Showing posts with label नवभारत टाइम्स में मेरे लेख. Show all posts
Showing posts with label नवभारत टाइम्स में मेरे लेख. Show all posts

Thursday, 14 September 2017

सबसे बुरे दौर में उच्च शिक्षा

शशांक द्विवेदी
डिप्टी डायरेक्टर, मेवाड़ यूनिवर्सिटी ,राजस्थान 
नवभारत टाइम्स 
देश में इस समय उच्च और तकनीकी शिक्षा के बुरे दिन आ चुके हैं । पिछले पाँच साल से उच्च शिक्षा का समूचा ढांचा चरमरा रहा था लेकिन किसी सरकार ने इसके लिए कुछ नहीं किया ।अब ये पूरी तरह से ध्वस्त हो चुका है। पिछले दिनों उच्च और तकनीकी शिक्षा की सबसे बड़ी नियामक संस्था ऑल इंडिया काउंसिल फॉर टेक्निकल एजुकेशन (एआईसीटीई) ने तय किया है कि जिन इंजिनियरिंग कॉलेजों में 30 प्रतिशत से कम दाखिले हो रहे हैं, उन्हें बंद किया जाएगा । फ़िलहाल देश भर में एआईसीटीई से संबद्ध 10,361 इंजीनियरिंग कॉलेज है जिनमें कुल 3,701,366 सीटें है(लगभ 37 लाख ) , अब इनमें करीब 27 लाख सीटें खाली हैं । जोकि बहुत बड़ा और भयावह आँकड़ा है , देश में उच्च शिक्षा के हालात इतने  बदतर हो चुके हैं कि एआईसीटीई ने तय किया है कि जिन कॉलेजों में पिछले 5 सालों में 30 पर्सेंट से कम सीटों पर दाखिले हुए हैं, उन्हें अगले सत्र से बंद किया जाएगा ।
पिछले दिनों रिलीज हुई फिल्म बाबुमोशय बंदूखबाज में एक डायलाग है कि आदमी की जिन्दगी में उसका किया हुआ जरुर उसके सामने आता है । ये डायलाग देश में उच्च शिक्षा की सबसे बड़ी नियामक संस्था एआईसीटीई पर पूरी तरह से फिट बैठता है , क्योंकि पहले तो इन्होने बिना ठीक से जांचे परखे ,गुणवत्ता की चिंता किये बगैर देश में हजारों हजार इंजीनियरिंग कॉलेज खोलनें के लाइसेंस दिए और बिना माँग आपूर्ति ,रोजगार का विश्लेषण किये बगैर 37 लाख सीटें कर दी ,अब जब उनमें से 27 लाख सीटें खाली रह गई तो इनके हाथ पैर फूल गए । तो यहाँ मुख्य सवाल तो एआईसीटीई से ही है कि इन्होने पहले कुछ क्यों नहीं किया ? जब तकनीकी शिक्षा का आधारभूत ढांचा चरमरा रहा था तब एआईसीटीई ने कोई ठोस कदम क्यों नही उठाया ? आखिर इतने बड़े पैमाने पर सीट खाली रहनें से और कालेजों के बंद होनें का सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था पर ही तो पड़ेगा ।
ये बात सही है की देश में उच्च और तकनीकी शिक्षा की बुनियाद 2010 से ही हिलने लगी थी और 2014 तक लगभग 10 लाख सीटें खाली थी। लेकिन तीन साल पहले मोदी सरकार आने के बाद ये उम्मीद जगी थी की उच्च शिक्षा के लिए कुछ बेहतर होगा लेकिन धरातल पर कुछ खास नही हुआ । मतलब सिर्फ सरकार बदली लेकिन नीतियाँ लगभग वही रही और अब हालात ऐसे हो गएँ हैं  जिन्हें संभालना बहुत मुश्किल दिख रहा है । सरकार का सारा ध्यान हिंदुत्व के अजेंडे पर लगा रहा दुसरी तरफ देश में उच्च शिक्षा तेजी से अपनी साख खोती चली गयी ।  इस सत्र में तो ऐसे हालात हो गए कि आईआईटीज में भी छात्रों में रुचि कम होती दिखाई दे रही है। आईआईटीज  में 2017-18 सत्र के लिए 121 सीटें खाली रह गई हैं। पिछले चार साल में आईआईटी में इतनी सीटें कभी खाली नहीं रहीं। आईआईटी के निदेशक मानते हैं कि सीटें खाली रहने का कारण छात्रों को मनपसंद विकल्प न मिलना है।
देश में स्किल इंडिया के इतने हल्ले के बावजूद देश में अनस्किल्ड लोगों की संख्या और बेरोजगारी तेजी से बड़ी है इसी वजह से हाल में हुए केंद्रीय मंत्रिमंडल के विस्तार में कौशल विकास मंत्री को उनके नान परफार्मेंस की वजह से हटाया गया । रुढी को उनके पद से हटाया गया लेकिन इससे क्या फर्क पड़ता है कि कौन आया और कौन गया क्योंकि जब धरातल पर नीतियों का क्रियांवयन ही नहीं होगा तो योजनायें बनाने से क्या हासिल होगा ।
देश में फ़िलहाल जो माहौल है उसे देखकर तो यही लगता है कि उच्च शिक्षा के जो हालात है वो अभी और बदतर होंगें । हालत यह हो गयी है कि इंजीनियरिंग की जिस डिग्री को हासिल करना कभी नौकरी की गारंटी और पारिवारिक प्रतिष्ठा की बात मानी जाती थी, आज वह डिग्री छात्रों और अभिभावकों के लिए एक ऐसा बोझ बनती जा रही है जिसे न तो केवल घर पर रख सकते हैं और न ही फेंक सकते हैं। देश में यही हालत प्रबंधन के स्नातकों की है ,एसोचैम का ताजा सर्वे बता रहा है कि देश के शीर्ष 20 प्रबंधन संस्थानों को छोड़ कर अन्य हजारों संस्थानों से निकले केवल 7 फीसदी छात्र ही नौकरी पानें के काबिल हैं । यह आंकड़ा चिंता बढ़ानेवाला इसलिए भी है, क्योंकि स्थिति साल-दर-साल सुधरने की बजाय लगातार खराब ही होती जा रही है। 2007 में किये गये ऐसे सर्वे में 25 फीसदी, जबकि 2012 में 21 फीसदी एमबीए डिग्रीधारियों को नौकरी देने के काबिल माना गया था।
नियामक संस्थाओं और केंद्र सरकार का सारा ध्यान सिर्फ कुछ सरकारी संस्थानों पर ही रहता है । जबकि देश भर के  90 प्रतिशत युवा निजी विश्वविद्यालयों और संस्थानों से शिक्षा लेकर निकलते है और सीधी सी बात है अगर इन  90  प्रतिशत छात्रों पर कोई संकट होगा तो वो पूरे देश की अर्थव्यवस्था के साथ साथ सामाजिक स्तिथि को भी नुकसान पहुंचाएगा । सिर्फ  आईआईटी और आईआईएम की बदौलत विकसित भारत का सपना साकार नहीं हो सकता ।
कौशल विकास की जरुरत
असल में हमनें यह बात समझनें में बहुत देर कर दी की  अकादमिक शिक्षा की तरह ही बाजार की मांग के मुताबिक उच्च गुणवत्ता वाली स्किल की शिक्षा देनी भी जरूरी है। एशिया की आर्थिक महाशिक्त दक्षिण कोरिया ने स्किल डेवलपमेंट के मामले में चमत्कार कर दिखाया है और उसके चौंधिया देने वाले विकास के पीछे स्किल डेवलपमेंट का सबसे महत्वपूर्ण योगदान है। इस मामले में उसने जर्मनी को भी पीछे छोड़ दिया है। 1950 में दक्षिण कोरिया की विकास दर हमसे बेहतर नहीं थी। लेकिन इसके बादउसने स्किल विकास में निवेश करना शुरू किया। यही वजह है कि 1980 तक वह भारी उद्योगों का हब बन गया। उसके 95 प्रतिशत मजदूर स्किल्ड हैं या वोकेशनलीट्रेंड हैं, जबकि भारत में यह आंक़डा तीन प्रतिशत है। ऐसी हालत में भारत कैसे आर्थिक महाशिक्त बन सकता है ?
देश में इंजीनियरिंग और प्रबंधन कॉलेज लगातार बढ़े लेकिन उनकी गुणवत्ता नही बढीं , न ही इंडस्ट्री की बदलती जरूरतों के मुताबिक उनका पाठ्यक्रम अपग्रेड किया गया । हमें यह बात अच्छी तरह से समझनी होगी की “”स्किल इंडिया”” के बिना “”मेक इन इंडिया”” का सपना भी नहीं पूरा हो सकता । इसलिए इस दिशा में अब ठोस और समयबद्ध प्रयास करनें होंगे। इतनी बड़ी युवा आबादी से अधिकतम लाभ लेने के लिए भारत को उन्हें स्किल बनाना ही होगा जिससे युवाओं को रोजगार व आमदनी के पर्याप्त अवसर मिल सकें । सीधी सी बात है जब छात्र स्किल्ड होगें तो उन्हें रोजगार मिलेगा तभी उच्च और तकनीकी शिक्षा में व्याप्त मौजूदा संकट दूर हो पायेगा ।
मांग और पूर्ति में संतुलन बनाना जरूरी
आज यूजीसी और एआइसीटीइ से यह सवाल पूछा जाना चाहिए कि क्या उनके पास प्रबंधन और इंजीनियरिंग डिग्रीधारियों की वर्तमान और भावी मांग के संबंध में कोई तथ्यपरक व विश्वसनीय आंकड़ा है?
क्या भविष्य में नये संस्थान, कॉलेज व यूनिवर्सिटियां खोलते समय में यह ध्यान में रखा जायेगा कि एमबीए, इंजीनियरिंग, फार्मेसी, मेडिकल और डेंटल शिक्षा के कोर्सों की मांग और पूर्ति में संतुलन बना रहे? इसका विश्लेषण केंद्रीय मानव संसाधन विकास  मंत्रालय और देश की प्रमुख नियामक संस्थाओ को ठीक ढंग से करना पड़ेगा क्योंकि देश में उच्च शिक्षा को लेकर जो मौजूदा संकट है उसका एक प्रमुख कारण नियामक संथाओं का प्रभावी ढंग से काम न कर पाना भी है । अगर इन्होने शुरुआत में ही उच्च शिक्षा की गुणवत्ता सुनिश्चित की होती तो आज देश उच्च शिक्षा के संकट को नही झेल रहा होता।
(लेखक शशांक द्विवेदी राजस्थान के मेवाड़ यूनिवर्सिटी में डिप्टी डायरेक्टर हैं और  टेक्निकल टूडे पत्रिका के संपादक हैं)


