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Monday, 8 July 2019

विज्ञान और नास्तिकों की बेचैनी

दया सागर
विज्ञान और नास्तिकों की बेचैनी और छटपटाहट मैं समझ सकता हूं। दुनिया के सबसे बड़े वैज्ञानिकों में गिने जाने वाले स्टीफन हॉकिंग ने मरने से पहले कहा कि इस दुनिया को बनाने वाला कोई भगवान नहीं है। यह दुनिया भौतिकी के नियमों के हिसाब से अस्तित्व में आई। उनके मुताबिक बिंग बैंग गुरुत्वाकर्षण के नियमों का ही नतीजा था। स्टीफन हॉकिंग ने अपनी नई किताब 'द ग्रैंड डिजाइन' में ईश्वर की किसी भी भूमिका की संभावना खारिज करते हुए कहा कि ब्रह्मांड का निर्माण शून्य से भी हो सकता है।
पता नहीं क्यों मुझे डार्विन की थ्योरी ठीक लगती है कि इंसान जानवरों का वंशज है। ईश्वर ने उसे पैदा नहीं किया। क्योंकि उसे सीधे ईश्वर ने बनाया होता तो वह इतना उपद्रवी कैसे हो सकता है? जितना मैंने पढ़ा और समझा है मैं इसी नतीजे पर पहुंचा हूं कि हमने ईश्वर को अपनी कल्पनाओं में इन बेकार के कामों में जबरदस्ती फंसा दिया है। ईश्वर कोई मिस्‍त्री नहीं जो बनाने बिगाड़ने का काम करे। वह किसी इंसान बनाने वाली फैक्ट्री की मशीन भी नहीं जो बतौर प्रोडक्ट इंसान पैदा करता चला जाए। पहले इंसान को पैदा करे फिर एक दिन मार दे। फिर किसी नए गर्भ में जन्म दे और एक दिन उसे कत्ल कर दे। कभी रोग से कभी किसी एक्सीडेंट में या कभी उम्र के साथ शरीर को जीर्ण शीर्ण करके। फिर कभी कोई जन्म से विकृत बच्चा हो तो उसका जिम्मेदार भी ये खुदा है। पंड़ित मौलवी कहें ये तुम्हारे और इस नवजात  के पूर्व जन्म का फल है। और इसके लिए आप ईश्वर को कोसें। नही माफ कीजिए ईश्वर ये सब नहीं करता और न ये सब करना चाहता है।
और सृष्टि को बनाना और फिर उसे चलाना भी कितना बोरिंग, कितना ऊबाऊ काम है। क्या आप सोचते हैं अरबों से साल ईश्वर यही काम कर रहा है? जैसे कि वह कोई की-मैन हो। सुबह पानी की सप्‍लाई ऑन करे शाम को आफॅ करे। कुछ नहीं तो रोज सुबह उठ कर सृष्टि में घड़ी की तरह चाभी भरे।  
स्टीफन एकदम सही कह कहे हैं कि ब्रह्मांड या प्रकृति के सारे नियमों को विज्ञान से समझा जा सकता है। बस हमें सूत्र पकड़ने हैं। सटीक तौर पर वह थ्योरम खोजनी है जिससे यह सृष्टि बनी। या सृष्टि का शून्य से विस्तार हुआ तो उसका फार्मूला क्या था? यह कोई कठिन काम नहीं। मुझे पूरी उम्मीद है एक न एक दिन विज्ञान ये साबित कर देगा हमारे जिन्दा रहते।
तो ये सारा ड्रामा क्या है?
इसका जवाब मैंने वेद, उपनिषदों और आगे वेदान्त में पाया। दरअसल हमने सृष्टि और सृष्टा को अलग अलग मान लिया। जैसे कि पश्चिम ने मान लिया। लेकिन हमारे वेद फिर तैतरीय उपनिषद ने साफ कहा-शुरू में कुछ नहीं था न सत न असत न स्वर्ग न अंतरिक्ष न पृथ्वी। यानी शून्य था और उसी से सृष्टि का विस्तार हुआ।   भारतीय धर्मग्रन्थ कहते है की सृष्टि की रचना के पहले कुछ नहीं था न प्रकाश था न अन्धकार था न पृथ्वी थी न आसमान था अगर था तो सिर्फ शून्य। बाद में शंकराचार्य ने अपने अद्वैतवाद सिद्धान्त में कहा- ब्रह्मांड में सिर्फ ईश्वर है और कोई दूसरा अन्य नहीं। यानी पेड़ पौधे हवा मनुष्य जो भी है वो ईश्वर है और ईश्वर के सिवाय और कुछ नहीं। । विज्ञान कहता है की शून्य से अचानक ही एक बैंग के साथ ब्रह्मांड की उत्पत्ति हुई यानी सम्पूर्ण ब्रह्मांड की उत्पत्ति किसी एक से ही हुई है। तो शंकराचार्य और पौराणिक ग्रन्थ दोनों ही स्टीफन के दावों की पुष्टि करते हैं। विज्ञान कहता है कि ब्रह्मांड की उत्पत्ति के पहले कुछ नहीं था।  हमारे ग्रं‌थ भी कहते है की ब्रह्मांड की उत्पत्ति कुछ नहीं था।
अब आप कहेंगे फिर ईश्वर बीच में कहां से आ गया? क्यों आ गया?
बिलकुल ठीक प्रश्न है। हमारे प्राचीन ग्रंथ और कुछ आधुनिक दार्शनिकों ने इसे बखूबी समझाया है। रसायन विज्ञान में एक अजीबो गरीब वैज्ञानिक प्रक्रिया है कैटेलेटिक एजेंट । ये ऐसे तत्वों का जोड़ है जो खुद किसी क्रिया में हिस्सा नहीं लेता लेकिन फिर भी इनके बिना कोई क्रिया नहीं हो सकती। इसे ऐसे समझें। जल यानी पानी हाईड्रोजन और ऑक्सीजन का जोड़ है। विज्ञान भी कहता है कि हाईड्रोजन और ऑक्सीजन के अलावा पानी में और कुछ नहीं है। यानी जल एक रसायनिक पदार्थ है जिसका रसायनिक सूत्र H2O है। यानी हाईड्रोजन के दो अणु और आक्सीजन के एक अणु से मिलकर पानी बनता है। लेकिन विज्ञान के विद्यार्थी जानते हैं कि सिर्फ हाईड्रोजन और ऑक्सीजन मिलने से पानी नहीं बनता। उसे पानी बनने के लिए कैटेलेटिक एजेंट की भी जरूरत पड़ती है। हैरत की बात है कि अगर आप हाईड्रोजन और ऑक्सीजन के जोड़ को तोड़ें तो ये केटेलेटिक एजेंट की ऊर्जा आपको कहीं नहीं दिखेगी।  केटेलेटिक एजेंट की मौजूदगी ही उसका रोल उसकी भूमिका है। ये करता कुछ नहीं सिर्फ मौजूद रहता है। ये न हो तो पानी का अस्तित्व भी न हो। ऐसे ही ईश्वर है। वह करता कुछ नहीं सिर्फ मौजूद रहता है। उसके रहने भर से प्रकृति अपना काम करती है। कल ये प्रकृति भी नहीं रहेगी तो वह रहेगा। क्योंकि प्रकृति से पहले भी वह था। उसकी मौजूदगी के बिना यह सृष्टि नहीं चल सकती। इसकी मौजूदगी में सृष्टि खुद ब खुद चलती है।
फिर आप कह सकते हैं कि बस इतना सा ही काम है तो उसका होना क्यों जरूरी है?
ये सवाल उठ सकता है। बेशक ये तार्किक प्रश्न है। इसे ऐसे समझें। हर एक बीज अपने आप में एक ब्रह्मांड है। एक बीज में कितनी आपर संभावनाएं छिपी हैं। दुनिया के सारे पेड़ नष्ट हो जाएं ‌सिर्फ एक बीज पूरे संसार को पेडों से ढक सकता है। वह बीज पेड बनेगा। उस पर फूल और फल आएंगे और उसके साथ आएंगे अन्नत बीज। फिर हर बीज से एक नया पेड़ बनेगा। यह प्रक्रिया जारी रहेगी। आप समझें ईश्वर हर बीज को अंकुरित नहीं कर रहा है। यह वैज्ञानिक प्रक्रिया है। जिसके तहत बीज अंकुरित होते हैं। तो इस हिसाब से सारे बीज अनिवार्य रूप से अंकुरित होने चाहिए। लेकिन नहीं। ऐसा नहीं होता। सिर्फ वही बीज अंकुरित होते हैं जिन्हें ईश्वर चाहता है। बीज के अंकुरण में ईश्वर की मौजूदगी अनिवार्य है। यही ईश्वर की  महत्ता है। ये वाकई एक अबूझ पहेली है। लेकिन दिलचस्प है। ईश्वर की मेरी खोज जारी है। और आपकी?

 संदर्भ ग्रंथ-
कॉसमाालॉजी आफ ‌दि ऋग्वेदा-एच डब्लू वालिस
तैतरीय उपनिषद तृतीय संस्करण चौखम्बा प्रकाशन
आईडिया आफ गॉड -प्रिगिंल, पैटिसन
तर्कदीपिका अथल्ये का द्वितीय संस्करण
Times of Refreshing: A Worship Ministry Devotional By Tom Kraeuter, Gerrit Gustafson, Kent Henry, Bob Kauflin, Patrick Kavanaugh
Man's Fate and God's Choice: An Agenda for Human Transformation-By Bhimeswara Challa

Friday, 14 June 2019

पानी की ए टू जेड कहानी

...ताकि पानी न करे पानी-पानी
Water Purification: A to Z

हाल में नैशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) ने केंद्र सरकार से कहा है कि जिन इलाकों में पानी ज्यादा खारा नहीं है, वहां आरओ के इस्तेमाल पर बैन लगाया जाए क्योंकि इससे पानी की बहुत बर्बादी होती है और यह सेहत के लिए मुफीद भी नहीं है। खास बात यह है कि महानगरों में पानी सप्लाई करने वाली एजेंसियां भी इस बात पर जोर देती हैं कि उनका पानी सौ फीसदी शुद्ध है, लेकिन हकीकत यह है कि महानगरों में सबसे ज्यादा आरओ वॉटर प्योरिफायर ही बिक रहे हैं। क्या है शुद्ध पानी का फंडा और आरओ के इस्तेमाल में है समझदारी, एक्सपर्ट्स से बात करके ब्योरा रहे हैं वीरेंद्र वर्मा:

दिल्ली, मुंबई या लखनऊ समेत देश के ज्यादातर शहरों में पानी का स्रोत या तो नदियां हैं या फिर ग्राउंड वॉटर। इनके पानी को ही साफ करके वहां की सरकारी एजेंसियां लोगों के घरों में पानी की सप्लाई करती हैं। सरकारी एजेंसी कच्चे पानी को साफ करके पाइपलाइन के जरिए लोगों के घरों में पहुंचाती है। हालांकि यहां दिक्कतें पुरानी पाइपलाइनों की वजह से आती हैं या फिर फैरूल से घर तक पानी पहुंचने के दौरान पानी में अशुद्धियां मिलती हैं। अगर कहीं लीकेज होती है तो सप्लाई वाले पानी में सीवर का पानी मिलने की आशंका बढ़ जाती है क्योंकि कई जगह पीने की पाइपलाइनें और सीवर की पाइपलाइनें साथ-साथ गुजरती हैं।
पानी की पाइपलाइन पर सीधे मोटर लगाने से भी गंदा पानी आ जाता है। कई बार हमें यह पता नहीं होता कि पाइप में सप्लाई आ रहा है या नहीं। अगर नहीं आ रहा है और हम मोटर चालू कर देते हैं तो मोटर बाहर की गंदगी खींच लेता है।
सप्लाई वाले पानी में अमूमन सबसे ज्यादा अशुद्धियां फेरूल से आपके घर तक जाने वाले पाइप में मिलती हैं। ऐसे में बेहतर रहेगा कि पानी का कनेक्शन जल बोर्ड के लाइसेंसी प्लंबर से ही कराएं और अगर पानी में गड़बड़ी आ रही है तो सबसे पहले अपनी लाइन की जांच कराएं। जरूरी हो तो पाइपलाइन बदलवा लें। फैरूल वह जॉइंट होता है, जहां पर जल बोर्ड की पाइपलाइन से घरों में पानी का कनेक्शन दिया जाता है। यहां लीकेज होने पर घरों के अंदर गंदा पानी सप्लाई होने लगता है।

पानी में गड़बड़ियां
पानी में दो तरह की अशुद्धियां होती हैं: घुलनशील और अघुलनशील। ये केमिकल और बायलॉजिकल होती हैं। केमिकल अशुद्धियां कई बातों पर निर्भर करती हैं। मसलन, अगर पानी के स्रोत के पास फैक्ट्रियां हैं तो उनकी गंदगी पानी में जाएगी। इसी तरह सेनेटरी लैंडफिल की गंदगी रिसकर जमीन के नीचे के पानी को खराब कर देती है। दिल्ली में गाजीपुर और भलस्वा लैंडफिल के साथ ऐसा ही हुआ है। स्टडी के मुताबिक, इन दोनों सैनिटरी लैंडफिल के 10 किलोमीटर तक के दायरे के अंडरग्राउंड वॉटर की क्वॉलिटी काफी खराब हो चुकी है। अगर खेती में कीटनाशकों का बहुत इस्तेमाल होता है तो ये केमिकल अंडरग्राउंड वॉटर में मिलकर उसे गंदा कर देते हैं।

पीने का पानी कैसा हो?
BIS स्टैंडर्ड
TDS: 0-500 ppm
pH level: 6.5-7.5
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WHO स्टैंडर्ड
- पानी में 300 से कम टीडीएस है तो उसे एक्सेलेंट कैटिगरी का माना जाता है।
- 300 से 600 के बीच की टीडीएस को गुड कैटिगरी में माना जाता है।
- 600 से 900 के बीच के टीडीएस को फेयर कैटिगरी में माना जाता है।
- 1200 से ज्यादा के टीडीएस वाले पानी को खराब कैटिगरी में माना जाता है।

BIS के नियम
पीने के पानी की जांच के लिए बीआईएस (ब्यूरो ऑफ इंडियन स्टैंडर्ड्स) ने जो स्टैंडर्ड बनाए हैं वे बीआईएस-10500 के तहत आते हैं। इनके अनुसार पानी में टीडीएस की मात्रा 0 से 500 पीपीएम (पार्ट्स प्रति मिलियन) होनी चाहिए। साथ ही पीएच लेवल 6.5 से 7.5 के बीच होना चाहिए। इससे ज्यादा होने पर यह नुकसानदेह है। बीआईएस के मुताबिक, पानी में कुल 82 तरह की अशुद्धियों की जांच होनी चाहिए। ये फिजिकल पैरामीटर-6, कैमिकल (टॉक्सिक)-23+16, रेडियोएक्टिव-3, पेस्टिसाइड्स-18, बैक्ट्रियोलोजिकल-2, माइक्रोस्कॉपिक-13 हैं। डब्ल्यूएचओ ने पानी की जांच के लिए 300 से 400 तरह के पैरामीटरस तय किए हैं, चूंकि भारत में बीआईएस के मानक लागू होते हैं, इसलिए पानी की जांच बीआईएस के मानकों पर सही मानी जाती है।

TDS क्या है?
पानी में घुली हुई सभी चीजों को टीडीएस (टोटल डिसॉल्व्ड सॉलिड्स) कहते हैं। इसमें सॉल्ट, कैल्शियम, मैग्निशियम, पोटैशियम, सोडियम, कार्बोनेट्स, क्लोराइड्स आदि आते हैं। ड्रिंकिंग वॉटर को मापने के लिए टीडीएस (टोटल डिसॉल्व्ड सॉलवेंट), पीएच और हार्डनेस लेवल देखा जाता है। बीआईएस (ब्यूरो ऑफ इंडियन स्टैंडर्ड) के मुताबिक, मानव शरीर अधिकतम 500 पीपीएम (पार्ट्स प्रति मिलियन) टीडीएस सहन कर सकता है। अगर यह लेवल 1000 पीपीएम हो जाता है तो शरीर के लिए नुकसानदेह हैं। लेकिन फिलहाल आरओ से फिल्टर्ड पानी में 18 से 25 पीपीएम टीडीएस मिल रहा है जो काफी कम है। इसे ठीक नहीं माना जा सकता। इससे शरीर में कई तरह के मिनरल नहीं मिल पाते। यहां एक सवाल और है कि हमारे घरों में जो पीने के पानी की सप्लाई सरकारी एजेंसियां करती हैं, उनकी कितनी जांच होती है?

