Showing posts with label विज्ञान प्रसार. Show all posts
Showing posts with label विज्ञान प्रसार. Show all posts

Wednesday, 2 September 2015

प्रतिभा खोज स्कॉलरशिप की संख्या दोगुनी

मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी ने राष्ट्रीय प्रतिभा खोज परीक्षा के तहत मिलने वाली स्कॉलरशिप की संख्या को एक हजार से बढ़ाकर दो हजार करने का ऐलान किया है। इन स्कॉलरशिप की संख्या में पिछली बार इजाफा सन 2000 में किया गया था उसके बाद इनकी संख्या एक हजार ही चली आ रही है जबकि स्कूली छात्रों की संख्या में तब से दोगुने से भी ज्यादा की वृद्धि हो चुकी है।ईरानी ने यहां राष्ट्रीय शैक्षणिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) के 55वें स्थापना दिवस कार्यक्रम को संबोधित करते हुए यह ऐलान किया। इस कार्यक्रम में स्कूल शिक्षा सचिव आर. सी. खूटिया ने कहा कि उन्हें 1973 में राष्ट्रीय प्रतिभा खोज स्कॉलरशिप मिली थी। ईरानी ने कहा कि उनका जन्म 1976 का है और उन्होंने भी यह परीक्षा दी थी। एक स्कूली छात्र के लिए यह स्कॉलरशिप जीवन में बहुत महत्व रखती है। इसलिए इनकी संख्या को बढ़ाए जाने की जरूरत है। इसलिए इस साल से यह संख्या एक हजार की बजाय दो हजार की जाएगी।बता दें कि इस स्कॉलरशिप को पाने वाले छात्रों को प्रति माह पांच सौ रुपये की राशि दो सालों तक प्रदान की जाती है। कक्षा दसवीं में पढ़ने वाले छात्र इस परीक्षा में बैठते हैं। 1961 में पहली बार जब यह स्कॉलरशिप शुरू हुई थी तो तब इनकी संख्या सिर्फ दस थी।हर जिले में बनेगी विज्ञान लैब छात्रों में विज्ञान एवं गणित की पढ़ाई की गुणवत्ता में सुधार लाने तथा नवाचार को बढ़ावा देने के लिए राष्ट्रीय आविष्कार योजना के तहत हर जिले में एक मॉडल विज्ञान प्रयोगशाला स्थापित की जाएगी। साल के अंत तक यह योजना तैयार कर ली जाएगी। इसके लिए राज्यों को मदद भी प्रदान की जाएगी।पढ़ाई का आकलन होगा ईरानी ने कहा कि तीसरी, पाँचवी, आठवीं और दसवीं कक्षा के छात्रों ने स्कूली पढ़ाई में क्या सीखा है, इसका अब सभी शैक्षणिक वर्ष में सैम्पल सर्वेक्षण के जरिए आकलन कराया जाएगा। इसका जिम्मा एनसीईआरटी को सौंपा जाएगा। इसके लिए उन्होंने एनसीईआरटी के अधिकारियों से योजना पेश करने को कहा।क्षेत्रीय भाषाओं में पुस्तकें उन्होंने कहा कि एनसीईआरटी की पुस्तकों का प्रादेशिक भाषाओं में भी अनुवाद किया जाएगा। अभी ये पुस्तकें हिन्दी, उर्दू तथा अंग्रेजी में छपती हैं। लेकिन यदि इन्हें प्रादेशिक भाषाओं में भी छापा जाए तो दूरदराज के इलाकों के छात्रों को भी आसानी होगी।विशेष पाठ्यक्रम उन्होंने आटिज्म और सेरेब्रल पाल्सी से प्रभावित बच्चों के लिए एनसीईआरटी से अलग पाठ्य सामग्री तैयार करने को कहा। क्योंकि ऐसे बच्चों की सीखने की प्रवृत्ति धीमी होती है। इरानी ने दृष्टिहीन छात्रों के लिए ब्रेल और अंग्रेजी में भौगोलिक मानचित्र की पुस्तक का विमोचन भी किया।
  

Monday, 28 January 2013

गरीबों को क्यों नहीं मिलते साइंस के फायदे

कुमार विजय॥
 लगातार बदलती दुनिया में अपने आपको बचाए रखने के लिए आविष्कार का मंत्र याद रखना बहुत जरूरी है। लेकिन इसके साथ ही साथ ही इस बात पर भी नजर रखी जानी चाहिए कि देश-दुनिया के बेहतरीन दिमागों द्वारा जो आविष्कार या रिसर्च किए जाते हैं, उनका लाभ समाज के हर हिस्से तक पहुंच पा रहा है या नहीं। हकीकत यही है कि विज्ञान के आविष्कारों का लाभ समाज के निचले तबकों तक नहीं पहुंच पाता है, या पहुंचता भी है तो इतनी देर से कि उनके लिए इसका ज्यादा मतलब नहीं बचता। ऐसा होने की मुख्य वजह यह है कि रिसर्च में मुनाफे और बाजार को अधिक महत्व दिया जाता है, इंसान को नहीं।

सिर्फ मुनाफे की फिक्र
दुनिया में पुरुषों का गंजापन दूर करने की दवा विकसित करने के लिए जितना खर्च किया जाता है, वह मलेरिया की दवा विकसित करने पर होने वाले खर्च से 10 गुना ज्यादा है। विज्ञान के चमत्कारों को देखते हुए यह भी कम आश्चर्यजनक नहीं है कि मलेरिया आज भी मानव समाज के सामने एक जानलेवा रोग बनकर खड़ा है। इससे निपटने के लिए एक सदी से भी ज्यादा समय से प्रयास हो रहे हैं, लेकिन सफलता आज तक नहीं मिल सकी है। आज भी दुनिया भर में मलेरिया से हर साल 10 लाख बच्चों की मौत हो जाती है। गंजेपन और मलेरिया की रिसर्च के खर्चों के बीच नजर आने वाले विरोधाभास की कुंजी यहां है कि गंजापन दूर करने की दवा के साथ बहुत बड़ा मुनाफा जुड़ा है जबकि मलेरिया के साथ सिर्फ लोगों की जिंदगी-मौत का सवाल जुड़ा है, मुनाफे की कोई खास गुंजाइश इसमें नहीं है।
नैपकिन की जगह सूखे पत्ते
विश्व स्वास्थ्य संगठन की इस स्वीकृति के बावजूद कि हर बच्चे को हैपेटाइटिस बी का वैक्सीन लगना चाहिए, विकासशील देशों के लिए यह काम एक सपने जैसा ही है। कारण? इसकी कीमत प्रति डोज 2.3 डॉलर है, जो विकासशील देशों के लोगों की पहुंच से बाहर है। ध्यान रहे, हैपेटाइटिस बी के कारण इन देशों में 1 से 2 फीसदी लोगों की मौत हो जाती है। समय से इसका टीका न लगने पर बाद में लिवर खराब होने की संभावना भी बढ़ जाती है। औरतों के बुनियादी स्वास्थ्य से जुड़े हुए क्षेत्रों में भी सस्ते अविष्कार की जरूरत है। मासिक धर्म (पीरियड्स) के समय उपयोग करने के लिए सस्ते सैनिटरी नैपकिन हर स्त्री को उपलब्ध होने चाहिए, लेकिन भारत के ग्रामीण समाज में ज्यादातर औरतें आज भी पीरियड्स के दौरान पुराने कपड़ों, अखबार, यहां तक कि सूखे पत्तों का उपयोग करती हैं।

