारे समुद्रों का सर्वे किया और अभी अपनी रिपोर्टें संयुक्त राष्ट्र के सामने पेश करने की तैयारी में हैं। इन रिपोर्टों में समुद्री सतह के नीचे मौजूद सारे पर्वतों, गर्तों और गर्म पानी के स्रोतों के ब्यौरे शामिल हैं और यह जिक्र भी है कि किस जीवजाति के सर्वाइवल के लिए कौन सा इलाका ज्यादा महत्वपूर्ण है।

ऐसा सर्वे कुछ साल पहले तक संभव नहीं था क्योंकि इसके लिए जरूरी टेक्नॉलजी ही दुनिया में मौजूद नहीं थी। लेकिन अभी समुद्री जीवों की टैगिंग और जीपीएस के जरिये समुद्र के हरेक वर्ग किलोमीटर के साथ किसी जीव के रिश्ते को लेकर पूरी जानकारी हासिल की जा सकती है। वैज्ञानिकों का कहना है कि एक वैश्विक संधि के जरिए अगर 40 फीसदी समुद्रों में शिकार और उत्खनन पर रोक लगाई जा सके तो 30 फीसदी समुद्री जीवजातियों की निरंतरता सुनिश्चित की जा सकेगी।

Saturday, 30 March 2019

लैंग्लैंड्स प्रोग्राम यानी गणित की ग्रैंड यूनिफिकेशन थियरी

लैंग्लैंड्स प्रोग्राम यानी गणित की ग्रैंड यूनिफिकेशन थिअरी
चंद्रभूषण
इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के प्रो. हरिश्चंद्र के शिष्य डॉ. रॉबर्ट लैंग्लैंड्स को गणित में पिछले पचास वर्षों से ‘लैंग्लैंड्स प्रोग्राम’ के लिए जाना जाता है, जिसको कुछ लोग भौतिकी की बहुप्रतीक्षित ‘ग्रैंड यूनिफिकेशन थिअरी’ की तर्ज पर गणित की जीयूटी भी कहते हैं। गणित के बारे में ज्यादातर लोगों की राय यही होती है कि दो दूनी चार अब से हजारों साल पहले भी होता रहा होगा और आज भी यह दो दूनी चार ही होता है, फिर इसमें नई खोज की गुंजाइश कहां से बनती होगी?

इससे ऊंचे स्तर वाली समझ के लोग अप्लाइड मैथमेटिक्स यानी मुख्य रूप से भौतिकी के जटिल हिसाब-किताब में काम आने वाली गणित में कुछ खोजबीन की भूमिका देख पाते हैं। लेकिन मजे की बात यह कि ऐसे दुराग्रह खुद उच्च गणित के दायरे में भी मौजूद हैं, जिसका शिकार प्रो. लैंग्लैंड्स को होना पड़ा। उन्हें गणित के क्षेत्र में अपने दौर का एकमात्र अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार फील्ड्स मेडल सिर्फ इसलिए नहीं मिल सका, क्योंकि संबंधित वर्ष के निर्णायकों की नजर में उनका काम कुछ ज्यादा ही अमूर्त था!

वैसे भी फील्ड्स मेडल हर चार साल बाद 40 साल से कम उम्र वाले किसी गणितज्ञ को ही मिलता है। एक बार आप उससे चूक गए तो फिर जीवन भर के लिए चूक गए। असाधारण प्रतिभा वाले रॉबर्ट लैंग्लैंड्स ने अपना पहला महत्वपूर्ण काम यह साबित करने के रूप में किया कि घनों के योगफल के रूप में लिखी जा सकने वाली अभाज्य संख्याएं (प्राइम नंबर्स) हार्मोनिक एनालिसिस के जरिये भी निकाली जा सकती हैं। इस वक्तव्य के अटपटेपन पर हम बाद में आएंगे, पहले इसके शुरुआती हिस्से पर बात करते हैं।

रोजमर्रे के काम आने वाली गिनतियां अपने पीछे जो शाश्वत रहस्य छिपाए हुए हैं, उनका शुरुआती दरवाजा अभाज्य संख्याओं में दिखता है। यानी ऐसी संख्याएं, जिनमें खुद उनको और 1 को छोड़कर और किसी भी संख्या का भाग नहीं जाता। इनके बारे में कई प्राथमिक सिद्धांत हैं, जैसे यह कि इन्हें किसी भी प्राकृतिक संख्या के छह गुने से एक कम या ज्यादा की शक्ल में लिखा जा सकता है (जाहिर है, यह नियम 2 और 3 पर लागू नहीं होता।) इसी तरह एक तरीका प्राइम्स को दो वर्गों के जोड़ के रूप में लिखने का भी है, जैसे 41=16 (4 का वर्ग) + 25 (5 का वर्ग)।

इसी तरीके से देखें तो प्राइम्स का एक दुर्लभ समूह ऐसा भी है, जिसे तीन घनों के जोड़ के रूप में लिखा जा सकता है। जैसे, 73=1 (1 का घन) + 8 (दो का घन) + 64 (4 का घन)। अंकगणित के लिए घनों के योगफल का आम फॉर्म्युला हमेशा से एक समस्या रहा है और प्राइम नंबर्स के साथ इसका रिश्ता दोहरी मुश्किल वाला माना जाता रहा है। लेकिन रॉबर्ट लैंग्लैंड्स ने जब कहा कि इन्हें हार्मोनिक एनालिसिस के जरिये भी निकाला जा सकता है तो साठ के दशक में कई गणितज्ञों को लगा कि यह नौजवान सटक गया है।

हार्मोनिक एनालिसिस तरंगों के जोड़-घटाव के अध्ययन का गणित है और इसके साथ अंकगणित का तो तब दूर-दूर तक कोई रिश्ता ही नहीं माना जाता था। लैंग्लैंड्स प्रोग्राम दरअसल आपस में कोई रिश्ता न रखने वाली गणित की विभिन्न शाखाओं की तह में मौजूद किसी ज्यादा गहरे गणितीय सिद्धांत की तलाश का ही कार्यक्रम है, जिसके कुछ हिस्से खुद प्रो. लैंग्लैंड्स ने खोजे और कइयों की खोज में दुनिया भर की गणितीय प्रतिभाएं लगी हुई हैं।

और तो और, उनके इस प्रस्तावित कार्यक्रम के आधार पर डॉ. ऐंड्रयू जे. वाइल्स ने तीन सौ साल से असिद्ध पड़े फर्मा के अंतिम प्रमेय को सिद्ध कर डाला, जिसके लिए उन्हें 2016 में ऐबेल प्राइज का हकदार पाया गया। यह भी दिलचस्प है कि खुद डॉ. लैंग्लैंड्स को गणित का नोबेल कहलाने वाले इस पुरस्कार से दो साल बाद, 2018 में नवाजा गया। काफी पहले से माना जाता रहा है कि लैंग्लैंड्स प्रोग्राम एक ऐसी गणितीय प्रस्थापना है, जो आने वाले दिनों में न सिर्फ गणित बल्कि भौतिकी की फ्रंटलाइन समझ का भी खाका बदल देगी।

दूध और चीन का दिलचस्प कनेक्शन

दूध पर चीनी क्यों हुए लट्टू
शशांक द्विवेदी
किसी देश के आम लोगों का दूध पीना भी क्या दुनिया के लिए चिंता का विषय हो सकता है? क्यों नहीं, बशर्ते उसकी आबादी संसार में सबसे ज्यादा हो और दूध पीने की परंपरा वहां जड़ से शुरू हो रही हो। जाहिर है, हम पड़ोसी मुल्क चीन की बात कर रहे हैं। वहां की 95 फीसदी आबादी हान जाति की है, जिसका शरीर वयस्क होने के बाद दूध नहीं हजम कर पाता। आंकड़ों में कहें तो 1950 में वहां डेरी के नाम पर कुल 1 लाख 20 हजार देसी गायें दर्ज की गई थीं, जिनमें ज्यादातर इनर मंगोलिया में और कुछ तिब्बत में थीं।