Thursday, 10 September 2015

कॉल ड्रॉप पर सख्ती बरते सरकार

शशांक द्विवेदी ,डिप्टी डायरेक्टर (रिसर्च ),मेवाड़ यूनिवर्सिटी 
नवभारत टाइम्स(NBT)
नवभारत टाइम्स(NBT)
के संपादकीय में प्रकाशित लीड आर्टिकल
सरकार ने कॉल ड्रॉप की समस्या को गंभीरता से लिया है। उसने कंपनियों से साफ कह दिया है कि अगर यह समस्या नहीं सुधरती, तो वह दूरसंचार ऑपरेटरों पर जुर्माना लगा सकती है। कुछ समय पहले प्रधानमंत्री ने भी इस पर चिंता जताई थी। ट्राई के अनुसार पिछले एक साल में कॉल ड्रॉप का प्रतिशत दोगुना हुआ है। देश में मौजूद 2जी के 183 नेटवर्क सर्किल में से 25 यानी हर सात में से एक, ट्राई द्वारा कॉल ड्रॉप को लेकर तय किए गए मापदंडों पर खरे नहीं उतरते। शायद ही कोई ऐसा दिन गुजरता हो, जब आपको अपने मोबाइल पर बात करते हुए कॉल ड्रॉप से दो-चार न होना पड़ता हो। मगर केंद्र सरकार के दबाव के बावजूद इस मामले को मोबाइल कंपनियां गंभीरता से नहीं लेती हैं क्योंकि इससे उनका मुनाफा बढ़ रहा है।

टॉवर और स्पेक्ट्रम
पिछले दिनों देश की सभी बड़ी टेलिकॉम कंपनियों ने कॉल ड्रॉप के मामले पर संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस की थी। कंपनियों के अनुसार स्पेक्ट्रम और टॉवरों की कमी के कारण कॉल ड्रॉप एक बड़ी परेशानी बनती जा रही है और आगे यह और भी बढ़ सकती है। वोडाफोन इंडिया के मैनेजिंग डायरेक्टर सुनील सूद ने कहा कि अगर फॉर्मल टेलिकॉम टॉवर पॉलिसी नहीं आती है तो आने वाले दिनों में कॉल ड्रॉप की समस्या और ज्यादा बढ़ जाएगी। पर सरकार कहती है कि दूरसंचार कंपनियों ने अधिकांश निवेश स्पेक्ट्रम हासिल करने में किया, जबकि बुनियादी ढांचे में उनका इन्वेस्टमेंट महज 13 फीसदी है। जहां तक सवाल स्पेक्ट्रम की कमी का है तो सरकार के मुताबिक कंपनियां उपलब्ध स्पेक्ट्रम नहीं खरीद रहीं।

2012 में उन्हें जितना स्पेक्ट्रम ऑफर किया गया था उसका 48 फीसदी ही उन्होंने खरीदा। 2013 में 20 फीसदी, 2014 में 81 फीसदी और इस साल 88 फीसदी ही खरीदा है। फिर जो स्पेक्ट्रम कंपनियों ने खरीदा है, उसका भी ये पूरा इस्तेमाल नहीं कर रही हैं। दरअसल उसे जानबूझकर बचा कर रखा जा रहा है क्योंकि मोबाइल कंपनियां अब 2जी, 3जी के बजाय 4जी में ज्यादा निवेश करना चाहती हैं। यही वजह है कि बुनियादी ढांचे के विकास पर उनका बिल्कुल ध्यान नहीं है। इसके साथ ही मोबाइल कंपनियां अपने मुनाफे से भी कोई समझौता नहीं कर रही हैं। एक तरफ मोबाइल में कॉल ड्राप बढ़ रहा है, दूसरी तरफ लगभग सभी टेलिकॉम कंपनियों ने पिछले एक साल में उपभोक्ताओं के लिए 2जी और 3जी सेवाओं के लिए अपनी इंटरनेट दरें लगभग दोगुनी कर दी हैं।

पिछले दिनों 1.1 लाख करोड़ रुपये की स्पेक्ट्रम नीलामी से सरकार का खजाना तो भर गया लेकिन इसकी कीमत अब आम आदमी को अपनी जेब से चुकानी पड़ रही है। गवर्नमेंट को जल्द ही मोबाइल टॉवर पर एक राष्ट्रीय नीति बनानी होगी जिसमें मोबाइल रेडिएशन से लोगों के स्वास्थ्य और पर्यावरण पर पड़ने वाले नुकसान को भी ध्यान में रखना होगा। कॉल ड्रॉप की समस्या के संबंध में केंद्रीय संचार और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री रवि शंकर प्रसाद ने कहा कि उन्होंने सभी मुख्यमंत्रियों को लिखा है कि राज्य सरकार की बिल्डिंग पर मोबाइल टॉवर इंस्टॉल करने की मंजूरी दी जाए। इससे सर्विस प्रोवाइडर्स को कवरेज और क्षमता को बूस्ट मिलेगा और कॉल ड्रॉप दिक्कत से निपटने में मदद मिलेगी। उन्होंने यह भी कहा कि प्राइवेट टेलिकॉम कंपनियों को यह समझना होगा कि उन्हें लोगों के लिए काम करना है, न कि केवल खुद के लिए। कंपनियों को इंफ्रास्ट्रक्चर और टेक्नॉलजी को बूस्ट करने के लिए निवेश करना ही होगा।

टेलिकॉम कंपनियों के पास कमर्शल स्पेक्ट्रम की कमी है क्योंकि इसका ज्यादातर हिस्सा रक्षा सेवाओं के लिए है। बाकी दर्जनों स्पेक्ट्रम ऑपरेटर्स में बंटा है। यहां ऑपरेटर्स 10.5 मेगाहर्ट्ज के स्पेक्ट्रम से काम चलाते हैं, जबकि यूरोपीय देशों में यह औसतन 65 मेगाहर्ट्ज है। शांघाई में उपलब्ध स्पेक्ट्रम भी दिल्ली का ढाई गुना है, जबकि दोनों शहर आकार और आबादी के घनत्व में लगभग एक जैसे हैं। स्पेक्ट्रम कम्युनिकेशन सिग्नल्स ले जाने वाली तरंगें हैं। इनकी भूमिका हाईवे जैसी है। जब इस पर ट्रैफिक बढ़ता है तो रफ्तार धीमी हो जाती है। ऐसे ही जब एक नेटवर्क के दायरे में ज्यादा लोग मोबाइल इस्तेमाल करते हैं तो कुछ रुकावटें आती हैं। टॉवर सिग्नल्स को अपना सफर पूरा करने में मदद करते हैं। देश में फिलहाल चार लाख 25 हजार टॉवर हैं। साउंड व डेटा ट्रांसमिशन सुधारने के लिए फिलहाल एक लाख और टॉवर्स की तत्काल जरूरत है। जितने ज्यादा उपभोक्ता होंगे, उतने ही अधिक स्पेक्ट्रम की जरूरत पड़ेगी। ऐसे में सीमित टॉवरों पर कॉल का बोझ बढ़ता है और उनको अधिक स्पेक्ट्रम की आवश्यकता होती है।

सर्विस की क्वॉलिटी
जहां टॉवर अधिक हैं, वहां सीमित स्पेक्ट्रम में काम चल जाता है लेकिन अधिक टॉवरों के प्रबंधन के लिए अधिक उपकरण चाहिए। देश में फिलहाल लगभग 90 करोड़ लोग मोबाइल फोन का इस्तेमाल कर रहे हैं। ऐसे में टेलिकॉम कंपनियों की सर्विस क्वॉलिटी खराब होना स्वाभाविक है। देश के कई हिस्सों में वॉइस कनेक्टिविटी की समस्या डेटा कनेक्टिविटी को भी प्रभावित कर रही है। इस समस्या से निपटने के लिए नए सेवा गुणवत्ता मानक तय किए जाने चाहिए जिनका कड़ाई से पालन हो। इन मानकों पर खरी न उतरने वाली मोबाइल कंपनियों के खिलाफ कड़ी दंडात्मक कार्रवाई होनी चाहिए।