सरकारी प्लांट से घर तक ऐसे पहुंचता है पानी
1. सरकारी एजेंसियों के वॉटर ट्रीटमेंट प्लांट में पानी नदी या नहर के जरिए आता है तो सबसे पहले पानी में मौजूद अशुद्धियों की जांच होती है। इसके बाद तय किया जाता है कि उस पानी को किस विधि से साफ किया जाना चाहिए।
2. पानी की जांच करने के बाद उसमें क्लोरीन मिलाई जाती है। उसके बाद फिटकरी, पॉली एल्युमिनियम क्लोराइड मिलाया जाता है, ताकि पानी की गंदगी साफ हो सके।
3. इसके बाद पानी क्लोरीफायर में जाता है, जहां अशुद्धियां और गाद नीचे बैठ जाती हैं। यहां पानी की दो बार टेस्टिंग होती है।
4. क्लेरीफायर से पानी फिल्टर हाउस में जाता है, जहां पानी छाना जाता है। फिर से पानी की जांच होती है। इसके बाद पानी को प्लांट में मौजूद जलाशयों में भेजा जाता है। यहां पर दोबारा से क्लोरीनेशन होता है। पानी साफ करने के बाद जितनी भी बार पानी की जांच होती है, उसमें घुलनशील और अघुलनशील अशुद्धियों की जांच की जाती है। अगर पानी में कोई भी गड़बड़ी पाई जाती है तो पानी की सप्लाई रोक दी जाती है। प्लांट से पानी साफ होने के बाद अंडर ग्राउंड रिजरवॉयरों में जाता है। यहां भी घरों में सप्लाई करने से पहले जांच की जाती है। इसके बाद भी जल बोर्ड लोगों के घरों में भी जाकर पानी के सैंपल जांच के लिए उठाता है। इसलिए आरओ कंपनियों का आरोप गलत है कि जल बोर्ड पानी की जांच सही से नहीं करता।

क्या कहा है NGT ने
एनजीटी के निर्देश पर नैशनल एन्वॉयरनमेंट इंजीनियरिंग रिसर्च इंस्टिट्यूट (Neeri), सेंट्रल पलूशन कंट्रोल बोर्ड (CPCB) और IIT-Delhi ने आरओ के इस्तेमाल पर एक रिपोर्ट तैयार कर एनजीटी को सौंपी है। रिपोर्ट के आधार पर एनजीटी ने 28 मई को पर्यावरण मंत्रालय को जारी निर्देश में ये बातें कही हैं:
-देश में 16 करोड़ 30 लाख लोग ऐसे हैं, जिन्हें पीने के लिए साफ पानी नहीं मिलता। यह संख्या पूरी दुनिया में सबसे ज्यादा है।
-विकसित देशों में भी आरओ का इस्तेमाल कम करने पर जोर दिया जाता है। वहां समंदर के पानी को पीने लायक बनाने के लिए आरओ इस्तेमाल होता है क्योंकि इस पानी में TDS बहुत होता है। वहीं भारत में मौजूद पानी में टीडीएस की मात्रा कम होने के बावजूद आरओ की डिमांड दिन ब दिन बढ़ रही है।
-आरओ सिस्टम बनाने वाली कंपनियों ने पानी को लेकर लोगों में डर का माहौल बना दिया है।
-घरों में सप्लाई होने वाले पानी में अगर TDS 500mg/लीटर से कम है तो RO को बैन कर देना चाहिए।
-लोगों के घरों में जो पानी सप्लाई होता है, उसमें TDS कितना है, यह कैसे पता चले। इसके लिए सरकार को उस पानी के बारे में बिल के जरिए पूरी जानकारी दी जानी चाहिए। बिल पर लिखा रहे कि इस पानी का स्रोत क्या है और उसमें TDS कितना है।
-आरओ सिस्टम से पानी में मौजूद जरूरी मिनरल्स भी पूरी तरह निकल जाते हैं। विदेशों में आरओ के बुरे असर देखा जा रहा है। वहां के लोगों में कैल्शियम और मैग्निशियम की कमी होने की शिकायत आने लगी है। इसलिए भारत में आरओ सिस्टम बनाने वाली कंपनियां यह ध्यान रखें कि पानी में कम से कम 150mg/लीटर टीडीएस जरूर मौजूद रहे।
-जिन इलाकों के पानी में आर्सेनिक और फ्लोराइड जैसे खतरनाक तत्वों की मौजूदगी है, वहां के लिए भी ऐसी तकनीक लाई जाए जिससे कि इनका स्तर कम हो सके ताकि आरओ की जरूरत वहां भी नहीं पड़े।
-आरओ से पानी साफ होने की प्रक्रिया में अमूमन 80 फीसदी पानी बर्बाद हो जाता है और 20 फीसदी ही पीने लायक मिलता है। आरओ कंपनियों को ऐसी मशीन बनाने के लिए कहा जाए, जिसके द्वारा कम से कम 60 फीसदी पानी पीने लायक बने और 40 फीसदी से ज्यादा पानी बर्बाद न हो। वहीं साफ पानी प्राप्त करने की क्षमता को आगे कम से कम 75 फीसदी तक बढ़ाई जाए।

RO कंपनियों का पक्ष
'आरओ पर पाबंदी लगाना समस्या का हल नहीं है। दरअसल, पानी में टीडीएस के साथ-साथ माइक्रोप्लास्टिक, आर्सेनिक, कीटनाशक जैसी दूसरी अशुद्धियां भी होती है जिन्हें आरओ के जरिए हटाया जाना जरूरी है। जहां तक पानी की बर्बादी की बात है तो हमने ऐसी तकनीक विकसित की है कि 80% की जगह 50% पानी ही बर्बाद होता है। हम और रिसर्च करके इसे घटाने की कोशिश कर रहे हैं। BIS और WHO के मापदंडों में कहीं भी यह नहीं बताया है कि टीडीएस कम से कम कितना हो। फिर भी हम यह सुनिश्चित करते हैं कि हमारे आरओ में कम से कम 50mg/लीटर टीडीएस पानी निकले। यह पानी स्वाद और सेहत के लिए मुफीद होता है। डब्ल्यूएचओ ने कहा है कि एक दिन में 4 ग्राम से ज्सादा सॉल्ट नहीं लेना चाहिए, लेकिन भारत एक व्यक्ति 9 ग्राम सॉल्ट लेता है। अगर पानी में ज्यादा टीडीएस होता है तो और ज्यादा सॉल्ट शरीर के अंदर जाता है। उससे ब्लड प्रेशर बढ़ता है। एनजीटी ने जो सवाल उठाए हैं, उसके लिए भी सही तथ्य पेश करने पड़ेंगे ताकि आरओ को लेकर भ्रम की स्थिति ना बने।'
-महेश गुप्ता, चेयरमैन, केंट आरओ

क्या कहते हैं डॉक्टर
'अगर टीडीएस 100 तक है तो वह ठीक है। हां, किडनी के मरीजों के लिए 50 से 100 के बीच टीडीएस होना चाहिए।'
-डॉ़ के. के. अग्रवाल, सीनियर कार्डियॉलजिस्ट

'सेफ वॉटर के लिए अगर बैक्टीरिया, वायरस हटाने हैं तो पानी उबालने से ये सब मर जाते हैं, लेकिन अगर उसमें हेवी मेटल्स हैं तो वे उबालने से नहीं जाएंगे। उसके लिए आरओ की जरूरत होती है।'
-डॉ़ एस. के. सरीन, डायरेक्टर, इंस्टिट्यूट ऑफ लिवर एंड बाइलरी साइंसेज

पानी साफ करने के परंपरागत तरीके
पानी को उबालना: वैसे तो पानी को साफ और पीने योग्य बनाने के लिए ढेरों तरीके मौजूद हैं, लेकिन सबसे पुराना तरीका है पानी को उबालना। दुनियाभर में इस परंपरागत तरीके को लोग अपनाते हैं। पानी को कम-से-कम 20 मिनट उबालना चाहिए और उसे ऐसे साफ कंटेनर में रखना चाहिए, जिसका मुंह छोटा हो ताकि उसमें गंदगी न जाए। उबले पानी को ढक कर रखें। हालांकि उबालने से पानी साफ तो हो जाता है, लेकिन उसमें मौजूद हेवी मेटल्स नहीं निकल पाते।

कैंडल वॉटर फिल्टर: पानी को साफ करने के लिए दूसरा मुफीद तरीका है कैंडल वॉटर फिल्टर। इसमें समय-समय पर कैंडल बदलने की जरूरत होती है ताकि पानी बेहतर तरीके से साफ हो सके। सिरैमिक से बने कैंडल्स पानी से बैक्टीरिया हटाते हैं। हालांकि यह पानी में घुले हुए केमिकल को निकाल नहीं पाता। इसके कैंडल को 6 महीने या इस्तेमाल के हिसाब से बदलते रहना चाहिए। कैंडल की कीमत करीब 550 रुपये से शुरू होती है। फिल्टर के साइज के साथ-साथ कीमत बढ़ती रहती है।

क्लोरिनेशन: पानी साफ करने के लिए क्लोरिनेशन बहुत पुरानी प्रक्रिया है। पानी को हानिकारक बैक्टीरिया से बचाने के लिए नगरपालिका, अस्पताल, रेलवे आदि की टंकियों में क्लोरीन का इस्तेमाल किया जाता है। इस प्रक्रिया से पानी साफ होने के साथ-साथ उसके रंग और गंध में भी बदलाव आ जाता है। क्लोरिनेशन से बैक्टीरिया मर जाते हैं। हालांकि इसका इस्तेमाल सही मात्रा में किया जाना चाहिए क्योंकि ज्यादा क्लोरीन से पानी के स्वाद के साथ हमारी सेहत पर भी असर पड़ता है। घरों में इसका इस्तेमाल करना हो तो एक्सपर्ट की सलाह लें।

पानी साफ करने के आधुनिक तरीके
RO (रिवर्स ऑस्मोसिस)
आरओ पानी साफ करने की ऐसी तकनीक है, जिसमें प्रेशर डालकर पानी को साफ किया जाता है। इस तकनीक में पानी में घुली अशुद्धियां, पार्टिकिल्स और मेटल खत्म हो जाते हैं। आरओ का इस्तेमाल उन इलाकों में करना चाहिए जहां पानी में टीडीएस (टोटल डिसॉल्व्ड सॉल्ट) ज्यादा हो यानी पानी खारा हो। मसलन बोरवेल के पानी के लिए या समुद्री इलाकों के लिए आरओ सही है।
खूबियां
- आरओ के पानी में कोई भी अशुद्धि नहीं रहती।
- बैक्टीरिया और वायरस को ब्लॉक कर बाहर करता है।
- क्लोरीन और आर्सेनिक जैसी अशुद्धियों को भी साफ करता है।
कमियां
- बिजली की जरूरत पड़ती है।
- यह नॉर्मल से ज्यादा टैप वॉटर प्रेशर में काम करता है।
- औसतन 20 से 50 फीसदी पानी आरओ के रिजेक्ट सिस्टम से बर्बाद होता है।
- कई आरओ हमारे पीने के पानी से जरूरी मिनरल्स को बाहर कर देते हैं।

कौन-सा RO लें?
आरओ के इतने ब्रैंड्स और फीचर्स आने के बाद सबसे ध्यान रखने वाली बात यह है कि जो भी फाइनल करें, वह आपके इलाके के सप्लाई वॉटर के हिसाब से हो। मसलन, अगर मेट्रो सिटी में रह रहे हैं तो जाहिर है कि वहां का पलूशन लेवल ज्यादा होगा। इसका असर सप्लाई हो रहे पानी पर भी पड़ेगा। ऐसे में प्योरीफायर वही लें जिसमें RO, UV, UF तीनों तकनीक हो। इसके साथ ही चूंकि जरूरी मिनरल्स की शरीर को जरूरत होती है, ऐसे में बाजार में आ चुकी TDS (टोटल डिसॉल्व्ड सॉल्ट) कंट्रोलर तकनीक से लैस प्योरिफायर ही लें, जिससे शरीर में बैलेंस बना रहे।

UV (अल्ट्रावॉयलेट)
इस तकनीक से पानी में मौजूद बैक्टीरिया और वायरस खत्म होते हैं। यह पानी में घुली क्लोरीन और आर्सेनिक को साफ नहीं कर सकता। इसका इस्तेमाल उन इलाकों में ही होना चाहिए जहां ग्राउंड वॉटर पहले से मीठा हो और सिर्फ बैक्टरिया को खत्म किए जाने की जरूरत हो। मसलन, पहाड़ी और कम प्रदूषण वाले इलाकों के लिए ठीक है। इसे समुद्री इलाकों में या प्रदूषित शहरों में इस्तेमाल करना सही नहीं होगा।
खूबियां
- सभी बैक्टीरिया और वायरस को खत्म कर देता है।
- यह नॉर्मल टैप वॉटर प्रेशर में काम कर सकता है।

अल्ट्रा फिल्ट्रेशन (UF)
यह एक फिजिकल तकनीक है। इसे ग्रैविटी तकनीक भी कहते हैं। इसमें किसी केमिकल का उपयोग किए बिना पानी साफ हो जाता है। इसमें तकनीक अलग-अलग हो सकती हैं, लेकिन तरीका एक ही है और वह यह कि यह ग्रैविटी की वजह से इसमें पानी विभिन्न परतों से होते हुए नीचे पहुंचती है और इस दौरान पानी साफ हो जाता है। कुछ में इसके लिए मेंब्रेन (झिल्ली) का इस्तेमाल होता है तो कुछ में सेरेमिक का जिससे पानी छनकर साफ होकर मिलता है।
खूबियां
- बिजली की जरूरत नहीं।
- बैक्टीरिया और वायरस को मार कर पानी से बाहर करता है।
- नॉर्मल टैप वॉटर प्रेशर में काम कर सकता है।
-किसी केमिकल इस्तेमाल नहीं होता।
-यह सस्ता है।
कमियां
पानी हार्ड हो और क्लोरीन और आर्सेनिक की मात्रा ज्यादा हो तो इसका कोई फायदा नहीं। यह घुली हुई अशुद्धियों को साफ नहीं कर पाता।

पोर्टेबल प्योरिफायर
यह छोटे आकार का होता है। इसमें अक्सर नैनो टेक्नॉलजी या फिर मेटल बेस्ट प्योरिफिकेशन होता है।
खूबियां
-इसमें बिजली की जरूरत नहीं होती।
-इसे कहीं भी साथ ले जाना आसान है।
-इसे सीधे टैप में लगाकर साफ पानी मिल जाता है।
कमियां
-ज्यादा गंदा पानी के लिए कारगर नहीं।
-हार्ड वॉटर या खारे पानी में काम नहीं करता।
-बैक्टीरिया और वायरस को निकालने की इसकी क्षमता कम होती है।

हैलोजन टैब्लेट: इमर्जेंसी या ट्रैकिंग के दौरान पानी साफ करने के लिए हैलोजन टैब्लेट का इस्तेमाल किया जाता है। ये गोलियां पानी में पूरी तरह घुल जाती हैं। बाजार में पोर्टेबल एक्वा वॉटर टैब्लेट्स की 50 टैब्लेट्स लगभग 500 रुपये में आती हैं। इसी तरह एक्वाटैब्स वॉटर प्योरिफिकेशन की 100 टैब्लेट्स लगभग 1100 रुपये में आती हैं।

चंद जल सूत्र
Q. फिल्टर होने के कितने दिनों बाद तक उस पानी को पी सकते हैं?
A. आरओ से फिल्टर होने के बाद पानी अगर सही तापमान यानी फ्रिज में रखा है तो करीब एक हफ्ते तक ठीक रहता है।

Q. फिल्टर को कितने समय पर बदल लेना चाहिए?
A. अगर आप अपने घर में हर दिन 20 लीटर पानी साफ करते हैं तो फिल्टर को 6 महीने के अंदर बदल देना चाहिए।

Q. पानी साफ होने के बाद आरओ से बर्बाद हुआ पानी पौधों में डाल सकते हैं?
A. एक अनुमान के मुताबिक दिल्ली में घरों में लगे आरओ से हर दिन काफी पानी बर्बाद हो जाता है। इतने पानी से करीब 20 लाख लोगों की प्यास बुझाई जा सकती है। चूंकि आरओ पानी से सारी अशुद्धियां निकाल देता है तो बर्बाद हुए पानी में प्रदूषण ज्यादा होता है। अगर इस पानी को पौधों में डालेंगे तो पानी के जरिए प्रदूषण पौधों में भी जाएगा। साथ ही, यह पानी जमीन के अंदर जाने पर जमीन के पानी को भी खराब करेगा। हालांकि, कुछ कंपनियों का यह दावा कि इस पानी को स्टोर करके गार्डनिंग कर सकते हैं। इस बेकार पानी को इस्तेमाल करने का बेस्ट तरीका है कि इसका इस्तेमाल कपड़ा धोने और साफ-सफाई में किया जाए।

Q. कहा जाता है कि आरओ वॉटर से बाल धोने से फायदा होता है। क्या यह सही है?
A. चूंकि आरओ वॉटर से प्रदूषण फैलाने वाले कण निकल जाते हैं। इसलिए आरओ के पानी से बाल धोने से फायदा हो सकता है।

Q. पानी की टंकी के लिए सबसे बेहतरीन मटीरियल कौन-सा है?
A. वॉटर टैंक किसी भी मैटिरियल का हो अगर उसमें पानी लगातार निकलता और भरता रहता है तो वह हानिकारक नहीं है। अगर पानी के टैंक में पानी लंबे समय तक जमा रहता है तो मटीरियल से फर्क पड़ सकता है। वैसे फूड ग्रेड प्लास्टिक का पानी टैंक सबसे अच्छा माना जाता है। इससे पानी की क्वॉलिटी खराब नहीं होती। आजकल स्टेनलेस स्टील की भी टंकियां आने लगी हैं। सीमेंट की टंकियों की परंपरा पुरानी है।

Q. तांबे या चांदी के बर्तन में पानी पीने से क्या वाकई फायदा होता है?
A. तांबे या चांदी के बर्तन में पानी पीने से तभी फायदा होता है जब पानी पहले से साफ हो। गंदा पानी इन बर्तनों में रखकर पीने से फायदे के बजाय नुकसान करेगा क्योंकि जब पानी तांबे, चांदी या सोने जैसे मेटल के संपर्क में आता है तो आयोनाइजेशन प्रक्रिया होती है। अगर पानी साफ होता है तो यह फायदा करता है, लेकिन अगर पानी गंदा हुआ तो यह नुकसानदायक साबित होता है।

Q. क्या स्टेनलेस स्टील का परंपरागत वॉटर फिल्टर शुद्ध पानी देता है?
A. स्टेनलेस स्टील का परंपरागत वॉटर फिल्टर तभी कामयाब होता है जब पानी में टीडीएस या क्लोराइड या फ्लोराइड या वायरस जैसी हानिकारक अशुद्धियां नहीं हैं। अगर ये अशुद्धियां हैं तो वह पानी शुद्ध नहीं कर पाता।

Q. घर के अंदर पानी सप्लाई के लिए किस तरह की पाइप अच्छी मानी जाती हैं?
A. फूड ग्रेड प्लास्टिक की पाइपलाइनें सबसे अच्छी मानी जाती हैं। जीआई पाइप में जंग लगने की आशंका होती है।