नतीजा यह होता है कि जननांगों का संक्रमण उनके लिए आम बीमारी बन जाता है। इसके कारण बच्चा पैदा होने के दौरान मुश्किलें पेश आती हैं। औरतों के स्वास्थ्य से जुड़ा हुआ यह एक अहम सवाल है लेकिन इस ओर गंभीरता के साथ ध्यान नहीं दिया जाता। बाजार में उपलब्ध नैपकिन की कीमत इतनी ज्यादा होती है कि समाज की गरीब औरतें उसे खरीदने में असमर्थ होती है। इसी बात को ध्यान में रखते हुए अरुणाचलम मुरुगनाथम ने, जिसे केवल 10वीं तक की ही शिक्षा मिली थी, अपनी चार साल के मेहनत के बाद नैपकिन बनाने की ऐसी मशीन तैयार की, जिसे बिजली और पैडल, दोनों से चलाया जा सकता है। इस मशीन के जरिये बनाया गया नैपकिन 12 रुपए में 8 की दर पर उपलब्ध है। मुरुगनाथम ने इस मशीन को पेटेंट कराने से मना किया है।

इसी तरह गुजरात के मनसुख भाई प्रजापति ने मिट्टी से एक ऐसा रेफ्रिजरेटर बनाया है, जिसमें सब्जी जैसे खाद्य पदार्थ 6 दिन तक सुरक्षित रह सकते हैं। आम आदमी के लिए कोई आविष्कार करते समय इस बात का ध्यान रखा जाना चाहिए कि आज भी हमारे समाज का एक बहुत बड़ा तबका आधुनिक विकास और तकनीक की परिधि से बाहर है। चीन में ऐसा नहीं है क्योंकि वहां ऐसी बहुत सारी कंपनियां हैं जो तकनीकी रूप से ऐसे अविष्कार या रिसर्च करती हैं, जिससे कम कीमत पर लोगों को सुविधाएं हासिल हो सकें। यही कारण है कि कम कीमतों के सामान के मामले में चीन दुनिया का अग्रणी देश है।

हमारे अविष्कारों का लक्ष्य यह होना चाहिए हमारे देश का एक बहुत बड़ा तबका, जो जिंदगी की बुनियादी जरूरतों से महरूम है, उसे रोटी, कपड़ा, मकान और मोबाइल मिल सके। पृथ्वी पर संसाधनों और श्रम की कोई कमी नहीं है। यहां आविष्कार इस बात के लिए होने चाहिए कि पानी, ऊर्जा और कुदरती संसाधनों का अधिक से अधिक उपयोग हो सके। भारत सरकार के द्वारा भी जुलाई 2012 में एक अरब डॉलर का इनोवेशन फंड प्रारंभ किया जा रहा है। सैम पित्रोदा को इसका नेतृत्व करने के लिए कहा गया है। इस फंड का निवेश वैसे इनोवेशन में किया जाएगा जो लोगों को सस्ती सेवा और उत्पाद उपलब्ध करा सके और जिसका उपयोग गरीब लोगों का जीवन स्तर ऊपर उठाने में किया जा सके।

आम लोगों के काम आए
पित्रोदा ने मीडिया में कहा है- 'हमें ऐसे लोगों को पैसा मुहैया कराना चाहिए जिनके पास आइडिया तो है लेकिन सीड कैपिटल नहीं है'। इस फंड का नाम इंडिया इनक्लूसिव इनोवेशन फंड है और इसका निवेश खासकर कृषि, पानी, ऊर्जा और स्वास्थ्य सेवा में किया जाएगा। यहां यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि भारत सरकार द्वारा गरीबों को आज भी काफी सब्सिडी दी जाती है, लेकिन सरकार के खुद के आकलन में भी इसका नतीजा बहुत बेहतर नहीं है। अगर हमारे समाज के बहुत बड़े निचले तबके तक आधुनिक तकनीक और आविष्कार का लाभ नहीं पहुंचा तो समाज में असमानता की खाई ओर चौड़ी होगी। सस्ते और सुविधाजनक आविष्कार भविष्य में इस खाई को पाटने के लिए एक कारगर हथियार की भूमिका निभा सकते हैं।
 

Saturday, 9 June 2012

विज्ञान पत्रकारिता को व्यवहारिक और रोजगारपरक बनाना होगा

वैज्ञानिक दृष्टिकोण तथा चेतना जगाने में संचार माध्यमों की भूमिका अन्‍तर्राष्‍ट्रीय सम्मेलन  में  दिया गया व्याख्यान और आलेख 