Tuesday, 9 June 2015

अभी दूर है स्किल इंडिया का सपना

नवभारत टाइम्स (NBT)
शशांक द्विवेदी 
डिप्टी डायरेक्टर (रिसर्च ),मेवाड़ यूनिवर्सिटी
नवभारत टाइम्स (NBT) के संपादकीय पेज पर प्रकाशित  
अपने पहले साल में मोदी सरकार ने विज्ञान, शोध, तकनीक और उच्च शिक्षा के क्षेत्र में सुधार के लिए कोई बड़ा और ठोस कदम नहीं उठाया। वैज्ञानिक शोध के लिए पर्याप्त बजट नहीं दिया गया, न ही बुनियादी विज्ञान के प्रसार के लिए कोई विशेष कार्ययोजना बन पाई, जिससे विज्ञान को आम लोगों से जोड़ा जा सके। 'अटल नवाचार मिशन' के तहत अनुसंधान और विकास के लिए सिर्फ 150 करोड़ रुपये आवंटित किए गए।
स्किल डिवेलपमेंट के लिए सरकार जरूर संजीदा हुई और इसके लिए बाकायदा अलग मंत्रालय भी बनाया गया, लेकिन इसके भी ठोस नतीजे अभी तक आए नहीं हैं। दूसरी तरफ देश में तकनीकी और उच्च शिक्षा की हालत बहुत खराब हो गई है। हायर और टेक्निकल एजुकेशन के मौजूदा सत्र में देश भर में सात लाख से ज्यादा सीटें खाली हैं। नया सत्र जुलाई से शुरू होने वाला है, लेकिन इस स्थिति में बदलाव की कोई गुंजाइश नजर नहीं आ रही।
यूपीए जैसा ही माहौल

सिर्फ कुछ आईआईटी, एनआईटी, आईआईएम और सरकारी कॉलेजों के भरोसे देश उच्च शिक्षा में तरक्की नहीं कर सकता। सरकार के पास निजी संस्थानों और विश्वविद्यालयों के लिए भी कोई बेहतर कार्य योजना होनी चाहिए। उसे पता लगाने की कोशिश करनी चाहिए कि इतने बड़े पैमाने पर साल दर साल सीटें क्यों खाली रह रही हैं, हायर एजुकेशन से लोगों का मोहभंग क्यों हो रहा है और इसे ठीक कैसे किया जा सकता है। इंजीनियरिंग कॉलेजों की सीटों का खाली रहना देश की अर्थव्यवस्था और सामाजिक स्थिरता के लिए भी ठीक नहीं है।

दस साल चली पिछली यूपीए सरकार ने भी इंजीनियरिंग में गुणवत्ता लाने के लिए कोई प्रयास नहीं किया, जिसका नतीजा यह हुआ कि 2010 के बाद से उच्च शिक्षा की बुनियाद कमजोर पड़ने लगी। दरअसल गवर्नमेंट ने बिना किसी विशेष खोजबीन के और बिना गुणवत्ता को ध्यान में रखे हजारों इंजीनियरिंग कालेज खोलने की अनुमति दे दी, लेकिन उनके भविष्य के बारे में नहीं सोचा गया।बिना स्किल के हजारों-लाखों इंजीनियरिंग ग्रेजुएट बेरोजगार घूमने लगे तो इससे लोगों का मोहभंग होना शुरू हो गया। रही-सही कसर बढ़ती महंगाई और मोटी फीस ने पूरी कर दी। मोदी सरकार से उम्मीद थी कि वह इस मामले में कुछ अलग कोशिश करेगी, लेकिन कुछ नहीं हुआ।
सरकार जब भयंकर कर्ज में डूबी एक बीमार एयरलाइंस को उबारने के लिए प्रयास कर सकती है तो उसे उच्च और तकनीकी शिक्षा के लिए भी कुछ जरूर करना चाहिए। इस सचाई को हमें समझना ही होगा कि तकनीकी और उच्च शिक्षा में मजबूती के बिना हम दुनिया में आगे नहीं बढ़ सकते, क्योंकि विकास का असली रास्ता शिक्षा और कौशल से होकर ही जाता है। हालत यह है कि देश में लाखों युवाओं के पास इंजीनियरिंग की डिग्री तो है लेकिन कुछ भी कर पाने का 'स्किल' नहीं है। इसकी वजह से अपने यहां हर साल लाखों इंजीनियर बेरोजगारी का दंश झेलने को मजबूर हैं।पिछले दिनों जारी हुई सीआईआई की इंडिया स्किल रिपोर्ट-2015 के मुताबिक हर साल सवा करोड़ भारतीय युवा रोजगार बाजार में उतरते हैं। इनमें मात्र 37 प्रतिशत ही रोजगार के काबिल होते हैं। यह आंकड़ा कम होने के बावजूद पिछले साल के 33 प्रतिशत के आंकड़े से ज्यादा है और इससे यह संकेत मिलता है कि युवाओं को हुनरमंद करने की दिशा में धीमी गति से ही सही, लेकिन काम हो रहा है।
एक दूसरी रिपोर्ट के अनुसार हर साल देश में 15 लाख इंजीनियर तैयार होते है लेकिन उनमें सिर्फ चार लाख को नौकरी मिल पाती है। नैसकॉम (नेशनल असोसिएशन ऑफ सॉफ्टवेयर एंड सर्विसेज कंपनीज) द्वारा कराए गए एक सर्वे के अनुसार देश के 75 फीसदी टेक्निकल ग्रेजुएट नौकरी के लायक नहीं हैं।
आईटी इंडस्ट्री इन इंजीनियरों को भर्ती करने के बाद इनकी ट्रेनिंग पर करीब एक अरब डॉलर खर्च करती है। इंडस्ट्री को उसकी जरूरत के हिसाब से इंजीनियरिंग ग्रेजुएट नहीं मिल पा रहे। डिग्री और स्किल के बीच फासला बहुत बढ़ गया है। असल में हमने यह समझने में बहुत देर कर दी कि अकादमिक शिक्षा की तरह अपनी नई पीढ़ी को बाजार की मांग के मुताबिक उच्च गुणवत्ता वाली स्किल एजुकेशन देना भी हमारे लिए बहुत जरूरी है।एशिया की एक आर्थिक महाशिक्त दक्षिण कोरिया ने स्किल डिवेलपमेंट के मामले में चमत्कार कर दिखाया है। 1950 तक विकास के स्तर और विकास दर, दोनों ही मामलों में कोरिया हमारे मुकाबले कहीं नहीं था। लेकिन अभी अगर उसकी गिनती भारत से एक पायदान आगे के देशों में होती है और विकास के कुछ पैमानों पर वह जर्मनी को भी पीछे छोड़ चुका है तो इसमें सबसे बड़ी भूमिका स्किल एजुकेशन की ही है।
हुनर बढ़ाने पर जोर
आज डिग्री से ज्यादा जरूरत हुनर की है। केंद्र सरकार को शैक्षणिक कोर्सेज के साथ स्किल डिवेलपमेंट के कार्यक्रमों पर विशेष ध्यान देना होगा क्योंकि 'मेक इन इंडिया' का सपना 'स्किल इंडिया' के बिना पूरा नहीं हो सकता। सरकार अगर वाकई देश को साइंस-टेक्नॉलजी के क्षेत्र में आगे बढ़ाना चाहती है और अपने वादे के मुताबिक करोड़ों युवाओं को रोजगार देना चाहती है तो उसे शोध, विज्ञान, तकनीक, उच्च शिक्षा और स्किल डेवलपमेंट के लिए बजट बढ़ाना होगा। इसके साथ ही तकनीकी संस्थानों में नियुक्ति और इनके संचालन आदि के मामले में उसे संकीर्ण नजरिए से ऊपर उठना होगा।
Article link
http://blogs.navbharattimes.indiatimes.com/nbteditpage/entry/skill-india-dream-is-far-away


Saturday, 2 August 2014

ताकि अजूबा बनकर न रह जाए विज्ञान

शशांक द्विवेदी
नवभारत टाइम्स(NBT)
पिछले कुछ सालों में विज्ञान संचार के लिए देश में कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों का आयोजन हुआ है। ये प्रयास सकारात्मक दिशा में हैं, लेकिन ऐसा लगता है कि हम अभी तक विज्ञान को आम आदमी से नहीं जोड़ पाए हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह शायद यह है कि विज्ञान संचार किसी के लिए रोजी-रोटी का विषय नहीं बन पाया है। देश के अधिकांश हिंदी अखबारों और इलेक्ट्रॉनिक चैनलों में विज्ञान पत्रकार नहीं हैं। न ही निकट भविष्य में इन माध्यमों में विज्ञान पत्रकारों के लिए कोई संभावना बनती दिख रही है। विज्ञान, अनुसंधान और शोध से संबंधित खबरें इधर प्रिंट मीडिया में थोड़ी जगह बनाने लगी हैं, लेकिन इलेक्ट्रॉनिक मीडिया इनसे कोसों दूर है। कोई भी देख सकता है कि विज्ञान और तकनीक से जुड़े मामलों में सिर्फ सनसनीखेज खबरें ही खबरिया चैनलों में जगह बना पाती हैं।