Q. अगर गर्मी में पानी की टंकी से बहुत गर्म पानी आ रहा है हो तो क्या आरओ को बंद कर देना चाहिए?
A. अगर पानी की टंकी का पानी 40 से 45 डिग्री सेल्सियस तक गर्म है तो आरओ चलाने में कोई दिक्कत नहीं है। अगर इससे ज्यादा गर्म होता है तो आरओ को बंद कर देना चाहिए।

Q. आजकल में गली-गली में वॉटर प्यूरिफायर यूनिटें लग गई हैं। इनसे गैलन में पानी पैककर मोहल्लों, खासकर बाजारों में बेचा जाता है। क्या उस पानी की क्वॉलिटी स्तरीय होती है?
A. कई इलाकों में पानी की सप्लाई कम होने या पानी साफ न होने की वजह से लोग पानी की 20 लीटर का गैलन खरीदते हैं। यह 40-70 रुपये में आता है। इसे सप्लायर कई बार इस्तेमाल करते हैं और अक्सर इन्हें ढंग से साफ नहीं किया जाता। हालांकि कुछ बड़ी कंपनियां साफ-सफाई का ख्याल रखती हैं। बोतल की गंदगी के अलावा पानी की क्वॉलिटी पर भी सवाल है। हां, अगर किसी ने बीआईएस से लाइसेंस लिया हो तो उसका पानी पी सकते हैं।

Q. क्या पानी फूड कैटिगरी में शामिल है?
A. भारत में पानी फूड कैटिगरी में नहीं है। दुनिया के तमाम देशों में इसे फूड कैटिगरी में रखा गया है। अगर पानी फूड की कैटिगरी में आ जाता है तो उस पर 'प्रीवेंशन ऑफ फूड अडल्ट्रेशन ऐक्ट' लागू होगा। ऐसे में अगर पानी में कोई मिलावट हुई तो यह आपराधिक श्रेणी में आ जाएगा और पानी सप्लाई करने वाली एजेंसी पर केस दर्ज हो जाएगा। भारत में अधिकतर पानी की सप्लाई सरकारी एजेंसियों के पास ही है। अगर इस दायरे में पानी आता है तो लोगों को साफ पानी देने की जिम्मेदारी इन एजेंसियों की हो जाएगी।
Q. क्या कोई प्राइवेट कंपनी भी पानी की जांच करती है? क्या इसके लिए पैसे भी लगते हैं?
A. अगर पानी गंदा आ रहा है तो इसकी जांच जल बोर्ड की लैबरेटरी से कराई जा सकती है। यह पूरी तरह से फ्री है। प्राइवेट कंपनियों से भी जांच कराई जा सकती है। मिनिस्ट्री ऑफ साइंस के तहत एनएबीएल प्रमाणित लैबरेटरी से पानी की जांच कराई जा सकती है। एनएबीएल की वेबसाइट www.nabl-india.org पर जाकर, ऊपर लिखे Laboratory Search को क्लिक करने पर Accredited Laboratories का ऑप्शन आता है, इसमें जरूरी जानकारी भरने पर आपको नजदीकी लैब के बारे में पूरी जानकारी मिल जाती है। यहां से पूरे देश की लैबरेटरीज की जानकारी और उनके नंबर लिए जा सकते हैं।

घर में क्वॉलिटी चेक
मार्केट में पानी का टीडीएस मापने की एक पेननुमा मशीन आती है। इसे डिजिटल टीडीएस मीटर कहते हैं। यह मीटर 600 से 1500 रुपये तक की आता है। हालांकि इससे सिर्फ टीडीएस का ही पता चलेगा। दिल्ली जल बोर्ड की लैब में फोन करके भी सैंपल चेक करवा सकते हैं। जल बोर्ड की टीम सैंपल उठाने आएगी और जांच के बाद आपको पूरी रिपोर्ट देगी। ऐसा ही दूसरे शहरों की पानी सप्लाई करने वाली सरकारी एजेंसी करती है।

दिल्ली में पानी की जांच के लिए इन नंबरों पर संपर्क किया जा सकता है:
टोल फ्री: 1916
011-23634469
9650291021

आखिर में निचोड़ क्या है?
Q. अगर सरकारी एजेंसी द्वारा पीने के पानी की सप्लाई की जा रही है तो क्या प्योरिफायर की जरूरत है?
A. अगर सरकारी एजेंसियों की पाइपलाइनें सही हैं, उनमें लीकेज नहीं है और पानी घर की टंकी में स्टोर भी नहीं किया जा रहा यानी पानी सीधे इस्तेमाल कर रहे हैं तो वह पानी पीने के लिए सेफ है। इसके लिए प्योरिफायर की जरूरत नहीं है, लेकिन अमूमन ऐसा कम ही होता है। पानी की पाइप्स में लीकेज भी होते हैं और हम उन्हें टंकी में स्टोर भी करते हैं। ऐसे में सेरमिक फिल्टर वाला प्योरिफायर इस्तेमाल करना चाहिए।

Q. अगर पीने के पानी का सोर्स ग्राउंड वॉटर है, तब कौन-सा प्योरिफायर इस्तेमाल करें?
A. इसके लिए जरूरी है कि सबसे पहले ग्राउंड वॉटर की जांच कराएं। अगर पानी साफ है तो सिर्फ फिल्ट्रेशन से काम चल जाएगा। सच तो यह है कि ज्यादातर जगहों पर ग्राउंड वॉटर साफ है, लेकिन फैक्ट्री या डंप एरिया के करीब के ग्राउंड वॉटर में केमिकल्स मिल जाते हैं। अगर पानी में आर्सेनिक, क्लोराइड या फ्लोराइड की मौजूदगी है, तब आरओ लगाना जरूरी हो जाता है।

Q. क्या आरओ प्यूरीफायर से मिनरल्स वाकई निकल जाते हैं?
A. आरओ पानी से सूक्ष्म पोषक तत्व भी निकाल देता है। इन तत्वों के निकलते ही पानी की पीएच वैल्यू गिर जाती है यानी पानी फिर ऐसिडिक बन जाता है। पीएच का स्केल 0-14 के बीच होता है। पीएच वेल्यू 7 से नीचे होने पर पानी ऐसिडिक होता है। 7 से ऊपर होने पर पानी अल्केलाइन होता है। हमारा शरीर 97 फीसदी तक अल्केलाइन है। पीने लायक पानी की पीएच वैल्यू 6.5 से 8.5 के बीच होना चाहिए।

Q. आजकल आरओ कंपनियां दावा करती हैं कि वे पानी में मिनरल्स भी मिलाती हैं। क्या यह दावा सही है? और इससे सेहत पर कोई बुरा असर तो नहीं पड़ता?
A. आरओ के जरिए पानी साफ करने से अशुद्धियों के साथ-साथ पानी के पोषक तत्व भी खत्म हो जाते हैं। इसलिए आजकल कई आरओ कंपनियां मिनरल्स कैंडल्स के जरिए बाहर से पोषक तत्व भी पानी में मिलाती हैं। उनका यह दावा किसी हद तक सही है। दूसरा भी तरीका है। सबसे पहले पानी से बैक्ट्रीरिया मारने के लिए यूएफ फिल्टर से पानी को साफ किया जाता है। अब 90 फीसदी पानी को आरओ तकनीक में से गुजारा जाता है। इससे घुलनशील अशुद्धियां जैसे मैग्निशियम, कैल्शियम और मिनरल्स आरओ के जरिए खत्म हो जाती हैं। यूएफ फिल्टर से साफ किए हुए बाकी 10 फीसदी पानी को अब इसमें मिला दिया जाता है ताकि मिनरल्स की कमी पूरी की जा सके। इससे सेहत पर कोई बुरा असर नहीं पड़ता है।

Q. क्या आरओ का पानी पीना सेहत के लिए हानिकारक है?
A. पानी में मौजूद हर तरह की चीजों को आरओ निकाल देता है। इसमें केमिकल्स, मिनरल्स, पल्यूटेंट्स और टीडीएस भी शामिल हैं। पानी से मिनरल्स को भी पूरी तरह निकाल देने से लंबे समय तक मिनरल रहित पानी पीना सेहत के लिए समस्या पैदा कर सकता है। एक तरफ कैल्शियम के निकल जाने से हड्डियों में कमजोरी आ सकती है तो मैग्निशियम की कमी से क्रैंप्स हो सकते हैं। हालांकि, इसमें बहुत ज्यादा घबराने की जरूरत नहीं है। कारण यह है कि अब ज्यादातर आरओ कंपनियां अपने आरओ के पानी में मिनरल्स मिलाने लगी हैं।

...और आखिर में एक एक्सपर्ट की राय
घर में अगर सरकारी पानी आ रहा है तो आरओ लगवाने की कोई जरूरत नहीं है। आरओ का पानी मिनरल-रहित होता है- यह बात सामने आने पर कंपनियां अब कुछ मात्रा में मिनरल मिलाने लगी हैं। पर यह कोई समाधान नहीं है। वे एक फिक्स्ड फॉर्म्युले में मिनरल मिलाते हैं, पर यह फॉर्म्युले किसने तय किया है? किस आधार पर तय हुआ है? हर इलाके का जमीन का पानी अलग किस्म का होता है और पानी में करीब 140 किस्म के मिनरल होते हैं। आरओ हर तरह के वायरस का भी खात्मा नहीं कर पाता। मसलन: सुपरबग वायरस।
-संजय शर्मा, प्रेसिडेंट, Be Enviro Wise

संडे नवभारत टाइम्स 

Friday, 31 May 2019

कितना सुरक्षित है आरओ का पानी ?

स्कंद शुक्ला
यह किस आधार पर तय हो कि भारतीय जनता कहाँ आरओ का पानी पिये और कहाँ नहीं ? आरओ यानी रिवर्स ओस्मोसिस की पद्धति से प्राप्त पानी किन अशुद्धियों को पानी से हटाता है ? क्या पूरे भारत के हर महानगर और हर गाँव का हर व्यक्ति आरओ-जल पीने लगे ? और इस तरह से इस जलपान के दुष्प्रभाव क्या हैं ?

आपके घर में आरओ-यन्त्र लगा है ? यदि हाँ , तो आपने इसे लगवाने का निर्णय कैसे लिया ? किस आधार पर ? क्या सचिन तेन्दुलकर और हेमा मालिनी के विज्ञापनों को देखकर ? अथवा किसी वैज्ञानिक आधार पर मिली जागरूकता की वजह से ?

भारत में पेयजल का संकट बढ़ रहा है और आने वाले समय में यह और भीषण रूप लेगा : ऐसे में यह जानना महत्त्वपूर्ण है कि आरओ के अन्धे प्रयोग ने पानी की बर्बादी में बड़ी भूमिका निभायी है। इसी बाबत नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने पर्यावरण-मन्त्रालय को पत्र लिखा है और कहा है कि जिन स्थानों में टोटल डिजॉल्व्ड सॉलिड्स ( टीडीएस ) की मात्रा 500 मिलीग्राम / लीटर से कम हो , वहाँ आरओ के प्रयोग पर प्रतिबन्ध लगा देना चाहिए।

पेयजल में कई प्रकार की अशुद्धियाँ हो सकती हैं। घुले हुए ठोस पदार्थ ( टीडीएस ) जिनका ऊपर ज़िक़्र किया गया है , उनमें से एक हैं। भारत में अलग-अलग स्थानों में टीडीएस की मात्रा पानी में अलग-अलग है। आरओ इन पदार्थों को पानी से अलग कर देता है। लेकिन हर स्थान पर ये पदार्थ इतने नहीं कि इन्हें निकालने की ज़रूरत पड़े। उलटा इन्हें हर जगह निकालने से पानी का जो 'अतिशुद्धीकरण' आरओ मशीनों द्वारा किया जाता है , उससे पानी की गुणवत्ता गिर जाती है।

कुछ हद तक टीडीएस हमें चाहिए, हमारे लिए ज़रूरी है। टीडीएस-मुक्त जल पीना कोई बहुत अच्छी बात नहीं। महत्त्वपूर्ण बात यह है कि टीडीएस की मात्रा एक निश्चित हद में रहे , न ज़्यादा और न कम। आरओ-यन्त्र टीडीएस को पानी से अलग कर देते हैं। इस क्रम में लगभग अस्सी प्रतिशत तक पानी बरबाद होता है और केवल बीस प्रतिशत पीने योग्य पानी मिलता है। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल का मन्त्रालय से निवेदन है कि प्राप्त पानी कम-से-कम 60 % हो , ऐसा प्रावधान आरओ-निर्माता दें। यानी चालीस प्रतिशत से अधिक पानी बर्बाद न हो।

आरओ-यन्त्र विकसित देशों में वहाँ इस्तेमाल होते हैं , जहाँ समुद्री पानी से लवण अलग करके उसे पीने योग्य बनाना होता है। भारत में इन्हें लगाने की एक भेड़चाल चल पड़ी है। जिसे देखो , आरओ का पानी पी रहा है और आरओ-यन्त्र लगवा रहा है ? क्यों , यह जानकारी है ही नहीं। जो थोड़ा बहुत टीडीएस को जानते हैं , वे उसे एकदम मानव-शरीर का शत्रु समझे बैठे हैं।

यह आपका कर्त्तव्य और अधिकार दोनों है कि अपने जलकल-संस्थान से संवाद स्थापित करें। वहाँ अभियन्ता व अन्य अधिकारियों से मिलें। पूछें कि जो पानी आप पी रहे हैं , उसमें टीडीएस कितना है ? क्या 500 से अधिक है ? क्या आपको अपने घरों में आरओ लगवाने की ज़रूरत है ? कहीं आरओ लगवा कर आप पेयजल को दोयम दर्ज़े का नहीं बना रहे ? कहीं आपके आरओ-यन्त्र के कारण अस्सी फीसदी पानी नाली में तो नहीं ?  अगर हाँ , तो यह कितनी बड़ी नासमझी और कितनी बड़ी बर्बादी है !

आरओ-यन्त्रों की बिक्री जनता में भय फैला कर चल रही है , ऐसा नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल का मानना है। यह प्रचार करो कि हर जलस्रोत एकदम प्रदूषित है। हर जगह जीवाणु हैं , हर जगह टीडीएस एकदम उच्च। हर पानी के स्रोत में फ़्लोराइड है और आर्सेनिक भी। कौन जाकर अपने अपने इलाक़े के जेई से सच्चाई जानेगा ? सब केवल टीवी पर महानायकों-महानायिकाओं को देखेंगे और 'शुद्ध पानी' के लिए उनका कहा मान लेंगे। विज्ञापन की विज्ञान पर जीत होगी।

( इस लेख के साथ नीचे नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल की रिपोर्ट पर आधारित लेख का लिंक दे रहा हूँ। कुछ अख़बारों में इस ख़बर का विवरण भी। इन्हें पढ़िए। अपने स्थानीय जलकल-अभियन्ता से मिलिए। पूछिए उनसे कि क्या आपका पेयजल इतना अशुद्ध है , जितना बाज़ार बताता है ? क्या पूरे देश में हर व्यक्ति को आरओ का पानी ही पीना चाहिए ? )

Sunday, 26 May 2019

बच्चों को चाहिए स्क्रीन से आजादी

इन्हें चाहिए स्क्रीन से आजादी
How to handle Kid’s Mobile Addiction

तकनीक की दुनिया के सबसे कामयाब नामों में शुमार बिल गेट्स से लेकर स्टीव जॉब्स तक ने कम उम्र में अपने बच्चों को गैजट्स से दूर रखा। दूसरी ओर, हमारे बच्चों को स्क्रीन की लत लग गई है। डब्ल्यूएचओ की सलाह है कि छोटे बच्चों को एक घंटे से ज्यादा स्क्रीन न देखने दें। एक्सपर्ट्स से पूछकर स्क्रीन, खासकर मोबाइल की लत से निजात पाने के टिप्स दे रही हैं प्रियंका सिंह

एक्सपर्ट्स पैनल
शिव खेड़ा, मशहूर लेखक और मोटिवेशनल स्पीकर
अरुणा ब्रूटा, सीनियर साइकॉलजिस्ट
डॉ. समीर पारिख, डायरेक्टर, मेंटल हेल्थ, फोर्टिस गीतांजलि शर्मा, सीनियर काउंसलर

मोनिका ने 8 साल के बेटे ध्रुव को पिछले साल मोबाइल लाकर दिया ताकि ऑफिस में रहने के दौरान ध्रुव से संपर्क बना रहे। कुछ महीनों में ही मोनिका ने ध्रुव के बर्ताव में एक अजीब-सा बदलाव देखा। मेड ने मोनिका को बताया कि ध्रुव अक्सर मोबाइल में ही लगा रहता है। मोबाइल के लिए मना करो तो टीवी खोलकर बैठ जाता है। खाना खाने और होमवर्क के लिए भी आसानी से तैयार नहीं होता। यहां तक कि मोनिका के ऑफिस से आने के बाद भी ध्रुव ज्यादातर मोबाइल से ही चिपका रहता है। बेटे का यह हाल देख मोनिका ने फौरन एक अच्छे चाइल्ड काउंसलर की मदद ली। कुछ महीनों की काउंसलिंग और मोनिका की कोशिशों के बाद ध्रुव ने मोबाइल और टीवी पर वक्त बिताना काफी कम कर दिया है और अब वह ज्यादा खुश नजर आता है। इसके लिए मोनिका ने न सिर्फ खुद ज्यादा-से-ज्यादा वक्त ध्रुव के साथ बिताना शुरू किया बल्कि ध्रुव को ज्यादा दोस्त बनाने के लिए भी प्रेरित किया। साथ ही, उसकी पसंद के अनुसार उसे टेनिस और पेंटिंग क्लास भी जॉइन करा दी।

