Wednesday, 1 April 2026

एलपीजी का सशक्त विकल्प है बायोगैस

 डॉ. शशांक द्विवेदी

परियोजना प्रबंधक, टीएसएससी

(कौशल विकास एवं उद्यमिता मंत्रालय,भारत सरकार)

भारत आज ऊर्जा परिवर्तन के एक महत्वपूर्ण दौर से गुजर रहा है। एक ओर प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना जैसी योजनाओं ने करोड़ों घरों तक एलपीजी पहुंचाकर स्वच्छ ईंधन की क्रांति लाई है, वहीं दूसरी ओर बढ़ती आयात निर्भरता, कीमतों में उतार-चढ़ाव और वैश्विक भू-राजनीतिक संकटों ने देश की ऊर्जा सुरक्षा पर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं। हाल के समय में पश्चिम एशिया के तनाव के कारण एलपीजी आपूर्ति प्रभावित होने की घटनाओं ने इस चिंता को और गहरा किया है . अमेरिकाइजरायल और ईरान के बीच बढ़ते तनाव ने वैश्विक ऊर्जा बाजार को अस्थिर कर दिया है। यह स्थिति भारत जैसे ऊर्जा आयात पर निर्भर देश के लिए एक चेतावनी है कि अब ऊर्जा सुरक्षा के प्रश्न को टालना संभव नहीं है।अंतरराष्ट्रीय संकटों का सीधा असर आम नागरिकों पर पड़ता हैपेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ते हैं, महंगाई बढ़ती है और घरेलू रसोई तक प्रभावित होती है। ऐसे में यह जरूरी हो जाता है कि हम पारंपरिक ऊर्जा स्रोतों के विकल्प तलाशें। इसी संदर्भ में बायोगैस एक मजबूत और टिकाऊ समाधान के रूप में उभरती है।

बायोगैस जैविक कचरेजैसे गोबर, कृषि अवशेष, रसोई कचरा आदिसे उत्पन्न गैस है, जिसमें मुख्य रूप से मीथेन होती है। यह गैस खाना पकाने, बिजली उत्पादन और वाहन ईंधन के रूप में भी इस्तेमाल की जा सकती है।भारत जैसे कृषि प्रधान देश में बायोगैस की अपार संभावनाएं हैं। गांवों में पशुधन और जैविक कचरे की उपलब्धता इसे एक व्यवहारिक विकल्प बनाती है।

एलपीजी का विकल्प कैसे बन सकती है बायोगैस?

गांवों में छोटे और मध्यम आकार के बायोगैस प्लांट स्थापित कर स्थानीय स्तर पर गैस का उत्पादन किया जा सकता है। इससे एलपीजी सिलेंडर पर निर्भरता कम होगी। आधुनिक तकनीक के माध्यम से बायोगैस को शुद्ध कर कंप्रेस्ड बायोगैस (CBG) बनाया जा सकता है, जो एलपीजी और सीएनजी का प्रभावी विकल्प है।  गोबर-धन योजनाऔर ‘SATAT’ (Sustainable Alternative Towards Affordable Transportation) जैसी योजनाएं बायोगैस उत्पादन को बढ़ावा दे रही हैं। इनके माध्यम से किसानों और उद्यमियों को आर्थिक सहायता और बाजार उपलब्ध कराया जा रहा है। शहरों में निकलने वाले जैविक कचरे को बायोगैस में बदलकर केवल ऊर्जा पैदा की जा सकती है, बल्कि कचरा प्रबंधन की समस्या का भी समाधान किया जा सकता है।

भारत में एलपीजी (रसोई गैस) की स्थिति

भारत में एलपीजी की सालाना खपत लगभग 28–31 मिलियन टन (MMT) के आसपास है  भारत में एलपीजी का घरेलू उत्पादन लगभग 10–12 MMT प्रति वर्ष है। यानी कुल मांग का केवल 35–40% ही देश में बनता है .भारत को हर साल लगभग 18–22 MMT LPG आयात करनी पड़ती है . यानी 60–65% LPG आयात पर निर्भरता .भारत आधा से ज्यादा एलपीजी बाहर से खरीदता है ।आयात का बड़ा हिस्सा मिडिल ईस्ट (खाड़ी देशों) से आता है।इसलिए हॉर्मुज स्ट्रेट जैसे संकट भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए सीधा खतरा हैं