भरोसे का संकट
वैज्ञानिक जागरूकता और जन सशक्तीकरण के लिहाज से हिंदी में विज्ञान पत्रकारिता की महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है। लेकिन हम विज्ञान से जुड़े व्यक्तियों और वैज्ञानिकों को ही विज्ञान के क्षेत्र में कुशल मानते हैं। यही कारण है कि जो पत्रकार विज्ञान पत्रकारिता के क्षेत्र में उल्लेखनीय काम कर रहे हैं, उन्हें भी खास विश्वसनीय नहीं माना जा रहा। कई ऐसे विषय हैं जिन्हें खोजी विज्ञान पत्रकारिता का हिस्सा बनाया जाना चाहिए। लेकिन ज्यादातर विज्ञान पत्रकार इन मुद्दों पर कलम नहीं चलाते। कारण? इन्हें जब तक वैज्ञानिक संस्थाओं की मान्यता नहीं मिलती तब तक इन्हें प्रामाणिक नहीं माना जाएगा। हिंदी में विज्ञान संचार और स्थानीय स्तर पर देसी वैज्ञानिकों की जानकारी देने वाले लेखन का सामने आना बहुत जरूरी है। अमेरिका में हर दस में से एक परिवार अपनी भाषा में कोई न कोई वैज्ञानिक पत्रिका जरूर पढ़ता है। लेकिन हमारे देश में वैज्ञानिक पेशों से जुड़े लोगों के घरों में भी ऐसी पत्रिकाएं दिखाई नहीं देतीं।

विज्ञान संचार का उद्देश्य लोगों को विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में होने वाली गतिविधियों और खोजों की समग्र जानकारी प्रदान करना है। ऐसे अनेक वैज्ञानिक, विज्ञान संबंधी खोजें, पद्धतियां, पारंपरिक ज्ञान और नवाचार के प्रयोग मीडिया में जगह न मिलने के कारण अज्ञात रह जाते हैं। खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में स्थानीय संसाधनों से आविष्कारों में लगे लोग। हाल ही में अमेरिकी पत्रिका फोर्ब्स ने सात ग्रामीण भारतीय वैज्ञानिकों की जानकारी दी है। इन अविष्कारकों ने विज्ञान के महानगरीय परिवेश से दूर रहकर भी ऐसी तकनीकें ईजाद की हैं जिनसे देश भर में लोगों को जीवन में बदलाव के अवसर मिले हैं।

इनमें से ज्यादातर ने प्राथमिक शिक्षा भी प्राप्त नहीं की है। इनके नामों का चयन आईआईएम अहमदाबाद के प्राध्यापक और भारत में हनीबी नेटवर्क के संचालक अनिल गुप्ता ने फोर्ब्स पत्रिका के लिए किया था। वाकई खोज-परख कर सामने लाई गई ये जानकारियां विज्ञान पत्रकारिता का श्रेष्ठ उदाहरण हैं। रोजमर्रा की जिंदगी में विज्ञान और तकनीकी विषयों से संबंधित जानकारी लोगों की निर्णय क्षमता के विकास में भी मददगार हो सकती है।

हमारे देश में 3500 से भी अधिक हिंदी विज्ञान लेखकों का विशाल समुदाय है। लेकिन प्रतिबद्ध लेखक मुश्किल से 5 या 7 प्रतिशत ही होंगे। इन लेखकों ने विज्ञान के विविध विषयों और विधाओं में 8000 से भी अधिक पुस्तकें लिखी हैं, मगर इनमें से अधिकतर पुस्तकों में गुणवत्ता का अभाव है। मौलिक लेखन कम हुआ है और संदर्भ ग्रंथ ना के बराबर हैं। लोकप्रिय विज्ञान साहित्य सृजन में प्रगति अवश्य हुई है, लेकिन ऐसा विज्ञान साहित्य, जिसमें गुणवत्ता हो और जो जन साधारण की समझ में भी आ सके, कम लिखा गया है। इंटरनेट पर आज हिंदी में विज्ञान सामग्री अति सीमित है। विश्वविद्यालयों तथा राष्ट्रीय वैज्ञानिक संस्थानों में कार्यरत विषय विशेषज्ञ अपने आलेख, शोधपत्र और किताबें अंग्रेजी में लिखते हैं। हिंदी अथवा अन्य भारतीय भाषाओं के विज्ञान लेखन में वे कोई रुचि नहीं लेते। संभवत: भाषागत कठिनाई और वैज्ञानिक समाज की घोर उपेक्षा उन्हें इस दिशा में आगे नहीं आने देती।

अर्थव्यवस्था के भूमंडलीकरण और उदारीकरण के दबाव के कारण आज तकनीकी ज्ञान की जरूरत बढ़ गई है। नई सामाजिक-आर्थिक चुनौतियों का सामना करने के लिए भी भारतीय जन मानस में वैज्ञानिक चेतना का विकास करना अनिवार्य है। संचार माध्यम समाज में वैज्ञानिक दृष्टिकोण जगाने में अहम भूमिका निभा सकते हैं। अखबारों में नियमित विज्ञान कॉलम और टीवी में विज्ञान का स्लॉट होगा तो लोगों का इस ओर रुझान बढ़ेगा। आज इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में अंधविश्वास से जुड़े कार्यक्रम लगातार दिखाए जा रहे हैं और विज्ञान से जुड़े कार्यक्रमों का सर्वथा अभाव है। यह स्थिति बदलनी चाहिए। प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, दोनों को विज्ञान से जुड़ी खबरों और लेखों के प्रति ज्यादा संजीदगी दिखानी पड़ेगी। इसके बिना विज्ञान आम आदमी के लिए एक अजूबा ही बना रहेगा।

डिजिटल दौर में
संचार माध्यमों के साथ-साथ वैज्ञानिकों की भी जिम्मेदारी है कि वे विज्ञान को लोगों तक पहुंचाने में सहयोग करें। इंटरनेट और डिजिटल क्रांति के जरिए क्षेत्रीय भाषाओं में विज्ञान को और प्रभावी बनाया जा सकता है। देश में विज्ञान संचार के उन्नयन के लिए इसे व्यावहारिक और रोजगारपरक भी बनाना होगा। सरकार अगर अपनी तरफ से इस दिशा में कुछ भी करने की स्थिति में न हो तो उसे सरकारी विज्ञान पत्रिकाओं का पारिश्रमिक तो बढ़ा ही देना चाहिए।
Article link
http://blogs.navbharattimes.indiatimes.com/nbteditpage/entry/importance-of-science-communication