शशांक द्विवेदी

अन्‍तर्राष्‍ट्रीय सम्मेलन में व्याख्यान देते हुए श्री शशांक द्विवेदी 
भारत में हिंदी में विज्ञान पत्रकारिता का जिक्र होता है तो ऐसा लगता है कि अभी भी वह शैशव अवस्था में है ,हम अभी भी इसे आम आदमी से ठीक तरह से नहीं जोड़ पाये हैं । पिछले कुछ समय से  देश में हिंदी में विज्ञान संचार के लिए  कई सरकारी और गैर सरकारी संस्थाओ द्वारा अथक प्रयास किया जा रहा है ,ये प्रयास सकारात्मक दिशा में है लेकिन ऐसा लगता है कि हम अभी तक विज्ञान को आम आदमी की मातृभाषा से नहीं जोड़ पाए है । इसकी सबसे बड़ी वजह शायद हिंदी में विज्ञान पत्रकारिता रोजी और रोटी से नहीं जुड़ पाया है । इसमें कैरियर की दृष्टि से भी पूर्णकालिक रूप में बहुत ज्यादा अवसर नहीं है । देश के अधिकांश हिंदी अखबारों और इलेक्ट्रानिक चौनलों में विज्ञान पत्रकार नहीं है । न ही इन माध्यमों में निकट भविष्य में विज्ञान पत्रकारों के लिए कोई संभावनाएं दिखती है । देश में इस समय जितना भी हिंदी में विज्ञान लेखन और पत्रकारिता हो रही है अधिकांशतया पार्ट टाइम हो रही है । वही लोग ज्यादातर विज्ञान लेखन कर रहें है हिंदी के उत्थान के लिए सरकारी विभागों से जुड़े है या वो लोग जो पद और पैसे से सम्रद्धिशाली है । कहने का मतलब आर्थिक रूप से संपन्न व्यक्ति ही हिंदी में विज्ञान लेखन कर रहें है । स्वतंत्र और पूर्णकालिक रूप से हिंदी में विज्ञान लेखन के लिए बहुत कम अवसर है । इसलिए हिंदी में विज्ञान संचार या पत्रकारिता को सबसे पहले  आकर्षक रोजगार से जोड़ना पड़ेगा तभी यह उन्नत दिशा में पहुचेगा ।
देश में विज्ञान ,अनुसंधान और शोध  से सम्बंधित खबरे  प्रिंट मीडिया में थोड़ी जगह बना रही है लेकिन इलेक्ट्रानिक मीडिया इससे कोसों दूर है । प्रत्यक्ष को प्रमाण की आवश्यकता नहीं है आप खुद देखिये कि इस क्षेत्र में इलेक्ट्रानिक मीडिया कितना संजीदा है । सिर्फ विज्ञान और तकनीक से जुड़ी सनसनीखेज खबरें ही खबरिया चैनलों में जगह बना पाती है । जबकि देश की प्रगति और आर्थिक सुरक्षा से जुड़ा यह क्षेत्र देश में पूरी तरह से उपेक्षित है । मै पिछले कई सालों से देश के प्रमुख अखबारों के लिए विज्ञान और तकनीकी विषयों पर स्तंभ लिख रहा हूँ लेकिन इस दौरान मैंने यह महसूस किया कि मीडिया में अधिकतर विज्ञान ,शोध और अनुसंधान से जुड़ी सनसनीखेज खबरें ही दिखाई जाती है  
वैज्ञानिक जागरूकता और जन सशक्तीकरण के परिप्रेक्ष्य में हिंदी में विज्ञान पत्रकारिता की महत्वरपूर्ण भूमिका हो सकती है। लेकिन हम विज्ञान से जुड़े व्यक्तित और वैज्ञानिकों को ही विज्ञान के क्षेत्र में कुशल मानते हैं। इसलिए जो पत्रकार विज्ञान पत्रकारिता के क्षेत्र में उल्लेखनीय काम कर भी रहे है तो भी उनकी पत्रकारिता को कमोबेश कम विश्वसनीय ही माना जाता है।कई ऐसे विषय हैं जिन्हें  खोजी विज्ञान पत्रकारिता का हिस्सा बनाना चाहिए। लेकिन ज्याहदातर विज्ञान पत्रकार इन मुद्दों पर इसलिए कलम नहीं चलाते क्योंकि इन्हें  जब तक वैज्ञानिक संस्थाओं से जुड़े वैज्ञानिक मान्यता नहीं देते तब तक इन्हें  प्रमाणिक नहीं माना जाता। जबकि हिंदी में विज्ञान संचार और स्थानीय स्तर पर देशी वैज्ञानिकों की जानकारी देने वाले लेखन का सामने आना जरूरी है। अमेरिका में दस परिवारों में से एक परिवार जरूर अपनी भाषा में वैज्ञानिक पत्रिका पढ़ता है। अमेरिका में वैज्ञानिक लेख नहीं लिखते। विज्ञान पत्रकार ही लेख लिखते हैं। हमारे देश में  वैज्ञानिक पत्रकारिकता अभी भी शैशव अवस्था में है ,इसे ज्यादा प्रोत्साहन की जरुरत है तभी स्वस्थ व जनहितकारी विज्ञान पत्रकारिता हर माध्यम से आम लोगों के सामने आएगी।
विज्ञान पत्रकारिता का उद्देश्य लोगों को विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में होने वाली गतिविधियों और खोजों की समग्र जानकारी प्रदान करना है। अनेक ऐसे वैज्ञानिक और वैज्ञानिक खोजें, पद्धतियां, पारंपरिक ज्ञान और नवाचार के प्रयोग तब अज्ञात रह जाते हैं, जब उन्हेंन अखबारों में जगह अथवा कोई मंच नहीं मिलता। ऐसे लोगों में ग्रामीण क्षेत्रों में स्थाानीय संसाधनों से आविष्काारों में लगे लोगों को लिया जा सकता है। जैसा कि हाल ही में अमेरिकी फोर्ब्सं पत्रिका ने सात ग्रामीण भारतीय वैज्ञानिकों की जानकारी दी है। इन अविष्कारकों ने ग्रामीण पृष्ठभूमि से होने के बावजूद ऐसी तकनीकें ईजाद की हैं जिससे देश भर में लोगों को जीवन में बदलाव के अवसर मिले हैं। जबकि इनमें से ज्यांदातर लोग ने प्राथमिक शिक्षा प्राप्त  भी नहीं हैं। इनके नामों का चयन आईआईएम अहमदाबाद के प्राध्यामपक और भारत में हनीबी नेटवर्क के संचालक अनिल गुप्ता ने फोर्ब्स पत्रिका के लिए किया था। वाकई खोज परख कर विज्ञान पत्रकारिता के माध्युम से सामने लाई गई ये जानकारियां बेहद महत्वपूर्ण हैं। रोजमर्रा की जिंदगी में विज्ञान और तकनीकी विषयों से संबंधित जानकारी निर्णय लेने की क्षमता के विकास में भी जिज्ञासु आविष्कारकों के लिए मददगार साबित हो सकती है।