यहां यह बताना जरूरी है कि संसार में सबसे पहले दूध पिये जाने के प्रमाण तुर्की में (ईसा से 7000 साल पूर्व) मिलते हैं, लेकिन सबसे ज्यादा तरह के जानवर अभी मंगोलिया में ही दुहे जाते हैं। वहां सात जानवरों की बाकायदा अलग डेरियां चलती हैं। इसके विपरीत हमारे यहां सिर्फ गाय का दूध अलग मिल पाता है, वह भी अब जाकर। गाय के अलावा हमारे यहां भैंस और बकरी दुही जाती है, कहीं-कहीं भेड़ और ऊंट भी। लेकिन इन पांच के सिवा छठां दुधारू जानवर खोजना मुश्किल है।

इनर मंगोलिया चीन का अभिन्न अंग होने के साथ-साथ मंगोलियाई सभ्यता का हिस्सा भी है। स्वाभाविक है कि चीन का ज्यादातर दूध वहीं से सप्लाई होता है। पारंपरिक रूप से चीनी कुलीन वर्ग दूध को बर्बर मंगोल हमलावरों की बदबूदार खाद्य सामग्री मानता था। गाय वहां मुख्यतः बीफ के लिए ही पाली जाती थी। लेकिन 1984 में टीवी के फैलाव के बाद चीनियों ने पहली बार लॉस एंजिलिस ओलिंपिक लाइव देखा तो लंबे-चौड़े ताकतवर विदेशियों को देखकर दंग रह गए।

उन्हें यह जानकारी भी मिली कि द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद जापान पर अमेरिकी कब्जे के दौरान वहां की डाइट में दूध और अंडे के प्रवेश से जापानियों की औसत लंबाई एक पीढ़ी के अंदर एक इंच बढ़ गई थी। फिर तो दूध के प्रति इस नए आकर्षण को भांपकर चीन की कम्यूनिस्ट सरकार ने दूध के प्रचार की झड़ी लगा दी और इसे घर-घर पहुंचाने की कोशिशें भी शुरू कर दीं। इस एहतियात के साथ कि बच्चों के मां का दूध छोड़ने के बाद उन्हें हर दिन गाय का दूध पिलाया जाए।

नतीजा यह रहा कि 2015 की गणना में वहां 1 करोड़ 30 लाख खूब दूध देने वाली जर्सी गाएं दर्ज की गईं। ये गायें पहले छिटपुट किसान पालते थे, लेकिन अभी ये बड़े-बड़े हाइली मैकेनाइज्ड फार्मों में पाली जाती हैं। डर इस बात का है कि चीनियों में दूध की मांग इसी रफ्तार से बढ़ती गई तो धरती का एक बड़ा इलाका बंजर हो जाएगा। कारण? पर्यावरणविदों के पास मोटा हिसाब है कि प्रकृति को 1 लीटर दूध बनाने के लिए 1022 लीटर पानी खर्च करना पड़ता है!

Sunday, 24 March 2019

करोड़ो साल पुराने जीवाश्मों का खजाना

52 करोड़ साल पुराने जीवाश्मों का खजाना
चंद्रभूषण
जीवाश्मशास्त्रियों के लिए मूसलों से ढोल बजाने का वक्त है। दक्षिण-मध्य चीन के हूपेई प्रांत में एक छोटी सी पहाड़ी नदी तानश्वी के किनारे उन्हें अतिप्राचीन जीवाश्मों का सबसे बड़ा खजाना प्राप्त हुआ है। पत्थरों में दर्ज जीवजगत के प्रारंभिक दौर का इतना सुंदर नजारा संसार भर में इससे पहले कभी देखने को नहीं मिला था।

जीवाश्मों की खोज में निकली एक यूनिवर्सिटी टीम छिंगच्यांग नाम की जगह पर नदी किनारे बैठी लंच कर रही थी कि तभी एक वैज्ञानिक की नजर एक तरफ के चट्टानी करार के पैटर्न पर गई। इसमें भूरी और काली लहरें बनी थीं, जिनसे सुदूर अतीत में किसी समुद्री भूस्खलन का अंदाजा मिलता था।

फिर उन्होंने चट्टानी परतों को एहतियात से अलगाया तो उन्हें बिल्कुल पास-पास कई हजार समुद्री जानवरों के फॉसिल मिल गए। इनमें 101 जीवजातियों की पहचान की गई, जिनमें आधी से ज्यादा ऐसी हैं, जिन्हें पहली बार देखा गया है। पहचाने गए जीवों में 4 सेंटीमीटर का एक मड ड्रैगन भी है, जिसकी समुद्री कीचड़ में पाई जाने वाली मौजूदा नस्ल कुछ मिलीमीटर से ज्यादा बड़ी नहीं होती।

51 करोड़ 80 लाख साल पुराने ये जीवाश्म इतने संरक्षित हैं कि इनकी आंखें, तमाम मुलायम मांसपेशियां और कई के तो बाल से भी पतले अंग बिल्कुल साफ नजर आ रहे हैं। दरअसल इन सारे जीवों का संबंध कैंब्रियन युग (53 करोड़ से 49 करोड़ साल पूर्व) से है और इनके इतने सुघड़ संरक्षण की वजह यह है कि किसी भूकंप में दबकर ये समुद्र की तली में पहुंचे होंगे और वहीं ज्यों के त्यों पड़े रह गए होंगे।

Sunday, 10 March 2019

जूनो ने बदली बृहस्पति की समझ

चंद्र भूषण
सूर्यदेव के ज्येष्ठ पुत्र के बारे में हालिया समझ के लिए पढ़ें पिछले साल की यह पोस्ट, इस जोड़ के साथ कि कई और बुनियादी जानकारियाँ हमें सौंपकर जूनो यान पिछली जुलाई में बृहस्पति में ही विलीन हो चुका है।

जूनो ने बदली बृहस्पति की समझ                                                                                                                                                      

करीब 20 महीने से नासा का अंतरिक्ष यान जूनो बृहस्पति ग्रह के चक्कर लगा रहा है। इसके भेजे धुआंधार आंकड़ों के विश्लेषण से निकाले गए नतीजे पिछले आठ-नौ महीनों से शोध पत्रिकाओं में छप रहे हैं। इसे सूचना क्रांति का कमाल कहना चाहिए कि इतने कम समय में इसने हमारे सौरमंडल के सबसे विशाल ग्रह के बारे में विशेषज्ञों की राय को कई पहलुओं से बदल दिया है। इतना ही नहीं, इसने गैसीय ग्रहों की हमारी समझ को भी काफी महीन बनाया है, जो अन्य तारों के इर्द-गिर्द पाए जाने वाले इस बिरादरी के और ग्रहों को समझने में भी हमारे काम आएगी।

संदर्भ के लिए बता दें कि अमेरिकी अंतरिक्ष संस्था नासा ने 5 अगस्त 2011 को यह स्पेसक्राफ्ट बृहस्पति के लंबे सफर के लिए रवाना किया था। प्रेक्षण के लिए इस पर सिर्फ दो तरह के उपकरण लगे हैं। तस्वीरें लेने के लिए कैमरे और गुरुत्वाकर्षण में बारीक बदलावों का अध्ययन करने के लिए बेहद संवेदनशील गुरुत्वमापी। शोध पत्रिका ‘नेचर’ में हाल में छपी चार अध्ययन रिपोर्टों और पिछले साल बृहस्पति पर एक जमाने से जारी तूफान को लेकर आई एक रिपोर्ट पर बात करने से पहले हम थोड़ी चर्चा इस ग्रह के बारे में अब तक की कुछ जानकारियों पर भी कर लेते हैं।