Saturday, 7 June 2014

रहने के लायक नहीं है शहर

साँसों में घुलता जहर 
नवभारतटाइम्स (NBT)
पिछले दिनों विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की एक रिपोर्ट के अनुसार  देश की राजधानी दिल्ली का वातावरण बेहद जहरीला हो गया है । इसकी गिनती विश्व के सबसे अधिक प्रदूषित शहर के रूप में होने लगी है। यदि वायु प्रदूषण रोकने के लिए शीघ्र कदम नहीं उठाए गए तो इसके गंभीर परिणाम सामने आएंगे। डब्ल्यूएचओ ने वायु प्रदूषण को लेकर 91 देशों के 1600 शहरों पर डाटा आधारित अध्ययन रिपोर्ट जारी की है। इसमें दिल्ली की हवा में पीएम 25 (2.5 माइक्रोन छोटे पार्टिकुलेट मैटर) में सबसे ज्यादा पाया गया है। पीएम 25 की सघनता 153 माइक्रोग्राम तथा पीएम 10 की सघनता 286 माइक्रोग्राम तक पहुंच गया है। जो कि स्वास्थ्य के लिए बेहद खतरनाक है। वहीं बीजिंग में पीएम 25 की सघनता 56 तथा पीएम 10 की 121 माइक्रोग्राम है। जबकि कुछ वर्षो पहले तक बीजिंग की गिनती दुनिया के सबसे प्रदूषित शहर के रूप में होती थी, लेकिन चीन की सरकार ने इस समस्या को दूर करने के लिए कई प्रभावी कदम उठाए। जिसके सकारात्मक परिणाम सामने आए हैं। डब्ल्यूएचओ के इस अध्ययन में 2008 से 2013 तक के आंकड़े लिए गए हैं। जिसमें वर्ष 2011 व 2012 के आंकड़ों पर विशेष ध्यान दिया गया है। एक अध्ययन के मुताबिक वायु प्रदूषण भारत में मौत का पांचवां बड़ा कारण है। हवा में मौजूद पीएम25 और पीएम10 जैसे छोटे कण मनुष्य के फेफड़े में पहुंच जाते हैं। जिससे सांस व हृदय संबंधित बीमारी होने का खतरा बढ़ जाता है। इससे फेफड़ा का कैंसर भी हो सकता है। दिल्ली में वायु प्रदूषण बढ़ने का मुख्य कारण वाहनों की बढ़ती संख्या है। इसके साथ ही थर्मल पावर स्टेशन, पड़ोसी राज्यों में स्थित ईंट भट्ठा आदि से भी दिल्ली में प्रदूषण बढ़ रहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन का नया अध्ययन यह बताता है कि हम वायु प्रदूषण की समस्या को दूर करने को लेकर कितने लापरवाह हैं और यह समस्या कितनी विकट होती जा रही है। खास बात यह है कि ये समस्या सिर्फ दिल्ली में ही नहीं है बल्कि देश के लगभग सभी शहरों की हो गई है .अगर हालात नहीं सुधरे तो वो दिन दूर नहीं जब शहर रहने के लायक नहीं रहेंगे । जो लोग विकास ,तरक्की और रोजगार की वजह से गाँव से शहरों की तरफ आ गयें है उन्हें फिर से गावों की तरफ रुख करना पड़ेगा ।
स्वच्छ वायु सभी मनुष्यों, जीवों एवं वनस्पतियों के लिए अत्यंत आवश्यक है। इसके महत्त्व का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि मनुष्य भोजन के बिना हफ्तों तक जल के बिना कुछ दिनों तक ही जीवित रह सकता है, किन्तु वायु के बिना उसका जीवित रहना असम्भव है। मनुष्य दिन भर में जो कुछ लेता है उसका 80 प्रतिशत भाग वायु है। प्रतिदिन मनुष्य 22000 बार सांस लेता है। इस प्रकार प्रत्येक दिन में वह 16 किलोग्राम या 35 गैलन वायु ग्रहण करता है। वायु विभिन्नगैसों का मिश्रण है जिसमें नाइट्रोजन की मात्रा सर्वाधिक 78 प्रतिशत होती है जबकि 21 प्रतिशत ऑक्सीजन तथा 0.03 प्रतिशत कार्बन डाइ ऑक्साइड पाया जाता है तथा शेष 0.97 प्रतिशत में हाइड्रोजन, हीलियम, आर्गन, निऑन, क्रिप्टन, जेनान, ओजोन तथा जल वाष्प होती है। वायु में विभिन्न गैसों की उपरोक्त मात्रा उसे संतुलित बनाए रखती है। इसमें जरा-सा भी अन्तर आने पर वह असंतुलित हो जाती है और स्वास्थ्य के लिए हानिकारक साबित होती है। श्वसन के लिए ऑक्सीजन जरूरी है। जब कभी वायु में कार्बन डाई ऑक्साइड, नाइट्रोजन के ऑक्साइडों की वृद्धि हो जाती है, तो यह खतरनाक हो जाती है ।
भारत को विश्व में सातवें सबसे अधिक पर्यावरण की दृष्टि से खतरनाक देश के रूप में स्थान दिया गया है । वायु शुद्धता का स्तर ,भारत के मेट्रो शहरों में पिछले 20 वर्षों में बहुत ही खराब रहा है आर्थिक स्तिथि ढाई गुना और औद्योगिक प्रदूषण चार गुना और बढा है। डब्ल्यूएचओ के अनुसार हर साल लाखों लोग खतरनाक प्रदूषण के कारण मर जाते हैं। वास्तविकता तो यह है कि पिछले 18 वर्ष में जैविक ईधन के जलने की वजह से कार्बन डाई ऑक्साइड का उत्सर्जन 40 प्रतिशत तक बढ़ चुका है और पृथ्वी का तापमान 0.7 डिग्री सैल्शियस तक बढ़ा है। अगर यही स्थिति रही तो सन् 2030 तक पृथ्वी के वातावरण में कार्बन डाई ऑक्साइड की मात्रा 90 प्रतिशत तक बढ़ जाएगी। 
सच बात तो यह है कि  पश्चिमी विज्ञान ने हमारे एक धड़े को प्रकृति का दोहन करने और उस पर वर्चस्व स्थापित करने का पाठ पढ़ाने में कामयाबी हासिल की। अंग्र्रेजों के पहले के भारत में प्रकृति के साथ सह अस्तित्व की मान्यता थी जहां कृषि, उत्पादन प्रणाली, यातायात और सामाजिक व धार्मिक कार्यक्रमों की योजना मौसम चक्र के अनुसार बनायी जाती थी। हमारा विज्ञान प्रकृति का सम्मान करता था लेकिन आधुनिक विज्ञान ने कोयले और कच्चे तेलों को उनकी खदानों से निकालने के साथ पुलों और बांधों को बनाने, भूजल के दोहन द्वारा बेमौसमी संकर फसलें उगाने, जीएम फसलों को पैदा करने की जानकारी दी। नए ज्ञान के इस रूप को अपनाने के दो सौ साल के भीतर ही आज हमने बड़े पैमाने पर पर्यावरण असंतुलन को जन्म दे दिया । जिससे अब हमें विकास के ऐसे माडल को अपनाना होगा जो पूरी तरह से सह अस्तित्व के सिध्दांत पर काम करता हो । 
पर्यावरण असंतुलन और विभिन्न प्रकार के प्रदूषण से बचने का का बस एक ही मूल मंत्र है कि विश्व में  सह अस्तित्व की संस्कृति का निर्वहन हो । सह अस्तित्व का मतलब प्रकृति के  अस्तित्व को सुरक्षित रखते हुए मानव विकास करे । प्रकृति और मानव दोनों का ही अस्तित्व एक दूसरें पर निर्भर है इसलिए प्राकृतिक संसाधनों का क्षय  न हो ऐसा संकल्प और ऐसी ही व्यवस्था की जरुरत है । अभी तक इस सिद्धांत को पूरे विश्व ने खासतौर पर  विकसित देशों ने विकासवाद की अंधी दौड़ की वजह से भुला रखा है ।
पर्यावरण असंतुलन दशकों से मानवजाति के लिए चिंता का सबब बना है। पृथ्वी का तापमान बढ़ा भी  है और इससे प्रकृति का संतुलन बिगड़ रहा है। वास्तव में देखा जाए तो पर्यावरण संरक्षण हमारे राजनीतिक एजेंडे में शामिल ही नहीं है। हाल में ही हुए लोकसभा चुनावों में अधिकांश राजनीतिक दलों ने अपने घोषणापत्र में पर्यावरण संबंधी किसी भी मुद्दे को जगह देना जरूरी नहीं समझा । देश में हर जगह ,हर तरफ हर पार्टी विकास की बातें करती है लेकिन ऐसे विकास का क्या फायदा जो लगातार विनाश को आमंत्रित करता है ।ऐसे विकास को क्या कहें जिसकी वजह से सम्पूर्ण मानवता का अस्तित्व ही खतरे में पढ़ गया हो । सिर्फ दिल्ली ही नहीं बल्कि देश के कई शहरों का वातावरण बेहद प्रदूषित हो गया है । इस प्रदूषण को रोकने के लिए कभी सरकार ने गंभीर प्रयास नहीं किये ,जो प्रयास किये गये वो नाकाफी साबित हुए और वायु प्रदूषण बढ़ता ही गया । इसे रोकने के लिए अब जवाबदेही के साथ एक निश्चित समयसीमा के भीतर  ठोस प्रयासों की दरकार है ।
Article link

Tuesday, 22 April 2014

हम अकालों की तरफ बढ़ रहे हैं

NBT

शशांक द्विवेदी 
(नवभारतटाइम्स (NBT) के संपादकीय पेज पर 22/04/2014 को प्रकाशित 
जलवायु परिवर्तन पर नजर रखने वाले संयुक्त राष्ट्र के अंतर सरकारी पैनल (आईपीसीसी) की पिछले दिनों जारी नई रिपोर्ट ने दुनिया भर में खतरे की घंटी बजा दी है। 'जलवायु परिवर्तन 2014: प्रभाव, अनुकूलन और जोखिम' शीर्षक इस रिपोर्ट के अनुसार यों तो जलवायु परिवर्तन का प्रभाव पहले ही सभी महाद्वीपों और महासागरों में फैल चुका है, लेकिन इसके कारण एशिया को बाढ़, गर्मी, सूखा तथा पेयजल से संबंधित गंभीर समस्याएं झेलनी पड़ सकती हैं। 
कृषि की प्रधानता वाले भारत जैसे देश के लिए यह काफी खतरनाक हो सकता है। जलवायु परिवर्तन की वजह से दक्षिण एशिया में गेहूं की पैदावार पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। वैश्विक खाद्य उत्पादन धीरे-धीरे घट रहा है। एशिया में तटीय और शहरी इलाकों में बाढ़ के चलते बुनियादी ढांचे, आजीविका और बस्तियों को काफी नुकसान हो सकता है। ऐसे में मुंबई, कोलकाता, ढाका जैसे शहरों पर खतरे की आशंका बढ़ सकती है। लोग ज्यादा, खाना कम क्लाइमेट चेंज दुनिया में खाद्यान्नों की पैदावार और आर्थिक समृद्धि को जिस तरह प्रभावित कर रहा है, उससे आने वाले समय में जरूरी चीजें इतनी महंगी हो जाएंगी कि विभिन्न देशों के बीच युद्ध जैसे हालात पैदा हो सकते हैं। यह खतरा उन देशों में ज्यादा होगा जहां कृषि आधारित अर्थव्यवस्था है। पर्यावरण का सवाल जब तक 'तापमान में बढ़ोतरी से मानवता के भविष्य पर खतरा' जैसे अमूर्त रूपों तक सीमित रहा, तब तक विकासशील देशों का इसकी ओर ध्यान नहीं गया। परंतु अब जलवायु चक्र का सीधा असर खाद्यान्न उत्पादन पर पड़ रहा है। किसान तय नहीं कर पा रहे कि कब बुवाई करें और कब फसल काटें। तापमान में बढ़ोतरी जारी रही तो आने वाले 15 सालों में खाद्य उत्पादन 40 प्रतिशत तक घट जाएगा। इससे पूरे विश्व में खाद्यान्नों की भारी कमी हो जाएगी। ऐसी स्थिति वर्ल्ड वार से कम खतरनाक नहीं होगी। एक नई अमेरिकी स्टडी में दावा किया गया है कि तापमान में एक डिग्री तक का इजाफा साल 2030 तक अफ्रीकी सिविल वार के रिस्क को 55 प्रतिशत तक बढ़ा सकता है। 


दुनिया जिस तरह विकास की दौड़ में अंधी हो रही है, उसे देखकर तो यही लगता है कि आज नहीं तो कल ग्लोबल वार्मिंग मानव सभ्यता के लिए भारी संकट पैदा करने वाली है। प्राकृतिक आपदाएं हमें बार-बार चेतावनी दे रही हैं। लोगों को इस कथित विकास की बेहोशी से जगाने के लिए ही अमेरिकी सीनेटर जेराल्ड नेल्सन द्वारा 22 अप्रैल 1970 से धरती को बचाने की मुहिम पृथ्वी दिवस के रूप में शुरू की गई थी। लेकिन, अभी यह दिवस सिर्फ रस्मी आयोजनों तक सिमट कर रह गया है। 