व्याख्यान की मुद्रा में शशांक द्विवेदी
विज्ञान के क्षेत्र में जो भी भला या बुरा, उचित या अनुचित हो रहा है, वह सामने आना चाहिए। तभी विज्ञान पत्रकारिता का सर्वांगीण रूप स्पष्ट होगा। वह केवल विज्ञान और वैज्ञानिकों की स्तुति भर नहीं रह जाएगी। बल्कि यह सजग प्रहरी और जागरूक सलाहकार के रूप में विकसित हो सकेगी। ऐसा तब हो सकता है जब देश के वैज्ञानिक अपने कार्यकलापों को निष्पक्षता से जांचें, परखें तथा अपनी आलोचना व विश्लेषण स्वयं करें। इसके साथ ही देश में विज्ञान संचारकों का ऐसा वर्ग विकसित हो, जो विज्ञान पत्रकारिता को व्यवसाय के रूप में अपनाए। यह विज्ञान पत्रकार वर्ग ही प्रयोगशाला में घुसकर वैज्ञानिक अनुसंधान कार्य की खोज कर सकता है और उसे संचार माध्यमों के द्वारा आम आदमियों तक पहुंचा सकता है। विज्ञान पत्रकारिता सुदृढ़ हो, इसके लिए जरूरी है कि समाचार पत्र और समाचार चैनल विज्ञान की खोजी पत्रकारिता के लिए अलग से संवाददाताओं की तैनाती करें और विज्ञान खबरों के लिए जगह दें। यहां यह भी जरूरी हो जाता है कि खोजी पत्रकारिता का मतलब सिर्फ गड़बड़ियों की खोज खबर करके उसे प्रकाशित करना ही नहीं है बल्कि  विज्ञान ने जो नए अनुसंधान किए हैं और जो अज्ञात हैं, उन्हें भी सामने लाना है। दूसरी ओर विज्ञान के क्षेत्र में भी पारदर्शिता, विज्ञान पत्रकारिता द्वारा लाई जा सकती है। इसकी खोज करने पर ही इनके कारणों का पता चल सकता है और उनके समाधान के उपाय ढूंढे़ जा सकते हैं। हमारे देश में अनेक प्रकार का पारंपरिक ज्ञान-विज्ञान और प्रौद्योगिकी का विशाल भंडार है। अनेक ऐसी जानकारियां हैं जो स्थाानीय स्तार पर तो प्रचलित हैं, लेकिन इन जानकारियों को भी लोगों के सामने लाया जा सकता है। यह ध्ये्य विज्ञान पत्रकार का होना चाहिए।
विज्ञान के क्षेत्र में खोजी पत्रकारिता लगभग नगण्य है, परंतु स्वस्थ  विज्ञान पत्रकारिता के लिए आज इसकी जरूरत है। आमतौर पर विज्ञान पत्रिकाओं के अधिकांश लेखक वैज्ञानिक होते हैं और वे विज्ञान से रोजगार के रूप में जुडे़ हुए हैं। जाहिर है कि इन वैज्ञानिकों द्वारा लिखे गए लेखों से यह बात तो उभर कर आती है कि अमुक विषय क्या  है ? इसकी उपलब्धियां क्या हैं या हमारे देश में इस विषय पर क्या हो रहा है ? परंतु जब उस विषय पर हो रही खोज या खोज करने वालों के तौर तरीकों का प्रश्न आता है, तो वैज्ञानिक लेखक मौन रह जाता है और आलोचना से बचता है। अलबत्ता लेख केवल विषयनिष्ठक रह जाता है। निष्पक्षता का उसमें प्रायः अभाव रहता है। ऐसे लेख केवल विषय की प्रशंसा भर करते हैं। पाठक इस एकपक्षीय प्रस्तुतिकरण से संतुष्ट नहीं हो पाता। वह सिक्के का दूसरा पहलू भी जानना चाहता है। पाठक आविष्कार की मनुष्य के लिए उपयोगिता क्या है, यह भी परखने की ललक रखता है। इसलिए वैज्ञानिकों द्वारा लिखे गए एक पक्षीय लेख उसकी जिज्ञासा का शमण नहीं करते।
आज हमारे देश में जो विज्ञान लेखन हो रहा है वह अधिकतर विभिन्न् विषयों के विवरणात्मक पहलुओं और उनकी प्रशंसा तक ही सीमित है। हमारे देश में अधिकतर विज्ञान लेखन और विज्ञान पत्रिकाएं राज्य पोषित अनुदान से प्रकाशित हो रहीं हैं, जिनसे यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि विज्ञान का आलोचनात्मक पहलू प्रस्तुत करें। अधिकतर शोध कार्य भी सरकारी प्रयोगशालाओं में किया जा रहा है। वैज्ञानिक इन प्रयोगशालाओं में क्या कुछ कर रहे हैं, यह जानकारी भी इन पत्रिकाओं में नहीं होती है। बल्क् इन पत्रिकाओं में मंत्रियों, संपादकों और क्षेत्रीय सांसदों व विधायकों के ऐसे प्रशंसा पत्र बेवजह पृष्ठ  घेरे होते हैं, जिन्हें  विज्ञान की जानकारी देकर उपयोगी बनाया जा सकता है। इसलिए इन विज्ञान पत्रिकाओं में विज्ञान के उन तीन सोपान परिलक्षित नहीं होते है जो खोज, शोध और बोध से जुड़े होने चाहिए।
आधुनिक परिदृश्य में  विज्ञान और प्रौद्योगिकी के विकास के अनुरूप हिन्दी भाषा के विकास में नए आयाम जोड़ने की आवश्यकता है । जिससे सुगम एवं बोधगम्य तकनीकी लेखन की शैली का तीव्र गति से अधिकाधिक विकास हो सके, जन-सामान्य के लिए विज्ञान और प्रौद्योगिकी को सुबोध और सम्प्रेषणीय बनाया जा सके, उसमें जिज्ञासा की प्रवृत्ति स्वाभाविक रूप से उत्प्रेरित की जा सके। विश्लेषणात्मक चिंतन शक्ति का विकास किया जा सके और प्रकृति की प्रक्रियाओं के बीच समन्वय स्थापित करने की दृष्टि पैदा की जा सके। साथ ही, बच्चों और किशोरों की कल्पनाशीलता को आकर्षित किया जा सके तथा वयस्कों को रोचक ढंग से समुचित ज्ञान उपलब्ध हो सके।
कुछ लोग खोजी पत्रकारिता को भ्रमवश सनसनीखेज पत्रकारिता से जोड़ते हैं। जबकि दोनों परस्पोर भिन्न है। संतुलित विज्ञान पत्रकारिता के लिए खोजी विज्ञान पत्रकारिता का भरपूर विकास किया जाना जरूरी है। यदि हम अपने चारों ओर नजर दौड़ाकर देखें तो हमारे आसपास ऐसे बहुत से विज्ञान विषयक सूत्र बिखरे मिलेंगे, जिन्हें यदि हम पकड़ने की दृष्टि हासिल कर लें तो एक सफल विज्ञान पत्रकार बन सकते हैं। दरअसल, वैज्ञानिक दृष्टिकोण का महत्वपूर्ण पहलू है खोज करना, जांच करना और उपलब्ध् जानकारियों के माध्यट से अज्ञात जानकारियों की तह में जाकर विज्ञान सम्मत तथ्यों  को ढूंढ़ निकालना। फिर यदि हम इन्हें कल्पनाशील शैली में प्रस्तुत करने में दक्षता प्राप्त कर लेते हैं तो विज्ञान पत्रकारिता के लिए यह एक उपलब्धि होगी।