सौरमंडल में सूरज से दूर जाने के क्रम में पांचवें नंबर पर पड़ने वाला बृहस्पति वैज्ञानिक दायरे में एक असफल तारा (फेल्ड स्टार) भी कहलाता है। यानी इसका वजन अगर तीन-चार गुना और होता तो शायद यह सबसे निचले स्तर का तारा (ब्राउन ड्वॉर्फ) बन गया होता। अपने ग्रह से तुलना करें तो इसका आकार 1321 पृथ्वियों के बराबर है, जबकि इसकी तोल 317.8 पृथ्वियों जितनी है। जाहिर है, बृहस्पति का घनत्व पृथ्वी से काफी कम है। और तुलना अगर अपने तारे से करनी हो तो इतना ही कहना काफी होगा कि तराजू एक पलड़े पर सूरज को रख दिया जाए तो डंडी सीधी रखने के लिए दूसरे पलड़े पर 1047 बृहस्पति रखने पड़ जाएंगे।

इस ग्रह के आकार का अंदाजा इस बात से लगा सकते हैं कि 12 पृथ्वियां एक सीध में रख दें तो बृहस्पति की चौड़ाई मिल जाएगी। लेकिन इतना बड़ा ग्रह सिर्फ 10 घंटे में अपनी धुरी पर पूरा घूम जाता है। यानी इसके घूमने की रफ्तार पृथ्वी की तकरीबन सवा सौ गुनी है। सौरमंडल के चारों ठोस भीतरी सदस्यों बुध, शुक्र, पृथ्वी और मंगल के विपरीत बृहस्पति एक गैस जायंट है। 90 फीसद हाइड्रोजन और 10 फीसद हीलियम से बनी बेहद हल्की चीज, जिसमें थोड़ी-थोड़ी मीथेन और अमोनिया की मौजूदगी इसकी गंध को गंदी, दलदली जगहों जैसी बनाती है। लेकिन इस ग्रह की सबसे बड़ी खासियत है इस पर चलने वाले तूफान, जो सैकड़ों वर्षों से इसे रहस्यों की खान बनाए हुए हैं।

गैलीलियो ने अपनी ही बनाई दूरबीन के जरिये लंबे प्रेक्षणों के बाद सन 1610 में इस ग्रह पर लाल, पीली, सफेद पट्टियों की मौजूदगी दर्ज की थी। बाद में इस पर एक बड़ा लाल धब्बा भी दर्ज किया गया, जिसे द ग्रेट रेड स्पॉट कहते हैं। टेलिस्कोपों के ताकतवर होने के साथ पता चला कि इसकी पट्टियां पूरब से पश्चिम और पश्चिम से पूरब की ओर चलने वाली तेज हवाएं (जेट स्ट्रीम्स) हैं, जबकि ग्रेट रेड स्पॉट संभवत: 300 वर्षों से चल रहा 16,350 किमी दायरे वाला एक तूफान। पिछले साल के मध्य में जूनो के प्रेक्षणों पर ही आधारित एक रिपोर्ट में बताया गया कि इस तूफान का आकार घट रहा है। 1979 में ज्यादा लंबे सफर पर निकले दोनों वॉएजर यानों ने इसका क्षेत्रफल जितना बताया था, फिलहाल यह उसका एक तिहाई ही रह गया है।

खगोलशास्त्रियों में बृहस्पति से जुड़ी सबसे बड़ी उत्सुकता यह चली आ रही है कि इसकी कोई सतह भी है या नहीं, और अगर है तो यह बाहर से नजर आने वाली बादलनुमा संरचना से कितने नीचे है। जूनो ने इस सवाल का पुख्ता जवाब दे दिया है। इजरायल के योहाई कैस्पी की टीम ने जूनो के भेजे गुरुत्व के आंकड़ों में मौजूद विसंगतियों (एनॉमलीज) का अध्ययन किया, जबकि फ्रांस के त्रिस्तान गुइलो की टीम ने इनकी सुसंगति (कॉन्सिस्टेंसी) का। उपमा में इन दोनों अध्ययनों को एक विशाल कागज की सफेदी और उस पर मौजूद धब्बों के अध्ययन जैसा माना जा सकता है। हालांकि ये अध्ययन कागज जैसी टू-डाइमेंशनल (सिर्फ लंबाई-चौड़ाई तक सीमित) सतह के बजाय थ्री-डाइमेंशनल (लंबी-चौड़ी के साथ-साथ गहरी भी) सतह के ब्यौरे सामने लाते हैं।

दोनों ही अध्ययनों का निष्कर्ष यह है कि बादलों जैसी दिखने वाली ऊपरी सतह के तीन हजार किलोमीटर नीचे तक इस ग्रह की गैसें तेज-रफ्तार पट्टियों की शक्ल में घूमती हैं, लेकिन वहां पहुंचकर ये स्थिर हो जाती हैं। यानी बृहस्पति की सतह बाहर से दिखने वाले बादलों के तीन हजार किलोमीटर नीचे पड़ती है, हालांकि यह चट्टानी ग्रहों की तरह ठोस न होकर एक द्रव सतह है। जूनो के भेजे आंकड़ों के आधार पर की गई दो और बड़ी खोजों का संबंध इसके उत्तरी और दक्षिणी ध्रुवीय इलाकों के बीच मौजूद अंतर से है।

पृथ्वी के सबसे ताकतवर टेलिस्कोप भी बृहस्पति की खास स्थिति के चलते इसके ध्रुवीय इलाकों का अध्ययन करने में अक्षम सिद्ध हुए हैं। लेकिन इटली के अल्बर्टो ऐड्रियानी की टीम ने पाया कि इसके उत्तरी ध्रुव पर जारी एक विशाल चक्रवात के इर्दगिर्द एक समबाहु अष्टभुज के आठों कोनों पर एक-एक चक्रवात स्थित हैं, जबकि दक्षिणी ध्रुव पर ऐसे ही ध्रुवीय चक्रवात के इर्दगिर्द एक समबाहु पंचभुज के पांचों कोनों पर एक-एक चक्रवात डेरा जमाए हुए हैं। दोनों ध्रुवों के बीच इस फर्क की कोई वजह अब तक नहीं खोजी जा सकी है।

हां, इटली के ही लूसियानो आएस की टीम ने बृहस्पति के दोनों ध्रुवों के गुरुत्वाकर्षण में जो फर्क दर्ज किया है (यानी आप उत्तर में खड़े हों तो तराजू आपका वजन ज्यादा और दक्षिण में खड़े हों तो कम बताएगा), उसकी वजह उन्होंने इस ग्रह पर गैसीय बहाव के पैटर्न में खोजी है। सूरज के बाद सौरमंडल के इस सबसे बड़े सदस्य के बारे में ढेरों अनसुलझे सवालों के जवाब अभी मिलने बाकी हैं। मसलन यह कि इसकी द्रव सतह के नीचे कहीं अचानक आने वाली धात्विक हाइड्रोजन की कोई ठोस कोर भी है या नहीं। उम्मीद करें कि इस साल जुलाई में बृहस्पति पर ही सद्गति पाने से पहले जूनो इनमें से कई उलझनें अंतिम तौर पर सुलझा देगा।

Saturday, 9 March 2019

मीठेपन का साइड इफेक्ट

चंद्रभूषण
पीने लायक पानी पूरी दुनिया में मौजूद कुल पानी का 3 फीसदी ही है। वह भी ज्यादातर बर्फ की शक्ल में, जिसका इस्तेमाल न इंसान कर पाते हैं, न ही पेड़-पौधे या ज्यादातर जीव-जंतु। दुनिया के कुछ इलाकों के लिए यह बहुत बड़ी समस्या है, हालांकि इनमें से अधिकतर समुद्र के करीब हैं, जिसने धरती की सतह का तीन-चौथाई हिस्सा घेर रखा है। ऐसे में स्वाभाविक है कि समुद्री या खारे पानी से मीठा पानी निकालने की तकनीकों में विकास की खबर संसार भर के टेक्नोलॉजिकल जर्नल्स का स्थायी फीचर हुआ करती है।