इसी तरह एक नामी साइकॉलजिस्ट के पास हाल ही में एक लड़की का केस आया। वह दिन भर फेसबुक और इंस्टाग्राम पर लगी रहती थी और कोई भी फोटो शेयर करने के बाद बार-बार देखती थी कि कितने लाइक मिले। सोशल मीडिया की लत की वजह से गौरी की पढ़ाई और सेहत पर बुरा असर पड़ रहा था। वह घर में किसी से बात भी नहीं करती थी। दिन भर वह अपने कमरे में मोबाइल पर सोशल मीडिया से चिपकी रहती थी। साइकॉलजिस्ट और पैरंट्स की कोशिशों से गौरी ने धीरे-धीरे मोबाइल की लत से छुटकारा पा लिया।

ये सिर्फ 2 मामले हैं, लेकिन बच्चों का मोबाइल से चिपके रहना घर-घर की समस्या बन गई है। आज बच्चे बहुत ज्यादा वक्त मोबाइल, टैबलेट, लैपटॉप, टीवी आदि पर बिता रहे हैं जोकि उनके शारीरिक और मानसिक विकास से लेकर परिवार के ताने-बाने तक के लिए खतरे की घंटी है। अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ मिशिगन की रिपोर्ट के अनुसार, 2 साल की उम्र तक के बच्चे भी रोजाना 3 घंटे तक मोबाइल पर बिता रहे हैं। इंग्लैंड की नैशनल हैंडराइटिंग असोसिएशन की एक रिसर्च का निष्कर्ष है कि 2 साल से कम उम्र के 58% बच्चे मोबाइल से खेलते हैं। ऐसे बच्चे पेंसिल पकड़ने, लिखने और ड्रॉइंग करने में कमजोर हो रहे हैं। इससे उनका हैंडराइटिंग का हुनर देर से विकसित हो रहा है। मोबाइल के ज्यादा इस्तेमाल से उनके हाथों की मांसपेशियां कमजोर हो रही हैं। हाल ही में डब्ल्यूएचओ ने पैरंट्स को सलाह दी है कि 2 से 5 साल तक के बच्चों को एक घंटे से ज्यादा टीवी, मोबाइल या कंप्यूटर न देखने दें। वैसे बेहतर यह है कि इस उम्र के बच्चों को मोबाइल से पूरी तरह दूर ही रखा जाए।

अब सवाल उठता है कि आखिर बच्चों को मोबाइल के जाल से कैसे बाहर निकालें? एक्सपर्ट्स की मानें तो थोड़ी कोशिशों से ऐसा करना मुमकिन है। जरूरी नहीं कि हर मामले में साइकॉलजिस्ट या काउंसलर की जरूरत पड़े, लेकिन पैरंट्स को जरूर वक्त रहते बच्चों पर ध्यान देना चाहिए ताकि वे मोबाइल की लत से बच सकें। यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि मोबाइल के लत से मतलब फोन पर बातें करने से नहीं बल्कि स्क्रीन के इस्तेमाल यानी इंटरनेट सर्फिंग या सोशल मीडिया पर वक्त बिताने से है। परेशानी की बात यह भी है कि बच्चों को टीवी या मोबाइल से जो मानसिक खुराक मिल रही है, उससे वे ज्यादा हिंसक और असंवेदनशील हो रहे हैं। वे इंसानों के मुकाबले गैजट्स के साथ ज्यादा सुकून महसूस करते हैं। यह परिवार और रिश्तों के ताने-बाने के लिए सही नहीं है।

शौक से लत तक
बच्चे जब छोटे होते हैं तो अक्सर पैरंट्स खुद ही उनके हाथ में मोबाइल थमा देते हैं, कभी खाना खिलाने के लालच में तो कभी अपना काम पूरा करने के लिए तो कभी बच्चों को कविता, डांस आदि सिखाने के लिए। इस तरह धीरे-धीरे उन्हें मोबाइल देखने में मजा आने लगता है और वे इसका आदी हो जाते हैं। शुरुआती शौक कब लत या अडिक्शन में तब्दील हो जाता है, पता ही नहीं चलता। दरअसल, स्क्रीन अडिक्शन भी वैसी ही लत है जैसे किसी नशे की लत होती है। एक्सपर्ट्स इसे भी ड्रग्स, अल्कोहल, जुआ आदि की तरह ही क्लिनिकल इंपल्सिव डिसऑर्डर मानते हैं यानी किसी काम को करने से खुद को नहीं रोक पाना। जब मोबाइल या टीवी पर लगे रहना बच्चे के रुटीन कामों, मसलन नींद, भूख, होमवर्क, सेहत आदि पर असर डालने लगे और आप चाहकर भी स्थिति को बेहतर नहीं कर पाएं तो समझ जाइए कि खतरे की घंटी बज चुकी है। ऐसे में फौरन एक्सपर्ट यानी काउंसलर या साइकॉलजिस्ट की मदद लें।

रोजाना कितनी देर मोबाइल?
यह कहना बहुत मुश्किल है कि बच्चे रोजाना कितनी देर तक मोबाइल का इस्तेमाल कर सकते हैं। कोशिश करें कि 3-4 साल तक बच्चों को मोबाइल से दूर ही रखें। ऐसा करना मुमकिन न हो पा रहा हो तो भी इस उम्र के बच्चों को 30-60 मिनट से ज्यादा मोबाइल इस्तेमाल न करने दें। इसके अलावा, 5 साल से 12 साल तक के बच्चे को भी 90 मिनट से ज्यादा स्क्रीन नहीं देखना चाहिए। यह अवधि टीवी, मोबाइल, कंप्यूटर सब मिलाकर है। इससे बड़े बच्चों (12 से 17 साल) के लिए जरूरी होने पर यह वक्त थोड़ा बढ़ा सकते हैं, लेकिन यह किसी भी कीमत पर दो घंटे से ज्यादा न हो।

स्क्रीन की लत के लक्षण
बर्ताव में बदलाव
- हमेशा मोबाइल से चिपके रहना
- मोबाइल मांगने पर बहाने बनाना या गुस्सा करना
- दूसरों के घर जाकर भी मोबाइल पर ही लगे रहना
- दूसरों से कटे-कटे रहना
- टॉइलट में मोबाइल लेकर जाना
- बेड में साइड पर मोबाइल रखकर सोना
- खेल के मैदान भी मोबाइल साथ ले जाना
- पढ़ाई और खेलकूद में मन न लगना
- पढ़ाई में नंबर कम आना
- ऑनलाइन फ्रेंड्स ज्यादा होना
- नहाने, खाने में बहानेबाजी करना

शारीरिक परेशानी
- नींद पूरी न होना
- वजन बढ़ना
- सिरदर्द होना
- भूख न लगना
- साफ न दिखना
- आंखों में दर्द रहना
- उंगलियों और गर्दन में दर्द होना

मानसिक समस्याएं
- ज्यादा संवेदनशील होना
- काम की जिम्मेदारी न लेना
- हिंसक होना
- डिप्रेशन और चिड़चिड़ापन होना
नोट: ये लक्षण दूसरी बीमारियों के भी हो सकते हैं। ऐसे में बर्ताव में बदलाव के साथ यह देखना भी जरूरी है कि बच्चा कितना वक्त मोबाइल पर बिताता है और क्या वाकई उसका असर बच्चे पर नजर आ रहा है?

बच्चों को कैसे बचाएं लत से
1. खुद बनें उदाहरण
बच्चे हमेशा वही सीखते हैं जो देखते हैं। ऐसे में आपको बच्चों के सामने रोल मॉडल बनना होगा। बच्चों के सामने मोबाइल, लैपटॉप या टीवी का कम-से-कम इस्तेमाल करें। अगर मां या पिता ने एक हाथ में बच्चा पकड़ा है और दूसरे में मोबाइल पर बात कर रहे हैं तो बच्चे को यही लगेगा कि मोबाइल और वह (बच्चा) बराबर अहमियत रखते हैं। ऐसा करने से बचें। अगर मदर होममेकर हैं तो कोशिश करें कि मोबाइल पर बातचीत या चैटिंग आदि तभी ज्यादा करें जब बच्चे घर पर न हों। सोशल मीडिया के लिए भी एक सीमा और वक्त तय कर लें। वर्किंग हैं तो घर पहुंचने के बाद बहुत जरूरी हो तभी मोबाइल देखें या फिर कोई कॉल आ रही हो तो उसे पिक करें। सुबह उठकर पहले बच्चों और खुद पर ध्यान दें, फिर मोबाइल देखें। अक्सर पैरंट्स अपना काम निपटाने के लिए बच्चों को मोबाइल थमा देते हैं। यह तरीका भी सही नहीं है। ऐसा कर आप अपने लिए फौरी राहत तो पा लेते हैं, लेकिन बच्चे को गैजट की ओर धकेल रहे होते हैं।

2. बनाएं गैजट-फ्री जोन
घर में एक एरिया ऐसा हो जहां गैजट लेकर जाने की इजाजत किसी को न हो। यह डाइनिंग या स्टडी एरिया हो सकता है। डिनर, लंच या ब्रेकफास्ट का वक्त पूरी तरह से फैमिली टाइम होना चाहिए। खाने के वक्त अक्सर पैरंट्स बच्चों के लिए टीवी ऑन कर देते हैं या मोबाइल दे देते हैं। यह गलत है। इससे बच्चे का ध्यान बंटता है और खाने का पोषण पूरा नहीं मिल पाता। साथ ही, उसका कंसंट्रेशन भी कमजोर होता है। इसी तरह, सोने से कम-से-कम एक घंटा पहले घर में डिजिटल कर्फ्यू लगा दें, मतलब मोबाइल और टैब्लेट जैसी चीजों से खुद भी दूर रहें और बच्चों को भी दूर रखें। बच्चा जब यह देखेगा तो वह खुद भी मोबाइल का इस्तेमाल जरूरत पड़ने पर ही करेगा।

3. बच्चों के साथी बनें
आजकल बहुत-से घरों में सिंगल चाइल्ड का चलन है। ऐसे में बच्चा अकेलापन बांटने के लिए मोबाइल या टैबलेट आदि का इस्तेमाल करने लगता है जोकि धीरे-धीरे लत बन जाती है। ऐसी स्थिति से बचने के लिए आप घर में बच्चे के साथ क्वॉलिटी टाइम बिताएं। उसके साथ कैरम, लूडो, ब्लॉक्स, अंत्याक्षरी, पजल्स जैसे खेल खेलें। बच्चे को जितना मुमकिन हो, गले लगाएं ताकि उसे फिजिकल टच की अहमियत पता हो और वह महसूस कर सके कि किसी करीबी के छूने में जो गर्माहट है वह सोशल मीडिया की दोस्ती में नहीं। जब बच्चा स्कूल से घर आए तो उससे स्कूल की बातें सुनें, उसकी पसंद-नापसंद के बारे में जानें, उसके दोस्तों के बारे में बातें करें। हो सके तो बीच-बीच में उसके दोस्तों को घर पर बुलाएं। इस तरह की चीजों से बच्चे और पैरंट्स के बीच का रिश्ता बेहतर होता है और वह मोबाइल के बजाय सकारात्मक चीजों से जुड़ता है।

4. लालच न दें
अक्सर पहली बार पैरंट्स ही बच्चे को फोन पकड़ाते हैं और यह देखकर खुश होते हैं कि हमारा बच्चा कितना स्मार्ट है। लेकिन यही छोटी-सी गलती आगे जाकर बुरी आदत बन जाती है। इसके अलावा, कई बार पैरंट्स बच्चों से कहते हैं कि फटाफट होमवर्क कर लो तो फिर मोबाइल मिल जाएगा या खाना खाओगे तो मोबाइल देखने को मिलेगा। इस तरह की शर्तें बच्चों के सामने नहीं रखनी चाहिए। इससे बच्चे लालच में फटाफट काम तो निपटा लेते हैं, लेकिन उनका सारा ध्यान मोबाइल पर ही लगा रहता है। उन्हें ब्लैकमेलिंग की आदत भी पड़ती है कि फलां काम करने पर फलां चीज मिलेगी। वे खुद भी इस ट्रिक को दूसरों पर इस्तेमाल करने लगते हैं। अगर बाद में पैरंट्स मोबाइल न दें तो बच्चे को मां-बाप पर गुस्सा आने लगता है।

5. आउटडोर गेम्स में लगाएं
बच्चों के साथ मिलकर वॉक करें, योग करें या दौड़ लगाएं। बच्चों को रोजाना कम-से-कम एक घंटे के लिए पार्क ले जाएं। वहां उन्हें दौड़ने, फुटबॉल, बैडमिंटन आदि फिजिकल गेम्स खेलने के लिए प्रेरित करें। पैरंट्स खुद भी उनके साथ गेम्स खेलें। टग ऑफ वॉर, आंख मिचौली जैसे गेम भी खेल सकते हैं, जिन्हें खेलने के लिए ज्यादा कोशिश भी नहीं करनी पड़ती। यों भी विशेषज्ञों का कहना है कि अगर बच्चे रोजाना दो घंटे सूरज की रोशनी में खेलते हैं तो उनकी आंखें कमजोर होने से बच सकती हैं। इसके अलावा, मुमकिन हो तो बच्चे को उसकी पसंद के किसी खेल (क्रिकेट, फुटबॉल, टेनिस, बैडमिंटन आदि) की कोचिंग दिलाएं। इससे वह फिजिकली ज्यादा ऐक्टिव होगा और मोबाइल से भी दूर रहेगा।

6. हॉबी का सहारा लें
बच्चों की कई हॉबीज़ होती हैं जैसे कि पेंटिंग, डांस, म्यूजिक, रोबॉटिक्स, क्ले मॉडलिंग आदि। बच्चे की पसंद को देखते हुए हॉबी क्लास जॉइन करवाएं, खासकर अगर दोनों पैरंट्स वर्किंग हैं तो यह जरूरी है। इससे बच्चा घर में ज्यादा वक्त अकेला या मेड के साथ रहने को मजबूर नहीं होगा। क्लास में वह अपनी पसंद की चीज तो सीखेगा ही दूसरे बच्चों के साथ घुलने-मिलने से उसका आत्मविश्वास भी बढ़ेगा। यह भी मुमकिन है कि आगे जाकर वह अपनी हॉबी में भी बहुत अच्छा करने लगे और वह एक करियर ऑप्शन बन जाए।

7. घर के काम में हाथ बंटवाएं
घर के कामों में बच्चों की उनकी क्षमता के अनुसार मदद लें। इससे बच्चे आत्मनिर्भर बनेंगे और खाली समय मोबाइल पर बिताने के बजाय कुछ व्यावहारिक चीजें सीखेंगे। कपड़े फोल्ड करना, पानी की बोतल भरना, कमरा सेट करना, पौधों में पानी डालना, अलमारी लगाना जैसे काम बच्चे खुशी-खुशी कर सकते हैं। इन कामों में पैरंट्स बच्चों की मदद ले सकते हैं। इससे पैरंट्स पर काम का बोझ थोड़ा कम होगा और बच्चे आत्मनिर्भर भी बनेंगे।

8. किताबों से दोस्ती कराएं
बच्चों को फोन के बजाय किताबों की ओर ज्यादा ध्यान देने के लिए प्रेरित करें। उन्हें अच्छी स्टोरी बुक लाकर दें और उनसे कहानियां सुनें। जब बच्चों को स्टोरी बुक या कोई और बुक पढ़ने के लिए दें तो खुद भी कोई किताब पढ़ें। ऐसा न हो कि आप टीवी या लैपटॉप खोलकर बैठ जाएं या मोबाइल पर बातें करने लगें। आपको किताब के साथ देखकर उसका भी मन पढ़ाई में लगेगा। बच्चों को रात में सोने से पहले कुछ पॉजिटिव पढ़ने को कहें, फिर चाहे 2 पेज ही क्यों न हों। इससे नींद भी अच्छी आएगी।

9. पेट से कराएं दोस्ती
बच्चों को डॉग जैसा पालतू जानवर लाकर दें। इससे बच्चे केयर करना और दूसरों की भावनाओं को बेहतर तरीके से समझने लगते हैं। अगर ममा-पापा, दोनों वर्किंग हैं तो पेट बच्चे का अच्छा साथी साबित होता है। डॉग को खाना देना, उसकी साफ-सफाई का ध्यान रखना, उसे घुमाना जैसे काम करने से बच्चा बिजी तो रहता ही है, साथ ही उसे कई चीजों की प्रैक्टिकल जानकारी भी हो जाती है।

10. प्राथमिकताएं तय करें
अपनी और अपने परिवार की प्राथमिकताएं तय करें। जितने टाइम सेविंग डिवाइस आज हैं, उतना ही टाइम कम हो गया है लोगों के पास। इसकी वजह यही है कि हमने प्राथमिकताएं तय नहीं की हैं। आजकल अत्यावश्यक (अर्जेंट) और अहम (इम्पॉर्टेंट) के बीच फर्क खत्म हो गया है। इसे ऐसे समझ सकते हैं कि सेहत अहम है, लेकिन अर्जेंट नहीं है इसलिए हम नजरअंदाज कर देते हैं। रिश्ते अहम हैं, लेकिन अर्जेंट नहीं हैं इसलिए पीछे छूट जाते हैं। ऐसे में प्राथमिकताएं तय करें और सेहत और रिश्तों को टॉप पर रखें। वैसे भी जिंदगी में बैलेंस बहुत जरूरी है। कोई भी चीज कितनी भी जरूरी क्यों न हो, अगर ज्यादा हो जाए तो वह नुकसान ही हो जाएगा। साथ ही, बच्चे के साथ मिलकर जिंदगी का लक्ष्य तय करें और वह लक्ष्य कुछ ऐसा हो जिसमें दूसरों के लिए भी कुछ करने का भाव हो। इससे बच्चा इधर-उधर वक्त बिताने के बजाय अपने लक्ष्य पर फोकस करता है।

ये ऐप्स भी कारगर
Mama Bear (Spyware)
Norton Family parental control
mSpy
Quality Time
ये ऐप एंड्रॉयड और iOs, दोनों के लिए हैं। इस तरह के ऐप इस बात पर निगरानी रखते हैं कि बच्चा किस किस वेबसाइट पर कितनी देर बिताता है तो Qustodio premier, Cracked Screen Prank जैसे ऐप एक तय टाइम पर मोबाइल की स्क्रीन में क्रैक जैसा लुक दे देता है। क्रैक्ड स्क्रीन देखकर अक्सर बच्चा मोबाइल छोड़ देता है। छोटे बच्चे पर इसे अपना सकते हैं।