हालांकि हमारे देश में केवल स्वास्थ्य संबंधी पत्रिकाएं एवं स्तंभ पढ़ने की जिज्ञासा पाठक में सबसे ज्यादा है। क्योंाकि स्वास्थ्य जीवन की लंबी उम्र से जुड़ा है। यदि आज चिकित्सा विज्ञान इतनी उपचार विधियों व दवाओं के आविष्कार में सक्षम नहीं हुआ होता तो मनुष्य का औसत जीवन 40 की उम्र पार नहीं कर पाता। 1900 में एक अमेरिकन व्यक्ति की औसत आयु 30 वर्ष थी जो आज बढ़कर 80 साल हो गई है।
आम तौर पर विज्ञान लेखन मूलतः ऐसे विषयों के इर्द-गिर्द ही घूमता रहता है, जो आम जनता को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित नहीं करते। विज्ञान को आम जनता के सरोकारों से जोड़ने की जरुरत है, और विज्ञान लेखक इस दायित्व को ज्यादा बेहतर ढंग से निभा सकते हैं। नई पीढी और बच्चों में विज्ञान के प्रति जागरूकता पैदा करने के लिए इसे जटिल व्याख्याओं के बंधन से मुक्त करना होगा। इसी पीढी के हाथों में ही न सिर्फ विज्ञान लेखन बल्कि विज्ञान जगत का भी भविष्य है। इसलिए इन्हें स्वयं से जोड़ने के लिए इसमें लचीलापन लाना होगा।
हिंदी में विज्ञान पत्रकारिता में भाषागत समस्या बहुत आती है । सामान्यतया विषय विशेषज्ञों की हिन्दी अथवा अन्य भारतीय भाषाओं में लेखन के प्रति रुचि नहीं है। इसके प्रमुख चार कारण हैं। भाषागत कठिनाई , वैज्ञानिक जगत की घोर उपेक्षा ,हिन्दी में लिखे आलेखों शोधपत्रों को प्रस्तुत करने के लिए मंचों का अभाव प्रकाशन की असुविधा।  इन चारो समस्यायों के समाधान पर हमें अधिक ध्यान देने की जरुरत है । हिन्दी में विज्ञान विषयक शोधपत्रों आलेखों को प्रस्तुत करने के लिए अंग्रेजी के समकक्ष विज्ञान मंचों की स्थापना की आवश्यकता है क्योंकि ज्यादातर ऐसे राष्ट्रीय मंचों का अभाव है जो राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय सेमीनार सम्मेलन आयोजित कर सकें और विज्ञान के बहुपृष्ठी चित्रात्मक शोधपत्रों का संकलन प्रकाशित कर सकें।
अकादमिक संस्थाओं के माध्यम से भी विज्ञान लेखन को दृढ़ता देने के प्रयास सुनिश्चित करने होंगे। किसी शोधार्थी का मूल्यांकन सिर्फ उसके शोध प्रबंध से प्रकाशित शोधपत्रों से ही नहीं, बल्कि विज्ञान को आम जनता के बीच पंहुचाने में सफलता के पैमाने पर रखकर भी होना चाहिए । इस दिशा में शोध निर्देशकों को भी सकारात्मक भूमिका निभाने को प्रेरित किया जाना चाहिए । अकादमिक जगत की सक्रियता विज्ञान लेखन की स्थिरता सुनिश्चित करने में अत्यंत ही महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। निष्कर्षतःविज्ञान लेखन की दिशा विज्ञान को प्रयोगशालाओं तथा अकादमिक जकड़न से मुक्ति दिलाने और आम जन तक सुलभ बनाने की ओर ही होनी चाहिए ।
अर्थव्यवस्था के भूमंडलीकरण और उदारीकरण के दबाव के कारण आज प्रौद्योगिकी की आवश्यकता बढ़ गई है। वास्तव में प्रौद्योगिकीय गतिविधियों को बनाए रखने के लिए तथा सामाजिक-आर्थिक चुनौतियों का सामना करने के लिए भारतीय जन मानस में वैज्ञानिक चेतना का विकास करना अनिवार्य है। देश की सम्पर्क भाषा हिन्दी में वैज्ञानिक तथा प्रौद्योगिकीय ज्ञान के सतत विकास और प्रसार के लिए हम सब को आगे आना होगा । एक व्यक्ति और एक संस्था से ही यह काम सफल नहीं हो सकता है इसमें हम सब की सामूहिक और सार्थक  भागीदारी की जरुरत है ।
अक्सर यह देखने में आता है कि हमारे समाचार पत्र-पत्रिकाओं में ज्यातदातर रचनाएं, विदेशों से आने वाली फीचर प्रचार सामग्री पर आधारित होती हैं। एक तरह से इनके प्रकाशन में कोई बुराई नहीं है। लेकिन यदि इसके साथ ही हम देश में विकसित वैज्ञानिक जानकारियों, तकनीकों और वैज्ञानिक गतिविधियों को प्राथमिकता दें तो यह ज्यादा अच्छा  होगा। इसके लिए आवश्यरक है कि विज्ञान लेखक और पत्रकार स्वयं इस प्रकार की जानकारियां एकत्र करें। इस प्रकार जब वे प्रयोगशालाओं, विज्ञानकर्मियों, विज्ञान नीति-निर्माताओं के संपर्क में आएंगे तो उन्हें  कुछ ऐसे सूत्र हाथ लगेंगे जिनको लेकर विज्ञान पत्रकारिता की राह पर वे आगे बढ़ सकते है। लेख की निष्परक्षता के लिए पत्रकार को जरूरी है कि वह दो वैज्ञानिकों से संबंधित विषय की जानकारी हासिल करे और किसी भी प्रकार के पूर्वग्रह से मुक्त रहे। तभी स्वस्थ व जनहितकारी विज्ञान पत्रकारिता सामनें आयेगी । कुल मिलकर देश में हिंदी विज्ञान पत्रकारिता के उन्नयन के लिये उसे व्यवहारिक और रोजगार परक बनाना होगा । इसके लिये हमें हर स्तर पर सकारात्मक और सार्थक कदम उठाने होंगे ।
(लेखक सेंट मार्गरेट इंजिनियरिंग कॉलेज , नीमराना ,राजस्थान में असिसटेंट प्रोफेसर और शिक्षा ,विज्ञान तथा तकनीकी विषयों पर लिखने वाले वरिष्ठ स्तंभकार है )