इन कोशिशों का ही नतीजा है कि पिछले तीस वर्षों में इस काम पर आने वाली लागत आधी से भी कम रह गई है। अभी समुद्री पानी को पेयजल में बदलने की रनिंग कॉस्ट 35 से 65 रुपये प्रति हजार लीटर है, जो वैसे तो काफी कम है लेकिन प्लांट का पूंजी खर्च जोड़ने पर ज्यादा हो जाती है। आने वाले दिनों में प्लांट्स को वायु या सौर ऊर्जा से चलाने पर यह खर्च और कम हो जाएगा। पूरी दुनिया में इस काम के लिए लगभग 20 हजार प्लांट लगे हुए हैं, जिनमें कोई चार हजार सिर्फ खाड़ी देशों- ज्यादातर सऊदी अरब और यूएई में हैं।

मुख्यत: दो तरह की तकनीकें इस काम में इस्तेमाल होती हैं। डीजल या गैस से संचालित थर्मल टेक्नीक और बिजली से चलने वाली रिवर्स ऑस्मोसिस (आरओ) टेक्नीक, जो हमारे घरों में भी काम आती है। आरोप है कि ये दोनों तकनीकें तटीय समुद्रों को और ज्यादा खारा बनाकर समुद्री जीवन को नुकसान पहुंचाती हैं और थर्मल तकनीक खास तौर पर ग्लोबल वार्मिंग बढ़ाती है। बचाव में कंपनियां अपने कचरे के रूप में निकलने वाले अति-खारे पानी से किनोआ और सैलिकॉर्निया जैसी खारी दलदली फसलें उगाने लगी हैं।

Friday, 5 October 2018

ग्लोबल वार्मिंग का इलाज


चंद्रभूषण 
बढ़ती कार्बन डाइऑक्साइड अगले कुछ ही वर्षों में ग्लोबल वार्मिंग को बेकाबू बना सकती है। पेरिस सम्मेलन में सदी के अंत तक धरती का तापमान 2 डिग्री सेल्सियस से ज्यादा न बढ़ने देने के लिए यह तय किया गया कि तब तक कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन बिल्कुल रोक दिया जाए और फिर इस गैस को सिस्टम से बाहर करने के प्रयास चलाए जाएं। लेकिन यह बात कहने में जितनी सटीक थी, व्यवहार में उतनी ही बोगस साबित हो रही है। दुनिया में हर जगह अंधाधुंध गाड़ियां बिक रही हैं और कार्बन का उत्सर्जन दिनोंदिन तेज ही होता जा रहा है। इसके सोख्ते के तौर पर खूब सारे पेड़ लगाने की बात और भी बोगस है क्योंकि इसके नाम पर हर जगह सिर्फ सरकारी पैसे खाए जा रहे हैं।
ऐसे में वातावरण से कार्बन डाइऑक्साइड हटाने का एक ही रास्ता बचता है कि किसी तरह इसे सीधे ही चूस लिया जाए। डायरेक्ट एयर कैप्चरनाम की इस मुहिम में हवा को बड़े-बड़े पंखों से खींचकर किसी ऐसे केमिकल से गुजारा जाता है, जो कार्बन डाइऑक्साइड सोख ले। फिर उससे यह गैस निकालकर केमिकल को दोबारा काम पर लगा दिया जाए। हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के भौतिकशास्त्री डेविड कीथ ने कनाडा में ऐसा एक पायलट प्रॉजेक्ट शुरू किया, जिसकी लागत पिछले कुछ सालों में 600 डॉलर से घटकर 100 डॉलर प्रति टन कार्बन डाइऑक्साइड तक आ गई है। आगे इससे 1 डॉलर प्रति लीटर का ईंधन बनाया जा सकेगा। सरकारें पर्यावरण को लेकर गंभीर हों तो 2030 तक इस प्रयास से कुछ ठोस उम्मीद बांधी जा सकती है।


Friday, 8 June 2018

सुखी संख्याएं और सुख देने वाली संख्याएं

चंद्रभूषण 
नंबर थिअरी को गणित की रानी कहा जाता है। रीक्रिएशनल मैथमेटिक्स (मनोरंजन से जुड़ा गणित) भी इसी दायरे में आता है, हालांकि नंबर थिअरी खुद में बड़ा विशद शास्त्र है। इसकी दो दिलचस्प धारणाएं कम से कम नाम के मामले में एक-दूसरे से इतनी मिलती-जुलती हैं कि इन पर एक साथ चर्चा करने का दिल करता है। इनकी उत्पत्ति बिल्कुल अलग-अलग जगहों से है, और आपस में इनका कुछ भी लेना-देना नहीं है।
संस्कृत शब्द हर्षदका अर्थ खुश कर देने वाला/वाली है और कुछ खास प्राकृतिक संख्याओं को यह नाम देने का श्रेय महाराष्ट्र के डहानू जिले के स्कूलटीचर व शौकिया गणितज्ञ डीआर कापरेकर (1905-1986) को जाता है। ऐसी सभी संख्याएं, जिनमें अपने अंकों के योगफल का भाग चला जाता है, हर्षद संख्याएं कहलाती हैं। जैसे 12 एक हर्षद संख्या है, क्योंकि इसमें 1+2=3 का भाग चला जाता है।
कोई कह सकता है कि यह तो एक बहुत सामान्य धारणा है, इसको इतना ज्यादा वजन देने की क्या जरूरत है। लेकिन कापरेकर जी का रीक्रिएशनल मैथमेटिक्स में योगदान इतना बड़ा और मौलिक है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ऐसी संख्याओं को उनके द्वारा दिए गए नाम हर्षद नंबर्ससे ही जाना जाता है। दूसरे, हर्षद नंबर से जुड़ी नई-नई धारणाएं भी लगातार आती जा रही हैं। जैसे, 2005 में गणितज्ञ ई. ब्लोएम द्वारा पेश की गई मल्टिपल हर्षद नंबर’ (एमएचएन) की धारणा।
उदाहरण में जाएं तो 6804 अपने अंकों के योग 18 से कट जाती है और भागफल 378 आता है। यह संख्या फिर अपने अंकों के जोड़ 18 से कट जाती है और भागफल 21 आता है। फिर 21 भी अपने अंकों के योग 3 से कट जाती है, जिससे आने वाला भागफल 7 खुद 7 से कट जाता है। इस प्रकार 6804 को चौगुनी हर्षद संख्याकहा जा सकता है, और एक गणितीय श्रेणी के रूप में इसे एमएचएन-4 कहा जाएगा।
यह तो हो गई सुख देने वाली संख्या। लेकिन हैपी नंबर्स यानी सुखी संख्याओं की अलग ही दुनिया है और इनका हर्षद नंबर्स से कुछ भी लेना-देना नहीं है। इनका खोजी कौन है, यह भी किसी को पक्का नहीं पता, लेकिन सबसे पहले इनपर चर्चा रूस में होनी शुरू हुई थी। हैपी नंबर्स वे हैं, जिनके अंकों के वर्ग का योगफल करते जाने पर अंतिम नतीजा 1 निकलता है।
जैसे 19 को लें तो पहली बार 1 का वर्ग 1 और 9 का वर्ग 81 जोड़ने पर 1+81=82 आता है। दूसरी बार 8 का वर्ग 64 और 2 का वर्ग 4 जोड़ने पर 68, तीसरी बार 6 का वर्ग 36 और 8 का वर्ग 64 जोड़ने पर 100 आता है और चौथी बार 1, 0 और 0 का वर्ग जोड़ने पर 1 आ जाता है। यानी 19 एक हैपी नंबर है। 50 से नीचे की हैपी नंबर्स का जिक्र करना हो तो ये 1, 7, 10, 13, 19, 23, 28, 31, 32, 44 और 49 हैं। इनके बड़े दिलचस्प पैटर्न बनते हैं और इस दायरे में नई-नई खोजें होती रहती हैं।