दुनिया भर में पर्यावरण संरक्षण को लेकर काफी बातें, सम्मेलन, सेमिनार आदि हो रहे हैं। लेकिन, इनके निष्कर्षों पर अमल की सूरत बनती दिखाई नहीं देती। केंद्रीय पर्यावरणमंत्री ने 3 साल पहले सभी वाहनों में फ्यूल एफिशंसी स्टैंडर्ड, मॉडल ग्रीन बिल्डिंग कोड और इंडस्ट्रीज के लिए एनर्जी एफिशंसी सर्टिफिकेट आवश्यक करने के लिए ऊर्जा संरक्षण कानून में संशोधन, देश के सभी कोयला आधारित ताप बिजलीघरों में 50 प्रतिशत प्रदूषण रहित कोयले का प्रयोग, वन क्षेत्र संरक्षण के लिए कठोर कदम आदि बातों का जिक्र किया था। परंतु वास्तविकता के धरातल पर इनमें से एक भी पहलू पर ठीक ढंग से काम नहीं हुआ है। हम अपने लक्ष्य से अभी बहुत दूर है। हालांकि यह मुद्दा 2009 में घोषित नैशनल एक्शन प्लान के 8 मिशनों में से एक है। 

पर्यावरण संबंधी मुद्दों पर सरकार ने अभी तक कोई गंभीर प्रयास नहीं किया। असल में पर्यावरण सरंक्षण का मुद्दा पार्टियों के राजनीतिक अजेंडे में ही नहीं है। देश में लोकसभा के चुनाव चल रहे हैं, लेकिन अधिकांश राजनीतिक दलों ने अपने घोषणापत्र में ऐसे किसी भी मुद्दे को जगह देना जरूरी नहीं समझा। 

जलवायु परिवर्तन पलायन की बड़ी वजह भी बनने जा रहा है। इंटरनेशनल ऑर्गनाइजेशन फॉर माइग्रेशन ने अनुमान लगाया है कि सन 2050 तक तकरीबन 20 करोड़ लोगों का पलायन जलवायु परिवर्तन की वजह से होगा जबकि उस समय तक दुनिया की आबादी बढ़ कर 9 अरब तक पहुंच जाने का अनुमान है। 

कितना महंगा विकास पर्यावरण असंतुलन के लिए जनसंख्या वृद्धि उतनी जिम्मेदार नहीं है जितनी उपभोगवादी संस्कृति। यही संस्कृति हर कीमत पर विकास वाली मनोवृत्ति बनाती है। क्या सिर्फ औद्योगिक उत्पादन में बढ़ोतरी कर देने को विकास माना जा सकता है? खासकर तब जब एक बड़ी आबादी को अपनी जिंदगी बीमारी और पलायन में गुजारनी पड़े? आखिर ऐसे विकास का क्या मतलब जो विनाश को आमंत्रित करता हो? ऐसे विकास को क्या कहें जिसकी वजह से संपूर्ण मानवता का अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाए? 

वास्तव में पर्यावरण संरक्षण ऐसा ही है जैसे विपरीत परिस्थितियों में भी अपने जीवन की रक्षा करने का संकल्प। सरकार और समाज के स्तर पर लोगों को पर्यावरण के मुद्दे पर गंभीर होना होगा, नहीं तो सबको प्रकृति का कहर झेलने के लिए तैयार रहना होगा। इसलिए आज और अभी हम संकल्प लें कि पृथ्वी को संरक्षण देने के लिए जो कुछ भी हम कर सकेंगे, वह करेंगे और अपने परिवेश में इस बारे में जागरूकता भी फैलाएंगे।
Article link





Saturday, 18 January 2014

कैसे रुके ई-मेल पर विदेशी पहरेदारी

नवभारत टाइम्स | Jan 18, 2014


शशांक द्विवेदी
पिछले दिनों चुनाव आयोग ने वोटर रजिस्ट्रेशन के लिए गूगल के साथ एक करार किया था, जिसके तहत गूगल को आगामी लोकसभा चुनाव से पहले वोटरों का ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन करने, मतदाताओं के सवालों पर चुनाव आयोग की वेबसाइट मैनेज करने, मैप के जरिये पोल बूथ ढूंढने और अन्य सुविधाएं मुहैया कराने की जिम्मेदारी दी जानी थी। साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों और प्रमुख राजनीतिक दलों ने इस करार पर गंभीर सवाल उठाये थे। हाल ही में अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए के पूर्व कर्मचारी एडवर्ड स्नोडेन के खुलासों की रोशनी में इस करार को सुरक्षा के लिहाज से घातक बताया गया था।
इस विवाद के बाद चुनाव आयोग ने अपने फैसले की समीक्षा करते हुए करार रद्द कर दिया। लेकिन, सवाल यह है कि आखिर ऐसा करार किया ही क्यों गया था? दुनिया भर में भारत सॉफ्टवेयर सुपर पावर के तौर पर जाना जाता है और यहां चुनाव आयोग द्वारा किसी भारतीय कंपनी की जगह गूगल जैसी विदेशी कंपनी को चुनना हैरान करने वाला था। इस करार के बाद गूगल के पास रजिस्टर्ड भारतीय वोटर्स का पूरा डेटाबेस होता, जबकि दुनिया भर के लोगों की जासूसी के लिए अमेरिकी खुफिया एजेंसी एनएसए के साथ गूगल की साठ-गांठ की बात सामने आ चुकी है।
दुनिया में इंटरनेट प्रणाली पर काफी हद तक अभी भी अमेरिका का नियंत्रण है और अधिकांश बड़ी इंटरनेट कंपनियां अमेरिकी हैं। सभी के सर्वर वहीं हैं और वे वहां के कानूनों से संचालित होती हैं। इसलिए सबसे बड़ा सवाल भारत सहित दूसरे देशों के सामने यह है कि वे साइबर दुनिया में अपनी निजता को कैसे बचाते हैं। यह सवाल निजता और साइबर सुरक्षा के साथ-साथ राष्ट्रीय सुरक्षा से भी जुड़ा है।इन्हीं चिंताओं को ध्यान में रखते हुए बीते साल भारत सरकार ने राष्ट्रीय साइबर सुरक्षा नीति-2013 जारी की थी। इसका मुख्य मकसद देश में ऐसा साइबर सिक्यॉरिटी सिस्टम तैयार करना है जो साइबर हमलों को रोकने में सक्षम हो। अब इसी दिशा में आगे बढ़ते हुए केंद्र सरकार नई ई-मेल नीति भी बना रही है। यह ई-मेल पॉलिसी पब्लिक रेकॉर्ड ऐक्ट के तहत बनाई जा रही है। इससे सरकारी डेटा भारत से बाहर के किसी सर्वर पर नहीं जा पाएगा।

इसके तहत वह सरकारी विभागों में जीमेल और याहू जैसी ईमेल सेवाओं के इस्तेमाल पर पाबंदी लगा सकती है। सरकार अपने सभी विभागों में ईमेल संवाद के लिए आधिकारिक वेबसाइट एनआइसी का इस्तेमाल करने की सोच रही है। यह नीति लगभग तैयार हो चुकी है और विभाग इसके क्रियान्वयन के लिए अन्य मंत्रालयों से बातचीत कर रहा है। इस नीति के बाद बड़ी संख्या में सरकार के संवेदनशील आंकड़ों को सुरक्षित रखा जा सकेगा। भारत सहित कई एशियाई देशों का सारा कामकाज गूगल, याहू जैसी वेबसाइट्स के जरिए होता है। इसलिए यहां की सरकारें संकट में घिर गई हैं। भारत चाहता है कि याहू, गूगल जैसी अमेरिकी कंपनियां भारत के साथ अहम जानकारियों को साझा करें। भारत में फोन और इंटरनेट की केंद्रीय मॉनिटरिंग की प्रणाली हाल में ही शुरू हुई है।
सुरक्षा मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति से मंजूरी के जरिए खुफिया एजेंसियों को फोन टैपिंग, ई मेल स्नूपिंग, वेब सर्च और सोशल नेटवर्क पर सीधी नजर रखने के अधिकार मिले हैं। मगर, इस पर अमल में दिक्कत है। गूगल, फेसबुक, माइक्रोसॉफ्ट आदि को नई मॉनिटरिंग नीति के तहत लाना और उनके सर्वर में दखल देना भारतीय एजेंसियों के लिए काफी मुश्किल साबित हो रहा है। ये कंपनियां अपने सर्वर देश से बाहर होने और विदेशी कानूनों के तहत संचालित होने का तर्क देती हैं। ऐसे में सरकारी डेटा बाहर भेजा जा सकता है, जो पब्लिक रेकॉर्ड ऐक्ट का उल्लंघन है।

देश के रक्षा और विज्ञान शोध संस्थानों तथा दूतावासों पर साइबर जासूसी का आतंक मंडरा रहा है। दुनिया के सबसे बड़े साइबर जासूसी रैकेट के खतरे से जूझ रहे इन संस्थानों को बेहद संवेदनशील जानकारियों और आंकड़ों के चोरी होने का डर है। साइबर संसार में जासूसी करने के लिए अमेरिका ने पूरे विश्व में लगभग 150 जगहों पर 700 सर्वर्स लगा रखे हैं। ब्रिटिश अखबार गार्जियन के मुताबिक इन सर्वर्स में से एक भारत में भी लगाया गया है। दिल्ली के नजदीक किसी स्थान पर इसके लगे होने की आशंका जताई गई है।