Thursday, 7 June 2012

विज्ञान संचार पर अन्तरराष्ट्रीय सम्मेलन




उद्घाटन समारोह



वैज्ञानिक दृष्टिकोण तथा चेतना जगाने में संचार माध्यमों की भूमिका पर अन्तरराष्ट्रीय सम्मेलन
  विज्ञान पत्रकारिता सत्र में श्री सुभाष लखेड़ा ,श्री शशांक द्विवेदी ,श्रीमती प्रियंका शर्मा द्विवेदी 
आम आदमी तक वैज्ञानिक उपलब्धियों का लाभ पहुंचाने में संचार माध्यमों की अहम् भूमिका रही है। परन्तु संचार माध्यमों की भूमिका भारत जैसे विविध संस्कृति वाले देश में और भी जटिल हो जाती है, जहां इन माध्यमों की सुलभता के लिए ग्रामीण तथा शहरी क्षेत्रों में बहुत अन्तराल व्याप्त है। इसी विषय को लेकर दिनांक 29 मई 2012 को ‘‘वैज्ञानिक दृष्टिकोण तथा चेतना जगाने में संचार माध्यमों की भूमिका पर दो दिवसीय अन्तरराष्ट्रीय सम्मेलन’’ आयोजित किया गया। इस अन्तरराष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन विज्ञान संचार के लिए कार्यरत देश की चार अग्रणी संस्थाओं सीएसआईआर-निस्केयर, विज्ञान प्रसार, राष्ट्रीय विज्ञान प्रौद्योगिकी एवं संचार परिषद् एवं राष्ट्रीय विज्ञान संग्रहालय परिषद् द्वारा किया गया। अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर हिन्दी भाषा में विज्ञान संचार का यह पहला सम्मेलन था। इस आयोजन में विदेश एवं देश के विभिन्न राज्यों से आये वक्ताओं ने अपने विचार प्रकट किए। सम्मेलन में लगभग 150 वक्ताओं एवं प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया। फ्रांस, रूस और जापान से आये वक्ताओं ने सम्मेलन को सफल बनाने में अपना सहयोग दिया।
उद्घाटन समारोह के मुख्य अतिथि डा. लालजी सिहं, कुलपति, बनारस हिन्दु विश्वविद्यालय ने विज्ञान को ग्रामीण क्षेत्रों तक पहुँचाने पर ज़ोर दिया। उनके अनुसार वैज्ञानिक विकास गांव तक नहीं पहुँचा है, जहां देश की कुल आबादी का 60-70 फीसदी हिस्सा रहता है। इसके लिए जरूरत है कि प्रयास निम्न स्तर से किये जाएं। साथ ही गांव के लिए स्थाई व्यवस्था की जानी चाहिए। वैज्ञानिक दृष्टिकोण को बढ़ावा देने के लिए मौखिक शिक्षा की बजाए प्रयोगात्मक ज्ञान दिया जाए। उन्होंने कहा इंटरनेट के साथ-साथ और आधुनिक तकनीकों को गांव तक पहुंचाया जाना चाहिए। डा. सिहं ने इस बात को माना कि लोगों में उत्सुकता है लेकिन साथ ही इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता की ग्रामीण इलाकों में साधनों की कमी है। यहां पर उन्होंने मीडिया की भूमिका को अहम बताया।
श्री शशांक द्विवेदी व्याख्यान देते हुए 

सम्मेलन में की-नोट वक्तव्य देते हुए डा. जी. एस. रौतेला, महानिदेशक, राष्ट्रीय विज्ञान संग्रहालय परिषद् (एनसीएसएम) ने इस बात पर ज़ोर दिया कि आज प्रभावी विज्ञान संचार के लिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण को नापने का मापदण्ड और विज्ञान संचार के सूचकांकों को चिन्हित कर सूचकांकों को स्थापित करने की आवश्यकता है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण को नापने के लिए कोई ऐसा यंत्र बनाया जाए जिसमें सभी की भागदारी होनी चाहिए। साथ ही उन्होंने एनसीएसएम द्वारा विज्ञान को आम आदमी तक पहुंचाने के लिए किये जा रहे प्रयासों की व्याख्या की।
प्रोफेसर एस. के. जोशी, पूर्व महानिदेशक, सीएसआईआर ने अध्यक्षीय संबोधन में कहा की वैज्ञानिक दृष्टिकोण को जन जन तक पहुंचाने की आवश्यकता है। प्रोफेसर जोशी ने भी ग्रामीण क्षेत्रों कि तरफ ध्यान देने की ज़रूरत ज़ाहिर की। उन्होंने कहा की वैज्ञानिक दृष्टिकोण यह बताता है कि किसी भी बात को विवेचना के साथ ही अपनाना चाहिए। उन्होंने कहा कि संचार माध्यम समाज में वैज्ञानिक दृष्टिकोण जगाने में अहम भूमिका निभा सकते हंै। उन्होंने अखबारों में विज्ञान काॅलम में और टी. वी. में विज्ञान स्लाॅट की कमी पर निराशा जताई। उन्होंने कहा की संचार माध्यमों के साथ-साथ वैज्ञानिकों की भी जिम्मेदारी है कि वो विज्ञान को लोगों तक पहुंचाने में सहयोग करें। उनके अनुसार इंटरनेट क्रांति के ज़रिए क्षेत्रीय भाषाओं में विज्ञान को और प्रभावी बनाया जा सकता है।
श्री शशांक द्विवेदी