Thursday, 5 October 2017

गुरुत्वीय तरंगों से किस तरह बदलेंगी हमारी दुनियाँ

चंद्रभूषण 
सौ साल तक तो यह अटकल ही चलती रही कि इस तरह की कोई चीज संभव है या नहीं। यह आश्चर्य की बात है कि इसी दुविधा के माहौल में कुछ लोग इन तरंगों को दर्ज करने के उपकरण बनाने में भी जुटे रहे। उनके साहस का अंदाजा लगाकर आप सिर्फ उनके सामने सिर ही झुका सकते हैं। नोबेल कमिटी ने इतना ही किया है। न इससे कम, न ज्यादा। जरा सोचकर देखिए, गुरुत्वीय तरंगों को अगर तरंग माना जाए तो ये किस चीज में चलने वाली तरंगें हैं? इनके रास्ते में करोड़ों प्रकाश वर्ष की दूरी ऐसी गुजर जाती है, जहां एक छोटा से छोटा कण तक नहीं होता, दूसरी तरफ ये ब्लैक होल जैसे इलाकों से भी गुजरती हैं, जिनसे पार पाना रोशनी तक के लिए नामुमकिन होता है।
2015 में आइंस्टाइन ने जनरल थिअरी ऑफ रिलेटिविटी के तहत अपनी तरफ से अकाट्य ढंग से स्पेस-टाइम (देश-काल) संजाल की संकल्पना दी थी। एक ऐसी चीज, जो खुद में कुछ भी नहीं है, लेकिन जो हर जगह, हर चीज में, हर समय में समान रूप से फैली हुई है। भारतीय दर्शन में पंचम तत्व आकाश की व्याख्या कुछ-कुछ इसी रूप में की जाती है, लेकिन समय वहां नदारद है। आइंस्टाइन के यहां आकाश और समय आपस में जुड़े हुए हैं, एक ही अमूर्त व्यक्तित्व के अलग-अलग चेहरों की तरह। और सबसे बड़ी बात यह कि भारतीय दर्शन का आकाश एक सर्वव्यापी स्थिर तत्व है, जबकि आइंस्टाइन का देशकाल फैलता-सिकुड़ता है। यहां तक कि इसमें छेद भी हो सकता है।
उस समय ही आइंस्टाइन का कहना था कि किसी बहुत भारी पिंड को, सूरज से कई गुना भारी पिंड को, अगर बहुत ज्यादा त्वरण मिल जाए, यानी उसकी रफ्तार अचानक बहुत ज्यादा बढ़ जाए तो वह देशकाल में ऐसी विकृति ला सकता है, जो अबाध रूप से आगे बढ़ती हुई एक तरह की तरंग जैसी शक्ल ले सकती है। यह बात आम समझ से परे है। अव्वल तो उस समय तक ऐसे किसी पिंड और उसे मिल सकने वाले इतने बड़े त्वरण की कल्पना करना भी लगभग असंभव था। फिर, मान लीजिए, ऐसी अनहोनी हो ही जाए, तो स्पेस में आने वाले किसी फैलाव या सिकुड़ाव को नापा कैसे जाएगा? जिस भी पैमाने से इसे नापना होगा, क्या वह खुद भी उतना ही फैल या सिकुड़ नहीं जाएगा?
यह उधेड़बुन आखिरकार 2015 में खत्म हुई और पिछले साल, यानी 2016 में पहली बार गुरुत्वीय तरंग की शिनाख्त का प्रकाशन हुआ। पता चला कि 30 सूर्यों के आसपास- एक थोड़ा कम, एक थोड़ा ज्यादा- वजन वाले दो ब्लैक होल एक अरब तीस करोड़ प्रकाश वर्ष दूर एक-दूसरे के करीब आते हुए रोशनी की आधी रफ्तार (एक सेकंड में लगभग डेढ़ लाख किलोमीटर) से घूमने लगे और फिर आपस में मिलकर एक हो गए। इस क्रम में ऊर्जा कितनी निकली? सेकंड के भी एक बहुत छोटे हिस्से में इतनी, जितनी तीन सूर्यों को पूरा का पूरा ऊर्जा में बदल देने पर निकल सकती है। इतनी भीषण घटना से देशकाल में पैदा हुई जो थरथरी एक अरब तीस करोड़ वर्षो में चल कर धरती तक पहुंच पाई, उसका आकार इतना छोटा था कि हमारा दिमाग उसकी कल्पना भी नहीं कर सकता। यूं समझें कि सूरज से धरती तक का आकाश इसके असर में जरा देर के लिए एक परमाणु बराबर सिकुड़ गया।
बहरहाल, शुरू में कुछ लोगों ने यह भी कहा कि संभव है, यह थरथरी किसी और हलचल से पैदा हुई हो। लेकिन पिछले डेढ़-दो वर्षों में यह सिलसिला बढ़ते-बढ़ते कुछ दिन पहले चौथी तरंग के प्रेक्षण तक पहुंचा और यह तय हो गया कि आने वाले दिनों में विज्ञान की कुछ सबसे बड़ी सनसनियां गुरुत्वीय तरंगों के जरिये रचे जाने वाले खगोलशास्त्र के ही हिस्से आने वाली हैं। लेकिन इससे खगोल विज्ञान की सेहत पर फर्क क्या पड़ेगा? सबसे पहला तो यह कि आर्यभट्ट से लेकर आज तक का खगोलशास्त्र पूरी तरह रोशनी पर निर्भर है, जो खुद में बहुत भरोसेमंद जरिया नहीं है। स्पेक्ट्रोमेट्री और एक्स-रे, गामा-रे टेलिस्कोपों के साथ भी यह सीमा जुड़ी है कि कुछ मामलों में उनके नतीजे बहुत धुंधले हो जाते हैं। जैसे, ब्लैक होल को ही लें तो उससे कोई रोशनी बाहर ही नहीं आती, लिहाजा अटकलबाजी के सिवाय वहां ज्यादा कुछ करने को होता ही नहीं।
इसके विपरीत गुरुत्वीय तरंगें किसी भी जिंदा या मुर्दा तारे की परवाह नहीं करतीं। वे खाली जगहों से भी उतनी ही आसानी से गुजरती हैं, जितनी आसानी से महाशून्य (द ग्रेट वॉयड) से। इन्हें धोखा देना या अपने दायरे में जकड़कर बाहर निकल जाने देना सृष्टि के सबसे बड़े ब्लैक होल के भी वश की बात नहीं है। कुछ वैज्ञानिक तो इतने आशावान हो चले हैं कि उन्हें लगता है, भविष्य की गुरुत्वीय तरंग वेधशालाएं सृष्टि के आरंभ बिंदु ‘बिग बैंग’ का भी कुछ हाल-पता ले सकती हैं, जहां तक पहुंचने की उम्मीद भी किसी टेलिस्कोप से नहीं की जाती। असल में, ब्रह्मांड की बिल्कुल शुरुआती रचनाएं भी बिग बैंग से कम से कम चार लाख साल बाद की हैं। तो नोबेल प्राइज की खबरों में ही न डूबे रहिए। मजे लीजिए, नजर के सामने खुल रहे इस नए शास्त्र के, जिसे कल तक कल्पना से भी परे माना जाता था।