देश में साइबर सुरक्षा में मैन पावर की बहुत कमी है। साइबर सुरक्षा के आंकड़ों के अनुसार चीन में साइबर सुरक्षा के काम में सवा लाख विशेषज्ञ तैनात हैं। अमेरिका में यह संख्या 91 हजार से ऊपर है। रूस में भी लगभग साढ़े सात हजार माहिर लोग इस काम में लगे हुए हैं। अपने यहां यह संख्या सिर्फ 5560 है। फिलहाल स्थिति चिंताजनक है और तत्काल ऐक्शन की जरूरत है। इसमें दो राय नहीं कि सरकार की नई ई- मेल नीति सही दिशा में उठाया गया कदम है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या यह काफी है? वक्त का तकाजा है कि सरकार इस संवेदनशील मसले पर गंभीरता से गौर करे। सभी सवालों और चुनौतियों के जवाब उसी गंभीरता से निकलेंगे।
(लेखक विज्ञानपीडिया.कॉम के संपादक हैं) 

Saturday, 4 January 2014

एड्स माफिया के चंगुल में देश

शशांक द्विवेदी 
 एड्स के नाम पर घोटाला
नवभारतटाइम्स(NBT)
संयुक्त राष्ट्र की संस्था यूएनएड्स की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक भारत में एड्स के संक्रमण में 57 फीसद की कमी आई है। जबकि दुनियाभर के अधिक प्रभावित लगभग 25 देशों में एचआइवी के मामलों में 50 प्रतिशत तक कमी आई है। पिछले एक दशक ं में इससे मरने वालों की संख्या में भी भारी कमी देखी गई है। जिस तरह से एड्स के आंकड़ों के मामले में पिछले वर्षों में कुछ गैरसरकारी संगठनों ने विदेशी फंडिंग हासिल करने के लिए एड्स संक्रमित लोगों के आंकड़े बढ़ा-चढ़ाकर पेश किए, उसे देखते हुए किसी भी आंकड़े पर सहज विश्वास करना मुश्किल लगता है। लेकिन यह आंकड़ा संयुक्त राष्ट्र द्वारा जारी किया गया है, इसलिए इस पर विश्वास किया जा सकता है। कुछ लोग के लिए एड्स जानलेवा बीमारी हो सकती है लेकिन ज्यादातर लोग इसके नाम पर अपनी जेबे भर रहे है । 
कुछ साल पहले भाजपा नेता मुरली मनोहर जोशी ने संसद में कहा था कि ‘इन अवर कंट्री पीपल आर नाँट लिविंग विद एड्स , दे आर लिविंग आँन एड्स ‘अर्थात हमारे देश में लोग एड्स के साथ नहीं जी रहे हैं , बल्कि एड्स से अपनी रोजी-रोटी कमा रहें हैं । वाकई, आज देश एड्स माफिया के चंगुल में है । एड्स के नाम पर पैसे की बरसात हो रही है । एड्स को लेकर पूरी दुनिया में जितना शोर है उतने तो इसके मरीज भी नहीं है फिर भी दुनिया भर के स्वास्थ्य के एजेंडे में एड्स मुख्य मुद्दा बना हुआ है । और इसकी रोकथाम के लिए करांेडों डालर की धनराशि को पानी की तरह बहाया जा रहा है ।यही नहीं अब तो अधिकांश गैरसरकारी संगठन भी जन सेवा के अन्य कार्यक्रमों को छोड़कर एड्स नियत्रंण अभियानों को चलाने में रूचि दिखा रहे है। क्योंकि इसके लिए उनको आसानी से अनुदान मिल जाता है और इससे नाम और पैसा आराम से कमाया जा सकता है । कुछ विशेषज्ञों के अनुसार एड्स के हौवे की आड़ में कंडोम बनाने वाली कम्पनियाँ भारी मुनाफा कमाने के लिए ही इन अभियानों को हवा दे रही हैं । तभी तो एड्स से बचाव के लिए सुरक्षित यौन संबंधों की सलाह तो खूब दी जाती है, पर संयम रखने या व्यभिचार न करने की बात बिल्कुल नहीं की जाती है । यानि कि खूब यौनाचार करो पर कंडोम के साथ । 
पिछले दिनों एड्स से बचाने के लिए बनाने गए कॉन्डम वेंडिंग मशीन योजना में भी घोटाले की बात सामने आई। सीएजी ने सरकार के कॉन्डम वेंडिंग मशीनों पर किए गए खर्च पर सवाल करते हुए स्वास्थ्य मंत्रालय और नाको की खिंचाई की है। रिपोर्ट के अनुसार  सरकार ने एड्स जैसे संक्रमित रोग की रोकथाम के लिए देश भर में 22 हजार कॉन्डम वेंडिंग मशीनों लगाने के लिए 21 करोड़ रुपये खर्च किए, लेकिन इनमें से 10 हजार मशीनें गायब हैं और करीब 1100 मशीनें काम नहीं कर रही हैं। सीएजी की रिपोर्ट के अनुसार सरकार ने इस योजना के पहले चरण की प्रगति के बारे में जाने बिना ही दूसरे चरण के लिए पैसा जारी कर दिया । इस घपलेबाजी के बाद कैग ने नैशनल एड्स कंट्रोल ऑर्गनाइजेशन पर भी  सवाल खड़े किए है। दरअसल नाको ने 2005 में देश में एड्स की रोकथाम के लिए सार्वजनिक जगहों मसलन रेलवे स्टेशनों, रेड लाइट एरिया, बस स्टैंड ,विश्वविद्यालयों के आस पास ,बैंकों और डाकघरों आदि में ऐसी मशीनें लगाने का प्रस्ताव रखा था । । केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की मंजूरी मिलने पर इस योजना को शुरू कर दिया गया था । लेकिन अब इस योजना में बड़े पैमाने पर धाँधली सामने आयी है । 
दूसरी खतरनाक बीमारियों की उपेक्षा
हिमाचल दस्तक 
आज पूरी दुनिया में एड्स को लेकर जिस तरह का भय व्याप्त है और इसकी रोकथाम व उन्मूलन के लिए जिस तरह के जोरदार अभियान चलाये जा रहे हैं , उससे कैंसर, हार्टडिजीज, टी.बी. और डायबिटीज जैसी खतरनाक बीमारियां लगातार उपेक्षित हो रही हैं । और बेलगाम होकर लोगों पर अपना जानलेवा कहर बरपा रहीं है । पूरी दुनिया के आॅकडों की माने तो हर साल एड्स से मरने वालों की संख्या जहाँ हजारेां में होती है, वहीं दूसरी घातक बीमारियों की चपेट में आकर लाखों लोग अकाल ही मौत के मुंह में समा जाते हैं ।
देश में हर साल कैंसर के 7 से 9 लाख मामले सामने आते हैं और हर साल कैंसर के कारण चार लाख मौतें होती हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन मानता है कि देश में एक साल में मलेरिया 16000 से अधिक लोगों की जान ले लेता है। भारत में विभिन्न रोगों से होने वाली मृत्य  के दस सबसे प्रमुख कारणों में एड्स नहीं है। लेकिन केंद्र सरकार के स्वास्थ्य बजट का सबसे बड़ा हिस्सा इसमें चला जाता है। 
एड्स पर सरकार और दुनियाँ मेहरबान
सरकार ने अगले पांच साल के लिए तैयार किए गए राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण कार्यक्रम-4 (एनएसीपी-4) के तहत कुल 11394 करोड़ रुपये खर्च करने की योजना बनाई गई है। जिसमें विदेशी संस्थानों से  2762 करोड़ रुपये  मिलेगें । इसके साथ ही भारत और विश्व बैंक ने एड्स नियंत्रण कार्यक्रम के लिए 255 मिलियन अमरीकी डॉलर के बराबर ऋण समझौते पर हस्ताक्षर किए । पिछले दिनों दिल्ल्ली में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री ने विश्व बैंक से सहायता प्राप्त राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण परियोजना भी प्रारंभ की।  उनके अनुसार एचआइवी से बचाव भारत सरकार की उच्च प्रथमिकता है। आर्थिक मामलों से संबंधित कैबिनेट समिति ने राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण परियोजना को मंजूरी दे दी है। इस परियोजना पर 2550 करोड़ रुपये की राशि खर्च होगी। भारत की 99.5 प्रतिशत से अधिक आबादी अब एचआइवी से मुक्त है।  फिर भी सरकार एड्स उन्मूलन और रोकथाम के नाम पर हजारों करोड़ के कार्यक्रम चला रही है जिसमें सरकारी और गैर सरकारी संस्थाएँ बड़े पैमाने पर वित्तीय धाँधली कर रहें है ।
इस वर्ष के इकोनॉमिक सर्वे पर नजर डालें तो यह बात साफ हो जाती है कि देश में जन स्वास्थ्य के क्षेत्र में जितना पैसा खर्च किया जाना चाहिए उतना या उससे ज्यादा सिर्फ एक बीमारी के लिए खर्च किया जा रहा है।
भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में सेक्स, कण्डोम, एड्स के बारे में बात करने पर आज भी लोग काफी असहज महसूस करते हैं । इस सम्बन्ध में टीवी पर अगर कोई विज्ञापन भी प्रसारित हेाता है तो देखने वाले चैनल बदल देते हैं । फिर प्रश्न उठता है कि एड्स निवारण के नाम पर जो करोड़ो का फंड आता हे वो जाता कहाॅं है ? क्योंकि न तो इसके ज्यादा मरीज हैं, और जो मरीज हैं भी उन्हें भी सुनिश्चित दवा और सहायता उपलब्ध नहीं कराई जाती । वित्तीय अनियमितता अपने चरम पर है । एड्स नियत्रंण कार्यक्रम सिर्फ नोट कमाने का जरिया बनकर रह गये है वहीं एड्स की कीमत पर अन्य बीमारियों के लिए सरकार समुचित फंड और सुविधायें उपलब्ध नहीं करा पा रही है । 
article link