डिजिटल डी-टॉक्सिफिकेशन जरूरी
अपने घर के लिए डिजिटल डी-टॉक्सिफिकेशन का नियम बनाएं। हर हफ्ते में एक दिन और महीने में कुल 4 दिन गैजट फ्री रहें। सुनने में यह मुश्किल जरूर लगता है, लेकिन ऐसा करना मुमकिन है। इस दौरान आप मोबाइल का स्विच ऑफ रखें या उसे फ्लाइट मोड पर रखें। इस दौरान साथ मिलकर ऐक्टिविटी करें। फैमिली के साथ मिलकर गेम्स खेलें। शुरुआत आप दो घंटे से कर सकते हैं। फिर धीरे-धीरे टाइम बढ़ा सकते हैं। इस दौरान जरूरी कॉल होगा तो लैंडलाइन पर आ जाएगा। अगर लैंडलाइन नहीं है तो मिस्ड कॉल का मेसेज मिल जाएगा। 2 घंटे बाद जाकर मोबाइल देखें और अगर कोई जरूरी कॉल लगे तो पलटकर फोन मिला लें। दरअसल, लोग अक्सर मन को बहलाने के लिए चैटिंग या सोशल मीडिया सर्फिंग शुरू कर देते हैं या टीवी देखने लगते हैं। इन सबमें मजा जरूर आ सकता है, लेकिन दिमाग को आराम नहीं मिलता बल्कि उसका और ज्यादा इस्तेमाल होने लगता है। आराम नहीं मिलने से दिमाग थक जाता है। इससे चिड़चिड़हाट होगी और कंसंट्रेशन नहीं होगा। गलतियां भी ज्यादा होंगी।

आजमाएं इसे
आज से आप भी अपने और अपने परिवार को हफ्ते में एक दिन डिजिटल डी-टॉक्सिफाई करना शुरू करें। आज आप इसके लिए 2 घंटे का वक्त तय कर सकते हैं। इस बीच टीवी, मोबाइल, लैपटॉप आदि गैजट के बजाय फैमिली के साथ फन टाइम बिताएं। आपने अपने परिवार के साथ कैसे वक्त बिताया, हमें लिखें
साभार संडे एनबीटी

Saturday, 20 April 2019

ब्लैक होल के खुलते राज

"अगले 20 साल में खुल जाएंगे ब्रह्मांड के कई बड़े राज"
खगोल विज्ञानी प्रियंवदा नटराजन से राजेश मित्तल की बातचीत

पिछले हफ्ते गुरुवार को ब्लैक होल की पहली तस्वीर जारी हुई। यह ब्लैक होल हमारी धरती से करीब 30 लाख गुना बड़ा है। इससे विराट ब्रह्मांड की अनसुलझी गुत्थियां फिर से चर्चा में आ गई हैं। आइए, पहले हम ब्रह्मांड यानी यूनिवर्स के बारे में अपनी बुनियादी समझ दोहरा लेते हैं और फिर इसके बारे में एक शीर्ष विज्ञानी से बातचीत करते हैं।

हमारी धरती सूरज के चारों ओर घूमती है। दूसरे 7 ग्रह भी सूरज के चक्कर लगाते हैं। सूरज, उसके आठों ग्रहों (प्लैनेट्स), उनके चंद्रमाओं आदि को मिलाकर हम सौरमंडल (सोलर सिस्टम) कहते हैं। हमारे सूरज जैसे ढेरों तारे हैं जो हमें रात में आसमान में दिखाई देते हैं। इन तारों के समूह को आकाशगंगा (गैलक्सी) कहते हैं। हमारी वाली आकाशगंगा का नाम मंदाकिनी (मिल्की वे) है जिसमें हमारी धरती, हमारे वाला सूरज, दूसरे कई तारे, उनके ग्रह, उपग्रह, धुएं और धूल के विशाल बादल आदि शामिल हैं। कई आकाशगगाएं मिलकर कलस्टर बनाती हैं। कई कलस्टरों से मिलकर सुपर कलस्टर बनता है। कई सुपर कलस्टर मिलकर ब्रह्मांड (यूनिवर्स) का निर्माण करते हैं।

ब्रह्मांड में जब हम बेहतरीन से बेहतरीन दूरबीन (टेलिस्कोप) से देखते हैं तो ज्यादा से ज्यादा 13.8 अरब प्रकाशवर्ष पुरानी आकाशगंगाओं के दर्शन हमें होते हैं। लेकिन इससे यह नतीजा निकालना गलत होगा कि यह ब्रह्मांड 13.8 अरब प्रकाशवर्ष बड़ा है। वजह, ब्रह्मांड लगातार फैल रहा है। इसलिए 13.8 अरब वर्ष पुरानी जो आकाशगगाएं हम देख रहे होते हैं, असल में वे आकाशगगाएं इस समय खिसक कर हमसे करीब 46.5 अरब प्रकाशवर्ष दूर जा चुकी होती हैं। यानी वर्तमान में ब्रह्मांड का फैलाव 46.5 अरब प्रकाशवर्ष (93 अरब प्रकाशवर्ष व्यास) तक हो चुका है। प्रकाशवर्ष वह पैमाना है जिसके जरिए हम लंबी दूरियां नापते हैं। प्रकाशवर्ष से इसलिए कि इस ब्रह्मांड में सबसे तेज रफ्तार रोशनी की है। रोशनी 1 सेकंड में करीब 3 लाख किलामीटर का फासला तय कर लेती है। एक साल में रोशनी जितनी दूरी तय करती है, उसे पैमाना बनाकर दूरी को प्रकाशवर्ष में नापा जाता है। तो 93 अरब प्रकाशवर्ष बड़ा ब्रह्मांड भी ब्रह्मांड की सीमा नहीं है। पूरा ब्रह्मांड हमें दिखाई देने वाले ब्रह्मांड से काफी बड़ा है। इसका कोई ओर-छोर नहीं। यह ब्रह्मांड अनंत है। ऐसा माना जाता है कि हमारे ब्रह्मांड जैसे भी ढेरों ब्रह्मांड हैं।

हमारे वाला ब्रह्मांड कैसे बना, इस बारे में अंतिम रूप से प्रमाणित तथ्य फिलहाल विज्ञान के पास नहीं हैं। कई थिअरी हैं। सबसे स्थापित थिअरी बिग बैंग को ब्रह्मांड का शुरुआती चरण मानती है। इसके मुताबिक, किसी वक्त ब्रह्मांड एक परमाणु से भी छोटा था। सूक्ष्म बिंदु में करीब 140 करोड़ साल पहले महाविस्फोट हुआ। इसे ही बिग बैंग कहते हैं। विस्फोट से बिंदु टुकड़े-टुकड़े होकर इधर-उधर छिटकने लगा। इसी से ब्रह्मांड की शुरुआत हुई। आकाशगंगाएं, तारे, ब्लैक होल, ग्रह आदि बने। लेकिन ब्रह्मांड के फैलने का सिलसिला अब भी लगातार जारी है। लगता था कि एक समय इसका फैलना बंद हो जाएगा और यह वापस एक बिंदु में समा जाएगा। लेकिन 1998 में हबल टेलीस्कोप की वजह से पता चला कि ब्रह्मांड जिस रफ्तार से यह फैल रहा है, वह रफ्तार भी लगातार बढ़ रही है। यानी कोई बाहरी ताकत है। वैज्ञानिकों का मानना है कि एेसा डार्क एनर्जी के कारण हो रहा है। यह डार्क एनर्जी हमारे आसपास हर जगह मौजूद है। पर यह हमें दिखाई नहीं देती। इसीलिए इसे हम डार्क कहते हैं। इसे हम न तो माप सकते हैं और न ही इसकी जांच कर सकते हैं। हां, इसका असर हमें महसूस होता है। यह खाली जगहों पर पाई जाती है।

दरअसल यह ब्रह्मांड जितना हमें दिखता है, वह समूचे ब्रह्मांड का सिर्फ 5 फीसदी हिस्सा ही है। बाकी 95 फीसदी अदृश्य है। इसमें से डार्क एनर्जी 68 फीसदी है। बाकी 27 फीसदी डार्क मैटर है जिसे सन 1933 में खोजा गया था। यह अणु-परमाणु से न बना होकर ऐसे जटिल और अनोखे कणों से बना है जिनके बारे में हमें अभी तक पता नहीं चला है। इस ब्रह्मांड में जितनी भी चीजें हमें दिखाई देती हैं, वे सब या तो खुद रोशनी फेंकती हैं या फिर रोशनी रिफ्लेक्ट करती हैं लेकिन डार्क मैटर ये दोनों ही काम नहीं करता। इसलिए इसे देखना मुमकिन नहीं। तभी यह डार्क मैटर कहलाता है। पर इसका असर दिखता है। दरअसल डार्क मैटर ही इतनी ताकतवर ग्रेविटी पैदा करता है कि हर आकाशगंगा के सभी तारे उसी आकाशगंगा में बंधे रहते हैं। वे इधर-उधर नहीं बिखरते।

कुल मिलाकर डार्क मैटर ब्रह्मांड को बांधे रखने का काम करता है जबकि डार्क एनर्जी ब्रह्मांड का लगातार विस्तार करती रहती है। इस वजह से हर आकाशगंगा का एक-दूसरे से फासला बढ़ता जाता है। इसी ब्रह्मांड में ब्लैक होल नाम की ऐसी चीज भी है जो अपने दायरे में आने वाली हर चीज को निगल जाती है। ऐसा उसकी ग्रैविटी के जबरदस्त खिंचाव के कारण होता है। इस पर भौतिकी के नियम लागू नहीं होते। ब्लैक होल के बाहरी हिस्से को इवेंट हॉराइज़न कहते हैं। ब्लैक होल की खोज सन 1964 में हुई थी। इसे हम अंतरिक्ष में बनी गहरी खाई भी कह सकते हैं। जैसे चादर में छेद, जैसे मौत का कुआं, जैसे कुप्पी की बनावट, जैसे पानी से भरी बाल्टी में हाथों से घुमाकर बनाया गया भंवर।

पूरे ब्रह्मांड में अलग-अलग आकार के ढेरों ब्लैक होल हैं, पर हमारे सौरमंडल में कोई ब्लैकहोल नहीं है। हां, हमारी आकाशगंगा के बीचोबीच एक विराट ब्लैक होल है जो हमारे सूर्य से करीब 1 करोड़ गुना बड़ा है।

ब्लैक होल कैसे बने, इस बारे में दो थिअरी हैं। एक थिअरी यह कि जब कोई विशाल तारा खत्म होने को होता है तो वह अपने अंदर ही सिमटने लगता है। कुछ वक्त बाद वह ब्लैक होल बन जाता है। दूसरी थिअरी यह कि ब्लैक होल बिग बैंग के बाद बना पहला आकाशीय पिंड है। सबसे पहले ब्लैक होल बना। ब्लैक होल से ही विभिन्न तारे बने। तारों से ग्रह, उपग्रह आदि बने।

ब्लैक होल में गिरने के बाद चीज़ें कहां जाती हैं, इसका अभी तक पता नहीं चल पाया है। वजह यह कि ब्लैक होल रोशनी को अपने अंदर जज्ब कर लेता है। रिफ्लेक्ट नहीं करता। तभी उस पर रोशनी डालने पर भी घुप्प अंधेरे के अलावा दूसरा कुछ दिखाई नहीं देता। इसलिए ब्लैक होल का कोई फोटो सीधे-सीधे लेना मुमकिन ही नहीं। हाल में इसका पहला फोटो जिसे बताया गया है, वह दरअसल कंप्यूटर से बना एक वर्चुअल फोटो है जो 8 बड़ी रेडियो दूरबीनों से मिले डेटा के आधार पर बना है। फिर भी यह विज्ञान की बड़ी कामयाबी है। ब्लैक होल के बारे में कई जरूरी सवालों का जवाब मिलना अभी बाकी है। मसलन, ब्लैक होल में गिरी चीज़ें क्या किसी दूसरे डाइमेंशन में चली जाती हैं? क्या ब्लैक होल दूसरे डाइमेंशंस में जाने का दरवाज़ा है? कहीं हम किसी दूसरी दुनिया, किसी दूसरे ब्रह्मांड में तो नहीं पहुंच जाएंगे? जैसे ब्लैक होल हैं, वैसे ही क्या वाइट होल भी अंतरिक्ष में हैं?

इन्हीं तरह के सवालों के जवाब पाने के लिए स्विट्जरलैंड की सर्न लैब में इन दिनों कई प्रयोग हो रहे हैं। दुनिया की यह सबसे बड़ी लैब फ्रांस-स्विट्जरलैंड सीमा पर 27 किलोमीटर लंबी सुरंग में बनी हुई है। यहां अरबों डॉलर का खर्चा करके लार्ज हैड्रॉन कोलाइडर नाम की महामशीन लगाई गई है। इसकी मदद से यह पता लगाया जाएगा कि ब्रह्मांड किन हालात में बना था। उन हालात को पैदा करके स्टडी करने की कोशिश की जा रही है। इस प्रयोग में भारत समेत दुनिया भर के करीब सौ देशों के हज़ारों वैज्ञानिक हिस्सा ले रहे हैं। सर्न लैब से ही गॉड पार्टिकल यानी हिग्स बोसोन होने के ठोस सबूत सन 2012 में मिले थे। आजकल यहां डार्क मैटर पर प्रयोग चल रहे हैं। उम्मीद है कि ब्रह्मांड से जुड़ी कई पहेलियां जल्दी ही सुलझ जाएंगी।

इंटरव्यू...............................

अनंत ब्रह्मांड की जटिल गुत्थियों को बारीकी से समझने के लिए राजेश मित्तल ने प्रियंवदा नटराजन से पिछले दिनों जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल के दौरान बातचीत की। प्रियंवदा अमेरिका की येल यूनिवर्सिटी में एस्ट्रॉनमी की प्रफेसर हैं। अपनी रिसर्च से उन्होंने ब्लैक होल और डार्क मैटर के बारे में दुनिया की समझ बढ़ाने में अहम योगदान किया है। पेश हैं उनसे बातचीत के खास हिस्सेः

Q. ब्रह्मांड के बारे में हमें अब तक क्या पता है और क्या नहीं पता?
A. हमें पता है कि ब्रह्मांड कैसे शुरू हुआ, वक्त बीतने के साथ किस तरह इसका विस्तार हुआ। हमें मालूम है कि इस ब्रह्मांड का सिर्फ 5 फीसदी हिस्सा ही नॉर्मल मैटर से बना है, 68 फीसदी हिस्सा डार्क एनर्जी है और 27 फीसदी डार्क मैटर। हमें यह भी पता है कि डार्क एनर्जी कार के एस्केलेटर की माफिक ब्रह्मांड फैलने की रफ्तार बढ़ा रही है। पर यह नहीं पता कि असल में यह है क्या। अगर यह पता चल जाए तो अतीत, वर्तमान और भविष्य की तमाम गुत्थियां खुल सकती हैं। आखिर में इस ब्रह्मांड का क्या होगा, यह इस बात पर तय होगा कि डार्क एनर्जी असल में क्या है । इसी तरह हमें डार्क मैटर का पता है कि यह ग्रैविटी पैदा करता है, पर यह जानकारी नहीं है कि डार्क मैटर बना किससे है।

Q. डार्क एनर्जी और डार्क मैटर की प्रकृति के अलावा और किन सवालों के जवाब कॉस्मोलजी फिलहाल खोज रही है?
A. बिग बैंग से पहले क्या था? किन हालात में बिग बैंग शुरू हुआ और क्यों? पहली आकाशगंगा कैसे बनी? पहला ब्लैक होल कैसे बना?