Friday, 29 September 2017

गुरुत्व तरंगों से छंट रहा है ब्रह्मांड का धुंधलका

चंद्रभूषण  
साइंस-टेक्नॉलजी में एक नए युग की शुरुआत का साक्षी बनने का सौभाग्य हर पीढ़ी को प्राप्त नहीं होता लेकिन हमारी पीढ़ी इस दृष्टि से एक खास मामले में सौभाग्यशाली है। हम ग्रैविटेशनल वेव ऐस्ट्रॉनमी (
गुरुत्वीय तरंग खगोलशास्त्र) के प्रारंभ के साक्षी बन चुके हैं। पिछले साल अमेरिका में लुईजियाना और वॉशिंगटन प्रांतों में बनी लीगो वेधशालाओं ने पहली बार गुरुत्वीय तरंग की शिनाख्त की थी। वह सिलसिला 27 सितंबर की घोषणा के साथ इस तरह की चौथी शिनाख्त दर्ज कर चुका है लेकिन इस बार की, यानी चौथी शिनाख्त की खासियत यह है कि इसमें अमेरिका से बाहर, इटली की एक गुरुत्व तरंग वेधशाला वर्गो भी शामिल है।
जिस तरह हम दो आंखों से देखकर किसी चीज की दूरी का अंदाजा लगाते हैं और जीपीएस कम से कम छह (तीन+तीन) उपग्रहों के जरिये धरती पर किसी चीज की लोकेशन ठीक-ठीक बता देता है, उसी तरह तीन जगहों से लिए गए गुरुत्वीय तरंगों के प्रेक्षण लगभग सटीक ढंग से बहुत अधिक ऊर्जा प्रक्षेपण वाली किसी अंतरिक्षीय घटना के स्रोत का अंदाजा दे सकते हैं। 27 सितंबर को घोषित की गई यह घटना 1 अरब 80 करोड़ साल पुरानी है, जब हमारे सूर्य के लगभग 31 और 25 गुना वजनी दो ब्लैक होल आपस में टकराए और तीन सूर्यों के वजन के बराबर ऊर्जा छोड़ते हुए 53 सूर्यों जितने वजनी ब्लैक होल में बदल गए।
इसके पहले दर्ज की गई तीनों घटनाएं भी 30 सूर्यों से थोड़ा कम या ज्यादा वजन वाले ब्लैक होलों के आपस में टकराने की थीं लेकिन वे ब्रह्मांड में कहां घटी थीं, इसका अंदाजा लगाना मुश्किल था। पिछले महीने दर्ज की गई घटना की सूचना लीगो की पकड़ में आने के एक मिनट के अंदर दुनिया के 25 टेलिस्कोपों तक रवाना कर दी गई, जिन्होंने तुरत-फुरत अपने कैमरे उसकी संभावित दिशा में घुमा दिए। इनमें प्रकाश को दर्ज करने वाले टेलिस्कोपों से लेकर एक्स-रे और गामा-रे टेलिस्कोपों तक विविध प्रकार के दूरदर्शी शामिल थे। यह और बात है कि वे कुछ भी देख नहीं पाए, क्योंकि घटना का स्रोत पकड़ पाने के मामले में लीगो का हाथ कुछ ज्यादा ही तंग था।
कितना तंग?
इसका अंदाजा इस बात से लगाएं कि हमारा चंद्रमा धरती से नजर आने वाले आकाश का 1 वर्ग डिग्री हिस्सा भर घेरता है, लेकिन लीगो ने 1000 वर्ग डिग्री (और समझाकर कहें तो 31.5 डिग्री लंबाई और इतनी ही चौड़ाई वाले) इलाके की ओर इशारा किया था। ऐस्ट्रॉनमी में इस सूचना का कोई मतलब नहीं है। इसके विपरीत दो के बजाय तीन वेधशालाओं से लिए गए 27 सितंबर के प्रेक्षण में घटना का स्रोत 60 वर्ग डिग्री (साढ़े सात डिग्री गुणे साढ़े सात डिग्री) के इलाके में बताया गया। यह दायरा भी काफी बड़ा है और अभी तक मालूम नहीं कि इस बार कोई टेलिस्कोप कुछ देख पाया है या नहीं लेकिन देखे जाने की संभावना इस बार कई गुना बढ़ गया है।

आने वाले दिनों में जब चीन, भारत और जापान में भी गुरुत्वीय तरंगों को दर्ज करने की व्यवस्था हो जाएगी, तब शायद टेलिस्कोपों को चंद्रमा जितने दायरे वाला ही आकाश खंगालना पड़ेगा और तब संभवत: उच्च ऊर्जा प्रक्षेपण वाली घटनाओं को एक साथ दो तरीकों से दर्ज किया जा सके। एक रोशनी या इसके करीब पड़ने वाली एक्स-रे, गामा-रे आदि के जरिए और दो- गुरुत्वीय तरंगों के जरिए, जो कि दुनिया के लिए एक बिल्कुल नई चीज है। यह कुछ-कुछ ऐसा है, जैसे दुनिया का नक्शा आप जहाजी यात्राओं के जरिए और उपग्रह द्वारा लिए गए प्रेक्षण के जरिए बनाकर दोनों को टैली कर सकें। ब्रह्मांड हमारे सामने ज्यादा साफ शक्ल में नुमायां हो रहा है। क्या हम दिमागी तौर पर इसे देखने के लिए तैयार हैं?

Thursday, 28 September 2017

चार सौ साल और पुराना हुआ शून्य

चंद्रभूषण 
एक अत्यंत महत्वपूर्ण स्वतंत्र संख्या के रूप में शून्य की खोज भारत में ही हुई है, इस बात को लेकर पूरी दुनिया में आम सहमति है। लेकिन यह ठीक-ठीक कब हुई, इसका खोजी कौन था, इसे लेकर आज भी बहस खत्म नहीं हुई है। इस सिलसिले में ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी की एक लाइब्रेरी में रखी पेशावर के पास के एक गांव बख्शाली में मिली एक बौद्ध पांडुलिपि की हाल में हुई कार्बन डेटिंग से एक अद्भुत जानकारी प्राप्त हुई है।बख्शाली पांडुलिपि दरअसल बौद्ध भिक्षुओं के प्रशिक्षण में काम आने वाली भोजपत्र पर लिखी लगभग सत्तर पन्नों की एक किताब है। इसे अब तक नवीं सदी की रचना माना जाता रहा है। इसकी खास बात यह है कि इसमें सैकड़ों जगह बिंदु के रूप में गणितीय शून्य के निशान बने हुए हैं। नवीं सदी में ही ग्वालियर के एक मंदिर में भी एक गोलाकार शून्य का निशान बनाया गया था, जिसकी तस्वीरें गणित के इतिहास से जुड़ी हर लाइब्रेरी में लगी रहती हैं। लिहाजा अभी तक आम धारणा यही थी कि इस निशान का प्रचलन नवीं सदी के आसपास ही हुआ होगा।गणितज्ञ ब्रह्मगुप्त के यहां शून्य की अवधारणा 628 ईस्वी में आती है, हालांकि इसके लिए उन्होंने कोई चिह्न नहीं निर्धारित किया। इसलिए माना जाता रहा है कि इसके सौ-दो सौ साल बाद बिंदु या गोले की शक्ल में शून्य बनाया जाने लगा होगा। लेकिन इधर बख्शाली पांडुलिपि की कार्बन डेटिंग से दो बातें पता चलीं। एक तो यह कि इसके सारे भोजपत्र एक साथ नहीं लिखे गए हैं और इनकी लिखावट में कई सदियों का फासला है। और दूसरी यह कि इनमें सबसे पुराने भोजपत्र की लिखाई 224 ई. से 383 ई. के बीच की है।बीच वाली 160 साल की अवधि इस मामले में कार्बन डेटिंग का ‘एरर मार्जिन’ है। यानी दावे के साथ सिर्फ इतना कहा जा सकता है कि यह लिखाई न तो 224 ई. से पहले की है, न ही 383 ई. के बाद की।
इसमें कोई शक नहीं कि दर्शन में शून्यवाद की अवधारणा तीसरी सदी ईसा पूर्व के बौद्ध दार्शनिक नागार्जुन की दी हुई है। उनके ही ग्रंथ माध्यमक का प्रसिद्ध वाक्य है- ‘शून्य है तो सब कुछ संभव है, शून्य नहीं है तो कुछ भी संभव नहीं है।’ लेकिन इस अवधारणा का गणितीय शून्य से कोई जुड़ाव हो सकता है, इस पर विद्वानों में कभी सहमति नहीं बन सकी।
अभी गणितज्ञ ब्रह्मगुप्त से कम से कम चार सौ साल पुरानी एक लिखाई में शून्य पा लिए जाने के बाद हम काफी पुख्तगी के साथ यह कह सकते हैं कि केवल दार्शनिक शून्य के ही नहीं, गणितीय शून्य के आविष्कारक भी नागार्जुन ही हैं। खासकर इस बात को ध्यान में रखते हुए कि पेशावर के इर्दगिर्द का इलाका पारंपरिक रूप से महायानियों का था, जो अपना आदिपुरुष नागार्जुन को ही मानते हैं।