Thursday, 4 July 2013

भारी पड़ेगा भारतीय प्रफेशनल्स का विरोध

शशांक द्विवेदी॥
नवभारत टाइम्स(NBT) में प्रकाशित
पिछले दिनों अमेरिका में पेशेवर इंजीनियरों की सबसे बड़ी संस्था (आईईईई-यूएसए) ने सीनेट की न्यायिक समिति से आग्रह किया कि वह कॉम्प्रिहेंसिव इमिग्रेशन बिल एच-1 बी अस्थायी वीजा से संबंधित नियमों को और कठोर करे। संस्था ने सांसदों से आग्रह किया है कि वे इंडियन प्रफेशनल्स में लोकप्रिय एच-1 बी वीजा का सालाना कोटा बढ़ाए जाने की पहल को खारिज कर दें। संस्था ने इस वीजा के विस्तार का विरोध करते हुए कहा कि इससे अमेरिकी नौकरियां विदेशियों के हाथ में चली जाती हैं, जिससे देश की अर्थव्यवस्था को नुकसान होता है।

भारत के औद्योगिक संगठन नैसकॉम ने अमेरिका के प्रस्तावित इमीग्रेशन बिल को भेदभाव वाला बताते हुए इस पर चिंता जताई है। नैसकॉम के अनुसार इस बिल में वीजा पर निर्भर कंपनियों और इस पर निर्भर नहीं रहने वाली कंपनियों के बीच भेदभाव किया गया है। अमेरिका ने अपने यहां के आईटी प्रोफेशनल को ज्यादा मौके देने के इरादे से यह बिल तैयार किया है। इस वजह से वित्त वर्ष 2014 में भारत के लिए एच-1बी वीजा रिजेक्शन रेट अभी के 45 फीसदी से बढ़कर 60 फीसदी हो सकता है।
प्रतिभा पलायन के फायदे
1990 से लेकर 2007 तक अमेरिका ने दुनिया भर से लोगों को बुला कर अपनी कंपनियों को फायदा पहुंचाया। इन सत्रह सालों में अमेरिकी वर्कफोर्स में विदेशी कर्मचारियों का प्रतिशत 9.3 से बढकर 15.7 हो गया। कई कंपनियों की सफलता में भारतीय प्रफेशनल्स का विशेष योगदान रहा है । सस्ते दामों पर भारत से प्रतिभा का पलायन कराकर अमेरिकी कंपनियों ने जमकर मुनाफा कमाया। आज अमेरिका में मंदी वहां की कंपनियों को अपनी गिरफ्त में ले चुकी है। बेरोजगारी चरम पर है और सरकार इसका दबाव झेल रही है। असल में अमेरिका अपने नागरिकों की बेरोजगारी के लावा भारतीय प्रफेशनल्स की सफलता से भी घबराया हुआ है। अमेरिका के आईटी सेक्टर में बेरोजगारी की दर 6 फीसदी है और सामान्य बेरोजगारी दर 8 प्रतिशत है। इस वक्त अमेरिका में लगभग 20 लाख भारतीय प्रफेशनल्स रह रहे है, जिनमें ज्यादातर बैचलर या हायर डिग्री होल्डर है। पीएचडी डिग्री धारकों में भी भारतीयों की खासी तादाद है।

मंदी से निकली दलीलें
कठिन वीजा नियमों के कारण भारतीय इंजीनियरों का अमेरिका जाना कम हो जाएगा। इसका फायदा अमेरिकी इंजीनियरों को मिलेगा क्योंकि भारतीय इंजीनियरों से उन्हें प्रतिस्पर्धा नहीं करनी पड़ेगी। अमेरिका में काम कर रही इनफोसिस और विप्रो जैसी भारतीय कंपनियों को अमेरिकी इंजीनियरों से ही काम चलाना होगा। इन परिस्थितियों को देखकर अब भारतीय आईटी कंपनियां एच-1 बी वीजा के विकल्प तलाश कर रही हैं। ज्यादातर कंपनियों ने अमेरिका में ही भर्तियां करनी शुरू कर दी हैं। इस तरह बढ़ती बेरोजगारी से निपटने के लिए अमेरिका ने अपनी खुले व्यापार की नीति को त्यागकर संरक्षण की नीति अपनाई है। कठिन वीजा नियमों के कारण यह स्थिति एकबारगी भारत के लिए हानिकारक और अमेरिका के लिए लाभप्रद दिखती है। लेकिन इसके दूरगामी फायदे भारत को ही होंगे।

भारतीय कर्मियों के लिए अमेरिका में रोजगार के अवसर कम हो जाएंगे तो अमेरिकी इंजीनियरों के लिए रोजगार के अवसर कुछ बढ़ जाएंगे, परंतु दीर्घकाल में विपरीत प्रभाव पड़ेगा। एक रिपोर्ट के अनुसार अमेरिका द्वारा पेटेंट कराई गई तकनीकों में 40 प्रतिशत अप्रवासियों द्वारा ईजाद की गई है। अप्रवासियों द्वारा स्थापित कंपनियों ने साढ़े चार लाख रोजगार अमेरिका में उत्पन्न किए गए हैं। वर्ष 2011 के दौरान वहां शुरू की गई कंपनियों में से लगभग 30 फीसदी के संस्थापक प्रवासी नागरिक हैं।

आप्रवासी आधारित व्यापार से अमेरिकी अर्थव्यवस्था को हर साल सैकड़ों अरब डॉलर से ज्यादा का राजस्व प्राप्त होता है। इन कड़े नियमों के बाद राजस्व में भी कमी आएगी। पूरा विश्व भारतीय प्रफेशनल्स की क्षमता और योग्यता का कायल है। माइक्रोसॉफ्ट प्रमुख बिल गेट्स कहते रहे हैं कि एच-1 बी वीजा की संख्या को बढ़ाया जाए ताकि उनकी कंपनी को निपुण और प्रतिभावान भारतीय इंजीनियरों की सेवा प्राप्त हो सके। अंतरराष्ट्रीय बाजार में आईआईटी के छात्रों के महत्व का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पिछले दिनों अमेरिकी राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार रहे जनरल वेसले क्लार्क ने कहा था कि अगर किसी व्यक्ति के पास आईआईटी की डिग्री हो तो उसे तुरंत अमेरिकी नागरिकता मिल जाएगी। बिल गेट्स का ही कथन है कि बतौर सॉफ्टवेयर इंजीनियर आईआईटियन उनकी पहली पसंद हैं।

अमेरिका की राष्ट्रीय खुफिया परिषद (एनआईसी) द्वारा हाल में प्रकाशित रिपोर्ट ग्लोबल ट्रेंड 2030 के अनुसार भारत 2030 तक विश्व की सबसे बड़ी आर्थिक ताकत बनकर उभर सकता है और उसे ऐसा बनाने में भारतीय प्रतिभाओं प्रफेशनल्स की अहम भूमिका होगी। वैश्विक महत्व की इस अमेरिकन रिपोर्ट के साथ ही कई सर्वेक्षण भारत में समृद्धि का नया परिदृश्य रेखांकित करते दिख रहे हैं।

बुद्धि की उत्पादन लागत
कठिन वीजा नियमों के बावजूद अमेरिकी कंपनियों द्वारा भारतीय कंपनियों को सॉफ्टवेयर के ठेके मिलते रहेंगे क्योंकि भारतीय इंजीनियर कम वेतन पर अच्छा काम करते हैं। मूल अंतर यह होगा कि अभी तक भारतीय कंपनियां आधा काम अमेरिका और आधा भारत में कराती थीं। अब वे पूरे काम को भारत में ही कराने का प्रयास करेंगी। इससे अमेरिका को दोहरा नुकसान होगा। भारतीय इंजीनियर अपने देश में रहकर अपनी समझ और प्रतिभा का उपयोग कर सकेंगे, जिससे नई तकनीकों का आविष्कार भारत में ही होने लगेगा। इसका सीधा लाभ भारत को मिलेगा। भारतीय कंपनियों को अमेरिका के बढ़ते संरक्षणवाद का लाभ आउटसोर्सिंग के माध्यम से उठाने के लिए तैयार होना चाहिए। उन्हें समझना चाहिए कि इस स्थिति में अंतिम तथ्य बुद्धि की उत्पादन लागत से तय होगा। यदि सॉफ्टवेयर बनाने की बौद्धिक क्षमता का उत्पादन भारत में दस लाख रुपये में हो जाता है और अमेरिका में उसी क्षमता के उत्पादन की लागत 50 लाख आती है तो भारत को फायदा होना ही है। ठीक उसी तरह, जैसे प्रखर भारतीय बुद्धि को बाहर रखने से अमेरिका का नुकसान होना
निश्चित है ।  
article link
http://navbharattimes.indiatimes.com/thoughts-platform/viewpoint/the-u-s-has-a-huge-deficit-of-indian-professionals/articleshow/20859528.cms?fb_action_ids=469482216479969&fb_action_types=og.recommends&fb_source=aggregation&fb_aggregation_id=288381481237582