Q. इन सवालों का जवाब कब तक मिलने के आसार हैं?
A. उम्मीद है कि 20 बरस में। अभी हम सुनहरे दौर से गुज़र रहे हैं। आज हमारे पास सभी ज़रूरी उपकरण और डेटा हैं। हां, पूरे ब्रह्मांड की पहेली को सुलझाने में कई सदियां लग सकती हैं। सुलझेंगी या नहीं, यह भी पक्के तौर पर नहीं कह सकते।

Q. कॉस्मोलजी से जुड़ीं कौन-सी गलत धारणाएं आम प्रचलित हैं?
A. एक तो यह कि इस ब्रह्मांड का कोई केंद्र है। सचाई यह है कि ब्रह्मांड का कोई केंद्र नहीं है। दूसरी गलत धारणा यह है कि ब्रह्मांड कुछ और बनने के लिए फैल रहा है जबकि सचाई यह है कि ब्रह्मांड फैल तो रहा है लेकिन कुछ अलग बनने के लिए नहीं। अक्सर एक मिसाल दी जाती है गुब्बारे के फैलने की। ब्रह्मांड वैसे ही फैल रहा है, जैसे हवा भरने पर गुब्बारा फैलता जाता है। लेकिन यह तुलना एक सीमा तक ही सही है। गुब्बारा जैसे-जैसे फूलता है, वह बाहर हवा की जगह को घेरता है, पर ब्रह्मांड खुद में फैलता है। उसका विस्तार किसी बाहरी इलाके में नहीं होता।

Q. ब्रह्मांड लगातार फैलता ही जा रहा है लेकिन दिल्ली-मुंबई का फासला तो ज्यों का त्यों है?
A. ब्रह्मांड फैल तो रहा है, इससे आकाशगंगाओं के बीच की दूरी भी बढ़ रही है, लेकिन उनका आकार नहीं बढ़ रहा। ऐसे में हमारी वाली आकाशगंगा में स्थित दिल्ली-मुंबई में दूरी भी नहीं बदलेगी। इसे अच्छी तरह यों भी समझ सकते हैं कि आकाशगंगाएं बंद बक्सों की माफिक हैं। इन बक्सों के बीच दूरी तो बढ़ रही है, पर बक्सों का आकार उतना ही है।

Q. आजकल समानांतर ब्रह्मांड की भी बात हो रही है?
A. हां, इस थिअरी में माना जाता है कि हमारे ब्रह्मांड में जो कुछ भी है, उसका प्रतिरूप समानांतर ब्रह्मांडों में मौजूद है। हमारी ज़िंदगी में जो कुछ भी घट सकता है, वह सब दूसरे ब्रह्मांडों में घटित हो रहा है। मसलन, अभी राजेश यहां मेरा इंटरव्यू ले रहे हैं, किसी दूसरे ब्रह्मांड में मुमकिन है कि प्रियंवदा राजेश का इंटरव्यू ले रही हो और किसी तीसरे ब्रह्मांड में राजेश क्रिकेट खेल रहे हो सकते हैं। जितनी तरह की संभावनाएं हो सकती हैं, वे सब संभावनाएं दूसरे ब्रह्मांडों में वाकई हो रही हैं। लेकिन यह अभी आइडिया ही है। इसे अभी साबित नहीं किया जा सका है।

Q. क्या हम बुलबुले है - न पूर्वजन्म और न ही पुनर्जन्म?
A. मेरा पूर्वजन्म में विश्वास नहीं है, न ही अगले जन्म में।सचाई यह है कि पूरे ब्रह्मांड के सामने हम अप्रासांगिक हैं। हमारी कोई औकात नहीं है। अंतरिक्ष से जब हमारा सूरज भी धूल के कण से भी छोटा नज़र आता है तो वहां हमारा वजूद क्या होगा। हमारे चारों तरफ पृथ्वी की तरह के करीब 5000 ग्रह हैं। कहीं न कहीं ज़िंदगी होगी और यह ज़िंदगी ज़रूरी नहीं कि हमारी तरह हो। बहुत ही प्राथमिक स्तर का जीवन भी हो सकता है मछली जैसा या हमसे उन्नत प्राणी भी हो सकते हैं। लेकिन अपने ग्रह के हिसाब से हम कुछ प्रभावी हैं। और कुछ नहीं तो हमारे पास विनाश की क्षमता है। अंधाधुंध विकास की होड़ में हम अपने ग्रह को बर्बाद कर रहे हैं।

Q. आपने तो दर्शन की भी पढ़ाई की है। यह ब्रह्मांड क्यों बना है? इसके पीछे क्या मकसद है?
A. मकसद खोजने में मेरी कोई रुचि नहीं। हम यहां क्षण भर के लिए हैं। इस ब्रह्मांड को किसी प्रयोजन की ज़रूरत नहीं है। वह है तो है। प्रयोजन तो इंसानों को ढूंढना चाहिए।

Q. तो इंसानों का प्रायोजन क्या होना चाहिए?
A. यह कि हम खुद को बस अपने और अपने परिवार तक ही सीमित न रखें। दुनिया के लिए भी कुछ करके जाएं। इस दुनिया पर कोई अच्छा असर डाल कर जाएं। दूसरों की मदद करें।

Q. आपने ऐसा क्या किया है जिससे आपको संतुष्टि मिली हो, जीवन की सार्थकता मिली हो?
A. मेरे मन में बस यह है कि मेरे किसी आइडिया पर मेरे बाद में भी काम हो। ब्रह्मांड की कोई पहेली जब भी कभी सुलझे, उसमें कुछ योगदान मेरा भी हो।

Q. आपका अब तक का योगदान क्या है?
A. डार्क मैटर की मैपिंग करने में मैंने कुछ योगदान किया है। बताया है कि यह डार्क मैटर कितने टुकड़ों में बंटा हुआ है, इसकी बारीकियां क्या हैं, ब्लैक होल कैसे फैलते हैं। इस पर भी काम कर रही हूं कि पहला ब्लैक होल कैसे बना।

Q. ब्रह्मांड पर आप जो रिसर्च कर रही हैं, उसमें टेलीस्कोप के अलावा और किन-किन टूल्स का इस्तेमाल होता है?
A. हम लोग कंप्यूटरों का इस्तेमाल करते हैं।

Q. आम कम्प्यूटर या कोई सुपर कंप्यूटर?
A. अपनी रिसर्च के लिए सुपर कंप्यूटर का भी इस्तेमाल करती हूं और एक आम लैपटॉप का भी। पेंसिल-पेपर का भी इस्तेमाल होता है। इसके अलावा हबल और चंद्रा टेलीस्कोप से मिले डेटा का विश्लेषण करती हूं।

Q. क्या भारत में भी इन सब चीजों पर रिसर्च हो रही है?
A. 10 साल पहले तक भारत इस क्षेत्र में पिछड़ा हुआ था। बेसिक रिसर्च पर पैसे खर्च नहीं किए जा रहे थे। दरअसल बेसिक रिसर्च का कोई फौरी फायदा नहीं होता। मानव जिज्ञासा शांत करने के लिए यह की जाती है।
लेकिन अब भारत में भी बेसिक रिसर्च पर काफी खर्चा किया जा रहा है। सभी अहम प्रोजेक्टों में भारत भाग ले रहा है। ब्लैक होल्स की स्टडी के लिए तीसरा लीगो डिटेक्टर भारत में ही बनाया जा रहा है जो 2025 में काम करने लगेगा। आजकल जो भी रिसर्च हो रही है, उसे कोई एक देश अपने बलबूते पर नहीं करता। कई देश मिलकर करते हैं।

Q. हाल में किसी संस्था ने दुनिया के सौ शीर्ष वैज्ञानिकों की सूची तैयार की है। उसमें बहुत कम महिला वैज्ञानिक हैं। विशुद्ध विज्ञान की रिसर्च में महिलाएं काफी कम हैं। ऐसा क्यों?
A. बाहर भी ऐसा ही है। सभी संस्थाएं पुरुषों ने बनाई हैं। उन्होंने दूसरों को आने नहीं दिया। लेकिन अब स्थिति बदल रही है। सचाई यह है कि प्रतिभा सबके पास है, सब लोग एक प्रतिभा, किसी तोहफे के साथ पैदा होते हैं।लेकिन कुछ लोग किस्मत वाले होते हैं जिन्हें अपने इस तोहफे का इस्तेमाल करने का पूरा मौका मिलता है।ज़्यादातर लोगों को यह मौका नहीं मिलता है। यह स्थिति बदलनी चाहिए। हर बच्चे में जो जन्मजात प्रतिभा है, उसे पहचान कर उसे बढ़ावा देना होगा, उसे विकसित करना होगा और उसे ऐसे मौके देने होंगे कि वह प्रतिभा का इस्तेमाल कर सके। तभी सारे समाज को लाभ होगा। प्रतिभा महिलाओं में ही नहीं, डिफरेंटली एबल्ड लोगों में भी है। इस दुनिया की समस्याओं को दूर करने के लिए हमें सबकी प्रतिभाओं की जरूरत है।

Q. कहा जाता है कि हमारे धर्मग्रंथों में, वेदों में सारा ज्ञान है?
A. हमारे धार्मिक ग्रंथों में जो कुछ लिखा है और जो विज्ञान कर रहा है, इन दोनों में कोई तुलना नहीं की जा सकती। मिसाल के तौर पर, कोई सवाल करे कि नीले रंग में कितना नमक है तो इसका कोई जवाब नहीं दिया जा सकता। रंग और स्वाद को मिक्स नहीं कर सकते। तमाम धर्मों में जो कहानियां हैं, वे सब कल्पना पर आधारित हैं।

Q. ऐसे कहा जाता है कि हमारी जो पुराने ऋषि-मुनि थे, वे धरती पर बैठे-बैठे दूसरे लोकों की सैर कर लिया करते थे, पूरा ब्रह्मांड वे यहीं बैठे-बैठे देख लेते थे?
A. ऐसा कुछ नहीं है। कोई विज्ञानी इसे नहीं मानता। पर दोनों की बात हम एक साथ करते हैं तो अपने पूर्वजों के ज्ञान की गरिमा घटाते हैं। हम इससे प्रेरणा लेनी चाहिए कि हमारे पूर्वजों के पास ऐसी गज़ब की कल्पनाशीलता थी।कल्पनाशीलता के इस्तेमाल से ही हम विज्ञान की गुत्थियां सुलझाते हैं।

संडे नवभारत टाइम्स से साभार

Friday, 4 May 2018

स्टीफन हॉकिंग का ‘आखिरी’ शोधपत्र


चंद्रभूषण 
स्टीफन हॉकिंग का आखिरी शोधपत्र प्रकाशित होने की चर्चा गरम है। बेल्जियन भौतिकशास्त्री टॉमस हर्टोग के साथ उनका यह काम कॉस्मॉलजी के इन्फ्लेशनमामले से संबंधित है, जिस पर हम यहां थोड़ी चर्चा करेंगे। लेकिन इससे पहले यह स्पष्ट कर देना जरूरी है कि 14 मार्च 2018 को दिवंगत हुए बहुचर्चित थिअरेटिकल फिजिसिस्ट स्टीफन हॉकिंग का यह अंतिम रिसर्च पेपर नहीं है।
उनके प्रिय शोध क्षेत्र ब्लैकहोलों पर केंद्रित कई और शोधपत्र आने वाले दिनों में भी प्रकाशित होते रहेंगे। यह बात और है कि ये सारे पेपर किसी न किसी के साथ मिलकर ही लिखे हुए हैं। 75 साल की उम्र पाए स्टीफन के लिए अपने अंतिम वर्षों में अकेले दम पर पर्याप्त सामग्री जुटाकर उसपर फैसलाकुन ढंग से काम करना संभव नहीं था, हालांकि इसका दूसरा पहलू यह भी था कि उनके साथ अपना नाम जोड़ना नई पीढ़ी के हर भौतिकशास्त्री का सपना हुआ करता था।
बहरहाल, बड़े फलक की विषयवस्तु इन्फ्लेशन पर टॉमस हर्टोग के साथ मिलकर किया हुआ उनका यह काम कॉस्मॉलजी से जुड़े भौतिकशास्त्रियों और उनके करीब पड़ने वाले गणितज्ञों के बीच चर्चा का विषय बनेगा। खासकर इस शोधपत्र की यह प्रस्थापना कि बिग बैंग के बाद गुजरे एक सेकंड के बहुत ही छोटे हिस्से में- जिसे इन्फ्लेशन का समय कहा जाता है- समय जैसी किसी चीज का कोई अस्तित्व नहीं था।
किसी को यह बात अटपटी लग सकती है, क्योंकि बात चाहे सेकंड के कितने भी छोटे हिस्से की क्यों न हो, समय तो समय है। उसके न होने की बात का भला क्या मतलब है? यहां आपको इस बात का मतलब समझाने का दावा इन पंक्तियों का लेखक नहीं कर सकता, क्योंकि सीमावर्ती भौतिकी की बहुत सारी बातों का कोई व्यावहारिक मतलब समझ पाना आला से आला दर्जे के भौतिकशास्त्रियों के भी बूते से बाहर की बात हुआ करती है। वहां सारा मतलब गणित की भाषा में ही समझना पड़ता है।
तो सवाल यह बचता है कि क्या हॉकिंग और हर्टोग ने सृष्टि के प्रारंभिक क्षणों का कोई ऐसा गणितीय समीकरण ढूंढ निकाला है, जो समय जैसी किसी चीज के बिना भी सफलतापूर्वक काम कर सकता हो? जवाब नहीं में है। उन्होंने एक प्रस्थापना भर दी है, जिसका खंडन-मंडन होना अभी बाकी है।
अब थोड़ी बात इन्फ्लेशन के बारे में, जिसे 1979 से ब्रह्मांड के निर्माण से जुड़ी दूसरी सर्वाधिक महत्वपूर्ण मान्यता जैसी प्रतिष्ठा प्राप्त है। पहली मान्यता 1927 में दी गई, 1929 में लगभग और 1964 में पूरी तरह पुष्ट मान ली गई बिग बैंग की प्रस्थापना की है। इस प्रस्थापना के मुताबिक बिग बैंग वह बिंदु है, जहां से देशकाल की शुरुआत होती है।
ब्रह्मांड में आकाशगंगाओं के एक-दूसरे से दूर भागने की दर का अध्ययन करके यह नतीजा निकाला गया है कि अनंत विस्तार का सारा किस्सा दरअसल 13.8 अरब साल पहले एक बिंदु से शुरू हुआ था, जिसके पहले आकाश और समय नहीं था, और अगर रहा भी हो तो उसके बारे में जाना नहीं जा सकता।
1964 में कॉस्मिक बैकग्राउंड रेडिएशन (सीआरबी) की खोज से बिग बैंग पर तो पक्की मोहर लग गई लेकिन दो नए सवाल भौतिकशास्त्रियों को परेशान करने लगे। पहला यह कि ब्रह्मांड हर तरफ एक जैसा क्यों है, और दूसरा यह कि ब्रह्मांड में कहीं द्रव्य के होने और कहीं न होने की गुंजाइश कैसे पैदा होती है। इन दोनों सवालों का जवाब 1979 में एलन गुथ ने इन्फ्लेशन की थीसिस के जरिये दिया।
इसके मुताबिक बिग बैंग के समय को शून्य समय नहीं बल्कि क्वांटम समय माना जाए, यानी 1 के बाद 36 शून्य लगाकर एक बहुत बड़ी संख्या बनाई जाए, फिर एक सेकंड समय को उससे भाग देने पर जो आए, उतना समय। क्वांटम थिअरी की अनिवार्य प्रस्थापना 'अनिश्चितता का सिद्धांत' पर बिग बैंग की खरा उतरने के लिए ऐसा करना जरूरी है।
10 की ऋण 36 घात सेकंड वाले इस क्वांटम समय से लेकर 10 की ऋण 33 घात वाले समय के बीच ब्रह्मांड अपने सूक्ष्म आकार का कम से कम साठ बार दो गुना होता चला गया- यह इन्फ्लेशन का सिद्धांत है। समय का यह इतना छोटा हिस्सा भी समय ही कहलाएगा, लेकिन हॉकिंग और हर्टोग की प्रस्थापना के मुताबिक यह समय न होकर स्पेस की तीन विमाओं में ही समाहित है। यानी शून्य समय।
अच्छा होगा कि हम इस प्रस्थापना के खंडन-मंडन का इंतजार करें। वैसे, स्टीफन हॉकिंग के ही कद के, बल्कि अपने शास्त्र में उनसे कहीं ज्यादा कद्दावर गणितज्ञ रॉजर पेनरोज शुरू से ही इन्फ्लेशन की धारणा को ही खारिज करते आए हैं। बाल की खाल निकालने वाली इन बहसों के देर-सबेर कुछ व्यावहारिक अर्थ भी निकलेंगे। तब तक चीजों और सिद्धांतों के नामों का आनंद लेते रहें।

Tuesday, 17 April 2018

Facebook के सही उपयोग के कुछ सूत्र:

Dr. Avyact Agrawal

Facebook पर मैं लगभग एक वर्ष से हूँ। इस बीच ज़हाँ आप सबने बहुत प्यार दिया, मेरी किताब आपकी वज़ह से आयी और बिकी। कुछ बेहद अच्छे मित्र मिले। कुछ गहरे लेखक मिले। फिर मेरे यूट्यूब चैनल को भी एक अच्छी शुरुआत आपने
दिलवाई।

वहीँ मेरा इनबॉक्स रोज़ाना लोगों की मानसिक और शारीरिक समस्याओं  से भरा रहने लगा।

कुछ समस्याएं तो लोगों की पोस्ट और बातें सुनकर मुझे फेसबुक की ही दी हुई लगने लगीं। तो सोचा मेरे एक वर्ष के अनुभव, मनोविज्ञान और व्यक्तित्वों की समझ के अनुरूप फेसबुक का खुशहाल उपयोग के कुछ सूत्र लिखूँ। शायद कुछ लोगों के काम आएं।

1. पहला सूत्र तो यही है कि इस बात को दिल की गहराइयों तक स्वीकार कर लें कि फेसबुक आपके रोज़मर्रा के जीवन में 0.1 प्रतिशत से ज़्यादा अहमियत नहीं रखता। इसे एक मनोरंजन और ज्ञान अर्जित का अच्छा साधन मानें लेकिन रिश्ते ढूँढने और बनाने का बिल्कुल नहीं।

2. हमेशा आइडियाज़, विचार, विचार धारा  की बातें करें और ज़हन में रखें किसी व्यक्ति की बातें न करें तीसरे से। खासकर नकारात्मक चर्चा से बचें। जो पसंद नहीं उसे इग्नोर कर दें, unfriend कर दें , ब्लॉक कर दें लेकिन नकारात्मक पोस्ट करना ,स्क्रीनशॉट पब्लिक करने का अर्थ यह है कि उस व्यक्ति को आप अपने खूबसूरत ज़हन में ज़रूरत से ज़्यादा महत्त्व और ज़गह दे रहे हैं।