कार्यक्रम में सेंट मार्ग्रेट इंजिनियरिंग कालेज में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर और देश के प्रमुख हिन्दी अखबारों में विज्ञानं और तकनीकी विषयों पर स्तंभ लिखने वाले स्तंभकार शशांक द्विवेदी ने हिंदी में विज्ञानं संचार और पत्रकारिता पर बोलते हुए कहा कि हिन्दी में विज्ञान संचार को रोजगारपरक और व्यावहारिक बनाना होगा तभी नौजवानों का इस क्षेत्र में आकर्षण बढेगा .जब तक विज्ञान संचार रोजी और रोटी से नहीं जुडेगा  तब तक यह आम आदमी से नहीं जुड पायेगा .इस अवसर पर प्रमुख स्तंभकार और अमर उजाला ,आगरा की पत्रकार  प्रियंका शर्मा ने विज्ञान पत्रकारिता से जुड़े अपने अनुभव  शेयर किये .उन्होंने कहा की अभी भी अखबारों में विज्ञान,शोध और अनुसन्धान से जुडी खबरों को बहुत महत्त्व नहीं दिया जाता .अधिकतर पत्रकारों और संपादको में विज्ञानं की ठीक समझ का अभाव है .इसी वजह से विज्ञान की खबरों को कम महत्त्व दिया जाता है .इसे बड़े पैमाने पर सुधारने की जरुरत है .  
      इससे पूर्व सम्मेलन का शुभारंभ डा. सुबोध महंती, निदेशक, विज्ञान प्रसार ने अपने स्वागत अभिभाषण से किया। इसमें उन्होंने वैज्ञानिक दृष्टिकोण को बढ़ावा दिये जाने पर ज़ोर दिया। इसके लिए डा. महंती ने कहा कि समाज के सभी वर्गों के व्यक्तियों एवं संस्थाओं को जोड़ना चाहिए। साथ ही उन्होंने भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू कि दूरगामी दृष्टि की सरहाना की। उन्होंने कहा कि पंडित नेहरू ने विज्ञान एवं तकनीकी क्षेत्र में आम आदमी कि भूमिका को अहम समझा और उसकी भागीदारी को बढ़ाने के लिए प्रयास भी किए। डा. महंती के अनुसार सभी भारतीय भाषाओं में विज्ञान का प्रचार ज़रूरी है।
श्रीमती प्रियंका शर्मा द्विवेदी व्याख्यान देते हुए

      डा. गंगन प्रताप, निदेशक, निस्केयर ने सम्मेलन को सम्बोधित करते हुए कहा कि विज्ञान के अधिकतर प्रयास एक ही भाषा तक सीमित हैं। वैज्ञानिक दृष्टिकोण बनाने के लिए ज़रूरी है कि विज्ञान का प्रचार सभी क्षेत्रीय भाषाओं में हो। डा. प्रताप ने भी पंडित जवाहरलाल नेहरू द्वारा वैज्ञानिक दृष्टिकोण की भूमिका को स्पष्ट किया। उन्होंने विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी को लोगों तक पहुंचाने के लिए संचार माध्यमों कि भूमिका पर भी चर्चा की। इसमें उन्होंने इलेक्ट्रॅानिक मीडिया को खास तौर पर ज़रूरी बाताया क्योंकि ग्रामीण क्षेत्रों में इलेक्ट्राॅनिक मीडिया कि पहुंच ज़्यादा है।
      मुख्य रूप से सम्मेलन को बारह सत्रों में विभाजित किया गया जिसमें प्रमुख हैं. शिक्षण संस्थाओं का विज्ञान संचार में योगदान, भारतीय भाषाओं में विज्ञान संचार, सम्पादन और प्रकाशन की चुनौतियां, विज्ञान पत्रकारिता एवं विज्ञान संचार, विज्ञान संचार के नये साधन, विज्ञान संचार में नीतिगत मुद्दे आदि। इस अंतर्राष्ट्रीय सम्मलेन में देश –विदेश के कई विद्वानों ने भाग लिया और अपने विचार रखे .
दो दिवसीय विज्ञान संचार सम्मेलन के समापन समारोह में दिनांक 30 मई 2012 को प्रो. यशपाल, श्री फारूक़ शेख एवं सुश्री मल्लिका साराभाई ने  मुख्य वक्ता के रूप में अपने विचार रखे .
समारोह के अंत में धन्यवाद ज्ञापन के दौरान श्रीमती दीक्षा बिष्ट, प्रमुख वैज्ञानिक, निस्केयर  ने सभी का आभार व्यक्त करते हुए यह उम्मीद ज़ाहिर की कि इस अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन से विज्ञान संचार के नए मानक स्थापित होंगे और स्थायी दिशा में आगे बढ़ा जा सकेगा।
प्रो .यशपाल से प्रमाण पत्र लेते हुए शशांक द्विवेदी 

देश में वैज्ञानिक दृष्टिकोण तथा चेतना जगाने के उद्देश्‍य से आयोजित इस सम्‍मेलन में जिन प्रमुख वक्‍ताओं ने भाग लिया, उनमें प्रो .यशपाल ,मल्लिका साराभाई , डॉ0 ओम विकास, सुभाष लखेड़ा, पंकज बिष्‍ट, रमेश उपाध्‍याय, देवेन्‍द्र मेवाड़ीचक्रेश जैन, सुरजीत सिंह, हरिकृष्‍ण आर्य, लक्ष्‍मण सिंह बटरोही, विनीता सिंघल, जाकिर अली रजनीश, शशांक द्विवेदी ,प्रियंका शर्मा द्विवेदी ,जीशान हैदर जैदी, विष्‍णु प्रसाद चतुर्वेदी, निमिष कपूर, एम0एम0 गोरे, के0के0 मिश्रा, किंकिणी दास गुप्‍ता, इरफान ह्यूमन आदि के नाम प्रमुख हैं। सम्‍मेलन में सर्वसम्‍मति से निम्‍न प्रस्‍ताव भी पारित किये गये:

1. विज्ञान संचार, विज्ञान जनचेतना, वैज्ञानिक समझ और विज्ञान नीतियों पर काम करने वाले विशेषज्ञों को अवधारणात्‍मक मॉडल तैयार करना चाहिए, जो एक ओर तो संस्‍कृति आधारित मॉडल विकसित करेगा, ताकि वह संस्‍कृति विशेष के अनुरूप वैज्ञानिक दृष्टिकोण की धारणा को समझने में मदद करे और दूसरी ओर विज्ञान संचारकों को इस धारणा को समाज के सभी वर्गों तक पहुंचाने में मदद करे।