लग्जमबर्ग में स्पेस कारोबार की शुरुआत

चंद्रभूषण 
यूरोप के छोटे से मुल्क लग्जमबर्ग में इसी हफ्ते स्पेस कारोबार की शुरुआत हुई है। स्टार्ट-अप कंपनी प्लैनेटरी रिसॉर्सेज ने वहां के राजपरिवार के संरक्षण में ढाई करोड़ यूरो (करीब दो अरब रुपये) की बीज पूंजी के साथ क्षुद्र ग्रहों की खनन परियोजना पर काम शुरू कर दिया है। दिल्ली के पौने दोगुने क्षेत्रफल वाले इस यूरोपीय देश में न कोई स्पेस एजेंसी है, न ही इसने अबतक कोई रॉकेट छोड़ा है। हम जानते हैं कि क्षुद्र ग्रह सूरज के इर्द-गिर्द घूमने वाली छोटी-बड़ी चट्टानें हैं, जिन पर खनन छोड़िए, यान उतारना भी स्पेस टेक्नॉलजी की एक असाधारण उपलब्धि है। ऐसे में किनका दिमाग खराब हुआ होगा जिन्होंने इतनी बड़ी रकम इस हवाई धंधे में लगा दी?
दरअसल, यह सवाल ही बताता है कि हम लग्जमबर्ग के बारे में कुछ नहीं जानते। कारोबारी इनोवेशन इसकी पहचान है। पांच लाख की आबादी वाले इस मुल्क ने 1928 में प्राइवेट रेडियो और 1985 में सैटेलाइट टीवी शुरू कर दिया था। काले धन के लिए इसको अभी दुनिया की सबसे सुरक्षित जगह माना जाता है क्योंकि यहां की कंपनियों में पैसा लगाने वालों से ज्यादा सवाल नहीं पूछे जाते और टैक्स उन्हें बहुत कम देना पड़ता है। अंतरिक्ष यानों पर लागत लगातार घट रही है लिहाजा अगले कुछ वर्षों में क्षुद्रग्रहों से प्लैटिनम निकालना मुनाफे का काम हो सकता है। बाकी दुनिया के लिए अंतरिक्ष अब भी पवित्र जगह है लेकिन लग्जमबर्ग ने पिछले महीने कानून बनाकर आकाश से खनिज लाना जायज बना दिया है।

टेलिकॉम सेक्टर बढ़ रहा है या मर रहा है?

चंद्रभूषण 
देश के सामने अचानक एक बहुत बड़ी दुविधा आ खड़ी हुई है। दुविधा यह कि भारत का टेलिकॉम सेक्टर असाधारण ऊंचाइयां छूने जा रहा है या फिर इसके बिल्कुल विपरीत मृत्यु के कगार पर खड़ा है। भारत के आला उद्योगपति स्वर्गीय धीरूभाई अंबानी के बेटों ने ठीक इन्हीं आशयों वाले बयान एक ही दिन, 27 सितंबर 2017 को लगभग एक ही समय जारी किए। मुकेश अंबानी ने पहली इंडिया मोबाइल कांग्रेस को संबोधित करते हुए कहा कि ‘भारत में अभी डेटा की स्थिति वही है, जो कभी दुनिया के कई देशों में कच्चे तेल की हुआ करती थी। देश अभी चौथी औद्योगिक क्रांति के मुहाने पर खड़ा है, जिसमें टेलिकॉम सेक्टर को अग्रणी भूमिका निभानी है।’दूसरी तरफ अनिल अंबानी ने अपनी कंपनी रिलायंस कम्यूनिकेशंस के शेयरहोल्डरों की सभा में कहा कि ‘देश का टेलिकॉम सेक्टर इंटेंसिव क्रिटिकल केयर यूनिट (आईसीसीयू) में पड़ा है और इस पर एकाधिकार का खतरा मंडरा रहा है।
इसमें कोई शक नहीं कि पिछले ही साल टेलिकॉम के धंधे में उतरी मुकेश भाई की कंपनी ने देखते-देखते अपना धंधा बहुत बड़ा बना लिया है। रिफंडेबल 1500 रुपये में, यानी सिद्धांतत: मुफ्त में करोड़ों लोगों को इस दीवाली से पहले 4जी फोन मुहैया कराने की उसकी योजना ने देश की सभी जमी-जमाई टेलिकॉम कंपनियों भारती एयरटेल, वोडाफोन, आइडिया वगैरह की नींद उड़ा रखी है। अभी दो साल पहले इन सभी ने बैंकों से हजारों करोड़ रुपये लोन लेकर सरकार से काफी महंगा स्पेक्ट्रम खरीदा है। इसके लिए जरूरी जमीनी ढांचा खड़ा करने की प्रक्रिया भी वे पूरी नहीं कर पाई हैं लेकिन इसका कोई कारोबारी इस्तेमाल वे कर पातीं, इसके पहले ही अचानक जैसे हवा से धंधे में उतर आई मुकेश अंबानी की कंपनी रिलायंस जियो ने लगभग मुफ्त में डेटा और वॉयस कॉल की सुविधा मुहैया कराकर उन्हें भौंचक्का कर दिया। अभी मुफ्त का 4जी फोन आने से उन्हें नए ग्राहक मिलने पहले ही बंद हो चुके हैं। यानी आने वाले एक साल में इनमें से ज्यादातर कंपनियां या तो दिवालिया हो जाएंगी या जैसे-तैसे बिकने को तैयार हो जाएंगी।
इसका सबसे बड़ा नमूना अभी मुकेश अंबानी के छोटे भाई अनिल अंबानी की कंपनी रिलायंस कम्युनिकेशंस बनी हुई है, जो दिवालिया घोषित होने के ठीक पहले की प्रक्रिया से गुजर रही है। अनिल भाई ने इसे व्यापारिक समझौते के नाम पर बेचने की कोशिश की लेकिन कुछ बड़े शेयरहोल्डरों के ऐतराज के बाद उन्हें अपने कदम पीछे खींचने पड़े। कंपनी पर कर्जे बहुत ज्यादा हैं और वसूली करने वाले रोज ही दरवाजा खटखटा रहे हैं। धंधे की डूबती हालत देखते हुए कोई बैंक इस कंपनी को नया कर्ज देने को भी तैयार नहीं होगा। ऐसे में नैशनल कंपनी लॉ ट्राइब्यूनल कब रिलायंस कम्यूनिकेशंस को दिवालिया घोषित करने की पहल करता है, बाजार को सिर्फ इस सूचना का इंतजार है। यानी अनिल भाई की इस बात में कुछ झोल हो सकता है कि भारत का टेलिकॉम सेक्टर फिलहाल आईसीसीयू में पड़ा हुआ है लेकिन यह बात तो पक्की है कि उनकी खुद की टेलिकॉम कंपनी का ठिकाना अभी आईसीसीयू और मोर्चरी के कहीं बीच में ही है।
किस्साकोताह यह कि बुधवार को कही गई दोनों ही अंबानियों की बातें अपनी-अपनी जगह सही हैं। भारत में टेलिकॉम सेक्टर बहुत बड़े बदलाव के मुहाने पर खड़ा है लेकिन यहां की ज्यादातर टेलिकॉम कंपनियों पर बहुत बड़ा संकट भी मंडरा रहा है। कोई कह सकता है कि यह संकट अगले दो-चार साल में हल हो जाएगा, जब देश में टेलिकॉम सर्विस कंपनी के नाम पर दो या ज्यादा से ज्यादा तीन कंपनियां ही बचेंगी। लेकिन जो लोग मुकेश भाई की वर्किंग स्टाइल से परिचित हैं, वे यह भी जानते हैं कि अपने धंधे में वे कंपिटीशन की कोई गुंजाइश ही नहीं छोड़ते।
देश में कैसे बदलाव होंगे, इसका क्या फायदा देश को मिलेगा, इस बात को लेकर वे कितने चिंतित रहते हैं, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि 2007-08 में दुनिया में बढ़ती कच्चे तेल की कीमतों के अनुरूप पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ाने से यूपीए सरकार ने मना कर दिया तो धीरूभाई ने देश में ये चीजें बेचनी ही बंद कर दीं और अपने पेट्रोल पंपों पर ताला लगाकर अपना माल अफ्रीका रवाना कर दिया। उनके द्वारा सरकार से मिट्टी के मोल खरीदे गए तेल के कुएं उस कठिन संकट के दौर में देश के रत्तीभर भी काम नहीं आए। ऐसा भविष्य में डेटा के साथ भी नहीं होने वाला है, कौन कह सकता है भला?