3. रिश्तों  और मित्रता के दो अर्थ मैं देखता हूँ,  पहला यह कि
मित्र या रिश्ता आपको यह अहसास और विश्वास दिला सके कि आपकी किसी मुश्किल में वह साथ देगा अपनी सामर्थ्य अनुसार दूसरा यह कि आपको वह आगे बढ़ते देखना चाहेगा और इसके लिए आपके मिशन या प्रोजेक्ट में अपनी सामर्थ्य अनुसार मदद करेगा। फेसबुक पर आपसे जुड़े  मित्र या कथित रिश्ते का रवैया आपके प्रति उस व्यक्ति के व्यक्तित्व की भीतर तक पड़ताल कर सकता है। इन दो criteria के अलावा मित्रता या रिश्ते के दावे झूठे होते हैं। Facebook friend से ये अपेक्षाएं नहीं होतीं लेकिन कोई दावा करे मित्रता या रिश्ते का तो इन दो पहलुओं पर उसकी परीक्षा ले लेना।
उदाहरण के लिए, मेरे किसी मित्र ने मुझसे इनबॉक्स पर किताब लिखने या स्वास्थ्य सम्बंधित जानकारी पर कोई सलाह मांगी और मैं उसे ज़वाब तक न दूं लेकिन कहूँ कि मैं तो सबका हूँ।
एक जनरल रूल यह भी है कि जो सबका हो , कम ही सम्भावना है कि वो किसी का भी होगा। क्योंकि हम मनुष्य सीमित क्षमता लिए हुए होते हैं निभाने की। हर वक़्त नए रिश्तों की तलाश में लगे लोग लाज़िमी है पुराने रिश्तों की उपेक्षा कर ही ऐसा कर सकते हैं। माँ तक 5 बच्चे पैदा कर ले तो नए पर ज़्यादा ध्यान देगी, बड़ा बच्चा माँ के समय और गोद के लिए तरसेगा, कभी पिट भी जायेगा। यह तब जब वह बराबरी से प्यार करने वाली माँ है। गुणा भाग ,हैसियत देख मित्रता करने वाला कोई व्यक्ति नहीं।
पहले तो मैं कहूँगा फेसबुक पर रिश्ते मत तलाशिये असल जीवन के रिश्ते मज़बूत कीजिये और अपने खालीपन को भरिये। हाँ कोई बहुत अच्छा मिल ही जाये तो जुड़िये लेकिन रिश्तों की फ़ौज़ नहीं होती, भगवान की तक रिश्तों की फ़ौज़ नहीं होती। राधा राधा थीं और बाक़ी गोपियाँ गोपी।

प्रकृति ने आप जैसा पूरी इंसानी सभ्यता के इतिहास में दूसरा कोई नहीं बनाया। आप बेहद uniqe हैं। इसलिए स्वाभिमान का ख़याल हमेशा रखें किसी भी रिश्ते में।

3. आपकी timeline आपके मस्तिष्क का extention है।
 उद्वेलित मन की अवस्था में कुछ भी न लिखें। लोग भले वाह वाह कह दें लेकिन आपके व्यक्तित्व का कोई भीतरी कमज़ोर हिस्सा लोगों को दिख जायेगा। और आपकी इमेज से चिपक जायेगा।

4. फेसबुक जब तक मनोरंजन करे खुशी और ज्ञान दे इस पर रहें। लेकिन दुःख देने लगे, ईर्ष्या,कुंठा,जोड़ तोड़ , recognition पाने की अदम्य इक्छा जैसी बातें मन में आने लगे तो कुछ दिन के लिए इससे दूर हो जाएं।

5. आपकी पारिवारिक जिम्मेदारी, और व्यावसायिक जिम्मेदारी
को उपेक्षित कर कभी इसे समय न दें।

6. फेसबुक पर कुछ लोग ज़्यादा लोकप्रिय हो जाते हैं। यदि आप हो गए हैं तो ज़्यादा खुश मत हो जाइए। इसका प्रभाव असल जीवन में नगण्य है। कोई भी 'फेसबुक सेलिब्रिटी' असल जीवन में एक अलग जीवन जीता है।
उदाहरण के लिए मेरी पहचान असल जीवन में मेरे शहर में एक चिकत्सक के रूप में है फेसबुक पर लिखने वाले लेखक के रूप में नहीं। आपका प्रमुख काम ही आपकी पहचान है इसलिए मुगालते मत पालिए। follower की संख्या दरअसल आपसे प्रभावित लोगों का प्रतिबिम्ब बिल्कुल भी नहीं।

7. हालाँकि यह व्यक्तिगत मसला है कि कौन क्या पोस्ट करता है और सभी मुद्दों की ज़रूरत है लेकिन फ़िर भी मुझे लगता है हिन्दू मुस्लिम , जात पात के मसले इतने जटिल हैं कि फेसबुक पर नहीं सॉल्व किये जा सकते वरन् उल्टा होता है इसका, लोग और भी नफ़रत से भर जाते हैं तार्किक दृष्टि की ज़गह। लिखना भी है तो अपने विचारों और अनुभवों को एक विनम्र, तर्कपूर्ण और विस्तारित पोस्ट का रूप दें और सही मंशा से करें जैसा कि
Tabish Siddiqui करते हैं। क्योंकि ये विषय विरोध आमंत्रित करते हैं।

8. बेहद अहम् यह कि इनबॉक्स पर चैट करने से बचें। और chat की भी है तो कम से कम् उन स्क्रीन शॉट्स को औरों को न भेजें न ही पोस्ट करें। यह व्यक्तित्व का बड़ा नकारात्मक पहलू दिखाता है। और आपकी विश्वसनीयता पर प्रश्नचिन्ह लगाता है।

9. बहसीले और नकारात्मक कमेंट करने वालों से बहस में उलझने की ज़गह सीधे ब्लॉक करें।

10. स्वाभिमान अवश्य रखें। कोई भी इतना बड़ा नहीं कि आपकी किसी भी पोस्ट को 'कभी भी' लाइक तक करने में कष्ट महसूस करे , गुणा भाग करे और आप उस पर वारे वारे जाओ।
दरअसल यह व्यव्हार एक बेहद calculatIive और स्वार्थी व्यक्तित्व की निशानी होती है। साथ ही व्यक्ति के स्वयं को आपसे बहुत ऊपर समझने के दम्भ को भी यह व्यव्हार प्रदर्शित करता है। छोटे छोटे क्लू  आपको व्यक्ति की भीतरी कोशिकाओं तक का प्रतिबिम्ब बता देते हैं बशर्ते कि आपमें नज़र हो यह देख सकने की।

11. जो अच्छा लिखे अच्छा काम करे उसकी दिल खोल कर प्रशंसा कीजिये,शेयर करिये,लाइक करिये, छोटे छोटे साथ दीजिये। जैसे मैं विजय सिंह ठकुराय का फैन उनकी किताब का इंतज़ार कर रहा हूँ जिससे मैं उसे खूब प्रमोट कर सकूं। प्रशंसा जैसी मुफ़्त की चीज़ में क्या कंजूसी करना। किसी अच्छे की प्रशंसा हमारे भीतर के अहम्,ईर्ष्या ,कुंठा को धोने का काम करती है मन साफ़ करती है। और साफ मन सुन्दर चमकते चेहरे और अच्छे स्वास्थ्य के लिए बेहद ज़रूरी है। मतलब मुफ़्त की चीज़ और बेहतरीन कॉस्मेटिक है किसी अच्छे की प्रशंसा।

12. महिलाएं वैसे तो बेहद बुद्धिमान हैं फिर भी अज़नबी पुरुषों से चैटिंग अवॉयड करें तो ज़्यादा सुख है।

13. अंत में बाहर के सुन्दर मौसम का आनंद लीजिये, ठंडी हवा को गालों से टकराने दीजिये घर की बालकनी में बैठे।
किसी बच्चे के संग खेलिए,उसे बॉल स्पिन करना सिखाइये कभी बैट पकड़ना, किसी पपी को दुलारिये, किसी पौधे को पानी दीजिये, फूल को निहारिये, नीले आसमान को देखिये, रात को तारे गिनिये, कुछ अच्छी डिश बनाइये, डांस करिये

मोबाइल स्क्रीन के परे अपनी असल दुनिया के मुद्दे ही आपके मन में  घूमना चाहिए मोबाइल से नज़र हटते ही।

मैं या मुझसा कोई कितना भी अच्छा दिखे फेसबुक पर perfect नहीं।

Friday, 23 March 2018

बेहद गंभीर मामला है फेसबुक डाटा लीक


नितिन ठाकुर 

आसान भाषा में समझिए कि जिसे आप कुछ नहीं मान रहे वो असल में कितना सीरियस मामला है।आपकी शक्ल किस एक्टर से मिलती है, आप अगले जन्म में क्या बनेंगे, आप की पर्सनैलिटी में सबसे शानदार क्या है? इस तरह के फालतू सवालों का जवाब कितना गंभीर होता है ये आप भी जानते हैं, लेकिन टाइमपास करने के फेर में आप क्लिक के बाद क्लिक किए जाते हैं और अपनी राय या जानकारियां उस पार बैठी किसी अनजान पेशेवर कंपनी से साझा कर लेते हैं। हो सकता है कि आपके लिए आपकी राय दो कौड़ी की हो, मगर डाटा कलेक्शन के धंधे में उतरे पेशेवरों के लिए ये आंकड़े हीरे-मोती हैं। फेसबुक इस्तेमाल करनेवाले औसत बुद्धि हिंदुस्तानी की अक्ल कैसे काम करती है ये इन विदेशी कंपनियों को बखूबी पता है और इसीलिए बेतुकी ऐप्लीकेशन्स के ज़रिए प्राइवेसी की दीवारें तोड़कर आसानी से डाटा इकट्ठा कर लेती हैं।
भारत इंटरनेट की दुनिया में अभी नाबालिग है। जो देश इस राह में बहुत पहले आगे बढ़ चुके हैं वहां की सियासत इंटरनेट पर उपलब्ध डाटा के इस्तेमाल के तरीके को भी जानती है, और वहां के लोग भी इस गोरखधंधे को लेकर खूब संवेदनशील हैं। यहां तो हालत ये है कि लोग आधार कार्ड के कथित नफे के सामने नुकसान की बात सुनना भी नहीं चाहते। जिन लोगों ने अमेरिकी टीवी सीरीज़ ‘हाउस ऑफ कार्ड्स’ देखी है, वो जानते हैं कि डाटा का इस्तेमाल चुनाव प्रभावित करने के लिए कैसे किया जाता है। सबसे आपत्तिजनक ये है कि ऐसा किया जाना अवैध है। जनमत को इन तरीकों से प्रभावित करना लोकतंत्र के साथ चीटिंग है। अमेरिका में पहले भी सरकारी स्तर और खुफिया तरीकों से नागरिकों की जानकारी इकट्ठा किया जाने का ज़बरदस्त विरोध होता रहा है। अमेरिकी नागरिकों की जागरुकता अमेरिकी नेताओं को ऐसा करने से रोकती रही है। आतंकवाद के नाम पर लोगों की निजी जानकारी संग्रह करने की योजना और भी खुलकर चलने लगी थी, मगर पढ़े-लिखे अमेरिकियों की जमात को ये आसानी से समझ आ गया कि उन्हें आतंकवाद का डर दिखाकर नेता मनचाहे कानून बना रहे हैं। ये कानून सिर्फ उनकी सत्ता को मज़बूत करने के काम आएंगे। भारत की स्थिति अलग है। इस देश में नेता देवता होते हैं जो कभी कुछ गलत कर ही नहीं सकते। ये स्थिति तब है जब हमारे नेताओं की डिग्री से लेकर पत्नी तक दशकों तक छिपे रह जाते हैं और हम उनके बारे में कभी भी ठीक ठीक पता नहीं कर पाते। ऐसे में सोचिए कि अगर भारतीय चुनावों में कैंब्रिज एनेलिटिका जैसी कंपनियां सक्रिय रही हों तो भला हमें कौन बताएगा और कैसे पता चलेगा।
आज रविशंकर प्रसाद ने कांग्रेस पर आरोप लगाया कि वो 2019 के चुनाव में कैंब्रिज एनेलिटिका की सेवाएं लेना चाह रही थी, तो सुरजेवाला ने बीजेपी पर आरोप लगाया कि 2010 के बिहार चुनाव में बीजेपी ने तो इस कंपनी की सेवाएं ली भी हैं। और तो और जेडीयू वाले केसी त्यागी के बेटे अमरीश त्यागी का नाम भी आ रहा है। अमरीश गाज़ियाबाद में एवेलेनो बिज़नेस इंटेलिजेंस चलाते हैं जो एससीएल लंदन का हिस्सा है। एससीएल ही कैंब्रिज एनेलिटिका की पेरेंट कंपनी भी है। अमरीश की कंपनी अपने संबंधों को एससीएल या कैंब्रिज एनेलिटिका से स्वीकारती तो है लेकिन फेसबुक जैसे प्लेटफॉर्म के साथ मिलकर काम करने से इनकार करती है। 
दरअसल कैंब्रिज एनिलिटिका एक ब्रिटिश कंपनी है। कंपनी का मालिक है रॉबर्ट मर्सर जो डोनाल्ड ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी का दानदाता है। उसकी कंपनी पर इल्जाम है कि 2016 के अमेरिकी चुनाव में उसने ट्रंप की पार्टी को ये समझने में गैर कानूनी ढंग से मदद की , कि अमेरिकी जनता का रुझान क्या है। वहीं ब्रिटेन की जनता को यूरोपियन यूनियन से बाहर निकलने के लिए भी कंपनी ने उकसाया था। कैंब्रिज एनेलिटिका में काम करनेवाले 28 साल के क्रिस्टोफर विली ने खुलासा किया है कि कंपनी ने 5 करोड़ अमेरिकियों का फेसबुक डाटा एक्सेस करके इस तरह डिज़ाइन किया कि लोगों का ब्रेनवॉश हो और वोटर्स ट्रंप के पक्ष में वोटिंग करने लगें। लोगों को ट्रंप से जुड़े पॉजिटिव विज्ञापन खूब दिखाए गए। फेसबुक कहता रहा है कि वो किसी ऐप्लीकेशन को बहुत कम डाटा एक्सेस करने देता है लेकिन इस बार आरोप है कि फेसबुक ने जानबूझकर कैंब्रिज एनेलिटिका को ज़्यादा डाटा इकट्ठा करने दिया।
असल कहानी शुरू होती है साल 2014 से जब कैंब्रिज विवि में मनोविज्ञान के प्रोफेसर डॉ एलेक्ज़ेंडर कोगान को कैंब्रिज एनालिटिका ने 8 लाख डॉलर दिए। उन्हें एक ऐसी ऐप्लीकेशन डेवलप करने का काम दिया गया जो फेसबुक यूज़र्स का डाटा निकाल सके। उन्होंने जो ऐप बनाई उसका नाम था दिस इज़ योर डिजिटल लाइफ। 2 लाख 70 हज़ार लोगों ने इस ऐप को डाउनलोड किया वो भी बिना जाने कि जिस ऐप को वो डाटा एक्सेस करने दे रहे हैं वो दरअसल इस डाटा का इस्तेमाल क्या, कहां और किसके लिए करेगी। कोगन ने सारा डाटा कैंब्रिज एनेलिटिका को बेच दिया। कैंब्रिज एनेलिटिका ने इस सारे आंकड़े के आधार पर लोगों की साइकोलॉजिकल प्रोफाइल तैयार कर ली। इसमें उनके रुझान, नापसंदगी , आदतों का सारा चिट्ठा था। आरोप है कि इन्हीं 5 करोड़ प्रोफाइल्स को फोकस करके डोनाल्ड ट्रंप के चुनावी प्रचार अभियान की योजना बनाई गई।
जब कैंब्रिज एनेलिटिका की हरकतें पकड़ में आईं तो उसने एक और खेल खेला। आरोप है कि उसने डोनाल्ड ट्रंप को बचाने के लिए अपने कागज़ातों में ऐसे हेरफेर किया कि पड़ताल में निष्कर्ष कुछ ऐसा निकले कि सारा डाटा रूस की मदद से इकट्ठा किया गया है। मुसीबत में फंसे फेसबुक ने कहा है कि 2015 में ही उन्होंने इस ऐप को हटा दिया था। ऊपर से उसने ये भी कहा कि ऐप को अपना एक्सेस लोगों ने खुद दिया जो एक हद तक सच तो है ही।
अब दुनियाभर में फेसबुक के खिलाफ गुस्सा है और जमकर अभियान चल रहा है। वॉट्सएप के सह संस्थापक ब्रायन एक्टन ने तो ट्विटर पर लिखा भी कि फेसबुक को डिलीट कर दें। वॉट्सएप वही है जिसे फेसबुक ने हाल ही में खरीदा था। अमेरिका और यूरोपीय सांसदों ने तो फेसबुक से जवाब मांगा है और मार्क जुकरबर्ग को पेश होने के लिए कहा है। अमेरिका में उपभोक्ता एवं प्रतिस्पर्धा संघीय व्यापार आयोग भी जांच शुरू करने जा रहा है। वहां भी कांग्रेस जुकरबर्ग को तलब करने वाली है।
फिक्र तो इस बात की है कि फेसबुक के सबसे ज़्यादा ग्राहक भारत में हैं। गूगल के साथ फेसबुक मिलकर अब एक ट्रिलियन डॉलर यानि 65 लाख करोड़ रुपए की कंपनी होने जा रही हैं। ये इतना पैसा है कि कई देशों की अर्थव्यवस्था को हिलाकर रख दे। कांग्रेस और भाजपा नेताओं के आरोपों से साफ है कि इन दोनों ही पार्टियों ने फेसबुक और कैंब्रिज एनेलिटिका जैसे एजेंसियों से खुलकर या छिपकर हाथ तो मिलाए हैं। दोनों ही पार्टियां डिजिटल स्पेस पर कब्ज़े के लिए आईटी सेल्स खोलकर सेनाएं तैयार कर रही हैं। ज़ाहिर है, जीतने के लिए नेता उसी मॉडल पर चलने में नहीं हिचकिचाएंगे जिस पर ट्रंप की टीम चली है।
फिलहाल भारत के नेता फेसबुक को बचाते दिख रहे हैं। ऐसा होने के पीछे कई कारण हैं। फेसबुक इतनी भारी भरकम कंपनी बन चुकी है कि सरकारें और पार्टियां उसके भारी दबाव में हैं। ओड़ीशा के साथ फेसबुक ने मिलकर महिलाओं को उद्यमी बनाने की योजना शुरू की है। आंध्र में वो सरकार के साथ डिजिटल फाइबर प्रोजेक्ट चला रही है। केंद्रीय मंत्री किरण रिजीजू तो आपदा प्रबंधन के मामले में फेसबुक के गले में हाथ डाले खड़े हैं। ये कंपनियां समाजसेवा में क्यों उतरती हैं इसे जो आज नहीं समझता वो सिर्फ मूर्ख है। व्यापारी कुछ भी मुफ्त में नहीं देता, यहां तक कि मुफ्त दी जा रही चीज़ भी असल में मुफ्त नहीं होती है। ये सिर्फ भारत की जनता के बीच छवि निर्माण का इन कंपनियां का तरीका है । सरकारों के कामकाज में घुसने की रणनीति है। भारत तो बस एक नया मैदान है। कंपनियां इस खेल को हमेशा खेलती और जीतती रही हैं। 
वैसे फेसबुक का खेल खुलते ही उसके शेयरों का नुकसान पहुंचा है। ज़ुकरबर्ग ने शातिराना ढंग से दो हफ्ते पहले ही 11.4 लाख शेयर बेचे थे। पिछले तीन महीने में जुकरबर्ग वॉल स्ट्रीट में सबसे ज़्यादा शेयर बेचनेवाले प्रोमोटर बन गए। दो ही दिनों में 49 लाख डॉलर का नुकसान झेल रही फेसबुक में सबसे ज़्यादा सुरक्षित भी ज़ुकरबर्ग ही रहे। इससे पहले भी फेसबुक सबको इंटरनेट देने के नाम पर इंटरनेट को कंट्रोल करने की साज़िश रच चुका है। दक्षिण कोरिया में तो फेसबुक और इंस्टाग्राम पर 39.6 करोड़ वॉन का जुर्माना लगा है। कंपनी पर ये जुर्माना यूजर्स के लिए सेवाओं की उपलब्धता सीमित करने के लिए लगाया गया है। फेसबुक ने लोगों को मिलनेवाली इंटरनेट स्पीड धीमी कर दी थी। 
ये तो मुश्किल है कि लोग फेसबुक से एकाउंट डिलीट करें मगर अब जो हो सकता है वो यही है कि अपना डाटा यूं ही किसी को ना दें। फालतू के गेम्स और ऐप्लीकेशन्स को इस्तेमाल ना करें। ये मासूम सी लगनेवाली ऐप हमारे देश और लोकतंत्र के लिए खतरनाक हैं। इन कंपनियों को ईस्ट इंडिया कंपनी ना बनने दें जिसने हमारे ही देश के राजाओं के साथ हाथ मिलाकर हम पर राज किया।