भारत में अभी लगभग 132 CBG (Compressed Biogas) प्लांट चल रहे हैं . इनकी कुल उत्पादन क्षमता लगभग 920 टन प्रति दिन है . 920 टन/दिन ≈ 3.3 लाख टन/वर्ष (0.33 MMT) .  अभी बायोगैस का योगदान 1% से भी कम है भारत 20 MMT CBG बना सकता है . कुल संभावित क्षमता (कचरा + गोबर + कृषि). कुल क्षमता लगभग 60 MMT तक मानी जाती है  इसका मतलब भारत अपनी पूरी LPG जरूरत (30 MMT) बायोगैस से पूरा कर सकता है फिलहाल अभी लगभग 300+ नए प्लांट निर्माणाधीन हैं। इंटरनेशनल  एनर्जी  एजेंसी  के अनुसार भारत 2030 तक बायोगैस उत्पादन 7 गुना तक बढ़ सकता है।

बायोगैस केवल सस्ती है बल्कि पर्यावरण के अनुकूल भी है। इससे कार्बन उत्सर्जन कम होता है, जैविक खाद (स्लरी) मिलती है और किसानों की आय बढ़ती है। साथ ही, यह स्थानीय रोजगार के अवसर भी पैदा करती है। हालांकि बायोगैस के क्षेत्र में कुछ चुनौतियां भी हैंजैसे शुरुआती निवेश, तकनीकी जानकारी की कमी और जागरूकता का अभाव। भारत में बायोगैस को लेकर अभी भी कई भ्रांतियाँ हैं। कई लोग इसेगांव की तकनीकमानते हैं या इसके उपयोग में असुविधा महसूस करते हैं।दूसरी ओर, एलपीजी को आधुनिक, सुरक्षित और सुविधाजनक ईंधन के रूप में देखा जाता है। यही कारण है कि शहरी और यहां तक कि ग्रामीण क्षेत्रों में भी लोग एलपीजी को प्राथमिकता देते हैं।इसके लिए जरूरी है कि सरकार और निजी क्षेत्र मिलकर प्रशिक्षण, वित्तीय सहायता और तकनीकी समर्थन उपलब्ध कराएं।

वर्तमान वैश्विक संकट ने यह स्पष्ट कर दिया है कि ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता अब विकल्प नहीं, बल्कि आवश्यकता है। बायोगैस जैसे स्वदेशी और टिकाऊ विकल्पों को अपनाकर भारत केवल अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा कर सकता है, बल्कि पर्यावरण संरक्षण और ग्रामीण विकास की दिशा में भी महत्वपूर्ण कदम बढ़ा सकता है।

आज जरूरत है एक समन्वित प्रयास कीनीतियों, तकनीक और जनभागीदारी के जरिएताकि बायोगैस को एलपीजी का वास्तविक विकल्प बनाया जा सके और भारत ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बन सके।

 

Tuesday, 28 October 2025

एआई के युग में इंसान को आगे रखने वाली क्षमताएँ

आज हम ऐसे युग में प्रवेश कर चुके हैं जहाँ कृत्रिम बुद्धिमत्ता (Artificial Intelligence – AI) हमारे जीवन, कामकाज और सोचने के तरीके को बदल रही है। एआई आज हर क्षेत्रशिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, बैंकिंग, उद्योग, मीडियामें अपनी पैठ बना चुकी है। जहाँ एक ओर यह तकनीक कार्यक्षमता बढ़ा रही है, वहीं दूसरी ओर यह चिंता भी बढ़ा रही है कि भविष्य में क्या मनुष्य के रोजगार छिन जाएंगे?

यह सवाल बेहद प्रासंगिक है: क्या इंसान एआई से मुकाबला कर पाएगा?

जवाब हैहाँ, बिल्कुल कर सकता है। लेकिन इसके लिए ज़रूरी है कि हम ऐसी क्षमताएं विकसित करें जिनकी बराबरी एआई कभी नहीं कर सके।

 

एआई की ताकत और सीमायें

एआई तेज़ी से डेटा को प्रोसेस कर सकता है, पैटर्न पहचान सकता है, और जटिल निर्णय भी ले सकता है। लेकिन यह एक सच्चाई है कि एआई में मानवीय भावनाएं, नैतिकता, रचनात्मकता और सहानुभूति नहीं होती।एआईसोचतानहीं, बल्किसीखाए गए पैटर्नपर काम करता है। यह वही कर सकता है जो उसे सिखाया गया है; नई परिस्थितियों में मानवीय समझ या संवेदनशीलता नहीं दिखा सकता।

इसलिए, भविष्य उन्हीं लोगों का होगा जो अपनी मानवीय क्षमताओं को निखारेंगे और तकनीक को अपना सहयोगी बनाएंगे, प्रतिस्पर्धी नहीं।

एआई से आगे रहने के लिए विकसित की जाने वाली मुख्य क्षमताएं

भावनात्मक बुद्धिमत्ता (Emotional Intelligence - EI)