Thursday, 21 September 2017

विज्ञान की नजर में ध्यान के फायदे-नुकसान

चंद्रभूषण 
जो लोग योग और ध्यान को ईश्वर प्राप्ति का माध्यम नहीं मानते, उनमें से भी कुछेक अक्सर यह दावा करते देखे जाते हैं कि इन उपायों से मनुष्य चेतना की उच्चतर अवस्था में पहुंच सकता है। यह सचमुच चिंताजनक बात है कि हिंदू धर्म में आध्यात्मिक लोगों की इतनी बड़ी बहुतायत के बावजूद अभी तक किसी भी योगी, ध्यानी या सन्यासी ने स्वयं को खुली वैज्ञानिक खोजबीन के लिए प्रस्तुत नहीं किया। इसके विपरीत ध्यान की महायान बौद्ध पद्धतियों का अनुसरण करने वाले तिब्बती धर्मगुरु दलाई लामा ने एक अर्से से न सिर्फ स्वयं को बल्कि अपने मत के कई अन्य आध्यात्मिक व्यक्तियों को भी वैज्ञानिक जांच-पड़ताल के हवाले छोड़ रखा है।
उनका कहना है कि हम अपनी स्वाभाविक ध्यान-आधारित जीवन चर्या का अनुसरण करते रहेंगे, वैज्ञानिक अपनी मर्जी से जिस भी तरह चाहें, जीवन-पर्यंत और उसके बाद भी हमारा अध्ययन करें और मानवता के हित में इसका जो भी उपयोग हो सकता है, उसके लिए मार्ग प्रशस्त करें। अभी विकसित देशों में विभिन्न ध्यान पद्धतियों की बाढ़ सी आई हुई है। हाल तक हम यूरोप-अमेरिका में हॉट-केक की तरह बिक रहे योगासनों के आचार्यों की चर्चा सुनते रहे हैं। एक स्कूल दार्शनिक प्रवचन और योग का कोई मिला-जुला नुस्खा बेचने वालों का भी है, जिसमें अब भारतीयों के साथ-साथ कुछ पश्चिमी विशेषज्ञ भी कूद पड़े हैं। लेकिन ध्यान का आकर्षण अलग है।
बड़े उद्योगपतियों और अमीर लोगों से लेकर सॉफ्टवेयर टेक्नॉलजी के सिद्धहस्त आविष्कारकों तक में अभी दिमागी शोर की कुछ ज्यादा ही शिकायत देखी जा रही है। ध्यान को शुरू से ही इस शोर से मुक्त होकर चित्त को शांत करने के अमोघ अस्त्र की तरह देखा जाता रहा है। ऐसे में योगासन और अध्यात्म से अलग ध्यान का अपना ही बाजार विकसित हो रहा है। हाल में आई दो किताबें ‘द साइंस ऑफ मेडिटेशन’ (डेविड गोलमान और रिचर्ड डेविडसन) और ‘माइंडलेसनेस’ (टॉमस जॉइनर) दो बिल्कुल विपरीत नजरियों से ध्यान के नफे-नुकसान की पड़ताल करती हैं। लेखकों का परिचय यह है कि डेविड गोलमान और रिचर्ड डेविडसन न्यूरोसाइंटिस्ट (स्नायु-विज्ञानी) हैं और न्यूयॉर्क टाइम्स के नियमित स्तंभ लेखक भी, जबकि टॉमस जॉइनर एक सायकायट्रिस्ट (मनोचिकित्सक) हैं।
साइंस ऑफ मेडिटेशन में गोलमान और डेविडसन ने तिब्बती लामाओं के साथ किए गए अपने प्रयोगों के ब्यौरे दर्ज किए हैं। उनका कहना है कि ध्यान हर समस्या का रामबाण इलाज तो नहीं है, लेकिन इसके जरिये मानसिक बेचैनी कम की जा सकती है, दर्द में थोड़ी राहत हासिल हो सकती है, और अलगाव की असाध्य समस्या से जूझ रहे लोगों में दुनिया की हर जड़-चेतन वस्तु के प्रति और अपने सगे-संबंधियों के प्रति लगाव पैदा किया जा सकता है। सबसे बड़ी बात यह कि ध्यान लोगों को अतिशय आत्मकेंद्रित होने से बचा सकता है, जो अभी के सेल्फी युग में गंभीर मानसिक बीमारी का रूप लेता जा रहा है। मसलन, क्या आपने खुद से शादी करने वालों का जिक्र सुना है? इस किताब का एक अध्याय केवल ध्यान की विफलताओं के प्रति समर्पित है।
इसके विपरीत जॉइनर की पूरी किताब ही ध्यान की आलोचना और इसकी मूलभूत प्रस्थापना में मौजूद झोल पर केंद्रित है। जॉइनर बताते हैं कि ज्यादातर ध्यान पद्धतियों में पहले दिन से ही आत्मा की केंद्रीय भूमिका पर जोर दिया जाता है, जो असल में लोगों को दुनिया से भागने के लिए प्रेरित करने के अलावा कुछ नहीं है। लोग इसे अलगाव से मुक्त होने के लिए अपनाते हैं लेकिन यह उन्हें और ज्यादा अलगाव की ओर ले जाता है। जो पद्धति खुद आत्म-केंद्रित होने, स्वयं में दुनिया देखने की वकालत करती हो, वह खुद को दुनिया का केंद्र समझने वाली आधुनिकता की मूलभूत बीमारी का इलाज भला कैसे कर सकती है? सबसे बड़ी बात यह कि जॉइनर अपनी बात किसी दार्शनिक विमर्श के रूप में नहीं, बाकायदा केस स्टडीज के जरिये करते हैं।
असल चीज तो ‘मैं’ की सही पोजिशनिंग ही है, जो अभी के दौर में हर व्यक्ति में ही थोड़ी-बहुत हिली हुई दिखती है। सृष्टि के एक हिस्से के रूप में खुद को देखना एक पुरानी चीज हुई। इसके बल पर न तो साम्राज्य खड़े किए जा सकते, न उद्योगपति बना जा सकता, न ही कलाकार और वैज्ञानिक होने की तरफ बढ़ा जा सकता है। कलाकारिता की तो बात ही छोड़ दें, उसकी तो बुनियाद ही ‘मैं’ की महत्ता है। ध्यान अगर अहं की स्वस्थ ढलाई का जरिया बन सके तो बहुत अच्छा। अभी बढ़िया बात यह हुई है कि उसने खुद को खोजबीन के लिए प्रस्तुत तो किया है।