Monday, 19 March 2018

इंटरनेट और पर्यावरण


विकास बनाम पर्यावरण की बहस ने इंटरनेट को भी अपनी चपेट में ले लिया है। पर्यावरण पर बुरा प्रभाव केवल औद्योगिक और यातायात प्रदूषण से ही नहीं पड़ रहा, बल्कि हालिया रपट में इंटरनेट में इस्तेमाल होने वाली अनावश्यक बिजली के कारण कुछ विपरीत असर देखने को मिल रहे हैं। दुनिया भर में बैठे नेट सर्फर्स एक कमांड पर मनचाही सूचना पाना चाहते हैं, लेकिन उस प्रक्रिया में सर्वरों को कितनी अतिरिक्त मशक्कत करनी पड़ती है, इसका खुलासा भी इस रपट में है।
हार्वर्ड विश्वविद्यालय के प्रसिद्ध भौतिकीविद् डॉ़ एलेक्स विजनर-ग्रॉस ने कुछ अरसा पहले अपने अध्ययन से निष्कर्ष निकाला था कि गूगल पर दो बार खोज करने से लगभग उतनी ही कार्बन डाई ऑक्साइड पैदा होती है जितनी कि एक कप चाय उबालने में। एक कप चाय उबालने से लगभग 15 ग्राम कार्बन डाई ऑक्साइड पैदा होती है। खबर इतनी सनसनीखेज और चिंताजनक थी कि गूगल को बयान जारी कर इस बारे में स्थिति साफकरनी पड़ी।
अलबत्ता, गूगल को मानना पड़ा कि भले ही उसकी खोज से उतनी ज्यादा कार्बन डाई ऑक्साइड पैदा नहीं होती, मगर होती जरूर है और दुनिया का तापमान बढ़ाने में उसका कुछ न कुछ योगदान तो है ही। उसने डॉ़ विजनर-ग्रॉस के आकलन (7 ग्राम प्रति खोज) की तुलना में इसे 0.2 ग्राम बताया। लेकिन जो बात गूगल ने नहीं कही, वह यह थी कि इतना प्रदूषण सिर्फ उन खोजों से पैदा होता है, जिनके नतीजे बहुत आसानी से मिल जाते हैं। जटिल खोजों (जिनके लिए गूगल की तकनीकी प्रणाली को खासी मेहनत करनी पड़ती है) से पैदा होने वाली कार्बन डाई ऑक्साइड एक ग्राम से लेकर दस ग्राम के बीच कहीं भी हो सकती है।
और सुनिए। जर्मन इंटरनेट कंपनी स्ट्राटो ने 2007 में गूगल के डेटा सेंटरों, सर्वरों और खोज अनुरोधों की गणना कर बताया था कि एक गूगल सर्च पर खर्च होने वाली बिजली से 11 वाट का सीएफएल बल्ब एक घंटे तक जल सकता है! आज जबकि कोई दो अरब लोग इंटरनेट से किसी न किसी रूप में जुड़े हैं, इसके जरिए दुनिया भर में हो रही ऊर्जा की खपत का अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है। और ऊपर से यह हर साल दस फीसदी की रफ्तार से बढ़ भी रही है! इसका अर्थ यह हुआ कि आप और हम जब एकाध घंटे इंटरनेट का इस्तेमाल करके उठते हैं तब तक हम दुनिया की सबसे चिंताजनक समस्या में थोड़ा और योगदानदे चुके होते हैं। ग्लोबल वार्मिंग की चुनौती को जरा सा और गंभीर बना चुके होते हैं, हालांकि हमें इसका जरा भी अहसास नहीं होता। और इसके लिए किसी एक कंपनी को ही दोष क्यों दिया जाए? यू-ट्यूब के भारी-भरकम वीडियोज से लेकर सैकंड लाइफ के आभासी ऑनलाइन विश्व तक और टेलीजेन्स की तकनीकों से लेकर बड़े पैमाने पर डाउनलोड किए जा रहे संगीत तक, कोई भी तो पीछे नहीं है। जिन वेब आधारित ईमेल सेवाओं का प्रयोग हम करते हैं, जिन इंटरनेट आधारित वीओआईपी आधारित संचार सेवाओं के इस्तेमाल से उत्साहित होते हैं, वे सब हमारी पर्यावरणीय उलझन को बढ़ा रहे हैं- ऊर्जा की खपत, तापमान की गर्मी और हानिकारक गैसों की मात्रा बढ़ाकर। 
क्या आपको यकीन होगा कि विश्व भर के वायुयानों, हेलीकॉप्टरों और उड्डयन उद्योग से जुड़े तमाम अन्य माध्यमों से जितनी कार्बन डाई ऑक्साइड पैदा होती है, वह इंटरनेट के कारण पैदा होने वाली कार्बन डाई ऑक्साइड से कम है! अमेरिकी शोध फर्म गार्टनर के अनुसार 2007 में ही इंटरनेट ने वैश्विक प्रदूषण में दो फीसदी योगदान के साथ हवाई यात्रा उद्योग को पीछे छोड़ दिया था। ऐसा नहीं कि हमें तकनीक का प्रयोग घटा देना चाहिए या कंप्यूटर को बंद कर देना चाहिए। जरूरत है इस बारे में जागरूक होने की। 
हमारे कंप्यूटर और इंटरनेट का अनावश्यक योग या दुरुपयोग न हो, यह सुनिश्चित करना सिर्फ अपना बिजली और इंटरनेट बिल बचाने के लिए ही नहीं बल्कि वैश्विक पर्यावरण के लिहाज से भी जरूरी है।
गूगल क्यों है निशाने पर
दुनिया की सबसे बड़ी इंटरनेट कंपनियों में से एक गूगल पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने के लिए खास तौर पर निशाने पर है तो इसकी बड़ी वजह उसके विशालकाय और असंख्य डेटा सेंटर हैं जिनमें बड़ी संख्या में सर्वर दिन-रात दुनिया भर के नेट-सर्फरों की फरमाइशें पूरी करने में मुस्तैदी से लगे हैं। इंटरनेट आधारित बड़ी परियोजनाएं चलाने वाली सभी कंपनियों, वेब होस्टिंग कंपनियों आदि के अपने डेटा सेंटर हैं जिनमें हजारों की संख्या में सर्वर लगे होते हैं। इनके माइक्रोप्रोसेसर बड़ी मात्रा में बिजली की खपत करते हैं और उनसे वातावरण में गर्मी पैदा होती है। इस गर्मी को दबाने के लिए बड़ी संख्या में एअर कंडीशनर इस्तेमाल किए जाते हैं। ये डेटा सेंटरों का भीतरी हिस्सा तो ठंडा रखते हैं, लेकिन बाहर बड़ी मात्रा में गर्म गैसें प्रवाहित करते हैं जो धरती के वातावरण में शामिल हो रही हैं। यूं भी एअर कंडीशनरों में इस्तेमाल की जाने वाली गैसें, जिन्हें ग्रीनहाउस गैसें कहा जाता है, धरती की सुरक्षा करने वाली ओजोन परत को नुकसान पहुंचाती हैं। इनमें लगने वाली बिजली का उत्पादन करने के लिए कोयला, गैस आदि ईंधनों का प्रयोग होता है जो पुन: ग्लोबल वार्मिंग को बढ़ाता है। 
क्या आप यकीन करेंगे कि अकेले अमेरिका के डेटा सेंटरों में सन 2006 में लगभग 61 अरब किलोवाट बिजली खर्च हुई थी। इतनी बिजली से पूरे इंग्लैंड को दो महीने तक रोशन रखा जा सकता है। यह आंकड़ा कैलीफॉर्निया की लारेंस बर्कले नेशनल लैब का है। आज तो हालात 2006 की तुलना में कहीं अधिक विकट हो चुके हैं। यह तो अकेले अमेरिका की बात हुई। पूरी दुनिया के डेटा सेंटर कितनी ऊर्जा पी रहे होंगे? उनके साथ-साथ इन कंपनियों के रिसर्च एंड डेवलपमेंट सेंटर और अब क्लाउड कंप्यूटिंग के सर्वरों को भी जोड़कर देखिए। कहते हैं कि गूगल के अपने मुख्यालय (गूगल कॉम्प्लैक्स) में ही कैलीफोर्निया के 3,333 घरों के बराबर बिजली खर्च होती है।
यूं ग्लोबल वार्मिंग में हमारी हिस्सेदारी उसी समय शुरू हो जाती है जब हम अपना कंप्यूटर ऑन करते हैं। सक्रिय स्थिति में हमारे अपने कंप्यूटर में लगभग 175 वाट बिजली की खपत होती है। उसके बाद हमारे निजी कंप्यूटर नेटवर्क, ब्रॉडबैंड नेटवर्क, विभिन्न देशों के इंटरनेट गेटवे और अंत में संबंधित वेबसाइट के सर्वर तक सब में बिजली की खपत हो रही है। 
मजेदार बात यह है कि हमारे द्वारा की जाने वाली इंटरनेट सर्च से हमारे अपने कंप्यूटर में तो बिजली की खपत में विशेष बढ़ोत्तरी नहीं होती, लेकिन जब वह कमांड हजारों किलोमीटर दूर किसी दूसरे महाद्वीप के डेटा सेंटर में रखे सर्वर पर जाती है तो उसके माइक्रोप्रोसेसर को जवाब देने के लिए मेहनत करनी पड़ती है और इस क्रिया में बिजली की खपत वहां होती है। उसे जितना अधिक श्रम (गणनाएं) करना होगा, बिजली की खपत और उसके परिणामस्वरूप आसपास के वातावरण की गर्मी उतनी ही बढ़ेगी।

डॉ़ विजनर ग्रॉस का आकलन है कि एक सामान्य वेबसाइट को देखने में हम विभिन्न स्तरों पर प्रति सैकंड लगभग बीस मिलीग्राम कार्बन डाई ऑक्साइड को जन्म 
देते हैं। अगर वेबसाइट में वीडियो, संगीत, एनीमेशन आदि हैं तो यही आंकड़ा 300 मिलीग्राम प्रति सैकंड तक हो सकता है। गूगल पर एक खोज पर यदि 11 वाट बिजली खर्च होती है तो कल्पना कीजिए कि रोजाना औसतन 20 करोड़ खोज परिणाम देने वाले गूगल की ऊर्जा संबंधी जरूरतें कितनी अधिक होंगी! गूगल इस बारे में अपने आंकड़े जाहिर नहीं करता, लेकिन उसकी तकनीक ही कुछ ऐसी है कि वह ऊर्जा की खपत बढ़ाती है। गूगल ने अमेरिका, चीन, जापान, यूरोप आदि स्थानों पर डेटा सेंटर बनाए हैं और जब हम किसी कीवर्ड को सर्च करने का प्रयास करते हैं तो उसकी कमांड किसी एक सर्वर को नहीं बल्कि अनेक सर्वरों को भेजी जाती है। तेजी से जवाब देने के लिए उनमें एक किस्म की होड़ चलती है और जिसका जवाब सबसे पहले आता है, गूगल उसी को हमें दिखाता है। जाहिर है, बाकी सभी सर्वरों पर खर्च हुई ऊर्जा की बर्बादी अनावश्यक थी! लेकिन चंद मिलि-सैकंड में सर्च परिणाम देने की क्षमता ही गूगल की सफलता का आधार है, जिसने उसे दुनिया की सफलतम इंटरनेट कंपनी बनाया है। क्या वह पर्यावरण के लिए उसका त्याग करने को तैयार होगा? विकास बनाम पर्यावरण और कारोबार बनाम पर्यावरण की बहस इंटरनेट की दुनिया में भी प्रासंगिक है। कैसी विडंबना है कि जिस गति से इंटरनेट की क्षमता और कनेक्टेडलोगों की संख्या बढ़ रही है, उसी अनुपात से पर्यावरण पर बोझ बढ़ता चला जाता है।

आएगा हरित इंटरनेट?
ऐसा नहीं कि सूचना प्रौद्योगिकी कंपनियों को इस समस्या का अहसास नहीं। गूगल ने कहा है कि वह कार्बन न्यूट्रलबनने के लिए प्रतिबद्ध है। कार्बन न्यूट्रल यानी न्यूनतम कार्बन डाई ऑक्साइड पैदा करने वाली कंपनियां जो इस उत्सर्जन से हुए नुकसान की भरपाई पर्यावरण-अनुकूल परियोजनाओं के माध्यम से करती हैं। उसने इंटेल के साथ मिलकर अपने हरितडेटा सेंटरों के विकास की परियोजना शुरू की है। आईबीएम ने सन 2007 में प्रोजेक्ट बिग ग्रीन के नाम से डेटा सेंटरों और सर्वरों में बिजली की खपत सीमित करने संबंधी परियोजना पर अमल शुरू किया था जिसमें मोड्यूर डेटा सेंटरों का योग किया जाता है। उसका दावा है कि इससे उनमें ऊर्जा का खर्च आधा हो जाएगा। केंब्रिज में माइक्रोसॉफ्ट की शोध प्रयोगशाला में अधिक बिजली फूंकने वाले कंप्यूटरों को पुराने जमाने के कंप्यूटरों से बदला जा रहा है जो अपेक्षाकृत कम बिजली खर्च करते थे। हैवलेट पैकर्ड (एचपी) के वैज्ञानिकों और तकनीशियनों ने एक दिलचस्प प्रस्ताव किया है कि वे डेटा सेंटरों को ऊर्जा सप्लाई करने के लिए गायों के गोबर से बनी हरितबिजली का प्रयोग करेंगे। उनके अनुसार दस हजार गायों के गोबर से उत्पन्न मीथेन गैस से इतनी बिजली बनाई जा सकती है जो एक मेगावाट के डेटा सेंटर को चला सके। नेटवर्किंग कंपनी सिस्को ने भी पर्यावरण अनुकूल डेटा सेंटरों के निर्माण की पहल की है। इंटरनेट को दीर्घायु बनाने के लिए प्रकृति के साथ उसका तालमेल जरूरी है। इस प्रयास में इंटरनेट कनेक्शन के इस सिरे से उस सिरे तक मौजूद हर व्यक्ति को हाथ बंटाना होगा।


ग्लोबल वार्मिंग में आपका हाथ?
सामान्य कंप्यूटर उपयोक्ताओं को भले ही इस बात का अहसास न हो, किंतु वे ग्लोबल वार्मिंग की समस्या में कुछ न कुछ योगदान दे रहे हैं। कैसे
- सामान्य वेबसाइट को सर्फ करने में प्रति सैकंड लगभग 20 मिलीग्राम कार्बन डाई ऑक्साइड का उत्सर्जन होता है। जटिल वेबसाइटों (वीडियो, एनीमेशन, एप्लीकेशंस आदि) में यह प्रति सैकंड 300 मिलीग्राम तक पहुंच जाता है।
- गूगल पर की जाने वाली जटिल सर्च (डॉ़ एलेक्स विजनर-ग्रॉस के अनुसार) लगभग सात ग्राम कार्बन डाई ऑक्साइड पैदा करती है। इस क्रिया में लगभग 11 वाट घंटे बिजली खर्च होती है।
- आपका सुस्त पड़ा कंप्यूटर (चालू स्थिति में) प्रति घंटे 40 से 80 ग्राम तक कार्बन डाई ऑक्साइड पैदा करता है। 
- ‘बिग स्विचके लेखक निकोलस कार के अनुसार सैकंड लाइफजैसी वर्चुअल रियलिटी गेम वेबसाइट में आपका अवतार (ग्राफिक प्रतिरूप) मौजूद है तो उससे सालाना लगभग 1752 किलोवाट घंटे बिजली खर्च हो रही है।
- ऑन स्थिति में आपका कंप्यूटर लगभग 175 वाट बिजली खर्च करता है। 
- ऑन किंतु निष्क्रिय स्थिति में आपके कंप्यूटर में 60 से 250 वाट बिजली तक जलती है, और वह भी तब जब मॉनीटर का स्विच बंद हो।