एआई के पास भावनाएं नहीं हैं, लेकिन इंसानों के पास यह सबसे बड़ी ताकत है।नेतृत्व, टीम वर्क, ग्राहक सेवा, या लोगों के साथ जुड़ने की क्षमताये सब भावनात्मक समझ से ही संभव हैं। अपनी सहानुभूति, संवाद शैली और दूसरों की भावनाओं को समझने की क्षमता को बढ़ाएं। भविष्य में जो व्यक्तिलोगों को समझनाजानता है, वहीमशीनों को चलानाभी बेहतर कर पाएगा।

रचनात्मकता (Creativity)

रचनात्मक सोच वह क्षेत्र है जहाँ एआई अभी भी पीछे है। एआई मौजूदा डेटा के आधार पर सुझाव देता है, लेकिन नई और मौलिक अवधारणा गढ़ने की क्षमता केवल मनुष्य के पास है।  कलाकार, डिजाइनर, लेखक, उद्यमी और इनोवेटरइन सभी को भविष्य में बड़ा स्थान मिलेगा।  रचनात्मक सोच का अभ्यास करें: पेंटिंग, कहानी लेखन, संगीत, डिजाइन थिंकिंग या किसी समस्या के नए समाधान निकालना।

सोचने की क्षमता (Critical Thinking):
सिर्फ़ जानकारी याद कर लेना काफी नहीं है। ज़रूरी है सवाल करना,“ये बात सच में सही है या नहीं? इसके पीछे कौन-सी धारणाएँ छिपी हैं? इसका दूसरा पहलू क्या है?” मशीन आपको बहुत जवाब दे सकती है, लेकिन सही को चुनना और गहराई से समझना इंसान ही कर सकता है।
आपके सामने कोई अख़बार की ख़बर आती है कियह दवा हर बीमारी का इलाज है।मशीन उस खबर को हज़ारों तरीकों से कॉपी कर सकती है, लेकिन एक इंसान ही यह सवाल पूछ सकता है,”क्या यह सच है? इसके पीछे किसका लाभ छिपा है? क्या इसके प्रमाण हैं?”
जैसे किसी समझदार किसान की तरह, जो बीज बोने से पहले मिट्टी को परखता है। वह आँख बंद करके नहीं बोता। उसी तरह, सोचने वाला इंसान भी हर बात को परखता है। यही आदत आपको धोखे से बचाती है और सच्चाई तक ले जाती है।

 ज़िम्मेदारी और अनुशासन (Conscientiousness):
यह आदत है अपने वचन निभाने की। वह काम पूरा करना जो आपने तय किया, चाहे मन न हो, चाहे थकान हो। मशीन को मेहनत करने की ज़रूरत नहीं होती, लेकिन इंसान जब मुश्किल होने पर भी टिकता है, तभी असली ताक़त पैदा होती है।
थॉमस एडिसन, बल्ब बनाने वाला वैज्ञानिक,उसने हज़ारों बार प्रयोग किया और असफल हुआ। अगर वह बीच में छोड़ देता, तो आज अँधेरा ही रहता।
अनुशासन का मतलब है कि आप रोज़-रोज़ छोटे कदम उठाएँ। जैसे छात्र हर दिन थोड़ा-थोड़ा पढ़ाई करे, चाहे मन न भी करे। धीरे-धीरे वही आदत उसका भविष्य बदल देती है। मशीन को थकान नहीं होती, लेकिन इंसान का असली सौंदर्य यह है कि वह थक कर भी चलते रहने का हौसला रखता है।
लिखने की कला (Writing):
लिखना केवल शब्दों को जोड़ना नहीं है, यह सोच को साफ करना है। जब आप लिखते हैं तो दिमाग की उलझनें सुलझती हैं। आपको पता चलता है कि आप सच में क्या मानते हैं। मशीन पैराग्राफ बना सकती है, लेकिन आपका अपना अनुभव और आपकी सच्चाई वही लिख सकता है जो आप हैं।
गांधीजी अगर सिर्फ़ भाषण देते और कभी लिखते नहीं, तो उनकी बात कितनी दूर तक जाती? लेकिन उनकी लिखी हुई “हिंद स्वराज” जैसी किताब आज भी लोगों को सोचने पर मजबूर करती है।लिखना आपके विचारों को साफ करता है। जब आप डायरी लिखते हैं, तो अपने मन का बोझ हल्का करते हैं। जब आप पत्र लिखते हैं, तो रिश्तों में गहराई लाते हैं। और जब आप लेख लिखते हैं, तो समाज को दिशा देते हैं। यही वह चीज़ है जो मशीन नहीं कर सकती, क्योंकि उसके पास आपका जीवन, आपका दर्द, और आपकी सच्चाई नहीं है।
बातचीत और समझौता (Communication & Negotiation):
जीवन में हर जगह बातचीत है,घर में, काम पर, समाज में। अच्छी बातचीत का मतलब है सुनना, समझना और भरोसा पैदा करना। जब मतभेद हों तो मिल-बैठकर रास्ता निकालना। यही असली समझदारी है।
महाभारत में युद्ध से पहले कृष्ण ने दोनों पक्षों को समझाने की कोशिश की। उन्होंने बातचीत की, समझौते के रास्ते सुझाए, ताकि खून-खराबा न हो। यही असली संचार और वार्ता है,मतभेद को समझना और हल निकालना।
आज भी, चाहे नौकरी में बॉस से बात करनी हो या घर में परिवार से, बातचीत ही सब ठीक करती है। मशीन चैट कर सकती है, पर दिल से सुनकर भरोसा दिलाना सिर्फ़ इंसान कर सकता है।