2. समाज में वैज्ञानिक दृष्टिकोण के विकास को परखने के लिए उपयुक्‍त मापन सूचक (इंडिकेटर) तैयार कने पडेंगे। यह काम आसान नहीं है, इसलिए इस कार्य में रूचि रखने वाली सभी संस्‍थाओं को एकजुट होकर प्रयास करना होगा।

3. वर्तमान में भारतीय भाषाओं में प्रशिक्षित विज्ञान संचारकों का काफी अभाव है। इसलिए समाज की आवश्‍यकताओं को ध्‍यान में रखते हुए नये तथा अधिक कारगर प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू करने की आवश्‍यकता है।

4. स्‍कूली विज्ञान शिक्षा पर अधिक ध्‍यान देना होगा। साथ ही प्रोयोगिक शिक्षा पर अधिक जोर दिया जाए, ताकि बचपन में ही वैज्ञानिक दृष्टिकोण का बीजारोपण किया जा सके। साथ ही साथ कॉलेज, विश्‍वविद्यालयों की शिक्षा, पाठ्यक्रम में ऐसी सामग्री विषय शामिल किये जाएं, जिससे वैज्ञानिक समझ और चेतना का विकास हो।

समापन समारोह 

5. आज सबसे बड़ी जरूरत इस बात की है कि वैज्ञानिक सोच के अनुरूप शिक्षा को गाँव-गाँव तक पहुँचाया जाए। इसलिए संचार के मौजूदा ढ़ाँचे के बेहतर उपयोग के साथ ही संचार के नए ढ़ाँचे तैयार करने होंगे।

6. विज्ञान संचार की नई प्रौद्योगिकियों पर आधारित माध्‍यमों को पूरी ताकत से अपनाना पड़ेगा।

7. वैज्ञानिक दृष्टिकोण के राष्‍ट्रीय स्‍तर पर व्‍यापक प्रचार-प्रसार के लिए सम्‍बंधित क्षेत्रीय व राष्‍ट्रीय संस्‍थाओं को मिल जुल कर काम करना पड़ेगा, ताकि इस दिशा में वैज्ञानिक चेतना जगाने के लिए समय-समय पर राष्‍ट्रीय व क्षेत्रीय अभियान चलाए जा सकें।

8. भारत के प्रत्‍येक नागरिक का संवैधानिक कर्तव्‍य है कि वह वैज्ञानिक मानसिकता अपनाए और इसके समुचित विकास में अपना हर संभव योगदान दे। इस बात को जन-जन तक पहुँचाने की आवश्‍यकता है।
9. वैज्ञानिकों और सभी बुद्धिजीवियों को कर्तव्‍य मानकर वैज्ञानिक दृष्टिकोण का प्रसार करने में अपना महत्‍वपूर्ण योगदान देना होगा।

10. आज मीडिया जिस प्रकार अंधविश्‍वासों और पुरानी रूढि़यों का प्रचार-प्रसार कर रहा है, उस पर सदन ने चिन्‍ता व्‍यक्‍त करते हुए प्रस्‍ताव पारित किया कि न्‍यूज ब्रॉडकास्टिंग एसोसिएशन प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया और प्रशासन की ओर से इस पर अंकुश लगाने के लिए अविलम्‍ब कारगर कदम उठाए जाएं।

11. इस बात पर भी चिन्‍ता जताई गयी कि देश का मीडिया जहाँ अति आधुनिक प्रौद्योगिकी का इस्‍तेमाल अपने हित साधन के लिए करता है, वह अंधविश्‍वासों को बढ़ावा देकर आमजन को दिगभ्रमित कर रहा है।

12. भारतीय विज्ञान की उपलब्धियों और वैज्ञानिकों के वर्तमान कार्य को आमजन तक पहुँचाने की पुरजोर कोशिश की जानी चाहिए।

13. देश में विज्ञान विरोधी बातें जनता में एक अज्ञात भय फैला रही हैं। विज्ञान संचारकों और अन्‍य लोगों को एकजुट होकर ऐसे प्रचार के खिलाफ कड़े कानून बनाने के लिए भरपूर दबाव बनाना चाहिए।

14. सदन ने इस बात पर भारी चिन्‍ता व्‍यक्‍त की गयी कि देश के कई टीवी चैनल दकियानूसी और विज्ञान विरोधी हैं। ऐसे चैनल पाखंड को प्रोत्‍साहित कर रहे हैं, जबकि विज्ञान को समर्पित कोई भी चैनल नहीं है। आमजन में वैज्ञानिक दृष्टिकोण के विकास के लिए देश में पूरी तरह विज्ञान को समर्पित टीवी चैनल होना चाहिए, जो केवल विज्ञान का संचार करे और जिसमें आईपीआर नियंत्रणों के बिना संसाधनों को साझा किया जा सके।

15. विज्ञान संचार गतिविधियों के दस्‍तावेजीकरण के लिए वेब आधरित डेटाबेस बनाया जाए, जिसमें सफल और असफल दोनों प्रकार के अनुभव एवं गतिविधियाँ दर्ज हों। सफल विज्ञान संचारकों को प्रोत्‍साहित और सम्‍मानित करने के लिए समुचित संस्‍थागत व्‍यवस्‍था की जाए।

16. वैज्ञानिक दृष्टिकोण की आवधारण का सम्‍बंध केवल प्राकृतिक विज्ञान की विधाओं से नहीं अपितु कला, दर्शन और साहित्‍य से भी है। वैज्ञज्ञनिक दृष्टिकोण्‍ के व्‍यापक विकास के लिए सभी विषयों की परस्‍पर सहभागिता की जरूरत है।

17. देशभर में वैज्ञानिक चेतना के प्रचार-प्रसार को अंजाम देने के लिए विज्ञान संचारकों के लिए रोजगार के अवसर बढ़ाए जाएँ। साथ ही इस काम में संलग्‍न संस्‍थाओं के प्रोत्‍साहन के लिए अनुदान की शुरूआत की जाए।



दैनिक भास्कर लेख (13/06/12)

दैनिक भास्कर में विज्ञान लेखन पर मेरा विशेष लेख .इसमें हाल में ही दिल्ली में हुए अंतर्राष्ट्रीय सम्मलेन का विशेष जिक्र है जिसमे मै शामिल हुआ था .एकदम लाइव रिपोर्ट (जरुर पढ़े )
For nicely read pls click on this article link

http://www.vigyanpedia.com/2012/06/blog-post_3938.html