नेतृत्व और प्रेरणा (Leadership & Motivation):
नेता होना आदेश देना नहीं है। नेता होना मतलब है लोगों को रास्ता दिखाना, उन्हें उम्मीद देना। यह जिम्मेदारी लेने की हिम्मत है। जब आप ईमानदारी से जीते हैं, तो लोग आपके साथ खड़े होकर बेहतर बनने लगते हैं। मशीन कभी लोगों को यह एहसास नहीं दिला सकती कि उनकी ज़िंदगी कीमती है,यह केवल इंसान ही कर सकता है।
नेतृत्व का असली मतलब है लोगों को अपने साथ खड़ा करना, उन्हें उम्मीद और दिशा देना।जब स्वतंत्रता आंदोलन चल रहा था तो लाखों लोग क्यों गांधीजी के पीछे चले? क्योंकि उन्होंने लोगों को केवल आदेश नहीं दिए, बल्कि विश्वास दिलाया कि उनका संघर्ष अर्थपूर्ण है। उन्होंने उदाहरण से प्रेरित किया।
आज भी एक अच्छा नेता वही है जो सबसे आगे चलकर कठिनाई उठाए, और पीछे वालों को कहे,”डरिए मत, मैं आपके साथ हूँ।यह काम कोई मशीन नहीं कर सकती।


समस्या-समाधान और आलोचनात्मक सोच

 

एआई किसी समस्या का समाधान डेटा के आधार पर करता है, लेकिन जटिल मानवीय या सामाजिक समस्याओं का समाधान केवल इंसान ही सोच सकता है।क्यों, “कैसेऔरक्यापूछने की आदत डालें। समस्या को देखने के कई दृष्टिकोण अपनाएं और विश्लेषण करने की क्षमता विकसित करें।

अनुकूलनशीलता (Adaptability)

 

तकनीक तेजी से बदल रही है, इसलिएसीखते रहनाही भविष्य का सबसे बड़ा हथियार है।

👉 नई तकनीकों, टूल्स और ट्रेंड्स के साथ खुद को अपडेट रखें।

👉 अगर आप एक कौशल में विशेषज्ञ हैं, तो उससे जुड़े नए क्षेत्रों में भी ज्ञान बढ़ाएं।

नैतिक और सामाजिक समझ (Ethical & Social Intelligence)

 एआई के प्रयोग के साथ कई नैतिक सवाल भी उठते हैंडेटा गोपनीयता, फेक न्यूज, साइबर सुरक्षा आदि।

👉 भविष्य में वे पेशेवर मूल्यवान होंगे जो तकनीक के साथ-साथ उसकी नैतिक सीमाओं को भी समझेंगे।

👉 समाज के लिए जिम्मेदार तकनीकी उपयोग की समझ विकसित करना बहुत ज़रूरी है।

इसलिएभविष्य में आपको मशीन से मुकाबला करने की ज़रूरत नहीं है। वह तो हमेशा तेज़ रहेगी। आपको इंसानियत को सँभालना है,स्पष्ट सोचमज़बूत चरित्रसच लिखने-बोलने की हिम्मतबातचीत और समझौते की कलाऔर दूसरों को प्रेरित करने की शक्ति। यही असली ताक़त हैयही गुण कभी भी बदले नहीं जा सकते।
भविष्य में असली ताक़त उन लोगों के पास होगी जिनके पास ये मानवीय गुण होंगे:सवाल पूछने की हिम्मत,कठिनाई में टिके रहने का अनुशासन,अपने विचारों को लिखकर स्पष्ट करने की कला,भरोसे से बातचीत करने की क्षमता और दूसरों को प्रेरित करने का नेतृत्व ।यही वह रास्ता है जिससे इंसान हमेशा मशीन से आगे रहेगा।